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बाजार और विचारों के बीच संघर्ष : मनुष्य को मनुष्यता के ही विरुद्ध कर रही बाजारवाद

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 22, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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बाजार और विचारों के बीच संघर्ष : मनुष्य को मनुष्यता के ही विरुद्ध कर रही बाजारवाद

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

संघर्ष तो बाजार और विचारों के बीच है. ऐसा द्वंद्व, जो शताब्दियों से चल रहा है, विशेष कर यूरोप में हुई औद्योगिक क्रांति के बाद से, जब बाजार ने खुद के विस्तार के लिये, कच्चे माल और सस्ते श्रम के लिये मनुष्यता और सभ्यता के मौलिक सिद्धांतों को रौंदते हुए एक नई दुनिया रच डाली. ऐसी दुनिया, जहां लोग तो क्या, देश ही गुलाम हो गए. मनुष्यों की गुलामी से सदियों तक जूझने वाले विचारों के सामने अब पूरे के पूरे समाज, पूरे के पूरे देश की गुलामी थी.

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विचार देशों की गुलामी के विरुद्ध खड़े हुए. एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म लिया जिसने विचारों को सम्मान दिया, उनसे प्रेरणा ली, अनथक संघर्ष किया और गुलामी की जंजीरों को तोड़ फेंका. यूरोप के औद्योगिक देशों की गुलामी से एशिया और अफ्रीका के दर्जनों देश शताब्दियों के शोषण और उत्पीड़न के बाद महज एक दो दशकों के अंतराल में ही आजाद हो गए. विचार जीते.

विचार लड़ते हैं, अंततः जीतते हैं, लेकिन बाजार फिर से नए रूप में आ जाता है. मनुष्य फिर से अपने अस्तित्व के लिये जूझने लगता है. विचार फिर से मनुष्यों के लिये आ खड़े होते हैं.

वो, जैसे वायरस के बारे में कहा जाता है कि वे रूप बदल कर आ जाते हैं, नए रूप में, अक्सर पहले से अधिक खतरनाक भी. वैज्ञानिक जुट जाते हैं इस नए रूप से मानवता को बचाने में. वैसे ही बाजार भी नए रूप में आ जाता है. पहले से अधिक अदृश्य शक्तियों से लैस, नैतिक रूप से अधिक पतित, अधिक क्रूर और खतरनाक और पहले से बहुत अधिक चतुर, चालाक.

नए रूप में आते ही बाजार ने पहला निशाना विचारों को ही बनाया. मनुष्य पर आधिपत्य बनाने के लिये विचारों को अप्रासंगिक बनाना जरूरी है. तो, बाजार के प्रवक्ताओं ने घोषणा कर डाली कि विचारों का अंत हो गया है. ऐसा कह कर बाजार खुद के लिये निर्बाध दुनिया बनाना चाहता था. लेकिन, बाजार और मनुष्यों के बीच विचार फिर आ खड़े हुए.

इस बार बाजार पूरी तैयारी के साथ बाजारवाद की छाया में आया था. तकनीक का अद्भुत विकास एक बड़ी ताकत के रूप में उसके साथ था. उसने मनुष्यों के मस्तिष्क पर कब्जा जमाने की योजना बनाई. मनुष्य, जो विचारों के वाहक हैं, जिनके लिये विचार हैं, बाजार ने सुचिंतित तरीके से उसी मनुष्य को विचारों से विमुख करना शुरू कर दिया.

यह अजीब-सा विरोधाभास है कि शिक्षा के अकल्पनीय विस्तार के साथ ही विचारहीनता के संक्रमण का भी व्यापक प्रसार हुआ. इसके कई कारण रहे, किन्तु सबसे पहला कारण तो यही रहा कि बाजार के हाथों जाते शिक्षा तंत्र में मूल्यहीनता पसरती गई. शिक्षा के साथ जो मूल्य जुड़े होते हैं, वे बाजार के मूल्यों के साथ सह अस्तित्व की कल्पना कर भी नहीं सकते.

जाहिर है, मूल्यों से दूर होती शिक्षा ने ऐसी पीढ़ी की रचना की जिसके मन में विचारों के लिये अधिक सम्मान नहीं था. मनुष्य न रह कर ऐसा उपभोक्ता बन जाना, जिसकी ललक कभी न मिटे, वह विचारों के प्रति कितना सम्मान रख पाएगा. अपरिग्रह, संतोष, सह अस्तित्व, संवेदना आदि जैसे शब्द, जो हमारी सभ्यता के मौलिक आदर्शों में थे, उपभोक्तावाद के आक्रामक प्रसार में अप्रासंगिक हो गए.

यह विचारों पर बाजार की बड़ी जीत थी कि उसने मनुष्य को उपभोक्ता में बदल डाला और उसमें उपभोग की असीमित ललक पैदा कर दी. मूल्यहीनता और संवेदनहीनता से समाज में त्राहि-त्राहि मच गई और बाजार यह सब देख कर विजयी भाव से मुस्कुराता रहा.

हमारे दौर पर हावी बाजारवाद स्वयं में कोई विचार नहीं, एक व्यवस्था है जिसका अपना स्वभाव है. यह जितना ताकतवर होता जाएगा, शोषण और छल के उतने ही आख्यान रचता जाएगा. यही हुआ भी. अर्थव्यवस्था को मुक्त करने, बाजार को अपनी गति से चलने देने के नाम पर श्रम कानूनों में बदलाव करके जीते जागते प्राणियों को उपकरणों में तब्दील कर दिया गया, पेंशन की छतरी को कामगारों के अन्य वर्गों तक पहुंचाने के बदले उसे भी बाजार के हवाले कर उस कंसेप्ट की ही हत्या कर दी गई.

शिक्षा को अधिकाधिक बाजार के हवाले करते हुए निर्धनों के संवैधानिक अधिकारों का हनन किया जाने लगा. हर वह तरीका अपनाया जाने लगा जो बाजार की शक्तियों को ताकतवर बनाता हो और मनुष्य को कमजोर करता हो. बाजार के प्रभु दिग्विजयी मुद्रा में हैं, मनुष्यता पराजित मुद्रा में है और मनुष्य हितैषी विचार अप्रासंगिक होने के खतरों से जूझने लगे हैं लेकिन, विचार न मरते हैं, न निर्णायक रूप से हारते हैं. बाजार और विचारों का संघर्ष तब भी चल रहा है. विचारहीनता का उत्सव मनाते लोगों के बीच भी विचार ज़िन्दा हैं. फीनिक्स की तरह अपनी राख से भी जन्म लेकर, नई ऊर्जा के साथ नई उड़ानों की ओर.

बाजार ने मनुष्य को विचारहीन उपभोक्ता बनाया, राजनीति को अपने नियंत्रण में लेकर, लोकतंत्र को प्रहसन में तब्दील कर सत्ता को अपना मैनेजर बनाया, मीडिया पर अपना प्रभुत्व कायम कर उसे अपना चारण बनाया, सार्वजनिक जीवन के लोकप्रिय सितारों को अपना सेल्स एजेंट बनाया.

इतिहास में बाजार इतना शक्तिशाली कभी नहीं था. उसने दुनिया उलटनी-पलटनी शुरू कर दी. हर चीज में मुनाफा की तलाश, हर शै को गुलाम बनाने की ज़िद.
उसने विज्ञान को मानवता के हित की जगह अपने हितों की ओर मोड़ने की हर सम्भव कोशिश की. कला और शास्त्रीयता को सम्मान के साथ किसी आलमीरा में सजावट की वस्तु के रूप में स्थापित कर साइड कर देने का हर सम्भव षड्यंत्र किया, विचारकों को उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर याद करने की औपचारिकता तक सीमित करने का हर सम्भव प्रयास किया.

टेस्ट क्रिकेट की कला और उसकी शास्त्रीयता की जगह बाजार ने टी-ट्वेंटी और अब टी-टेन को जन्म दिया ताकि एक महान खेल को मुर्गों की लड़ाई में तब्दील कर उससे अकूत मुनाफा कूटा जा सके. हर चीज जैसे उसकी जद में आती जा रही है. मनुष्य को मनुष्यता के ही विरुद्ध कर अपनी मनोवैज्ञानिक छाया में ले लेने की बाजार की कोशिशों का कोई अंत नहीं. लेकिन, विचार मनुष्यता के पीछे खड़े हैं. वे बाजार के विरुद्ध नहीं, बाजारवाद के विरुद्ध हैं, उसके षड्यंत्रों के विरुद्ध हैं.

कोरोना पूर्व यूरोप में सत्ता और बाजार की जुगलबंदी के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब हो, उच्च शिक्षा के घोर व्यवसायीकरण के खिलाफ भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में छात्रों का आंदोलन हो या आज की तारीख में दिल्ली की सीमा पर कंपा देने वाली सर्दी में डेरा डाले किसानों का विशाल समूह हो, वे उम्मीद दिलाते हैं कि बाजार की अपराजेयता का मिथक टूट सकता है.

नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के प्रवक्ता बाजार की भाषा बोल रहे हैं. वे यही बोल ही सकते हैं क्योंकि बाजार भारत के विशाल और बेहद संभावनाशील कृषि क्षेत्र पर कब्जा करना चाहता है. यह तब तक नहीं हो सकता जब तक किसानों में किसानी ज़िन्दा रहेगी. बाजार इस किसानी को खत्म करना चाहता है और नए किस्म का कृषि परिदृश्य रचना चाहता है. ऐसा परिदृश्य, जिसमें बीज से लेकर फसल के दाने तक, जमीन से लेकर जमीन के मालिक तक उसके अनुसार सांसें लें, उसके मुनाफे के औजार बनें.
सत्ता बाजार के साथ है, विचार किसानों के साथ हैं.

पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश आदि के जिन किसानों के साथ आज विचार खड़े हैं, वही जब अपने खेतों में काम करने वाले पिछड़े इलाकों के मजदूरों का शोषण करते हैं तो विचार उन मजदूरों के साथ आ खड़े होते हैं.

विचार किसी व्यक्ति, किसी वर्ग, किसी व्यवस्था के लिये नहीं, मनुष्य और मनुष्यता के लिए खड़े होते हैं. यही कारण है कि मनुष्यता के विलोम पर खड़े बाजारवाद के लिये विचार एक चुनौती हैं.

बहुत कुछ बचाना है सभ्यता को इस निर्मम, सर्वग्रासी बाजारवाद से. शिक्षा को, इलाज को, किसानी को, श्रमिकों के अथक श्रम को, निर्धन बच्चों की संभावनाओं को, असहाय, निराश्रित वृद्धों की उम्मीदों को, रिश्तों की टूटती भावात्मक डोर को, पूरी दुनिया की मानवीय बुनावट को. अभी बाजार भारी पड़ रहा है क्योंकि उसने हमारी पीढ़ी को मूल्यहीन और विचारहीन बनाने में बहुत जतन किया है. तभी तो सत्ता के खिलाफ खड़े होते हर व्यक्ति, हर समूह को संदेह की नजर से देखने की नई दृष्टि विकसित हुई है.

मनुष्यता को बचाये रखने की लड़ाई में विचारों का सिरा थामे रखने वाले लोगों को बाजारवाद से लड़ना है तो उन्हें सत्ता से जूझना होगा, मीडिया के कुप्रचार से लड़ना होगा, अपने ही लोगों की विचारहीनता का निशाना बनना होगा.

बाजार और बाजार प्रायोजित सत्ता की जुगलबंदी और अपने ही लोगों की ठस दिमागी से जूझते विचारवान लोग हारते भी जाएंगे तो विचारों का सिरा अगली पीढ़ी को थमाते जाएंगे. लड़ाई तो पीढ़ियों तक लड़नी होगी. एक किसान आंदोलन के सामने सत्ता की उखड़ती सांसों से अधिक उत्साहित होने की स्थिति नहीं है. जब तक अपने संवैधानिक अधिकारों के लिये छात्र और बेरोजगार युवा, अपने श्रम के वाजिब सम्मान और पारिश्रमिक के लिये श्रमिक और अपनी अस्मिता के लिये वंचित समुदाय उठ खड़े नहीं होंगे, तब तक मनुष्यता इस क्रूर, संवेदनहीन, सर्वग्रासी बाजारवादी व्यवस्था से पार नहीं पा सकती.

कोरोना संकट को बाजारवादी शक्तियों ने बेलगाम होने के अवसर के रूप में इस्तेमाल किया है. यह प्रवृत्ति दुनिया की अनेक सरकारों में देखी गई, लेकिन भारत की सरकार को कुछ अधिक ही जल्दी है, जो सरकार बाजार की शक्तियों के जितने ही अधिक नियंत्रण में है, वह उतनी ही जल्दीबाजी में है. रेल के प्लेटफॉर्म से लेकर खेत की मिट्टी तक बाजार के नियंताओं के हवाले करने की यह आतुरता बताती है कि हम ऐसे दौर में पहुंच गए हैं जहां बाजार के मगरमच्छ हमारी नियति का निर्धारण करने की ताकत हासिल कर चुके हैं. बाजार और मनुष्य के इस द्वंद्व में विचार ही हमें बचाएंगे, मनुष्य के नैसर्गिक अधिकारों और उसकी गरिमा को बचाने वाले विचार.

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