गरीब कौन है..? जिसके पास खाने के लिए खाना पहनने के लिए कपड़ा रहने के लिए मकान नहीं है तो...
Read moreDetailsचौहत्तर साल पुरानी लाश के पैर के अंगूठे में जो टैग लटक रहा है उस पर लिखा नंबर अब...
Read moreDetailsमेरी मां जो अब नहीं रही खुश है कि मेरी भूख बरकरार है ठीक वैसे ही जैसे पहली क्रंदन के...
Read moreDetailsवक़्त की ऐनक पर आदमी एक धब्बे सा उभरता है और, धुल जाता है वक़्त की बारिश में इस मुल्क...
Read moreDetailsतुम्हें बंदूक और पिस्टल से नहीं मारुंगा तुम्हें मारुंगा शब्दों के भाले गड़ांसे से कुदाल फावड़ा हंसिया हथौड़ा बेलचा बारी...
Read moreDetailsमौसम उतना उद्विग्न नहीं करता जितना कि जलते सवालों का संदर्भ मैं पार कर लूंगा देह के चौड़े पाटों में...
Read moreDetailsसोचिये अगर दुनिया से समाप्त हो जाता धर्म सब तरह का धर्म मेरा भी, आपका भी तो कैसी होती दुनिया...
Read moreDetailsमैंने बम नहीं बांंटा था ना ही विचार तुमने ही रौंदा था चींटियों के बिल को नाल जड़े जूतों से....
Read moreDetailsइतने दावे कि गिनती भूल जाता हूं गनीमत कि डेढ़ घंटे ही लगे एलईडी की दूधिया रौशनी में हाई वे...
Read moreDetailsजिस भाषा में हम बिलखते हैं और बहाते हैं आंसू वे उस पर करते हैं सवारी भरते हैं उड़ान उत्तुंग...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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