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Home गेस्ट ब्लॉग

शहादत से पहले भगत सिंह का साथियों को अन्तिम पत्र

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 23, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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22 मार्च, 1931

साथियो,

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स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता. लेकिन एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं कैद होकर या पाबन्द होकर जीना नहीं चाहता.

मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है- इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊंचा मैं हर्गिज नहीं हो सकता.

आज मेरी कमजोरियां जनता के सामने नहीं हैं. अगर मैं फांसी से बच गया तो वे जाहिर हो जाएंगी और क्रांति का प्रतीक चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते मेरे फांसी चढ़ने की सूरत में हिन्दुस्तानी माताएं अपने बच्चों के भगतसिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी.

हां, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हजारवां भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतन्त्र, जिंदा रह सकता तब शायद उन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता. इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फांसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक भाग्यशाली कौन होगा ? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इन्तजार है. कामना है कि यह और नजदीक हो जाए.

आपका साथी – भगतसिंह

मूल पत्र यहीं समाप्त होता है और अन्तिम अक्षर अस्पष्ट हैं. -सं.

Date Written: March 22, 1931
Author: Bhagat Singh
Title: Last Letter to Comrades before Martyrdom (Sahadat se pahale sathiyon ko antim patra).

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