ROHIT SHARMA

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'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

पुलिस

मैंने आदिवासी से पूछा - ‘तुम्हारे घर में दरवाज़ा नहीं है ? क्या इधर चोर नहीं आते ?' उसने कहा...

उर्सुला

उर्सुला सुनो उर्सुला हमें जीना ऐसे नहीं ऐसे था! बसाना था अपना एक मकांदो बेतरह! छींट देने थे एक मुट्ठी...

महाकुम्भ : जो संस्कृति तेजी से बदलते हुये समय में हमें बचा न सके, उसे बचाने की कोई आवश्यकता नहीं है

महाकुम्भ : जो संस्कृति तेजी से बदलते हुये समय में हमें बचा न सके, उसे बचाने की कोई आवश्यकता नहीं...

एक आम आदमी धर्म भी बचाए और देश की प्रोडक्टिविटी भी बढ़ाए, बदले में उसे क्या मिलेगा ?

एक आम आदमी धर्म भी बचाए और देश की प्रोडक्टिविटी भी बढ़ाए, बदले में उसे क्या मिलेगा ? हेमंत कुमार...

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