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Home गेस्ट ब्लॉग

भारत में मीडिया की सिमटती आजादी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 20, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
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मीडिया वेबसाइट हूट की इंडिया फ्रीडम रिपोर्ट, 2017 इस नतीजे पर पहुंची है कि पिछले एक साल में भारत में पत्रकारिता के लिए माहौल खराब हुआ है. गौरी लंकेश समेत दो पत्रकारों की गोली मारी गई. एक और पत्रकार की हत्या की गई. कुल 11 पत्रकार मारे गए. लेकिन इनमें से तीन की हत्या सीधे-सीधे उनकी पत्रकारिता से जुड़ती है. काम करने के दौरान पत्रकारों पर साल में 46 हमले हुए. 27 मामले ऐसे रहे जिनमें पत्रकारों को या तो गिरफ्तार किया गया, उन्हें पुलिस हिरासत में रोका गया या फिर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया.

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इस रिपोर्ट में सेंशरशिप के विभिन्न तरीकों का भी जिक्र है और मीडिया की पहुंच बाधित करने का भी. इस काम में हर राजनीतिक दल के लोग शामिल रहे. गोवा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने चुने हुए पत्रकारों को ही प्रेस वार्ता में आने दिया. केरल में कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यमंत्री ने पत्रकारों को एक बैठक से बाहर कर दिया. यह बैठक उनके और भाजपा के प्रतिनिधियों के बीच थी. राजस्थान सरकार ने मीडिया पर नकेल साधने वाला कानून बनाने की ही योजना बना ली थी. दार्जिलिंग में मीडिया को गोरखालैंड आंदोलन को कवर करने से मना किया गया. कांग्रेस पार्टी ने भी उन चैनलों को अपनी प्रेस वार्ता में आने से रोका जो उसके खिलाफ थे. जम्मू कश्मीर में हमेशा की तरह मीडिया को नियंत्रण जारी रहा. भारत सरकार के विशेष दूत दिनेश्वर शर्मा की कुपवाड़ा यात्रा को कवर करने से मीडिया को रोका गया. कई बार वहां इंटरनेट सेवा बंद की गई. कुल मिलाकर 2017 में जम्मू कश्मीर में 40 दिन इंटरनेट सेवा बंद रही. पूरे देश में कुल 77 दिन ऐसे रहे जब इंटरनेट सेवा बाधित की गई. प्रेस स्वतंत्रता के मामले में भारत की रैंकिंग अच्छी नहीं होने की वजह स्पष्ट है.

पत्रकारों की हत्या, उन पर हमले, उन्हें हिरासत में लेना, जेल में बंद करना और प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सेंसरशिप प्रेस की आजादी पर हमले के संकेतक हैं. लेकिन इसमें कई बार इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि कैसे सूचनाओं तक प्रेस की पहुंच को बाधित किया जाता है. भारत की मीडिया से भी अपेक्षा की जाती है कि यह लोकतंत्र के चैथे खंभे की भूमिका निभाए. लेकिन इस मामले में अब तक का इसका रिकाॅर्ड अस्थिर रहा है. कड़े सवाल नहीं पूछे जाते. एक विचार से दूसरे वैकल्पिक विचार को दबाने की कोशिश की जाती है. इस वजह से पिछले तीन साल में सूचनाओं तक पहुंच को सीमित करने का जो खेल चला है, उस पर खास ध्यान नहीं गया. कहना गलत नहीं होगा कि तकरीबन सभी सरकारें सूचनाओं तक मीडिया की पहुंच को सीमित करना चाहती हैं. अभी हालत यह है कि केंद्र सरकार में काम करने वाले अधिकारी पत्रकारों से मिलने-जुलने और बातचीत करने में डर रहे हैं. सत्ता में बैठे लोग प्रधानमंत्री की राय को प्रचारित करने में लगे हैं. सरकार के अंदर खुल कर चर्चा नहीं हो रही और स्वतंत्र सोच रखने वाले लोग डरे हुए हैं. ऐसे में स्वतंत्र पत्रकारों के लिए अहम मुद्दों की पड़ताल की कोई संभावना नहीं बचती. अगर इसके बावजूद कोई पड़ताल करता है तो उस पर आरोप लगते हैं कि वह विपक्षी दल के साथ मिला हुआ है.

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने साढ़े तीन साल हो गए. लेकिन अब तक उन्होंने कोई प्रेस वार्ता नहीं की. वह एकतरफा मन की बात और अपने प्रति मित्रवत भाव रखने वाले समाचार चैनलों को साक्षात्कार देने तक ही खुद को सीमित रखे हुए हैं. जो चैनल सरकार के अनुकूल हैं, उन्हें ही वे साक्षात्कार देते हैं. 20 और 21 जनवरी को प्रधानमंत्री द्वारा जी न्यूज और टाइम्स नाउ से बातचीत करना इसी बात को मजबूत करता है. इसके जवाब में कोई यह तर्क दे सकता है कि राष्ट्राध्यक्ष के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वह प्रेस के सवालों का जवाब दे. लेकिन सीधी बातचीत नहीं होने पर मीडिया के सामने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के सार्वजनिक बयानों के आधार पर उनकी सोच का पता लगाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अपने खिलाफ की गई हर खबर को ‘फर्जी खबर’ बताते हैं. इसके बावजूद वाइट हाउस की प्रेस वार्ता नहीं बंद की गई. इसमें पत्रकार सवाल करते हैं और आम लोग इन सवाल-जवाब को देख सकते हैं. भारत में ऐसे संवाद आम तौर पर नहीं होते. बजट और प्रमुख नीतिगत घोषणाओं के अवसर पर ही ऐसा संवाद यहां दिखता है.

भारत में मीडिया की स्वतंत्रता का बुरा हाल सूचनाओं की राह में अवरोध पैदा करने और पे्रस वार्ताओं के बंद होने से जुड़ी हुई है. यह तब होता जब कार्यपालिका यह मानने को तैयार नहीं हो कि मीडिया का काम नीतियों के क्रियान्वयन में व्याप्त खामियों को सामने लाना और इन पर सवाल पूछना है. स्वतंत्र मीडिया ही यह काम कर सकती है. आजकल कड़े सवालों को सरकार विरोधी और गैरजरूरी के साथ-साथ राष्ट्रविरोधी और गैरवफादारी वाला माना जाता है. ऐसे में मीडिया एक व्यक्ति के महिमामंडन में लगा हुआ है. पत्रकारिता का मजाक बनाने वाले साक्षात्कार लिए जा रहे हैं.

-EPW से साभार

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