कच्ची गोलिय़ां नहीं खेले हैं वे वे सयाने हैं वे जानते हैं किस तरह तुम्हारी खाल में घुसकर तुह्मारे जैसा...
Read moreDetailsजलभूमि जीवन का सोच्चार चीत्कार है तुम्हारे अरदास के पलटते पन्ने परिंदों के पंख के परवाज़ अदिती क्यों बार बार...
Read moreDetailsगिर और गिर गिरता जा निचाइयां अतल हैं गिरने का साहस तुझमें गजब है गिर और गिर अबे और गिर...
Read moreDetailsयह आर्तनाद नहीं, एक धधकती हुई पुकार है ! जागो मृतात्माओ ! बर्बर कभी भी तुम्हारे दरवाज़े पर दस्तक दे...
Read moreDetailsमन मस्त हवा के पंखों से मत पूछ आजाद उड़ानें कैसी हैं कैसी हैं चंचल पतवारें, सागर में गोते खाते...
Read moreDetailsयुद्ध से समतल हुए शहर में जहां पर ज़मीन तीन महीने के गर्भ से दिखी वहीं पर एक सामूहिक कब्र...
Read moreDetailsमैं चाहता तो आवाज़ बदल कर बातें कर भी सकता था तुम से चेहरा बदल कर मिल भी सकता था...
Read moreDetailsअंधी सड़कें नहीं देख पाती शार्क के खुले जबड़े आदमी मच्छी के कांटे सा फंसा हुआ है उसके नुकीले दांतों...
Read moreDetailsपचहत्तर के बोयाम में पांव घिसते हुए जिस क्षरण से तुम वाक़िफ़ हो सत्य की वह गंगा अब किसी पांच...
Read moreDetailsआदमी बुन लेता है सपने बना लेता है घरौंदा तोड़ देता है कई दिवारें बनाते हुए अपने इर्द-गिर्द कई दिवारें...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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