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अलविदा कश्मीरियत

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 6, 2019
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अलविदा कश्मीरियत

कश्मीर 5 अगस्त, 2019 को हमेशा के लिए बदल गया. राज्य का बंटवारा इसके ताबूत में आखिरी कील था. शेख अब्दुल्ला के ख्वाब का उम्मीद भरा नया कश्मीर अब दफन-सा हो गया है. यहां तक कि वाजपेयी की सोच ‘इनसानियत, कश्मीरियत, जम्हूरियत’ को अलविदा कह दिया गया. राज्य जल्दी ही गायब होगा और उसकी जगह केंद्रशासित जम्मू-कश्मीर रह जाएगा.

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अब देखना है कि इस खाक से दिल्ली कैसा कश्मीर तैयार कर पाती है, जो कभी पांचवां सबसे बड़ा राज्य था. बेशक, इसके लिए महज फौजी तैनाती नहीं, बड़ी कल्पना-शक्ति की भी दरकार होगी.

कुछ सनकियों की नजर में तो कश्मीर 9 अगस्त, 1953 में शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी के वक्त से ही प्रभावी तौर पर केंद्रशासित था. उसके बाद आए मुख्यमंत्रियों की लंबी कतार को कश्मीर में दिल्ली के कठपुतलों की तरह देखा जाता था. बस डॉ. फारूक अब्दुल्ला को 1983 में हटाए जाने के पहले उनके छोटे-से कार्यकाल को माफ कर सकते हैं. यहां तक कि शेख अब्दुल्ला साहब भी दिल्ली के साथ 1975 के समझौते के बाद सत्ता में लौटे तो अपने पुराने कद की छाया भर रह गए थे.

बहुत सारे कश्मीरियों को लंबे समय से शक रहा है और मीरवायज तो जाहिर भी करते रहे हैं कि दिल्ली को बस कश्मीर की जमीन में दिलचस्पी है, वहां के लोगों में नहीं. वे आशंकाएं सही साबित होती लग रही हैं. बकौल शाह फैसल, गुलाम बनाने का असली चेहरा खुलकर सामने आ गया है.

फिर भी कश्मीरियों का दिल्ली में इस कदर भरोसा था कि आखिरी वक्त तक, यहां तक कि 4 अगस्त को घाटी के पार्टी नेताओं की बैठक में भी उन्हें यह ख्याल नहीं आया कि ऐसा भी हो सकता है. कानून विशेषज्ञ मुजफ्फर बेग ने तो संविधान को हाथ में उठाए ऐसी ही दलील दी.

सबसे दर्दनाक नजारा तो बुरी तरह टूटे हुए डॉ. फारूक अब्दुल्ला का था, जो उन दोस्तों से मदद की अपील कर रहे थे, जिनके साथ वे हमेशा खड़े रहे हैं. एक ही झटके में दिल्ली ने समूचे कश्मीरी नेतृत्व को नेस्तनाबूद कर दिया. यहां तक कि दिल्ली के पसंदीदा चेहरे सज्जाद लोन की भी हवाइयां उड़ गईं, जो कभी मोदी को अपना ‘बड़ा भाई’ कह चुके हैं.

मुख्यधारा की राजनीति से छुटकारा पाने के बाद कुछ उग्रवादी कहने लगे हैं कि लड़ाई अब उनके और दिल्ली के बीच है. कुछ वक्त बाद दिल्ली का प्रतिनिधि कोई उप-राज्यपाल होगा और नई चुनी हुई सरकार होगी. लेकिन, जैसा कि मणिशंकर अय्यर ने सही ही कहा है कि अब हमारी उत्तरी सीमा पर हमेशा अशांत रहने वाला एक फिलिस्तीन बन सकता है.

घाटी में पूरी तरह बंदी के बावजूद अटकलें धड़ल्ले से उड़ रही हैं. कश्मीर में अनिश्चितकालीन इंतिफादा का डर आम हो गया है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के जेहादियों की मदद से फिदायीन हमलावरों की एक नई जमात उभर रही है और जमीन हड़पने वाले बाहरी लोग घुसने की तैयारी कर रहे हैं.

हालांकि घाटी के लोगों को पाकिस्तान से कोई उम्मीद नहीं दिख रही. जैसा कि एक उभरते कश्मीरी नेता ने कहा, पाकिस्तान कुल मिलाकर एक एनजीओ जैसा है, एक कागजी शेर, जिसकी सीमा पार लोगों को भेजने की योजना नीलम नदी की रुकावटों में ही खो जाएगी.

पाकिस्तान 9/11 को ही कश्मीर को गंवा चुका है, जब जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने जनरल परवेज मुशर्रफ को राह बदल लेने की हिदायत दी. तब कश्मीरियों को लगा कि पाकिस्तान जब अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकता तो हमारी मदद क्या खाक करेगा. पाकिस्तान की कश्मीर मामले में वापसी तो बुरहान वानी के मारे जाने और उसके बाद पूरी तरह फौजी तैनाती का नतीजा है.

जो हालात हैं, शायद उसमें यही उम्मीद की जा सकती है कि कश्मीर में कोई आम आदमी पार्टी जैसा कुछ उभरे, लेकिन इलाके की मुख्यधारा की राजनीति को दिवालिया कर देने की भूल भारी पड़ेगी.

अनुच्छेद 370 तो पहले ही खोखला हो चुका था, बस कश्मीरियों के लिए यकीन की एक डोर भर बचा था, उसे बेमानी करना निहायत गैर-जरूरी था. अपने मेहमान का कत्ल करने के पहले मैकबेथ के मन में उठे सवालों के उलट अनुच्छेद 370 को बिना किसी हिचक के विदा कर दिया गया.

कश्मीरियों के लिए सबसे अपमानजनक विशेष दर्जे वाले राज्य को केंद्रशासित प्रदेश में बदल देना है. दिल्ली को गौर करने की जरूरत है कि कश्मीर को साथ रखने के लिए वह एक बार फिर उसे राज्य का दर्जा बहाल करने पर विचार करे. बातचीत बेशक अहम है, शायद पाकिस्तान से भी बात करने का यही माकूल वक्त है.

(ए.एस. दुलत रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रॉ) के पूर्व प्रमुख हैं का लेख इंडिया टु-डे 4 सितंबर, 2019 के अंक में प्रकाशित, से साभार)

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