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‘मां’ के दूसरे रूपों के बारे में

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 27, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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'मां' के दूसरे रूपों के बारे में

पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ

हे दुनिया और भारत की जनसंख्या बढ़ाने वाली मशीनों, मेरा चरणस्पर्श स्वीकार करे !
‘माताओं’ की जगह ‘मशीनों’ इसलिए लिखा है क्योंकि आज के परिवेश में तुम माता रह ही नहीं गई हो. सिर्फ मजे के परिणामरूप बच्चे पैदा करने वाली मशीन मात्र रह गई हो. बहुत समय पहले मैंने एक पुस्तक में एक कहानी “मायता रौ सायो” पढ़ी थी, जिसमें मां की ममता, मां का वात्सल्य, मां का प्यार, मां करुणा की सागर, मां ही तीर्थ है, भगवान से बढ़कर मां है, सागर से असीम है, दुनियां में सबसे महान है आदि-इत्यादि पढ़ा था. लेकिन, हे बच्चे को जन्म देने वाली मशीनों, आज मैं तुम्हारे दूसरे रूप के बारे में वर्णन करने जा रहा हूं, जिसे पढ़कर शायद तुम्हें बुरा लगेगा और हो सकता है कि मेरे पाठको को भी पसंद न आए, पिछले कई दिनों से जो विचार मेरे मन को झकझोर रहे थे, उनको आज मैंने लिखने की हिमाकत कर ही दी है.

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1) हे जननी, सारी दुनिया तुझे जगतजननी कहता है पर मैं इसे भी दुनिया का सबसे बड़ा झूठ मानता हूं क्योंकि तेरी एक नई बातें और देखने में आ रही है कि आज तू इतनी भौतिकवादी ही गई है, तुममें सहवास की भूख इतनी बढ़ गई है कि तू होटलों में किसी गैर-मर्द के साथ सोने में भी नहीं हिचकिचाती है. तुम भी तो सबसे पहले नारी हो ना और नारी के कई रूप होते हैं, पर में आजतक नहीं समझ पाया कि जो नारी पूर्व में इतनी महान होती थी, वही नारी आज इतनी बदल कैसे गई ? मां के रूप में, सास के रूप में, ननद के रूप में, भाभी के रूप में, बहन के रूप में, बेटी के रूप में, अपनी महानता क्यों खोती जा रही है ? तेरे भीतर का स्नेह का भरा सरोवर और रोम-रोम में बरसने वाला वात्सल्य तथा अपने भीतर ममता का झरना कैसे सुख गया ? क्यों जननी के रूप में अपनी संतान के लिए प्राण देने के बजाय भ्रुण में ही उनकी हत्या कर देती हो, सिर्फ इतन-सी सफाई देकर कि ‘ये बच्चा नहीं चाहिए.’ सास के रूप में किसी के प्राण लेने की भावना तुझ में कैसे आ जाती है ? आखिर तुम भी तो मां रही हो तभी तो आज सास बनी, फिर अपनी बहु पर जोर देकर क्यों उसकी संतान की हत्या करवा देती हो ? तुम ननद, बहू तथा भाभी के रूप में सब कुछ हथियाने के लिए कैसे लालायित रहती हो ?

2) हे प्रसुते, सारी दुनियां तुझे वात्सल्य की मूर्ति कहती है पर मैं इसे दुनियां का सबसे बड़ा झूठ मानता हूं क्योंकि पूरी दुनियां में एक संतान के लिए सबसे सुरक्षित स्थान है मां की कोख. और यही कोख जब तेरे ही हाथों अपनी संतान का कब्रिस्तान बन जाये तो तू काहे की वात्सल्य की मूर्ति ? कहां चला गया तेरा वात्सल्य ? हे जननी, बिना तेरी मर्जी के भ्रुण हत्त्या तो हो ही नहीं सकती, भले वो कन्या भ्रुणा हो या बालक भ्रुण. और वात्सल्य के कशीदों में तू इस जिम्मेदारी से बच भी नहीं सकती !

3) हे धात्री, सारी दुनियां तुझे ममता की मूर्ति कहती है पर मैं इसे दुनिया का सबसे बड़ा झूठ मानता हूं क्योंकि तुम अपनी बेटी की शादी करके ससुराल विदा करती हो और दूसरी ओर अपने घर बेटी के रूप में एक सुंदर-सी बहू लाती हो. तुम्हारी बेटी को ससुराल में कोई कुछ कहता है तो तुम्हें बहुत बुरा लगता है और इधर अपने ही घर में अपनी बहु को तुम दिन भर ताने मारती रहती हो, यह दोहरी नीति क्यों ? तुम्हारे भीतर आत्मा एक है, दिमाग एक है फिर मां तुम्हारे मन के भाव क्यों बदल जाते हंै ? कहा चली जाती है वह तुम्हारी ममता ?

4) हे महतारी, सारी दुनिया तुझे करुणा की मूर्ति कहती है पर मैं इसे दुनियां का सबसे बड़ा झूठ मानता हूं. बेटी की शादी करने के बाद बेटी पराई हो जाती है और अब उसका ससुराल ही उसके लिए सब कुछ है. चाहे दुःख हो या सुख उसके भाग्य के अनुसार उसको ससुराल मिला. किसी भी तरह की तकलीफ में मां को उसके ससुराल में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, पर तुम शादी करवा उसे ससुराल भेजने के बाद उसके ससुराल में हस्तक्षेप करके उसको बार-बार टेलीफोन के माध्यम से उसके वैवाहिक जीवन में दरार पैदा करके, तलाक की स्थिति का निर्माण करने में तुम एक बहुत बड़ा कारण बनती जा रही हो फिर तू काहे की करुणा की मूर्ति हो ? इधर अपनी बहु के खिलाफ दिन भर बेटे को भड़काकर उसका घर-संसार भी खराब कर बहु को ताने मार-मारकर घर से निकाल देती हो और बेटे की दूसरी शादी करवा देती हो, क्या यही तुम्हारी करुणा है ?

5) हे मां, सारी दुनियां तुझे भगवान से ऊपर मानती है, पर मैं इसे भी दुनियां का सबसे बड़ा झूठ मानता हूं क्योंकि तुम शादी से पहले अपने नाजायज गर्भ में पल रही संतान को जन्म देने के बाद उसे किसी कूड़ेदान में या किसी हॉस्पिटल की सीढ़ियों पर या मन्दिर की सीढ़ियों पर छोडकर उसे अनाथ बना देती हो, जिसे अपनी नवजात संतान की परवाह नहीं वह कैसे भगवान से ऊपर हो सकती है क्योंकि भगवान तो उनके भी होते है जिनका कोई नहीं होता !

6) हे मातेश्वरी, सारी दुनियां तुझे त्याग की मूर्ति कहती है, पर मैं इसे भी दुनियां का सबसे बड़ा झूठ मानता हूं क्योंकि तूने अपनी आंखों पर भौतिकता का इतना बड़ा चश्मा पहन रखा है कि तुम संतान की खातिर इतना त्याग भी नहीं कर सकती कि उसे अपने आंचल का दूध पिलाओ. इसमें त्याग की बात कहां है यह तो हर मां का कर्तव्य और धर्म है पर फिर भी तुम अपना फिगर खराब न हो जाये, इसके लिए बच्चा पैदा करने के बाद से ही अंग्रेजी याने डिब्बे का दूध पिलाती हो तो फिर तू काहे की त्याग की मूर्ति है !

7) हे मैया, सारी दुनियां तुझे संस्कारों का विद्यालय कहती है, पर मैं इसे भी दुनियां का सबसे बड़ा झूठ मानता हूं क्योंकि संतान को ज्ञान का पहला पाठ पढाने वाली मां ही होती है, पर तूने तो अपनी छाती से आंचल ही उतार फेंका है. बच्चे होने के बाद भी तुम स्वयं बारमुडा पहन कर घूमती हो. जीन्स, पेन्ट व टाइट टी-शर्ट (जिसमें से तुम्हारे सारे उर्जे-पुर्जे दिखते हैं) पहन कर बाहर शापिंग माल में घूमती रहती हो. इतना ही नहीं कभी-कभी पारदर्शी नाइटी पहन कर संतान के सामने कमरे से बाहर भी आ जाती हो ! पाश्च्यात सभ्यता की इस अंधी होड़ में ‘हे मैया’ अपने ब्लाउज के पीछे बड़े-बड़े कट का तथा बिना बाहों का ब्लाउज वो भी इतना छोटा की सारा पेट दिखता है. पहनने लग गई आगे से गला इतना खुला कि तुम्हारे ब्लॉउज के दूरदर्शन में सबको तुम्हारे संस्कार दीख जाते हैं. इन सबका क्या औचित्य है ? खुद अपने को सजाने और संवारने में इतनी फैशनपरस्त और व्यस्त हो जाती है कि अपनी संतान को संस्कार देने का समय ही नहीं बचता, इस कारण आज कल बेटियों का घर से भाग जाने की घटनाओं में वृद्धि हो रही है, बेटे बलात्कार कर रहे हंै. तो तू काहे की संस्कारों की पाठशाला है !

8) हे माता, सारी दुनिया तुझे पालनहार कहती है परन्तु मैं इसे भी दुनिया का सबसे बड़ा झूठ मानता हूं क्यांकि आजकल तू किटी पार्टियों में इतनी व्यस्त हो गई है तुझे अपने घर के बच्चांे को देखने का समय ही नहीं मिलता या तो बच्चे अकेले घर में रहते हैं या उनको नौकरों के भरोसे छोडकर बाहर किटी पार्टी में घूमती रहती है और आजकल बड़े घरों की औरतें शराब और ड्रग्स तक लेने लग गई है. और ऐसे में बेचारे वे बच्चे या तो नौकरो के द्वारा यौन-उत्पीड़न का शिकार बनते हैं या इंटरनेट आदि से पोर्न आदि देखकर गलत दिशा पकड़ लेते हैं तो फिर तू कैसे किसी की पालनहार कहला सकती है ? हे पूज्ये, क्या तुम सिर्फ मां के रूप में पूजी जाना पसंद करोगी ? सास, बहू और ननद के रूप में नहीं ? तुम्हारे भीतर आत्मा एक है दिमाग एक है फिर रिश्ते बदल जाने पर तुम्हारे मन के भाव क्यों बदल जाते हंै ? सुना है कि तुझे देवता तक पूजने के लिए तरसते हैं (ऐसा कथाओं में भी पढ़ा है). भगवान स्वयं तुम्हारे भीतर वास करते हैं तो सास के रूप में भी उस भगवान को अपने भीतर जिंदा रहने दो न. ननद और बहू के रूप में भी अपने भीतर के भगवान को राक्षस मत बनने दो न हे माता ! जिस दिन तुम सास के रूप में मां, बहू के रूप में मंँ, ननद के रूप में मां, भाभी के रूप में मां, याने हर रूप में माँ बन जाओगी तो इस दुनियां से स्वार्थ वैमनस्य, नफरत घृणा के सारे बादल अपने आप छंट जाएंगे.

हे मातृके ! मैं किशन गोलछा (जैन) सचमुच में नादान हूं इसलिए इस लेख को लिखकर मैंने यदि कोई गुस्ताखी की है तो मुझे नादान समझकर अपने अंतर मन से माफ कर देना. यह लेख लिखने का तात्पर्य मात्र इतना है कि मैं तुझे मां के रूप में नहीं देखना चाहता हूं बल्कि नारी के हर रूप में मुझे मां ही दिखाई दे, ऐसा मैं चाहता हूं इसलिए मेरे इस लेख से तेरे दिल को अगर ठेस पहुंची हो तो मुझे क्षमा करना !

शास्त्रो में कहा गया है कि ‘पुत्र कुपुत्र जायते, माता कुमाता न भवति’ परन्तु आज तो साफ दिखाई दे रहा है कि ‘पुत्रं कुपुत्र जायते किं न जायते मातृणां कुमाता भवति.’ सो तेरे ही एक पुत्र के रूप में मेरे द्वारा तुझे सुधारने की ये एक कोशिश है मेरी. ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ियों को और तेरी संतानों को तुझे मां कहने में शर्म महसूस होने लगे और वे तुझे सिर्फ बच्चा पैदा करने की मशीन ही समझने लगे. सो आइन्दा के लिए तू सोच ले कि आने वाले समय में तू अपने लिए बच्चे पैदा करने वाली मशीन का संबोधन सुनना पसंद करेगी या जननी बने रहना चाहेगी ?

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