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भीड़ की ऐसी हिंसा की घटनाएं थम क्यों नहीं रहीं ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 25, 2019
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भीड़ की ऐसी हिंसा की घटनाएं थम क्यों नहीं रहीं ?

Ravish Kumarरविश कुमार, पत्रकार

जब भी आप किसी भी मामले में भीड़ के गुस्से की तस्वीर देख रहे होते हैं तो हमारे लिए अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि आप क्या सोच रहे होते हैं, आप सुन्न हो जाते हैं या कोई फर्क ही नहीं पड़ता. तरह तरह की घटनाओं में भीड़ की तस्वीर भी बनाई जा रही है ताकि वायरल हो सके. वीडियो बनाने वाले को भरोसा है कि उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा. वीडियो न बनाए तो हम आप तक बात ही नहीं पहुंचेगी कि किसी की हत्या इस तरह से की गई है. इस तरह की घटना जब सामने आती है, निंदा करने वाले पीछे नहीं हटते. मगर चुप रहने वालों की तादाद इतनी बड़ी होती है कि कई बार शक होने लगता है कि कहीं यह चुप्पी भीड़ की हिंसा का सपोर्ट तो नहीं है. नाकामी यह है कि ऐसी घटनाएं रूकी नहीं हैं.

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24 साल के तबरेज़ अंसारी को सात घंटे तक बिजली के खंभे से बांध कर मारा जाता रहा. मारने वाले के मन में कितना गुस्सा भरा होगा, कितनी घृणा भरी होगी कि वह एक शख्स को जान से मारने की हद तक मारता रहता है. आरोप है कि तबरेज़ मोटरसाइकिल चुराते पकड़ा गया था. एक मिनट के लिए भूल जाइये कि मार खाने वाला तबरेज़ और मारने वाला पप्पू मंडल है. मारने का वीडियो बनाने और भीड़ का खड़े होकर तमाशा देखने वालों को भी भूल जाइये. अब आप याद कीजिए ऐसे कितने वीडियो आप देख चुके होंगे, कहीं कोई मास्टर स्कूल के छात्र को मार रहा है तो कहीं मां बाप ही मिलकर अपने बच्चों का जला रहे हैं क्योंकि उन्होंने अपनी मर्जी से जाति तोड़ कर शादी कर ली है. हर तरह के वीडियो से आप सामान्य हो चुके हैं. फिर किससे उम्मीद की जाए कि वह इन वीडियो को देखकर बेचैन हो जाएगा. होता उल्टा है.




इस वीडियो को देखते ही जो प्रतिक्रिया आती है दरअसल उसे पढ़ना चाहिए. कोई पूछ रहा होगा कि बंगाल में ऐसी हिंसा हुई नहीं बोले, कोई लिख रहा होगा कि मार खाने वाला चोर था. जैसे हम भारत न होकर अरब हो गए जहां अपराध की सज़ा पत्थर मार कर दी जाती हो. अब आप सोचिए कि जब तबरेज़ खंभे से बांध कर मारा जा रहा होगा तो वह क्या सोच रहा होगा. अब वह जल्दी नहीं बचेगा और उसका वीडियो वायरल होगा. अगर नाम से लोगों को दिक्कत है तो तबरेज़ का नाम राकेश रखकर देखिए. तब क्या फर्क पड़ता है. शायद नहीं. क्योंकि आए दिन आप देखते तो रहते ही हैं कि किसी अनुसूचित जाति के लड़के को ज़िंदा जला दिया गया. किसी लड़की को बलात्कार के बाद जला दिया गया. कार टकरा गई तो उतर कर दो लोगों ने किसी को जान से ही मार दिया. डॉक्टर पर गुस्सा आया तो वहीं पर भीड़ ने घेर कर मार दिया. गुस्सा और सनक में जब यह बात मिल जाए कि जय श्री राम भी बोलना है जय हनुमान बोलना है क्योंकि मार खाने वाले का नाम तबरेज़ है, तब यह सोचिए कि यह आदमी किस समाज का हिस्सा है. क्या यह जय श्री राम इसलिए बुलवा रहा है क्योंकि यह तबरेज़ है या इसलिए बुलवा रहा है कि इसे मारने के बाद पुलिस से लेकर तमाम लोग इसके साथ आकर खड़े हो जाएंगे. क्या गाय के बाद जय श्री राम का नाम लेना नया पोलिटिकल लाइसेंस हो गया है या फिर हम बीमार हो गए हैं. खुद राम का नाम नहीं ले रहे हैं, किसी और से बुलवाने के लिए उस पर जानलेवा हमला कर रहे हैं.




मैं यह मानकर चलता हूं कि इस वीडियो को देखने से पहले ही आप ऐसे कई वीडियो देख चुके हैं और आप सामान्य हो चुके हैं. यह वीडियो तबरेज़ की मौत का नहीं है. नागरिक समाज की मौत का वीडियो है. बहुत से पत्रकार यहां तक कह रहे हैं कि उसने चोरी की थी इसलिए भीड़ बेकाबू हो गई. हम इसी तरह हत्या को सही ठहराने के लिए तर्क खोजते रहते हैं और भीड़ का हौसला बढ़ाते रहते हैं. जैसे चोरी के मामले में किसी को पकड़ लें तो खंभे से बांध कर कई घंटे तक मारते रहें ताकि वह ज़िंदा न बचे. पुलिस जांच की बात कहती है लेकिन तब क्या करेंगे जब आरोपी जेल से निकलेंगे और उन्हें कोई मंत्री लड्डू खिलाता दिख जाए. हमारे सहयोगी हरबंस ने बताया है कि तबरेज़ अपनी ही बाइक पर दो दोस्तों के साथ जमशेदपुर से आ रहा था. कदमडीहा उसका गांव था. गांव से तीन चार किमी दूर गांव वाले बाइक सवार को पकड़ लेते हैं कि चोरी की बाइक है. दो दोस्त भाग जाते हैं और तबरेज़ पकड़ में आ जाता है. पुलिस जांच कर रही है लेकिन सोचिए कि अगर बाइक तबरेज़ की ही निकलती है तो फिर यह गुनाह किस खाते में जाएगा.




दो साल पहले तबरेज़ की शाइस्ता से शादी हुई थी. तबरेज़ के मां बाप नहीं हैं. तबरेज़ के परिवार वाले चोरी के आरोप को नहीं मानते हैं. उनका कहना है तबरेज़ पूणे में काम करता था. ईद पर घर आया था.

झारखंड का ज़िला है सरायकेला-खरसावां. झारखंड के अतिरिक्त पुलिस महानिदेश आशीष बत्रा ने माना है कि पुलिस से चूक हुई है. दो अधिकारी सस्पेंड भी हुए हैं. पुलिस ने भी लापरवाही की और यह पुलिस के मुखिया ही मान रहे हैं. पुलिस अगर तबरेज़ को हवालात की जगह अस्पताल ले गई होती, उसकी चोट की गंभीरता से जांच कराती तो क्या पता बच जाता क्योंकि जब मरा तब वह पुलिस के हवाले था. एसपी सरायकेला ने बयान जारी किया है कि ’18 जून को धक्तीडीह गांव के लोगों ने तबरेज़ अंसारी को कमल महतो के घर में घुसते हुए पकड़ लिया. रात के ढाई बज रहे थे. तबरेज़ के साथ दो और लोग थे. तबरेज़ पकड़ा गया और उसे मारा गया. सुबह पांच बजे पुलिस को सूचना मिली, वह स्पॉट पर पहुंची और प्राथमिक चिकित्सा दी गई. चोरी की बाइक बरामद कर ली है. गांव वालों ने तबरेज़ और उसके दो साथियों के खिलाफ एफआईआर भी कराई. उसे ज़िला अस्पताल में इलाज के बाद न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 22 की सुबह वह बीमार पड़ा. सदर अस्पताल ले जाया गया जहां वो मर गया. तबरेज़ के परिवार वालों ने पप्पू मंडल और अन्य पर एफआईआर कराई है. उसे गिरफ्तार कर लिया गया है. 24 की सुबह को कमल महतो, प्रेमचंद माहली, भीम मंडल और सोनामू प्रधान को भी गिरफ्तार कर लिया गया.




भीड़ की हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट ने बकायदा एक गाइडलाइन बनाई है. पिछले साल जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था तब तक 18 महीने में 66 बार भीड़ ने हमला किया था और 33 लोगों की हत्या हो गई थी. इंडिया स्पेंड का यह आंकड़ा है. इसी की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा है कि भीड़ द्वारा हत्या के लिए सज़ा तय हो और संसद कानून बनाए. क्या संसद ने कानून बनाया है? क्या संसद को तुरंत इस पर कानून नहीं बनाना चाहिए था, सुप्रीम कोर्ट का आदेश तो जुलाई 2018 का है. सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लिंचिंग रोकने के लिए दिशानिर्देश भी तय कर दिए हैं जिसे चार हफ्ते के भीतर कें और राज्य सरकारों को लागू करना है. राज्य सरकार हर ज़िले में पुलिस अधीक्षक या उससे ऊपर के अधिकारी को नोडल अफसर बनाए. इस नोडल अफसर की मदद के लिए हर ज़िले में एक डीएसपी की तैनाती की जाए जिनका काम होगा भीड़ द्वारा हत्या की स्थिति का आंकलन और नियंत्रण. हर ज़िले में टास्क फोर्स बने जो भीड़ के बारे में ख़ुफिया जानकारी जुटाता रहे. राज्य सरकार ऐसे ज़िलों, सब डिविजनों और गांवों की पहचान करे. जहां पिछले पांच साल में भीड़ की हिंसा का अतीत रहा है. ऐसे ज़िलों के नोडल अफसरों के लिए राज्य सरकार दिशा निर्देश जारी करे. उन इलाकों में एस एच ओ स्तर का पुलिस अधिकारी विशेष रूप से सतर्क रहे.

तबरेज अंसारी और उसकी पत्नी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि लिंचिंग के खिलाफ केंद्र और राज्य सरकार रेडियो और टेलिविज़न और मीडिया के अन्य मंचों के ज़रिए इस बात का व्यापक प्रचार प्रसार करे, गृह विभाग और पुलिस विभाग की वेबसाइट पर इसका प्रचार किया जाए कि हत्यारी भीड़ में शामिल होने पर बेहद सख्त सज़ा मिलेगी. क्या ऐसा प्रचार प्रसार आपको दिख रहा है?

यह केंद्र और राज्य सरकार का कर्तव्य होगा कि वह सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे भड़काऊ बयानों, मेसेजों, वीडियो पर नज़र रखे. उन्हें फैलने से रोके, जिनसे भीड़ के भड़कने की आशंका रहती है. एक महीने के भीतर राज्य सरकारों को हत्यारी भीड़ के

शिकार पीड़ितों के मुआवज़े के लिए नीतियां बनाएगी. शारीरिक और मनोवैज्ञानिक ज़ख्म की प्रकृति, ज़ख्म के कारण रोज़गार के नुकसान वगैरह के आधार पर मूल्यांकन तय हो. हत्यारी भीड़ से संबंधित केस की सुनवाई के लिए अलग से फास्‍ट ट्रैक कोर्ट बने और छह महीने में सुनवाई पूरी हो.




माननीय सुप्रीम कोर्ट को ही अब रिपोर्ट लेनी चाहिए कि उन दिशानिर्देशों पर राज्यों और ज़िलों में अमल हुआ या नहीं. सरकारों ने दिशार्निदेश के आधार पर नोटिफिकेशन तो जारी कर दिया, लेकिन कानून और मुआवज़े की नीति पर क्या स्टेटस रिपोर्ट है. झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिशानिर्देश तो जारी कर दिया था लेकिन ऐसे मामलों का मुकदमा लड़ने वाले और बार काउंसिल के सदस्य वकील हेमंत कुमार का कहना है कि झारखंड में सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश को सही से लागू नहीं किया जा रहा है.

आखिर किन राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के आधार पर कानून बनाए हैं तो जब हमने सिर्फ मणिपुर का ही नाम मिला. सितंबर 2018 में पश्चिमी इंफाल में 26 साल के फरुख़ ख़ान को भीड़ ने मार दिया था क्योंकि उन्हें शक था कि फारुख ने बाइक चुराई थी. इस घटना का जो वीडियो बना था उसमें चार पुलिसकर्मी वहीं खड़े होकर देख रहे थे. इनमें से एक सब इंस्पेक्टर भी था. पुलिस के सामने भीड़ ने फारुख को मार दिया. मणिपुर में इस घटना के बाद बहुत सारे धरने प्रदर्शन हुए थे. तब जाकर वहां की राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के आधार पर कानून बनाया. ऐसा करने वाला मणिपुर पहला राज्य था. 8 नवंबर 2018 में मणिपुर सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी किया. इस कानून के अनुसार इस कानून में लिंचिंग को परिभाषित किया गया है. धर्म, जाति, लिंग, भाषा, राजनीतिक संबंधों के आधार पर अचानक या योजनाबद्ध तरीके से भीड़ की कोई भी हिंसा लिंचिंग है. हर ज़िले में राज्य सरकार ऐसे मामलों को देखने के लिए एक पुलिस अधिकारी को तय करेगी. पहले से खुफिया जानकारी हासिल करने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स बनाया जाएगा. हर पुलिस अधिकारी लिंचिंग को रोकने के लिए ज़िम्मेदार कदम उठाएगा. जो भी लिंचिंग में दोषी पाया जाएगा उसे सात साल तक की सज़ा होगी. एक लाख का जुर्माना देना होगा. अगर पीड़ित गंभीर रूप से घायल होता है तो ऐसे मामले में दस साल की सज़ा होगी. 3 लाख का जुर्माना होगा. साज़िश में शामिल लोगों को भी इसी तरह की सज़ा होगी.




झारखंड में लिंचिंग की पहली घटना नहीं है. वहां कानून की सख्त ज़रूरत है. बीच बीच में औरतों को डायन बताकर भी गांवों की भीड़ उन्हें मारती रही है. फर्स्‍टपोस्ट वेबसाइट पर इस पर एक रिपोर्ट है. यह रिपोर्ट 13 मार्च 2019 के दिन प्रकाशित हुई है. इसमें झारखंड पुलिस और राष्ट्रीय अपराध शाखा ब्यूरो के आंकड़ों का इस्तमाल किया गया है. इस रिपोर्ट के अनुसार 2001 से 2018 के बीच 590 औरतों को डायन बता कर मार दिया गया. 2016 से 2018 के बीच झारखंड की राजधानी रांची में 13 औरतों को डायन बता कर मार दिया गया. राज्य सरकार ने एक कानून भी बनाया है जिसे withcraft prevention act, 2001 कहते हैं. इस कानून के तहत किसी औरत को डायन बताने वाले को 3 माह से एक साल की सज़ा है. मात्र 2000 रुपये का जुर्माना है. हमने झारखंड पुलिस की वेबसाइट पर मौजूद इस कानून का ड्राफ्ट देखा तो डायन बताकर मारने वालों की सज़ा का ज़िक्र नहीं मिला. सिर्फ डायन बताने की सज़ा है. औरतों की जान कितनी सस्ती है. इस कानून का कोई असर नहीं है.




आईआईटी पटना और सेंट्रल यूनिवर्सिटी झारखंड के प्रोफेसरों ने इस पर एक रिसर्च पेपर लिखा है. बानी बेदी ने रिसर्च गेट वेबसाइट से इस रिसर्च पेपर को निकाला है. शमसेर आलम और आदित्य राज ने अपने रिसर्च में लिखा है कि डायन बताकर मारने वाले ज़्यादातर केस कोर्ट तक ही नहीं पहुंच पाते हैं. अगर पहुंचते भी हैं तो गवाह नहीं मिलते हैं. पुलिस की जांच ठीक से नहीं होती है. सज़ा भी बहुत मामूली है. राष्ट्रीय अपराध शाखा ब्यूरो का डेटा भी पूरा नहीं है. इसमें सिर्फ मार दी जाने वाली औरतों की संख्या होती है. औरतों को गर्म लोहे से दाग देने, शारीरि‍क अंगों को काट देने का ज़िक्र नहीं होता. औरतों को नंगा कर गांव में घुमाया जाता है उसका आंकड़ा नहीं होता है.

रिसर्च में आलम और राज ने लिखा है कि औरतों की संपत्ति को हड़पने के लिए उन्हें डायन बताकर मार दिया जाता है. खासकर उन औरतों के जिनके पति नहीं होते हैं. यह मैं इसलिए बता रहा हूं क्योंकि आप समझ सकें कि भीड़ जब तबरेज़ को नहीं मार रही थी तब उसकी मानसिकता किसी औरत को मार रही होती है. यह भीड़ कहीं से आई नहीं है बल्कि अब हमारे बीच होती ही है.




आपको याद होगा, पिछले साल स्वामि अग्निवेश झारखंड गए थे. रांची से दूर पाकुड़ में एक सेमिनार में बोलने गए थे. तभी वहां एक भीड़ से घिर गए जो उनकी पगड़ी उछालने लगी और जय श्री राम के नारे लगाने लगी. 21 जून को पीटीआई की खबर है कि असम के बारपेटा में कुछ लोगों को यह भीड़ जय श्री राम और पाकिस्तान ज़िंदाबाद बोलने के लिए दबाव डाल रही है. जिन पर दबाव डाला जा रहा है सभी मुसलमान हैं. असम पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है. इसका भी वीडियो वायरल हुआ था. तभी मैंने कहा कि आप इन वीडियो से अब सामान्य और सहज होने लगे होंगे. क्या ही फर्क पड़ता होगा. एक वीडियो की निंदा करते होंगे कुछ दिन बाद दूसरा वीडियो आ जाता है.

दिल्ली में ऐसी एक घटना हुई है. एक नमाज़ी जा रहा था. कार ने उसे टक्कर मार दी. जब उसके मज़हब का पता चला तो उसे जय श्री राम बोलने के लिए कहा गया और मारा गया. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

कुछ तो बुरा लगता ही होगा कि इस तरह के वीडियो देखकर. हम किस समाज में रह रहे हैं जहां ये आम लोग किसी को रोक कर किसी आरोप में घेर कर मार रहे हैं. मार देते हैं. धर्म, जाति, लिंग के आधार पर इस तरह की हिंसा के अनेक मामले आते रहते हैं. धर्म का एंगल आए तो और भी सतर्क होना चाहिए क्योंकि सामान्य आदमी भी इसकी चपेट में आ जाता है. जब ऐसी बातों को राजनीतिक मान्यता मिलती है, हमारे सांसद सपोर्ट करते हैं, सोशल मीडिया पर समर्थन मिलता है तो आपके बीच किसी को लगता है कि वह ऐसा कर सकता है. वह कानून अपने हाथ में ले लेता है. इसलिए कहता हूं कि सांप्रदायिकता इंसान को मानव बम में बदल देती है. वह कब कहां किस बात पर और किस पर फट जाएगा कोई नहीं जानता. न्यूज़ चैनलों के ज़रिए ऐसे मसलों पर जिस तरह से ज़हर आपके बीच घोला जा रहा है, उसे लेकर थोड़ा सावधान रहिए. भीड़ से सावधान रहना चाहिए. इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह को इसी तरह की एक भीड़ ने मार दिया था.




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