सीपीआई (माओवादी) की उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी) ने पार्टी के गठन की 22वीं वर्षगांठ के अवसर पर अपने साथियों और जनता के नाम एक विस्तृत संदेश जारी किया है. संदेश में पार्टी की स्थापना, उसके वैचारिक संघर्ष, संगठनात्मक स्थिति और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर समिति का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है.

समिति ने पार्टी की 22वीं वर्षगांठ को देशभर में मनाने का आह्वान करते हुए कहा है कि पार्टी को नष्ट करने तथा उसे खुला और वैध बनाने के लिए किए जा रहे प्रयासों का विरोध किया जाना चाहिए. संदेश में लेनिनवादी संगठनात्मक पद्धति, पार्टी, पीएलजीए और संयुक्त मोर्चे को मजबूत करने तथा पार्टी की नौवीं कांग्रेस-एकता कांग्रेस में निर्धारित राजनीतिक लाइन पर कायम रहने की बात कही गई है.

शहीदों और संस्थापक साथियों को श्रद्धांजलि

संदेश में कहा गया है कि पार्टी के गठन के 22 वर्ष पूरे होने के अवसर पर पार्टी के साथियों और जनता को शुभकामनाएं दी जाती हैं. इस अवसर पर उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि दी गई है जिन्होंने पार्टी और आंदोलन के लिए अपने प्राणों की आहुति दी.

समिति ने विशेष रूप से पार्टी के संस्थापक एवं वरिष्ठ साथियों तथा पीएलजीए के सदस्यों को याद किया है. संदेश में चारू मजूमदार, कन्हाई चटर्जी, श्याम, मुरली, महेश, शमशेर सिंह, बसवरजू, किशन दा, राजू दा, कोसा दा, विवेक दा, चलपति, हिदमा तथा अन्य साथियों का उल्लेख किया गया है.

संदेश के अनुसार, इन लोगों का बलिदान पार्टी को आगे बढ़ने और देश में नई लोकतांत्रिक क्रांति के लक्ष्य की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करता रहेगा.

अवसरवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष का आह्वान

संदेश में पार्टी से अलग होने वाले अथवा पार्टी लाइन का विरोध करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की कड़ी आलोचना की गई है. इसमें वेणुगोपाल, देवजी, बलराज उर्फ बचा प्रसाद सिंह, दर्शन पाल, अर्जुन प्रसाद सिंह, हरमनप्रीत, गोपाल मिश्रा, प्रशांत राही, राजू उर्फ केपी, सीमा-विश्वविजय और अन्य लोगों का नाम लिया गया है.

समिति ने इन लोगों को अवसरवादी, विघटनकारी और संशोधनवादी बताते हुए उनके राजनीतिक विचारों के खिलाफ संघर्ष जारी रखने की बात कही है.

पार्टी के गठन और नक्सलबाड़ी का संदर्भ

संदेश में नक्सलबाड़ी आंदोलन को भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण मोड़ बताया गया है. इसमें कहा गया है कि नक्सलबाड़ी ने सामंती व्यवस्था, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष को नई दिशा दी तथा विभिन्न कम्युनिस्ट धाराओं के बीच वैचारिक विभाजन को स्पष्ट किया.

संदेश में चारू मजूमदार के नाम से एक लंबा उद्धरण भी दिया गया है, जिसमें नक्सलबाड़ी के ऐतिहासिक महत्व तथा संशोधनवाद की आलोचना का उल्लेख है.

समिति के अनुसार, सीपीआई (माओवादी) का गठन विभिन्न कम्युनिस्ट क्रांतिकारी धाराओं के एकीकरण की प्रक्रिया का परिणाम था. संदेश में 21 सितंबर 2004 को हुए विलय तथा उसके बाद 2007 में आयोजित नौवीं कांग्रेस-एकता सम्मेलन को पार्टी के राजनीतिक एवं वैचारिक गठन की महत्वपूर्ण कड़ी बताया गया है.

2007 की नौवीं कांग्रेस-एकता सम्मेलन के दस्तावेजों का उल्लेख

संदेश में कहा गया है कि 2007 में आयोजित नौवीं कांग्रेस-एकता सम्मेलन ने 2004 में घोषित एकता को राजनीतिक और वैचारिक रूप से मजबूत किया.

इसके तहत पार्टी के संविधान, कार्यक्रम, राजनीतिक प्रस्ताव तथा रणनीति और कार्यनीति से संबंधित दस्तावेजों का उल्लेख किया गया है.

समिति का आरोप है कि वर्तमान में पार्टी के भीतर कुछ लोग इन दस्तावेजों और पूर्व निर्धारित राजनीतिक लाइन का विरोध कर रहे हैं. संदेश में इसे पार्टी के लोकतांत्रिक केंद्रीकरण और संगठनात्मक अनुशासन के विरुद्ध बताया गया है.

पार्टी के भूमिगत रहने और सशस्त्र संघर्ष से संबंधित दावे

संदेश में पार्टी के संविधान और पूर्व दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा गया है कि नई लोकतांत्रिक क्रांति के पूरा होने तक पार्टी के भूमिगत रहने की नीति निर्धारित की गई थी.

दस्तावेज में सशस्त्र संघर्ष को संघर्ष का प्रमुख रूप तथा सेना को क्रांतिकारी संगठन का प्रमुख साधन बताया गया है. साथ ही जन संगठनों और जन आंदोलनों की भूमिका का भी उल्लेख किया गया है.

समिति ने आरोप लगाया है कि कुछ नेता इस राजनीतिक लाइन में बदलाव की मांग कर रहे हैं और पार्टी को सार्वजनिक एवं कानूनी बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं.

विभिन्न राज्यों को लेकर राजनीतिक मतभेद

संदेश में पंजाब और हरियाणा सहित कुछ राज्यों में मौजूद सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को लेकर पार्टी के भीतर मतभेदों का उल्लेख किया गया है.

समिति का कहना है कि इन क्षेत्रों में कृषि उत्पादन में आधुनिक साधनों के इस्तेमाल के बावजूद वहां की व्यवस्था को वह पूर्ण विकसित पूंजीवादी व्यवस्था नहीं मानती. संदेश में इसे सामंती मूल्यों, साम्राज्यवादी शोषण और आर्थिक विकास से जोड़कर व्याख्यायित किया गया है.

पार्टी सदस्यों के लिए चार सूत्रीय कार्ययोजना

संदेश में पार्टी सदस्यों से तत्काल कार्ययोजना तैयार करने का आह्वान किया गया है. इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं—

1. नेतृत्व के साथ समन्वय बहाल करना:
जिन पार्टी सदस्यों का नेतृत्व के साथ समन्वय टूट गया है, उन्हें उच्च समिति के साथ समन्वय पुनः स्थापित करने और नेतृत्व के मार्गदर्शन में काम आगे बढ़ाने की अपील की गई है.

2. वैचारिक संघर्ष तेज करना:
अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष को तेज करने तथा भूमिगत कार्यकर्ताओं को तैयार करने की बात कही गई है.

3. भूमिगत कार्यप्रणाली पर जोर:
संदेश में भूमिगत कार्यपद्धति को लागू करने में सावधानी बरतने की बात कही गई है और लापरवाही को संगठन के लिए नुकसानदेह बताया गया है.

4. जन आंदोलनों से जुड़ाव:
भारतीय राज्य के विरुद्ध जनता के स्वतःस्फूर्त आंदोलनों को संगठित आंदोलनों में बदलने के लिए जनता के साथ गहरे संबंध स्थापित करने की आवश्यकता बताई गई है.

देश की जनता और लोकतांत्रिक ताकतों से अपील

संदेश के अंतिम हिस्से में देशवासियों से 21 सितंबर को पार्टी के गठन की वर्षगांठ के रूप में मनाने तथा पार्टी द्वारा प्रस्तुत तथ्यों और दावों का स्वयं अध्ययन करने की अपील की गई है.

समिति ने बुद्धिजीवियों, वकीलों और लोकतांत्रिक ताकतों से विभिन्न जेलों में बंद राजनीतिक कैदियों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की अपील की है.

संदेश में माओवादियों के कथित उत्पीड़न और गैर-कानूनी हत्याओं के खिलाफ आवाज उठाने तथा कुछ बंद नेताओं की रिहाई की मांग भी की गई है. इनमें प्रमोद मिश्रा, सागर दा, शीला दी, किशोर दा और दीपक राव आदि के नाम शामिल हैं.

निष्कर्ष

सीपीआई (माओवादी) उत्तर समन्वय समिति के इस संदेश में पार्टी के गठन की 22वीं वर्षगांठ, उसके वैचारिक इतिहास, 2004 के विलय और 2007 की नौवीं कांग्रेस-एकता सम्मेलन के दस्तावेजों को प्रमुखता दी गई है.

संदेश में पार्टी के भीतर वर्तमान वैचारिक और संगठनात्मक मतभेदों पर विस्तार से चर्चा की गई है तथा पार्टी की घोषित राजनीतिक लाइन को बनाए रखने का आह्वान किया गया है.

जारीकर्ता: 

उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), सीपीआई (माओवादी)