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ज्वाला देवी या एटरनल फ्लेम ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 24, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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ज्वाला देवी या एटरनल फ्लेम ?

पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ

प्रकृति की अद्भुत घटनाओं की श्रेणी में आज हम पृथ्वी के सैकड़ों हज़ारों भागों में उठती शाश्वत लौ (हमेशा जलती रहने वाली ठंडी / गर्म दोनों अग्नि की ज्वाला) के बारे में जानेंगे. भारत में इसे देवीय चमत्कार कहकर जोतावाली माता या ज्वालादेवी का मंदिर बनाकर धर्म का धंधा न जाने कब से चालू है, मगर ऐसी ही न जाने कितनी ज्योतियांं या ज्वालायें पृथ्वी के अनेकानेक भागों में है. कहीं जमीन से निकलती है तो कहीं झरने के अंदर से, कहीं पानी के अंदर से निकलती है तो कहीं निकलती-बुझती रहती है. अनेक जगहों पर चट्टानों से निकलती है तो अनेक जगहों पर गुफाओं से निकलती है. असल में ये प्राकृतिक घटना है और जमीन के अंदर से गैस का रिसाव है. और मीथेन गैस के कारण अनेकानेक प्राकृतिक संयोगों से वो जलती है. इसे दूसरी जगहों पर (जहांं अंधी आस्था नहीं है और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर) इसे Eternal Flame कहते हैं.

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भारत में Eternal Flame का एक उदाहरण : हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित कालीधर पहाड़ी एरिया है जिसमें से Eternal Flame निकलती है. मगर चालाक लोगों ने इसे अन्धविश्वास से जोड़कर धार्मिक पाखंड बना दिया है और अब इसे शक्तिपीठ कहकर करोडों का सालाना गोरखधंधा चालू है.

http://www.pratibhaekdiary.com/wp-content/uploads/2019/06/video-1561352779.mp4

अगर कांगड़ा में किसी देवी का चमत्कार है तो ये तो फिर साक्षात् भगवान ही होंगे जिनके खोदने से जमीन में से आग निकल रही है

वहां Eternal Flame की अलग-अलग 9 ज्वालायें पृथ्वी से निकलती है और इसके पीछे की मूर्खतापूर्ण कहानी भी लोग सहजता से विश्वास कर लेते हैं, तभी तो मैं इसे अंधी आस्था कहता हूंं क्योंकि जहांं आस्था अंधी हो वहां सवाल करने या तथ्य समझने की समझ ही कहांं होती है ?

कहानी इस प्रकार है कि गोरखनाथ (अरे, वही जाग मछेन्द्र गोरख आया वाले) देवी के भक्त थे. एक बार गोरखनाथ को भूख लगी. तब उसने देवी से कहा कि आप आग जलाकर पानी गर्म करें, मैं भिक्षा मांगकर लाता हूं. देवी ने कहे अनुसार आग जलाकर पानी गर्म किया और गोरखनाथ का इंतज़ार करने लगी, पर गोरखनाथ अभी तक लौट कर नहीं आये. देवी आज भी ज्वाला जलाकर अपने भक्त का इन्तजार कर रही है (कहानी काफी विस्तारपूर्वक है, मैंने संक्षिप्त में सारांश लिखा है). मूर्खता की हद है.




पहला तथ्य : जो देवी आराध्य है, वो अपने साधक की नौकरानी हो गयी कि उसके कहने से आग जलाकर पानी गर्म करने लगी.

दूसरा तथ्य : अगर देवी किसी को ऐसे ही साक्षात् हो तो उसे भिक्षा मांगने कहीं जाने की क्या जरूरत है ? देवी अपने चमत्कार से ही उसका पेट भर देती फिर तो.

तीसरा तथ्य : एक बार भूख लगी अर्थात उसे रोज भूख नहीं लगती थी क्या ? और अगर रोज लगती थी तो उसे एक ही बार देवी से पानी गर्म करने को क्यों कहा ?

चौथा तथ्य : जब देवी एक ही थी तो आज उसकी नौ देविया कैसे हो गयी ?

पांचवा तथ्य : चलो मान लिया ये सब भी हो गया मगर जब देवी का भक्त नहीं आया तो उसने अपनी शक्ति से उसे खोजा क्यों नहीं ?

छठा तथ्य : जो देवी अपने उस भक्त का पता नहीं लगा सकी, जिसके लिये वो पानी भी गर्म करती थी, वो दूसरे लोगों की मनोकामना कैसे पूरी करेगी ?

http://www.pratibhaekdiary.com/wp-content/uploads/2019/06/video-1561352780.mp4

ये लीजिये आपके लिये एटरनल फ्लेम का एक वीडियो. वो भी पानी में आग लगाने वाला. अगर ये भारत में होता तो क्या होता ? सोचकर देखिये एक बार, इसे कौन-सी देवी द्वारा बनाया जाता ?

ऐसे ही Eternal Flame पश्चिम न्यूयार्क के ऑर्कार्ड पार्क में एक वॉटर फॉल में भी है, जिसे ‘एटरनल फ्लेम फॉल्स’ कहा जाता है. ज्वाला देवी मंदिर में तो सिर्फ जमीन से ही निकल रही है मगर न्यूयार्क में तो पानी के झरने में से निकलती है और उस पर लगातार पानी गिरता है, फिर भी बुझती नहीं है (इस फॉल का चित्र सलंग्न है).

न्यूयार्क में लोग धर्मांध नहीं हैं. अतः समझते हैं कि यहां जमीन के नीचे मीथेन गैस के भंडार हैं और पहले ये जली हुई नहीं थी, मगर एक बार एक टूरिस्ट ने खेल-खेल में वॉटरफॉल के नीचे से निकलती मीथेन गैस को चिंगारी दिखा दीं, जिससे वो जल गयी और तब से यह आग लगातार जल रही है.

सोचिये अगर ये भारत में होता तो ? तो उसे भी चमत्कार बताकर काल्पनिक कहानिया गढ़ ली जाती और धर्म के नाम पर चमत्कार का गोरखधंधा शुरू हो चुका होता.




Eternal Flame के बारे में इंड के ब्लूमिंगटन में इंडियाना विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता अर्ड्ट शिमेलमन ने एक लेख में बताया था कि असल में पृथ्वी के अंदर गैसों का भंडारण है मगर इतना नहीं है कि उसे कृत्रिम तरीकों से निकालकर प्रयोग किया जा सके लेकिन ये पृथ्वी में बने प्राकृतिक छेदों से लगातार रिसती रहती है और जब भी किसी मानव ने अनजाने में जला दिया हो या किसी प्राकृतिक घर्षण के कारण अग्नि उत्पन्न होने से अपने आप जल गयी हो, उसके बाद से ये लगातार जलती रहती है. ये गैसें पृथ्वी के 400 मीटर (लगभग 1300 फुट) नीचे होती है और टेक्टोनिक प्लेटो की हलचल की वजह से ये पृथ्वी की ऊपरी सतह तक रास्ता बनाकर रिसती है लेकिन ये गैस उथली होने के कारण सतह तक आते-आते ठंडी हो जाती है.

इसके गर्म से ठंडे होने की प्रक्रिया बड़ी पेचीदा है और भाषा भी एक वैज्ञानिकों वाली. अतः मैं पूरी तरह समझ नहीं पाया हूंं इसीलिये उसे लिख नहीं रहा, लेकिन उनके शब्दों को मेरी समझ के अनुसार सरल शब्दों में व्याख्या करूंं तो ये बिल्कुल हमारे गैस चूल्हे की के कनेक्शन की तरह है अर्थात जिस तरह से सिलेंडर में गैस स्टोर रहती है, वैसे ही ये प्राकृतिक भंडारणों में स्टोर है. और जैसे हम पाइप लगाकर उसे चूल्हे से जोड़ते हैं, वैसे ही ये प्राकृतिक छेदों से रिसाव करता है. लेकिन इसमें फर्क यह है कि गैस चूल्हे को हम स्विच करके नियंत्रित कर सकते हैं जबकि ये अनियंत्रित होती है इसीलिये ये लगातार जलती रहती है. शायद कुछ हज़ारों सालों से जल रही है और कुछ आगे के हज़ारों सालों तक जलती रहेगी. ये तब तक जलती रहेगी, जब तक गैस का भण्डारण ख़त्म नहीं होगा या फिर कोई इसे बुझा नहीं देता.




हांं, इस जलती ज्वाला को बुझाया भी जा सकता है और बुझाने के बाद फिर से जलाया भी जा सकता है लेकिन ऐसा किसी जानकार की देख-रेख में ही करना सही रहता है क्योंकि बुझाने/जलाने की प्रक्रिया में गैस की कई अपनी यौगिक क्रियायें होती है और अग्नि भी सूक्ष्म रूप से अंदर की तरफ प्रवेश करती है, जिससे विस्फोट होने का खतरा हो सकता है.

इसी तरह की Eternal Flame दुनिया के कई हिस्सों में है जिनमें न्यूयार्क, जापान, इटली, भारत, न्यूजीलैंड जैसे अनेकानेक देश है. इसी मीथेन गैस का तुर्कीमेनिस्तान में एक खुला कुआं था जिसमें किसी ने आग लगा दी और अब उसे डोर टू हेल कहा जाता है.

असल में दुनिया भर में उत्सर्जित सभी मीथेन का लगभग 30 प्रतिशत प्राकृतिक स्रोतों से आता है जैसे कि ये गैस रिसना. और चूंंकि आग मीथेन को कार्बन-डाइ-ऑक्साइड में परिवर्तित करती है, जो वायुमंडल में मीथेन की तुलना में लगभग 20 गुना कम गर्म होती है. अतः ‘अनन्त ज्वाला’ बनाने के लिए इन गैस सीपों में आग लगाना जरूरी होता है. कई जगहों पर ये मिट्टी के माध्यम से नष्ट हो जाती है क्योंकि मीथेन खाने वाले बैक्टीरिया इसे कार्बन-डाइ-ऑक्साइड में बदल देते हैं. और इस तरह प्रकृति अपना बैलेंस कर लेती है और हम सबके जीवन जीने में सहयोग करती है लेकिन जब हम उसी प्रकृति की प्रवृति को विकृति बना देते हैं तो फिर विनाश निश्चित ही होता है.




नोट : किसी भी धर्म का मखौल उड़ाना मेरा ध्येय नहीं है बल्कि धर्म में फैली अंधी आस्था और कुरीतियों के खिलाफ समाज को जागरूक करना मेरा लक्ष्य है. सभी धर्मों की कुरीतियों और रूढ़ियों पर अक्सर मैं ऐसे ही तथ्यपूर्ण चोट करता हूंं इसीलिये बात लोगों के समझ में भी आती है और वे मानते भी है कि मैंने सही लिखा है. जो लोग दूसरे धर्मों का मखौल उड़ाते हैं, उनसे मैं कहना चाहता हूंं कि मखौल उड़ाने से आपका उद्देश्य सफल नहीं होगा और आपस की दूरियांं बढ़ेंगी तथा आपसी समझ घटेगी. अतः मूर्खतापूर्ण विरोध करने के बजाय कुछ तथ्यात्मक लिखे.




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