Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

संघ से वैचारिक संघर्ष की अधूरी तैयारी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 8, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

90 साल तक आरएसएस सत्ता की छाया में रहकर – चाहे अंग्रेजी शासन की तलवाचाटने की रणनीति हो या आजादी के बाद कांग्रेस की सत्ता के तलबाचाटने की नीति हो – अपना अभियान बिना रूके और बिना थके समाज के हर तबके और वर्ग में अपनी पहुंच बना ली है. इसके लिए वह सत्ता से हर तरह के समझौते भी करती आज वह इस स्थिति में आ गई है जब उसके विरूद्ध खड़ा होना भी किसी के लिए भी कठिन बन गया है. अब वह देश के संविधान तक पर हाथ लगाने की ताकत हासिल चुकी है. 90 साल के अपने संघर्ष के बदौलत वह संविधान की रक्षा खातिर निर्मित तमाम संवैधानिक ताकतों में अपने एजेंट बिठा कर उसे अपना गुलाम बना लिया है. अब वे तमाम संस्थायें, जिसे बड़ी मेहनत से विकसित किया गया था, आरएसएस का भोंपू और एजेंट बन गया है और आरएसएस के कार्यक्रमों को लागू करने का माध्यम बन गया है.

वक्त के ऐसे अन्तराल में जब आरएसएस देश के तमाम संवैधानिक मूल्यों को चुनौती पेश कर रहा है, उससे लड़ने की तैयारी बेहद ही व्यापक और गंभीर करनी होगी. बद्री नारायण, जो गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक हैं, चुनौतीपूर्ण वक्त में समय की आहट को पहचानने की जरूरत को रेखांकित कर रहे हैं.

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

संघ से वैचारिक संघर्ष की अधूरी तैयारी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मुकाबला करने के लिए दो नए संगठन गठित किए हैैं. इनमें एक है जयहिंद वाहिनी, दूसरा है बंग जनानी वाहिनी. उन्होंने जयहिंद वाहिनी का अध्यक्ष अपने एक भाई कार्तिक बनर्जी को एवं संयोजक दूसरे भाई गणेश बनर्जी को बनाया है. बंग जनानी वाहिनी का अध्यक्ष काकोली दस्तीदार को बनाया गया है. माना जाता है कि तृणमूल कांग्रेस ‘जयहिंद’ का संबंध सुभाष चंद्र बोस एवं स्वामी विवेकानंद के प्रतीकों से जोड़ने की कोशिश करेगी. ममता की तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी अपना वैचारिक संघर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ही मानते हैं.

वामपंथी दल यथा, भाकपा, माकपा आदि भी अपनी वैचारिक लड़ाई दक्षिणपंथी राजनीति के वैचारिक आधार रचने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ही मानते हैं, किंतु प्रश्न यह उठता है कि ये सभी दल अपना वैचारिक संघर्ष किस आरएसएस से मानते हैं ? क्या उस आरएसएस से जो उनकी धारणा का आरएसएस है या उस आरएसएस से जो वह वास्तव में है ? उनकी धारणा का आरएसएस वह है जिसे आज से लगभग 40-50 वर्ष पूर्व की वामपंथी व्याख्याओं से रचा गया है. इस धारणा को लगातार दोहराते हुए आरएसएस के बारे में एक प्रकार की रूढ़िवादी सोच बना ली गई है. यह सोच आरएसएस की एक छाया का निर्माण करती है.




आरएसएस स्वयं को लगातार बदलता और नया करता चला आ रहा है. हो सकता है कि यह नयापन एवं परिवर्तन उसके शरीर का ही परिवर्तन हो, आत्मा का नहीं, परंतु जो राजनीतिक दल अपनी लड़ाई आरएसएस से मानते हैं उन्हें आरएसएस के देह स्वरूप में हो रहे लगातार परिवर्तन को तो समझना ही होगा. अगर वे ऐसा नहीं करते तो आरएसएस की एक छाया से लड़ते रह जाएंगे. इसके नतीजे में संघ अपने सामाजिक आधार को और फैलाता चला जाएगा.

पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, उत्तर-पूर्व आदि में जहां-जहां संघ ने अपने को फैलाया है वहां उसके विरुद्ध संघर्ष की बात करने वाले राजनीतिक दल सच में जो संघ है, उसके बजाय उसकी छाया से ही लड़ते रहे हैं. हो सकता है कि मेरी इस बात से कुछ लोग नाराज हों, पर संघ में हो रहे सतत बदलाव को जाने-समझे बिना एक तरह से इस खुशफहमी में जीना है कि हम संघ के विचार के खिलाफ लड़ रहे हैं. संघ की शक्ति यह है कि वह अपनी लड़ाई किसी से नहीं मानता. वह अपने लक्ष्य को दृष्टिगत रख अपने प्रसार में लगा हुआ है.




संघ के प्रतिवाद के लिए जयहिंद वाहिनी बनाने वाली ममता बनर्जी यह नहीं समझ पातीं कि संघ की शक्ति डंडे, लाठी में नहीं छुपी है. संघ की पहली शक्ति वह सांस्कृतिक एकाधिकार है जिसकी सतत व्याख्या अंतोनियो ग्रम्शी के सैद्धांतिक प्रतिपादनों से पाई जा सकती है. यह सांस्कृतिक शक्ति धर्म, परंपरा, धार्मिक शास्त्रों-अनुष्ठानों एवं भारतीय पारंपरिक मूल्यों को अपनी भाषा में जोड़ने से संघ को प्राप्त हुई है. इसी कारण वह आज सर्वत्र उपलब्ध होने की क्षमता अर्जित किए हुए है. इसी अंत:शक्ति के कारण संघ व्यापक हिंदू समाज, कठिन भौगोलिक परिक्षेत्र, अल्पसंख्यक समूहों को अपने में जोड़ने में लगा हुआ है.

हाल के समय में संघ क्षेत्रीय संस्कृतियों को भी अपने वैचारिक ढांचे से जोड़ने में सफल होता हुआ दिखा है. संस्कृति की भाषा एवं भाव को अपनी शैली में जोड़ने के कारण उसने एक सांस्कृतिक शक्ति प्राप्त की है. जो भी राजनीतिक दल आरएसएस से वैचारिक प्रतिवाद का दावा कर रहे हैं उन्हें यह समझना होगा कि संघ सरीखी सांस्कृतिक शक्ति एवं सांस्कृतिक भाषा विकसित किए बिना ऐसा कर पाना कठिन है. इस भाषा का निर्माण भारतीय संस्कृति के तत्वों एवं स्नोतों में समाहित होकर ही किया जा सकता है.

संघ की एक अन्य शक्ति है उसके संपूर्ण ढांचे में निहित समाहन की शक्ति. संघ में अपने विरोधी तर्कों, ढांचों एवं शक्तियों को समाहित कर लेने की अद्भुत शक्ति है. संघ अपने ढांचे से जरूरी समझौते करके भी जनजातीय समूहों, उत्तर-पूर्व के गैर-हिंदू समूहों और अल्पसंख्यकों को अपने से जोड़कर एक ‘विस्तृत हिंदुत्व’ का निर्माण करने में लगा हुआ है. यह ‘इच्छा’ जब तक संघ के विरोध में सक्रिय शक्तियों में विकसित नहीं हो पाती तब तक उनके लिए संघ से मुकाबला कठिन है. समाहन की यही शक्ति समाज एवं राजनीति में प्रभावी परंपरा रचती है।




संघ की तीसरी शक्ति है सेवाभावी सामाजिक कार्य. संघ पूरे देश में अनेक सेवाभावी परियोजनाएं चला रहा है. इन सेवाभावी परियोजनाओं के माध्यम से वह जरूरतमंद लोगों तक पहुंचकर उन्हें अपने में शामिल कर रहा है. सेवाभाव की यह संस्कृति भी उसने भारतीय परंपरा में निहित सेवा एवं दान की भावना से सीखी है. इस पारंपरिक सीख का परिवर्द्धन संघ ने ईसाई मिशनरियों के सेवा कार्य की राजनीति को अप्रासंगिक बनाने के लिए भी किया है. अभी हाल में कुंभ में नेत्र रोगियों के लिए लगाए गए ‘नेत्र कुंभ’ के जरिये संघ लगभग दो लाख नेत्र रोगियों तक पहुंचने में सफल रहा. इसके लाभार्थियों में हिंदू-मुस्लिम, वंचित, आदिवासी सामाजिक समूहों के लोग शामिल थे.

जहां संघ प्रचारक अपने घर परिवार का मोह छोड़ संगठन के प्रति समर्पित होने का आभास देते हैं वहीं ममता बनर्जी ने जो ‘जय हिंद वाहिनी’ बनाई, उसकी कमान अपने भाइयों को सौंप दी. इस तरह धारणा की लड़ाई में ममता बनर्जी अपनी लड़ाई प्रथम चरण में ही हार बैठीं. संघ प्रचारक जिस त्याग भाव को अपनी छवि से जोड़कर रखते हैं, उससे जनता के बीच उनके प्रति भरोसा पैदा होता है. स्पष्ट है कि संघ और भाजपा विरोधी दलों को यह सोचना होगा कि पुरानी भाषा, पुरानी धारणा एवं पुराने हथियार से नित परिवर्तित होते जाने वाले संगठन से सफल प्रतिवाद नहीं किया जा सकता.

संघ से लड़ने के लिए इन दलों को भी नया तन एवं नई आत्मा वाला नया अवतार लेना होगा. सबसे बड़ा अंतर्विरोध है कि जहां ये दल राजनीतिक सत्ता की लड़ाई लड़ रहे हैैं, वही संघ सामाजिक सत्ता रचने में लगा है. जब उसे अपने किसी प्रचारक में राजनीतिक प्रतिभा एवं आकांक्षा दिखती है तो वह उसे भारतीय जनता पार्टी से जोड़ देता है. गैर राजनीतिक होने की उसकी यह छवि उसके प्रति जनता में विश्वास सृजित करती है. स्पष्ट है कि राजनीतिक शक्तियों को खुद को सामाजिक अभियानों से जोड़ना होगा.




Read Also –

हे धरती पुत्रों के मसीहा, तुझे प्रणाम
मोदी का हिन्दू राष्ट्रवादी विचार इस बार ज्यादा खतरनाक साबित होगा
शक्ल बदलता हिंदुस्तान
मोदी जी का विकल्प कौन है ? – विष्णु नागर




[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]




Previous Post

भाजपा का भक्त विरोधाभासों का पुलिंदा है

Next Post

अंग्रेजों के खिलाफ स्वाधीनता संघर्ष में मुसलमानों की भूमिका

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

अंग्रेजों के खिलाफ स्वाधीनता संघर्ष में मुसलमानों की भूमिका

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

गोडसे को हीरो बताने के बात को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए

May 19, 2019

क्रांतिकारी कवि वरवर राव की नजरबंदी त्रासदपूर्ण अन्याय रही !

September 14, 2024

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.