Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

असुरक्षा इंसान को डराती है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 27, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

असुरक्षा इंसान को डराती है

हिमांशु कुमार, सामाजिक कार्यकर्त्ताहिमांशु कुमार, गांधीवादी चिंतक

आपने विज्ञापन देखे होंगे. कम्पनियां अपना माल बेचने के लिए आपकी भावनाओं को संतुष्ट करने वाले विज्ञापन बनाती हैं. जैसे मोटर साईकिल वाला विज्ञापन कहेगा यह मोटर साइकिल आपको फ्रीडम देगी. अब आप मन में फ्रीडम को पसंद करते हैं तो आप फ्रीडम की चाह में मोटर साइकिल खरीद लेंगे. इसी तरह मोबाइल कम्पनी कहेगी कि हमारे मोबाइल से टूगेदरनेस यानी साथ रहना बढेगा या ब्यूटी प्रोडक्ट वाले कहेंगे ‘लड़कियों कर लो दुनिया मुट्ठी में.’

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

हम सब जानते हैं कि मोटरसाइकिल से फ्रीडम नहीं मिलती. मोबाइल से टुगेदरनेस कम ही हुई है और ब्यूटी प्रोडक्ट से दुनिया लड़कियों की मुट्ठी में नहीं हो जाती. असल में हम चाहते कुछ और हैं लेकिन उसके लिए करते कुछ और हैं.

हमारी ज़रूरतें तो भावनात्मक हैं. जैसे हम इज्ज़त, संतुष्टी और सुरक्षा चाहते हैं लेकिन हम उसके लिए अच्छे कपडे, बहुत सारी खरीददारी और बहुत सारा सामान इकट्ठा कर लेते हैं. अंत में हमें पता चलता है कि सामान इकट्ठा करने से ना तो इज्ज़त मिलती है, ना संतुष्टी मिलती है ना ही सुरक्षा मिलती है.

कुछ लोगों ने तो खुद की सुरक्षा के लिए इतना ज्यादा ज़मीन, जायदाद इकट्ठा कर लिया कि दुनिया के करोड़ों लोगों को भूखा और बिना मकान रहना पड़ रहा है. यह कुछ इस तरह से है जैसे किसी इन्सान को यह पता हो कि भूख लगने पर पानी पीना चाहिए तो वह भूख लगने पर पानी पीता है. थोड़ी देर के लिए उसे भास होता है कि पेट भर गया लेकिन कुछ देर के बाद उसे फिर भूख लगने लगती है. वह इंसान फिर पानी पी लेता है.

पानी पीने से उसकी भूख फिर भी नहीं मिटती. वह बहुत सारा पानी इकठ्ठा कर लेता है. दुसरे लोग प्यासे मरने लगते हैं. फिर एक अक्लमंद इंसान आकर कहता है कि पानी पीने से भूख नहीं मिटती बल्कि खाना खाने से मिटती है.

इसी तरह हम सब भी भूखे किसी और चीज़ के हैं लेकिन इकठ्ठा कुछ और ही कर रहे हैं. चाहते सम्मान, संतुष्टी और सुरक्षा हैं लेकिन इकट्ठा संपत्ति करने लगते हैं. और दुसरे लोगों के हिस्से का भी अपने पास जमा करके उनके जीवन को दु:खी बना देते हैं. इज्ज़त और सुरक्षा की यही चाहत आपको जातिवादी और साम्प्रदायिक भी बनाती है.

आप सोचते हैं कि दुसरे इंसानों को खराब नीचा और गलत बता कर आप अच्छे ऊंचे और सही माने जायेंगे इसलिए आप दुसरे इंसानों से उनकी जाति धर्म जन्म के स्थान या खाल के रंग या उनके कपडे पहनने के ढंग या पेशे की वजह से नफरत करते हैं. यह नफरत आपको अपने बारे में एक झूठा आभास देती है. आप सोचते हैं कि देखो यह लोग खराब हैं और मैं कितना अच्छा हूं.

ध्यान दीजिये आपने सम्मान पाने के लिए दूसरों के अपमान का रास्ता अपनाया
बदले में आपको भी अपमान ही मिला. आप दुसरे धर्म और जाति को नीचा कहते हैं, बदले में वो आपको खराब कहते हैं तो आप जो चाहते हैं उसका उल्टा आपको मिलता है. आप चाहते हैं सम्मान, लेकिन आपको मिलता है अपमान. फिर आप क्रोध से भर जाते हैं और दुसरे धर्म या जाति वालों पर हमला कर देते हैं.

पुरुष स्त्री को इसीलिए पीटता है कि यह मेरा सम्मान नहीं करती. वह सोचता है कि पीटने से स्त्री डर पर पुरुष का सम्मान करने लगेगी लेकिन पीटने से सम्मान नहीं पैदा होता. विद्रोह पैदा होता है.

बड़ी जाति वाले भी दलित जातियों पर यही सोच कर हमला करती हैं कि हमले से डर कर दलित जातियां हमारा सम्मान फिर से करने लगेंगी. इसी तरह अम्बानी इतना धन क्यों इकठ्ठा कर रहा है ? क्योंकि वह डरा हुआ है. उसे लगता है कि किसी दिन धन समाप्त ना हो जाय इसलिए इतना कमा लूं कि यह धन कभी समाप्त ना हो. जैसे गुफा मानव सोचता था कि इतना खाना इकट्ठा कर लूं ताकि बारिश या ठण्ड में खाने के लिए मिल जाय, ठीक वही असुरक्षा आज भी अम्बानी जैसे इंसान के भीतर उसे भी डरा रही है.

जैसे ही आप ध्यान देते हैं. आपको समझ में आ जाता है कि आप चाहते कुछ और हैं
लेकिन कर कुछ और रहे हैं. फिर आप इज्ज़त पाने के लिए दूसरों को नीचा समझना बंद करते हैं. फिर आप सुरक्षा पाने के लिए पागलों की तरह सामान इकट्ठा करना छोड़ देते हैं. अपनी चाहत को पहचानिए. इसका रास्ता है ध्यान देना. खुद के सोचने पर ध्यान दीजिये.

Read Also –

 

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

आवश्यकता है आंदोलन पर बैठे किसानों को एक परिभाषा की

Next Post

लहू है की तब भी गाता है

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

लहू है की तब भी गाता है

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

आपः बिहार में शिक्षा की बदहाली के सवाल पर नीतीश कुमार के नाम खुला पत्र

June 7, 2017

मोदी सरकार के गलत निर्णयों से देश भर का कामगार परेशान

December 10, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.