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बीएसएनएल को मोदी जानबूझकर बर्बाद कर रहा है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 11, 2019
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बीएसएनएल को मोदी जानबूझकर बर्बाद कर रहा है

पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ

बीएसएनएल (भारत संचार निगम लिमिटेड) भारत की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी (प्रथम) तथा वायरलेस कनेक्शन्स की संख्या के आधार पर दूरसंचार नेटवर्क में चीन के बाद दुनिया का दूसरी सबसे बड़ी संचार कम्पनी है, जिसका स्वामित्व (अभी तक) सरकार के अधीन है लेकिन सोशल मीडिया में कई दिनों से इसके बेचे जाने या बंद करने संबंधी कई बातें (अफवाहें भी) हो रही है.

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बीएसएनएल वर्तमान में भारत सरकार के सार्वजनिक उपक्रम के रूप में फिक्स्ड लाइन, डब्ल्यू. एल. एल., मोबाइल, इंटरनेट (ब्रांडबैंड और वाई-फाई इत्यादि सभी प्रकार से), डिजिटल टीवी, आई पी टीवी के रूप में 3G सेवा प्रदाता कम्पनी है और भारत के कुल संचार मार्किट का 24% बाजार अकेले बीएसएनल कवर करती है. वीएसएनएल (विदेशी सेवाओं के लिये) और एमटीएनएल (महानगरीय सेवाओं के लिये) दोनों ही इसी के अंग-सहयोगी हैं (लेकिन उसका बाजार अभी इसमें जोड़ा नहीं है).




बीएसएनएल का वर्तमान प्रारूप 2000 में बना था, लेकिन आंकड़े मेरे पास 2004 से ही उपलब्ध हो पाये हैं। अतः जो आंकड़े उपलब्ध हुए हैं, उनके अनुसार –

  • 2004 में बीएसएनएल प्रदत्त परोक्ष-अपरोक्ष रोजगार संख्या 2.3 मिलियन (सार्वजनिक कॉल कार्यालय).
  • 2004-2005 में कुल राजस्व ₹ 71,674 करोड़ (10.5 बिलियन US$) वित्तीय निवेश ₹ 17,8831 करोड़ (26.1 बिलियन US$).
  • 2005 बीएसएनएल प्रदत परोक्ष-अपरोक्ष रोजगार संख्या 3.7 मिलियन (सार्वजनिक कॉल कार्यालय).
  • 2005-06 में कुल राजस्व ₹ 86,720 करोड़ (12.7 बिलियन US$) वित्तीय निवेश ₹ 2,00,660 करोड़ (29.3 बिलियन US$) 21% वृद्धि.
  • 2005-2006 में 6.94 मिलियन उपभोक्ता जिसमें से 1.35 करोड़ के पास ब्रॉडबैंड कनेक्शन !
  • 2006-07 (उपलब्ध नहीं)
    2007-08 (उपलब्ध नहीं)
  • 2008-09 में बीएसएनएल पूर्व वित्त वर्ष के मुकाबले ₹ 1,15,382 करोड़ (16.85 बिलियन US$) का ज्यादा फायदा कमाया !
  • 2008-09 में ही बीएसएनएल के समग्र दूरसंचार उपकरणों का राजस्व ₹ 1,36,833 करोड़ (19.98 बिलियन US$) बढ़ा था.
  • 2009 दिसंबर तक वार्षिक सेल फोन जुड़ाव 17,82,50,000 (नये उपभोक्ता)
  • 2009-10 तक 706.37 मिलियन बेसिक टेलीफोन उपभोक्ता तथा 670.60 मिलियन मोबाइल फोन कनेक्शन्स उपभोक्ता थे.
  • 2010 में लैंडलाइन्स 35.96 मिलियन. सेल फोन्स 652.42 मिलियन
  • 2011 तक बीएसएनएल के पास भारत में लगभग 50% बाजार शेयर था.
  • 2011 अगस्त तक 2,76,306 कर्मचारी थे !
  • 2011–12 तक कुल संपत्ति ₹ 1,17,632 करोड़ (17.17 बिलियन US$) थी.
  • 2011-12 में कुल राजस्व ₹ 27,933 करोड़ (4.08 बिलियन US$) था.
  • 2011-12 में निवल आय ₹ 8,851 करोड़ (1.29 बिलियन US$) थी !
  • 2012 का अनुमानित दूरसंचार घनत्व 1 अरब (कुल जनसंख्या का 84%) लक्ष्य था. 2012 तक ₹ 3,44,921 करोड़ (50.36 बिलियन US$) अनुमानित वृद्धि थी.
  • 2012-13 में अनुमानित सालाना वृद्धि दर 26% तथा 2013 में 10 मिलियन लोगों के लिये बीएसएनएल में रोजगार के अवसर उत्पन्न करवाने का लक्ष्य था, ताकि साल 2013-14 में बीएसएनएल प्रत्यक्ष रूप से 2.8 मिलियन और अप्रत्यक्ष रूप से 7 मिलियन लोगों के लिए रोजगार पैदा कर सके.

उपरोक्त आंकड़ों से सिद्ध ही है कि बीएसएनएल एक तेज गति से बढ़ता और फैलता नेटवर्क बन रहा था लेकिन फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि 2014 में मोदी सरकार के आते ही बीएसएनएल लगातार घाटे में जाने लगी और महज 5 साल में यानि 2019 में उसके पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने तक के पैसे न बचे ?




सबसे खास बात पिछले 5 सालों से लगातार कर्मचारियों में कटौती की जा रही थी जबकि आंकड़े बताते हैं कि साल 2008-09 में ग्रामीण भारत मोबाइल विकास दर में शहरी भारत से आगे निकल गया था और 31 जुलाई, 2010 तक देश में टेलीफोनों की कुल संख्या 688.38 मिलियन को पार कर चुकी थी तथा जीएसएम, सीडीएमए और डब्ल्यूएलएल (एफ)) के उपभोक्ता 652.42 मिलियन से अधिक थे और जुलाई 2010 तक में कुल टेलीघनत्व में 58.17% की वृद्धि हुई थी.

लेकिन ये जानने से पहले भारत में बीएसएनएल का इतिहास भी आपको जानना जरूरी है ताकि आपको पता चल सके कि ये जो बीएसएनएल के साथ हो रहा है, उसकी नींव असल में बीजेपी ने बहुत पहले ही रख दी थी. इतिहास को जानने से आपको पता चलेगा कि अंग्रेजों से लेकर नेहरू तक और इंदिरा गांंधी से लेकर राजीव गांंधी तक ने भारत को संचार मामलों में कितना मजबूत बनाया और इन संघियों ने तब कितना विरोध किया था जबकि आज इसी संचार माध्यमों का प्रयोग सबसे ज्यादा संघी ही कर रहे हैं. तो अब पढ़िये बीएसएनएल का इतिहास –




बहुत से लोग तो शायद ये भी नहीं जानते होंगे कि भारत में टेलीग्राफ और टेलीफोन का बीड़ा उठाने वाले डॉ. विलियम ओ’ शौघ्नेस्सी थे और अंग्रेज सरकार के लोक निर्माण विभाग में कार्यरत थे. वे दूरसंचार के विकास की दिशा में लगातार काम करते रहे थे और ये उनकी इच्छा- शक्ति थी कि 1850 में पहली प्रायोगिक बिजली तार लाइन डायमंड हार्बर और कोलकाता के बीच शुरू की गई और 1851 में इसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए खोला गया. उस समय ये उपक्रम लोक निर्माण विभाग के अधीन था लेकिन 1854 में इसके लिये एक अलग विभाग बना, जिसमें टेलीग्राफ सुविधाओं को जनता के लिये भी चालू किया गया.

1880 मे दो निजी कम्पनियों ने भारत में टेलीफोन एक्सचेंज की स्थापना करने के लिये सरकार से संपर्क किया मगर अंग्रेज सरकार ने इसे ख़ारिज कर दिया क्योंकि अंग्रेजों की नजर में टेलीफोन की स्थापना करना सरकार का एकाधिकार था और सरकार खुद यह काम शुरू करना चाहती थी. लेकिन किन्हीं कारणों से 1881 में सरकार ने अपने पहले के फैसले से पलटते हुए इंग्लैंड की ओरिएंटल टेलीफोन कंपनी लिमिटेड को कलकत्ता, बॉम्बे, मद्रास और अहमदाबाद में टेलीफोन एक्सचेंज खोलने के लिये एक लाइसेंस दिया, जिससे 1881 में देश में पहली औपचारिक टेलीफोन सेवा की स्थापना हुई.




इस तरह डॉ. विलियम ओ’ शौघ्नेस्सी का सपना साकार हुआ और भारत में टेलीग्राफ और टेलीफोन दोनों की नींव पड़ी, जो आज भारत संचार निगम लिमिटेड के रुप में भारत की सबसे बड़ी दूरसंचार कम्पनी है.

हालांंकि ब्रिटिश काल में ही भारत (वर्तमान के भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश) के सभी प्रमुख शहरों और कस्बों को टेलीफोन से जोड़ दिया गया था लेकिन देश आज़ाद होने के बाद वर्तमान भारत में 1948 में टेलीफोन की कुल संख्या महज 80,000 के आसपास ही थी. ये नेहरू, इंदिरा और राजीव का ही माद्दा था जिससे वर्तमान भारत इस लायक हुआ कि आज भारत में, दुनिया में सबसे ज्यादा संचार माध्यमों का प्रयोग किया जा रहा है. इन्हीं तीनों (नेहरू, इंदिरा और राजीव) के सुधारवादी कदमों और अभिनव प्रयोगों के कारण जो टेलीफोन 1948 तक महज 80 हज़ार थे, वो 1971 में 9,80,000, 1981 में 2.15 मिलियन और 1991 में 5.07 मिलियन तक पहुंच गये.

राष्ट्रीय दूरसंचार नीति की घोषणा के साथ परिवर्तन का असली दौर शुरू हुआ और ग्रामीण भारत और विदेश को इससे जोड़ने का कार्य तेजी से शुरू हुआ और इसी कड़ी में वीएसएनएल और एचटीएल को दूरसंचार से अलग कर उन्हें अलग इकाई के रूप में स्थापित किया. हालांंकि 1975 में ही दूरसंचार विभाग (डीओटी) को पी एंड टी से अलग कर दिया गया था और 1985 तक दूरसंचार विभाग देश में सभी दूरसंचार सेवाओं के लिये जिम्मेदार विभाग बना दिया गया था. इसी कड़ी में दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े महानगरों को ‘महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड’ के जरिये अलग इकाई बनाकर उसे दिल्ली और मुंबई की सेवाओं को चलाने की जिम्मेदारी दी गयी.




राजीव के संचार क्रांति का संघियों ने खूब विरोध किया था और अटल बिहारी बाजपेयी ने तो बैलगाड़ियों से संसद को घेरकर विरोध किया था. राजीव की मृत्यु पश्चात जोड़-तोड़ वाली सरकारों के कारण एकमत नहीं होने से संचार क्रांति की गति धीमी पड़ गयी.

बाद में नरसिम्हा राव सरकार ने 49% तक निजी निवेश पर सभी को एकमत कर संचार क्षेत्र में उदारीकरण का काम किया और बाजपेयी सरकार ने दूर संचार विभाग को 1 अक्टूबर, 2000 को संचार विभाग के परिचालन हिस्से को निगम के अधीन कर उसे भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) का नाम दिया, जो उपरोक्त में बताये अनुसार 2013 तक सरकार की सबसे लाभ देने वाली कम्पनी थी.

2014 में मोदी सरकार के आते ही बीएसएनएल को ख़त्म करने की कोशिशें शुरू हो गयी और कई कॉरर्पोरेट्स के हाथों की कठपुतली बने मोदी ने उनकी निजी कम्पनियों (रिलायंस कम्युनिकेशंस, टाटा इंडिकॉम, हच, लूप मोबाइल, एयरटेल, आइडिया इत्यादि) को फायदा पहुंंचाना शुरू कर दिया, और ये ही सबसे बड़ी वजह रही बीएसएनएल के घाटे में जाने की. अर्थात जो फायदा बीएसएनएल को होने वाला था वो निजी कम्पनियों को हुआ.

मुकेश अम्बानी ने तो बाकायदा मोदी के चुनाव खर्च में इन्वेस्ट किया और रिलायंस जिओ लॉन्च कर 4G सर्विस उपभोक्ताओं के लिये शुरू कर निजी कम्पनी होकर भी सरकार से सब्सिडी ले ली.




सरकार अगर बीएसएनएल को वास्तव में बचाना चाहती तो उसी समय बीएसएनएल का 4G लॉन्च कर बीएसएनएल को 4G के साथ रिलायंस की टक्कर में उतार सकती थी. अगर बीएसएनएल 4G के साथ होती तो आज वो लगभग 80% से ज्यादा बाजार कवर करके विश्व की सबसे बड़ी संचार कम्पनी बनकर भारत में सबसे ज्यादा रोजगार उत्पन्न करने वाली कम्पनी बन चुकी होती.

रिलायंस जिओ तो छोड़िये दूसरी सभी निजी कम्पनियांं भी मार्किट से गायब हो चुकी होती लेकिन आज मोदी सरकार की नीतियों और कॉरर्पोरेट दोस्तों को फायदा पहुंंचाने के जूनून के कारण बीएसएनएल डूबने वाली है.

अब मोदी सरकार-2 इसे बेचने या बंद करने के बारे में विचार कर रही है और इसकी संपत्ति का आंकलन 950 करोड़ (2019) किया जा रहा है, जबकि उपरोक्त आंकड़ों से ही स्पष्ट है कि बीएसएनएल का सिर्फ गुडविल ही कम से कम 2000 करोड़ की है और सिर्फ इसके नाम की रायल्टी ही सरकार को 500 करोड़ सालाना तक मिल सकती है क्योंकि बीएसएनएल में सरकार के अन्य कई अप्रत्यक्ष निवेश भी शामिल हैं जिसमें नौ उपग्रह पृथ्वी स्टेशन (8 इंटेलसैट और 1 इनमारसैट) के साथ-साथ समुद्र में बिछाई गयी केबल जो पुरे भारत को विश्वभर से जोड़ती है, ताकि संचार में कोई बाधा उत्पन्न न हो भी शामिल है. ऐसे कई अप्रत्यक्ष निवेश और भी है जिनकी जानकारी किसी दूसरी लेख के माध्यम से दूंगा.




अतः किसी भी हालत में मोदी की इस चाल को कामयाब नहीं होने देना है (मोदी जानबूझकर ऐसी नीतियांं बना रहा है ताकि बीएसएनएल बिक जाये और इसे औने-पौने दामों में मुकेश अम्बानी खरीद ले और संचार बाजार का किंग बन जाये).

ऐसे ही बाजार से केबल मार्किट को भी नियंत्रित किया गया था. पहले सेटअप बॉक्स लागु किया, फिर मुकेश अम्बानी ने सभी ब्रॉडकास्टर को खरीदना शुरू कर दिया और अब केबल पर अम्बानी का एकाधिकार है और हम सब लूट का शिकार. केबल से हो रही लूट किसी और लेख में बताऊंगा. अभी तो हमें बीएसएनएल को बचाना है.

मोदी सरकार अपनी सत्ता की लोलुपता और अपने कारर्पोरेट दोस्तों को फायदा पहुंंचाने और उनसे कमीशन खाने के चक्कर में जबरन ऐसे हालात उत्पन्न कर रही है, जबकि सरकार चाहे तो बीएसएनएल सिर्फ एक महीने में खड़ी ही नहीं बल्कि नंबर वन पोजीशन पर पहुंच सकती है.




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