रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को केवल दो देशों की सेनाओं के बीच संघर्ष के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है. यह उस दुनिया का भयावह आईना भी है, जहां सत्ता, पूंजी, सामरिक हित और भू-राजनीतिक वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा में सबसे सस्ती चीज अक्सर आम आदमी की जिंदगी बन जाती है.

फरवरी 2022 से सितंबर 2026 तक यूक्रेन की धरती ने जो कुछ देखा है, वह किसी भी संवेदनशील मनुष्य को भीतर तक झकझोर देने के लिए पर्याप्त है. संयुक्त राष्ट्र के सत्यापित आंकड़ों में नागरिकों की मौत और घायल होने की संख्या लगातार बढ़ती रही है. अकेले जुलाई 2026 में सैकड़ों नागरिक मारे गए और हजारों घायल हुए. इन आंकड़ों के पीछे केवल संख्याएं नहीं हैं—इनके पीछे मनुष्य हैं.

वह बूढ़ी मां है, जिसने अपना बेटा खो दिया. वह सैनिक की पत्नी है, जो अपने पति की कब्र के सामने खड़ी है. वह बच्चा है, जिसकी किताबों के बीच अब पढ़ाई से ज्यादा हवाई हमले की चेतावनियां दर्ज हैं. वह परिवार है, जिसने अपना घर, शहर और आजीविका खो दी और किसी दूसरे देश में शरण लेने को मजबूर हो गया.

युद्ध की सबसे बड़ी कीमत आम आदमी चुकाता है

युद्ध ने यूक्रेन में बड़े पैमाने पर विस्थापन पैदा किया है. लाखों यूक्रेनी नागरिक देश से बाहर शरण लेने को मजबूर हुए हैं, जबकि लाखों लोग देश के भीतर विस्थापित हुए. युद्ध ने उनके सामने घर, रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा—सबसे जुड़े बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं.

सबसे अधिक चिंता बच्चों के भविष्य को लेकर है.

युद्ध ने यूक्रेन के स्कूलों और शिक्षण संस्थानों को भी प्रभावित किया है. हजारों शिक्षण संस्थान क्षतिग्रस्त हुए हैं और अनेक बच्चे अब भी ऑनलाइन अथवा हाइब्रिड शिक्षा पर निर्भर हैं. स्कूल जाने की उम्र में जिन बच्चों को किताबें, खेल और दोस्त चाहिए थे, वे सायरन, बंकर और मिसाइल हमलों के बीच बड़े हो रहे हैं.

इसलिए युद्ध केवल वर्तमान पीढ़ी के सैनिकों को नहीं मारता. वह आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा, मानसिक शांति और भविष्य को भी घायल करता है.

सैनिकों की मौत का असली आंकड़ा क्या है?

युद्ध में सैनिकों की मौत का सही आंकड़ा जानना भी बेहद कठिन है. रूस और यूक्रेन दोनों पक्षों द्वारा जारी आंकड़ों पर राजनीतिक और सैन्य हितों का प्रभाव होने की आशंका रहती है. विभिन्न पश्चिमी, रूसी और यूक्रेनी स्रोतों के आंकड़ों में भी बड़ा अंतर दिखाई देता है.

यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने फरवरी 2026 में लगभग 55 हजार यूक्रेनी सैनिकों की मौत का आंकड़ा बताया था. दूसरी ओर, कुछ यूक्रेनी मीडिया रिपोर्टों में इससे कहीं अधिक संख्या का दावा किया गया. ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है.

इसलिए मृत सैनिकों की वास्तविक संख्या चाहे जो हो, एक बात निर्विवाद है—युद्ध ने बड़ी संख्या में परिवारों को मौत, अपंगता, आर्थिक संकट और लंबे समय तक चलने वाले दुःख के हवाले किया है.

आखिर यह युद्ध किसके लिए है?

यहीं से युद्ध को केवल राष्ट्रवाद के चश्मे से देखने की सीमा सामने आती है.

युद्ध के पीछे हथियार उद्योग है. ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का सवाल है. भू-राजनीतिक प्रभाव का सवाल है. बाजारों और आर्थिक हितों का सवाल है. सैन्य गठबंधनों और प्रभाव क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धा का सवाल है.

इन तमाम सवालों के बीच सबसे कमजोर आदमी—मजदूर, किसान, बच्चा, बूढ़ा और आम नागरिक—अपने जीवन की कीमत चुकाता है.

जो लोग युद्ध के राजनीतिक निर्णय लेते हैं, वे अक्सर मोर्चे पर नहीं मरते. मरता है वह नौजवान, जिसके हाथ में कल तक किताब या औजार था और आज बंदूक थमा दी गई. मरती है वह मां, जिसने अपना बेटा खोया. घायल होता है वह बच्चा, जिसकी दुनिया बमों और सायरनों के बीच बड़ी होती है.

क्या इस युद्ध के लिए केवल पुतिन जिम्मेदार हैं?

यह सवाल स्वाभाविक है और इसका जवाब सरल नहीं है.

रूस द्वारा फरवरी 2022 में यूक्रेन पर शुरू किया गया पूर्ण पैमाने का सैन्य आक्रमण एक केंद्रीय तथ्य है और इसके कारण रूस की राजनीतिक एवं सैन्य जिम्मेदारी पर गंभीर अंतरराष्ट्रीय बहस हुई है. दूसरी ओर, इस युद्ध की पृष्ठभूमि में रूस-पश्चिम संबंधों, नाटो के विस्तार, यूक्रेन की सुरक्षा-नीति और लंबे समय से चले आ रहे भू-राजनीतिक तनावों को लेकर भी अलग-अलग व्याख्याएं मौजूद हैं.

इन सभी कारकों को एक-दूसरे का विकल्प मानना भी उचित नहीं होगा.

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पश्चिमी प्रभुत्व और अमेरिकी नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था को खुली चुनौती दी है. इसके परिणामस्वरूप विश्व राजनीति में रूस और अमेरिका तथा उनके सहयोगी देशों के बीच टकराव और अधिक स्पष्ट हुआ है.

लेकिन किसी युद्ध की पृष्ठभूमि में मौजूद कारणों को समझना और उस युद्ध में होने वाली नागरिक मौतों को उचित ठहराना—दो अलग बातें हैं.

ज़ेलेंस्की की भूमिका और जवाबदेही

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने युद्ध के दौरान पश्चिमी देशों से बड़े पैमाने पर सैन्य और आर्थिक सहायता प्राप्त की. उनकी सरकार ने व्यापक सैन्य लामबंदी की और युद्ध को जारी रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाया.

उनकी नीतियों, सैन्य लामबंदी, संसाधनों के इस्तेमाल, भ्रष्टाचार के आरोपों और सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर भी सार्वजनिक बहस होती रही है. इन आरोपों की प्रकृति और प्रमाण अलग-अलग हैं, इसलिए प्रत्येक दावे की स्वतंत्र जांच आवश्यक है.

इतिहास अंततः किसी भी नेता का मूल्यांकन केवल उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसके निर्णयों और उन निर्णयों के परिणामों से करेगा.

किसी भी शासक को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह राष्ट्रवाद के नाम पर जनता से अंतहीन बलिदान मांगता रहे और हर असहमति को देशद्रोह के रूप में प्रस्तुत करे. यदि किसी सत्ता के निर्णयों के कारण नागरिकों और सैनिकों की मौत बढ़ती है, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आते हैं या शांति के संभावित रास्तों पर पर्याप्त राजनीतिक प्रयास नहीं किए जाते, तो उस सत्ता की जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

लेकिन क्या इस पूरे संकट का असली अपराधी केवल ज़ेलेंस्की हैं?

नहीं.

असली सवाल व्यक्ति से आगे जाकर व्यवस्था का है

शायद सबसे बड़ा सवाल किसी एक व्यक्ति के नाम से जुड़ा हुआ नहीं है.

बड़ा सवाल उस राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था का है, जिसमें कभी-कभी इंसान से अधिक महत्वपूर्ण बाजार, जीवन से अधिक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक हित और शांति से अधिक लाभदायक युद्ध दिखाई देने लगता है.

यूक्रेन की धरती पर गिरने वाला हर बम हमें यह सवाल पूछने के लिए मजबूर करता है—

क्या राष्ट्रों की सीमाओं और सामरिक हितों से अधिक मूल्यवान इंसान की जिंदगी नहीं होनी चाहिए?

यदि उत्तर 'हां' है, तो फिर सवाल उन तमाम शक्तियों से पूछा जाना चाहिए, जिनके हित युद्ध को समाप्त करने के बजाय उसके लंबे खिंचने से जुड़े हो सकते हैं.

क्योंकि इतिहास में साम्राज्य आते-जाते रहे हैं. राष्ट्राध्यक्ष आते-जाते रहे हैं. आर्थिक शक्तियां बदलती रही हैं. लेकिन युद्ध की राख में हमेशा दबा मिलता है—आम आदमी.

हमारा पक्ष किसके साथ होना चाहिए?

हमारा पक्ष उन बच्चों का होना चाहिए, जो स्कूल में पढ़ना चाहते हैं.

उन माताओं का होना चाहिए, जो अपने बेटों को जिंदा घर लौटते देखना चाहती हैं.

उन मजदूरों का होना चाहिए, जिन्हें युद्ध नहीं, रोटी चाहिए.

उन किसानों का होना चाहिए, जिनकी जमीन पर मिसाइलें नहीं, फसलें उगनी चाहिए.

और उन करोड़ों इंसानों का होना चाहिए, जिन्हें साम्राज्यों की शतरंज में मोहरा बनने से इनकार करने का अधिकार है.

किसी भी विचारधारा की अंतिम परीक्षा यह नहीं हो सकती कि वह कितने झंडे खड़े करती है. असली परीक्षा यह है कि वह कितनी इंसानी जिंदगियां बचाती है.

मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और माओ के विचारों की रोशनी में

पूंजी और सत्ता के संबंध को समझने के लिए कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स का कम्युनिस्ट घोषणापत्र महत्वपूर्ण संदर्भ प्रस्तुत करता है. उसमें राज्य की भूमिका को वर्गीय हितों के संदर्भ में समझने की कोशिश की गई है.

लेनिन ने साम्राज्यवाद को पूंजीवाद की एक विशिष्ट ऐतिहासिक अवस्था के रूप में विश्लेषित किया और पूंजी के केंद्रीकरण, वित्तीय पूंजी तथा विश्व के आर्थिक क्षेत्रों पर प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा को अंतरराष्ट्रीय संघर्षों से जोड़ा.

माओ ने राजनीति और सैन्य शक्ति के संबंध को प्रसिद्ध वाक्य—“राजनीतिक सत्ता बंदूक की नली से निकलती है”—के माध्यम से व्यक्त किया.

इन विचारों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन आज भी वे एक महत्वपूर्ण सवाल हमारे सामने रखते हैं—

जब आर्थिक शक्ति और राजनीतिक सत्ता एक-दूसरे की रक्षा करने लगें और हथियार उद्योग तथा भू-राजनीतिक हित मानव जीवन पर भारी पड़ने लगें, तब युद्ध केवल सीमा पर नहीं रहता. वह मजदूर की जेब, किसान के खेत, बच्चे की किताब और परिवार की जिंदगी के भीतर भी पहुंच जाता है.

रूस-यूक्रेन युद्ध को कैसे देखा जाए?

यूक्रेन संकट को केवल रूस बनाम यूक्रेन के चश्मे से देखना अधूरा होगा. इसके साथ रूस-पश्चिम संबंध, नाटो, यूरोपीय सुरक्षा, ऊर्जा, हथियार उद्योग, अंतरराष्ट्रीय बाजार, यूक्रेनी राजनीति और रूसी सामरिक हित—इन सभी पहलुओं को समझना होगा.

जागरूक समाज को सवाल पूछना चाहिए—

इन युद्धों से किसकी सत्ता मजबूत होती है?
किसका हथियार बिकता है?
किसकी पूंजी बढ़ती है?
और किसकी संतान मरती है?

यही इस युद्ध के 'हार' और 'जीत' के असल मायने का प्रश्न है.

यदि किसी पक्ष को भू-भाग मिलता है, कोई सरकार सैन्य सफलता का दावा करती है या कोई महाशक्ति अपना प्रभाव बढ़ाती है, लेकिन इसके बदले लाखों परिवार उजड़ते हैं, बच्चे विस्थापित होते हैं और एक पूरी पीढ़ी युद्ध के मानसिक आघात के साथ बड़ी होती है, तो इतिहास के सामने 'जीत' शब्द का अर्थ भी सवालों के घेरे में आ जाता है.

मनुष्य व्यवस्था के लिए नहीं बना है—व्यवस्था मनुष्य के लिए होनी चाहिए.

और जिस व्यवस्था में मुनाफा इंसान से बड़ा हो जाए, वहां संघर्ष केवल युद्ध रोकने का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को बदलने के प्रश्न तक पहुंच जाता है.

अंततः सवाल यह नहीं कि रूस जीता या यूक्रेन. सवाल यह है कि इस युद्ध में इंसान कितना हारा.

  • सिद्धेश्वर चौहान,  लेखक स्वयं यूक्रेन में मेडिकल के छात्र रहे हैं और इस समय महाराष्ट्र में सेवारत हैं.  (हिन्दी अनुवाद एवं जरूरी संपादन—ए.के. ब्राइट)