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बनारस में जवान और किसान vs मोदी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 11, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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कौन सोच सकता था कि किसी दिन, एक जवान और थोड़े से किसान प्रधानमन्त्री को लोकसभा चुनाव में चुनौती देंगे ! एक शक्तिशाली चुनाव आयोग ने जवान को तो चुनावी दौड़ से बाहर कर दिया है, लेकिन किसान इसके गले की हड्डी बनकर अटक गए हैं.

‘प्रधानमन्त्री व्यक्ति नहीं देश की एक संस्था है. प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ साजिश मतलब देश से गद्दारी’ – बनारस में उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यह धमकी भी किसी काम नहीं आई.

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द इंडियन एक्सप्रेस, नई दिल्ली के 9 मई के अंक में ज्योति पुनवानी, बम्बई की एक स्वतंत्र पत्रकार हैं, का  “बनारस में जवान और किसान” शीर्षक से प्रकाशित लेख का अनुवाद हिंदी के पाठकों के राजनैतिक समझ और सही-गलत का निर्णय करने के सामर्थ्य को बढ़ायेगा. द इंडियन एक्सप्रेस से साभार के साथ लेख के मूल अंग्रेजी पाठ का लिंक भी दिया है – विनय ओसवाल ]

बनारस में जवान और किसान vs मोदी

“जय जवान, जय किसान” एक शक्तिशाली पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया यह शक्तिशाली नारा, आधी सदी से भी अधिक समय गुजर जाने के बाद भी जनमानस में अंकित है. चार शब्दों में, इस नारे ने हमारे समाज के उन दो वर्गों के महत्व को समझाया, जो उस समय तक महत्वहीन बने हुए थे.

कौन सोच सकता था कि किसी दिन, यही  जवान और किसान  प्रधानमंत्री को लोकसभा चुनाव में चुनौती देने को खड़े हो जाएंगे ! एक “शक्तिशाली” चुनाव आयोग ने युवा जवान को तो चुनावी दौड़ से बाहर कर दिया, पर वह अभी तक किसान से छुटकारा पाने में कामयाब नहीं हुआ है.

पिछले महीने, तमिलनाडु के 111 किसानों ने वाराणसी से पीएम के खिलाफ लड़ने का इरादा जताया है. तमिलनाडु, वाराणसी से बहुत दूर है, लेकिन इन किसानों ने 2017 में इससे भी अधिक दूरी तय करके दिल्ली पहुंचे थे. उन्होंने दिल्ली में 100 दिन बिताए थे, शासकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए. उन्होंने संसद के सामने अपने वस्त्र उतार निर्वस्त्र हो कर, खुद को  कीचड़ में दफन कर के और कई अन्य प्रकारों से प्रदर्शन किया. आश्चर्य, किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया. (न मोदी जी का, न उनकी सरकार के कृषिमन्त्री का, न संगठन के किसी पदाधिकारी का, इस ओर ध्यान नहीं गया. हालांकि तब यह अखबारों और टीवी पर भी उछला था.)

तमिलनाडु के किसानों के बाद, तेलंगाना के हल्दी उत्पादक किसानों ने नरेंद्र मोदी से लड़ने का फैसला किया. दोनो ही जगह के किसान यह जानते थे कि यह लड़ाई वह हार जाएंगे. परन्तु 2014 के वादों को पूरा करने में प्रधानमन्त्री की विफलता पर देश का ध्यान आकर्षित करने के लिए उन्होंने यह मार्ग चुना था.




यदि लाल बहादुर शास्त्री के समय में किसान और जवान देश के जनमानस में महत्वहीन थे, तो आज भी वे हमारे समाज के सबसे उपेक्षित वर्गों में ही शामिल हैं. पर आज वह महत्वहीन होते हुए भी अदृश्य नहीं है तो सिर्फ इसलिए कि उन्होंने अपनी समस्याओं की तरफ हम सब का ध्यान आकर्षित करने के अपने ही तरीके गढ़े हैं और अपने तरीकों से उन्हें अभिव्यक्त भी किया है. बनारस में प्रधानमन्त्री के खिलाफ चुनावी रण में उतारना भी उन्हीं के दिमाग की उपज है.

बनारस में प्रधानमन्त्री पर देश भर से छोड़े जा रहे आलोचनाओं के वाणों की पीड़ा भक्त भी जीवनभर भुला नही पाएंगे. पुलवामा के बाद हर तरह की आलोचनाओं से अपने को सुरक्षित रखने के लिए सेना को ढाल बना लिया है. इस चुनाव अभियान में वोट पाने के लिए भक्तों का नायक सेना की उप्लब्द्धियों को धड़ल्ले से अपनी बता रहा है. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है. फिर भी सेना का बर्खास्त जवान तेज बहादुर यादव मोदी जी के सामने एक बड़ी चुनौती बन गया है.

2017 तक, जब उसने जली हुई रोटियों और बेस्वाद पनिहल दाल को दिखाते हुए एक वीडियो पोस्ट किया, जो सीमा पर जवानों को परोसी जाती है, तब यादव सीमा सुरक्षा बल का हिस्सा थे. ये सैनिक शायद हमारे सशस्त्र बलों में कुछ ठिन कार्य करते हैं. अनुशासनहीनता के लिए अपने जवान को बर्खास्त करने में बीएसएफ को सिर्फ तीन महीने लगे, लेकिन उनके आरोपों की सच्चाई की जांच करने में एक साल लग गया.

तो क्या यह हरियाणवी जवान भी मोदी का विरोध करने वालों की तरह राष्ट्र विरोधी है ? और क्या किसान भी राष्ट्र विरोधी हैं ?

नामांकन करने की कोशिश करने वाले 54 किसानों में से, केवल 25 ही नामांकन दाखिल करने के लिए पहुंच पाए. अपने साथ वाराणसी पुलिस द्वारा उत्पीड़न करने और स्थानीय चुनाव आयोग के असहयोगात्मक रवैये को सामने लाने के लिए उनका धन्यवाद. अंत में, तेलंगाना के केवल एक किसान के नामांकन के कागजात स्वीकार किए गए.

क्योंकि जवान और किसान दोनों सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय चुनाव आयोग में अपने कारण को आगे बढ़ाने की योजना बना रहे हैं. उन्हें डेविड कहना उचित है क्योंकि आधुनिक युग में गोलिएथ के साथ लड़ाई में उनके नाम अप्रासंगिक हैं.

पाठकों के लिए लेखिका ने डेविड और गोलिएथ नाम के संदर्भ जिस अमरीकी कहानी से ली हैं, का संक्षेप में उल्लेख कर रहा हूंं. यह कहानी लेख का हिस्सा नही है, लेख से हट कर है. परन्तु इसको यहां देने से, पाठकों के सामने लेखिका की भावना एक दम स्पष्ट हो जाएगी – “अमेरिका के किसी गाँव में गोलिएथ नामक दैत्य बार-बार आकर वहां के निवासियों को खा जाता था. एक दिन गांंव में डेविड नामक 15 वर्षीय गड़रिया अपने मित्र से मिलने के लिए आया. उसने अपने मित्र से पूछा – “तुम सभी मिलकर उस दैत्य का सामना क्यों नहीं करते ?”




भयभीत मित्र ने डेविड से कहा – लगता है कि तुमने अभी गोलिएथ को देखा नहीं है. वह इतना ताकतवर है कि हम उसे मिलकर भी मार नहीं सकते !

डेविड ने कहा – अच्छा ! यदि वह वाकई बहुत शक्तिशाली है, तो इतना निश्चित है कि उस पर लगाया गया निशाना चूक नहीं सकता.

डेविड ने एक दिन गोलिएथ पर गुलेल से निशाना साधकर उसे गिरा दिया और पलक झपकते ही उसे अपनी तलवार से मार दिया. इस कहानी में डेविड की शारीरिक शक्ति नहीं बल्कि दुश्मन पर हर हाल में विजय पाने के उसके नजरिये ने उसे गोलिएथ पर विजय दिलाई”- विनय ओसवाल)

यह दूसरी विडंबना है. हर चुनाव में, फिर चाहे वह संसद के लिए हों या चाहे नगर/ग्राम पंचायतों के लिए हो, लगभग सभी दल धार्मिक और जातिगत पहचान को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवार चुनते हैं. इस चुनाव अभियान में, प्रधानमन्त्री और पार्टी अध्यक्ष ने अपने भाषणों में धार्मिक पहचान का स्पष्ट आभास कराते हुए उन्हें दुश्मन करार देने वाले भाषणों का सबसे अधिक प्रयोग किया गया है.  इतना धुंधलापन उनकी पहचान-आधारित भाषणों, घोषणाओं और धमकियों का इतना ज्यादा प्रयोग किया गया कि वातावरण पूरी तरह प्रदूषित हो गया. फिर भी चुनाव आयोग ने उन्हें क्लीन चिट दी है. ऐसा करके उसने ऐसी संस्था को अपमानित किया है जिस पर कभी हम सब को गर्व था.

पीएम मोदी के खिलाफ, वाराणसी में जिन दो वर्गों से आने वाले उम्मीदवार मैदान में सीना ताने खड़े हुए हैं, उनकी धार्मिक पहचान को लेकर उनपर हमले नहीं किये जा सकते हैं. हांं, यदि वे किसी अल्पसंख्यक समुदाय से सम्बंधित होते तो भक्तों और सत्तारूढ़ पार्टी के प्रमुख सहित उसके कार्यकर्ताओं के लिए उनको बदनाम करना बहुत आसान होता.

लेकिन वे तो सभी हिंदू हैं. यह महज एक इत्तेफ़ाक़ है. किसी भी उम्मीदवार ने लक्ष्य बना कर ऐसा निर्णय नहीं लिया है और न किसी को रोका है. ठीक इसके विपरीत धर्म निरपेक्ष देश के प्रधानमन्त्री द्वारा अपने नामांकन दाखिल करने की पूर्व संध्या पर जिस धार्मिक तमाशे का आयोजन किया गया, उसे सभी टीवी चैनलों ने जीवंत दिखाया है.




तेज बहादुर यादव और इस्तरी एस. नरसैया की एकमात्र पहचान उनके पेशे से है : एक सेना का जवान है और दूसरा किसान. यह हमारे चुनाव इतिहास में लगभग एक अनकथित/वर्णित घटना है.

भारत के ही एक पूर्व प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री, जिन्होंने जवान और किसान को हमारी चेतना में कभी न भुला सकने वाला हिस्सा बनाया, उनसे हमारे लिए बलिदान करने का आग्रह किया और इसके तहत उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ एक वास्तविक युद्ध जीता. (बुजुर्ग पाठकों की स्मृति को यहां ताजा करना और युवा पाठकों की जानकारी हेतु यहां संक्षेप में उल्लेख करना ही पर्याप्त होगा कि यह युद्ध 1965 में लड़ा गया था और तब केवल कश्मीर के खास मोर्चों तक ही इसे सीमित नही रखा गया था. पाकिस्तान में लाहौर की तरफ काफी भीतर घुस कर हमारी फौजों ने पाकिस्तानी फौजों को खदेड़ा था. यह बालकोट स्ट्राइक जैसा कोई आभासी यद्ध नहीं था, जमीन पर लड़ा गया एक वास्तविक युद्ध था – विनय ओसवाल)

भाजपा आज कांग्रेस के खिलाफ एक अनूठी चुनावी लड़ाई लड़ रही है जिसमें कांग्रेस मुक्त भारत की बात करके पाकिस्तान के साथ जमीन पर लड़े गए वास्तविक युद्धों में बार-बार उसे शिकस्त देने की कांग्रेस की ऐतिहासिक उप्लब्द्धियों पर, भाजपा पर्दा डालने की एक नाकाम कोशिश करती रहती है.

2014 में एक और डेविड, अरविंद केजरीवाल की वजह से वाराणसी की लड़ाई ऐतिहासिक हो गई थी.  इस साल, लड़ाई (जमीन और आसमान जैसे) असमान व्यक्तित्वों के बीच है, इसलिए अधिक रोमांचकारी है.




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