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चार जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस क्या अवमानना नहीं मानी जानी चाहिए ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 17, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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चार जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस क्या अवमानना नहीं मानी जानी चाहिए ?

प्रशांत भूषण के ट्वीट को पढ़िए तो उसमें न्यायपालिका से एक शिकायत का भाव है, और वह भाव इसलिए है कि न्यायपालिका, आज जब सारी संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण होता दिख रहा है और वे सत्ता के अहंकारी, ढीठ, उद्दंड और उन्मत्त सागर में डूबती उतराती हुई प्रतीत हो रही है, तो सुप्रीम कोर्ट का भव्य गुम्बद एक प्रकाश स्तंभ की तरह, हज़ार उम्मीदें जगा जाता है. लॉक डाउन के काल में जनता के मौलिक अधिकारों से जुड़े कितने महत्वपूर्ण मामलों का निस्तारण हुआ है, और उनमें सुप्रीम कोर्ट ने जनता को क्या राहत दी है ? यह तो सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध है, इसे आप देख सकते हैं.

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पर यह शिकायत अदालत की मानहानि मान ली गई और अब यह अंतिम फैसला है. इस पर अकादमिक बहस भले हो, पर किसी, न्यायिक बहस का औचित्य नहीं है. पर इससें गंभीर शिकायतें और आरोप तो सुप्रीम कोर्ट के ही चार जजों ने, दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर के खुद ही लगाए थे. सुप्रीम कोर्ट की सत्यनिष्ठा पर भी संदेह उठाया था. तत्कालीन सीजेआई को भी लपेटे में ले लिया था कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, पर तब तो किसी न्यायमूर्ति के खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं की गई.

अब उस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बारे में कुछ पढ़िए, जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजों, जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस मदन बी लोकुर ने 12 जनवरी, 2018 को, आयोजित करके, सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई और कार्यप्रणाली पर खुल कर सवाल उठाए थे, तब क्या, यह सुप्रीम कोर्ट की अवमानना नहीं थी ?

पर तब तो किसी भी जज ने आपत्ति नहीं की और न ही कोई याचिका दायर हुई कि उन जजों के इस कृत्य को न्यायालय की अवमानना मानी जाए. उक्त जजों ने तो यह भी सवाल उठाया था कि ‘राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामले क्यों एक ही बेंच को सौंपे जाते हैं ?’ जज लोया की संदिग्ध मृत्यु की भी चर्चा उठी थी.

उन्हीं चार जजों में से एक जस्टिस रंजन गोगोई भी थे, जो बाद में देश के सीजेआई बने. यह अलग बात है कि सीजेआई बनने के बाद वे एक यौन उत्पीड़न के आरोपों से घिरे, और उसे लेकर खूब चर्चा हुई तथा विवाद भी हुआ. वे ब्लैकमेल किए गए या उन्हें ब्लैकमेल करने की कोशिश की गई, इसकी फुसफुसाहट एक खुले रहस्य के रूप में आज भी न्यायपालिका के कॉरिडोर में व्याप्त है.

इस बाद का उल्लेख, प्रशांत भूषण के मामले में, पैरवी करते समय सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट, दुष्यंत दवे ने अदालत में भी उठाया था. वही रंजन गोगोई, आज राजकृपा से सांसद हैं, जिन्हें एक दिन सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं है, लग रहा था.

यहां यह भी याद रखना ज़रूरी होगा कि जनवरी, 2018 में शायद आज़ादी के बाद यह पहला मौक़ा था, जब सुप्रीम कोर्ट के ही चार सिटिंग मुख्य न्यायधीशों ने प्रेस कॉन्फ्रेन्स कर कहा था कि ‘लोकतंत्र की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट को बचाया जाना ज़रूरी है’ और उन्होंने एक तरह से तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश के ख़िलाफ़ बग़ावत की थी और उनके कामकाज पर सवाल उठाए थे.

जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने इस साझे प्रेस कांफ्रेंस में कहा था, ‘सुप्रीम कोर्ट को नहीं बचाया गया तो लोकतंत्र नाकाम हो जाएगा.’

उन्होंने ‘चयनात्मक तरीके से’ मामलों के आवंटन और कुछ न्यायिक आदेशों पर सवाल उठाए. इन न्यायाधीशों ने कहा, ‘ये समस्याएं देश की सर्वोच्च न्यायपालिका को नुकसान पहुंचा रही हैं और ये भारतीय लोकतंत्र को नष्ट कर सकती हैं.’

चयनात्मक तरीके यानी सेलेक्टिव, यह अपने आप में एक बड़ा आरोप है कि न्याय कानून के अनुरूप नहीं, चेहरे के अनुरूप दिया जाता है. अंग्रेजी की एक बेहद लोकप्रिय कहावत कि ‘शो मी योर फेस, आई विल शो यू द रूल’, अक्सर नौकरशाही का एक मजाकिया मुहावरा है.

न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने ख़ुद भी इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को ‘अभूतपूर्व घटना’ बताया और कहा, ‘कभी-कभी उच्चतम न्यायालय का प्रशासन सही नहीं होता है और पिछले कुछ महीनों में ऐसी अनेक बातें हुई हैं जो अपेक्षा से कहीं नीचे हैं.’

उन्होंने कहा, ‘संरक्षण के बग़ैर इस देश में ‘लोकतंत्र नहीं बचेगा.’ यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में अपनी तरह की पहली घटना थी.,उन्होंने कहा, ‘इस तरह से प्रेस कॉन्फ्रेंस करना ‘बहुत ही कष्टप्रद है, और हम चारों को ही यह यकीन हो गया है कि लोकतंत्र दांव पर है और हाल के दिनों में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनसे हमें यह आभास हो रहा है.’ इन मुद्दों के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा, ‘इनमें प्रधान न्यायाधीश द्वारा मुक़दमों का आवंटन भी शामिल है.’

उनकी यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण थी कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष शुक्रवार 12 जनवरी को ही संवेदनशील सोहराबुद्दीन शेख़ मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे सीबीआई के विशेष जज बीएच लोया की रहस्यमय परिस्थितयों में मृत्यु की स्वतंत्र जांच के लिए दायर याचिकाएं सूचीबद्ध थी. सुप्रीम कोर्ट ने, आगे चलकर सुनवाई के बाद, जज लोया के मृत्यु की जांच करने से मना कर दिया था.

जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा, ‘संस्थान और राष्ट्र के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है. संस्थान को बचाने के लिए क़दम उठाने हेतु प्रधान न्यायाधीश को समझाने के हमारे प्रयास विफल हो गए.’ चार जज अपनी असहायता को सार्वजनिक रूप से खुलकर प्रेस वार्ता में कह रहे हैं, क्या इससे न्यायपालिका की गरिमा पर आघात नहीं हो रहा है ?

वे आगे कहते हैं, ‘यह किसी भी राष्ट्र, विशेषकर इस देश के इतिहास में असाधारण घटना है और न्यायपालिका की संस्था में भी असाधारण घटना है. यह कोई प्रसन्नता की बात नहीं है कि हम प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए बाध्य हुए, लेकिन कुछ समय से उच्चतम न्यायालय का प्रशासन ठीक नहीं है और पिछले कुछ महीने में ऐसी अनेक बातें हुई हैं जो अपेक्षा से कम थीं.’

चारों न्यायाधीशों ने प्रधान न्यायाधीश को लिखा अपना सात पेज का पत्र भी प्रेस को उपलब्ध कराया. उन्होंने इसमें कहा है, ‘इस देश के न्यायशास्त्र में यह अच्छी तरह से प्रतिपादित है कि प्रधान न्यायाधीश हम सभी में प्रथम हैं … न तो अधिक और न ही कम.’

प्रेस कॉन्फ्रेंस में सभी न्यायाधीशों ने इन सवालों को बकवास बताया कि उन्होंने अनुशासन भंग किया है और कहा कि वे वह करना शुरू कर देंगे जो वे करते हैं. जस्टिस जे चेलमेश्‍वर ने कहा, ‘हम चारों मीडिया का शुक्रिया अदा करना चाहते हैं. यह किसी भी देश के इतिहास में अभूतपूर्व घटना है, क्‍योंकि हमें यह ब्रीफिंग करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. हमने ये प्रेस कॉन्‍फ्रेंस इसलिए की ताकि हमें कोई ये न कहे हमने अपनी आत्मा बेच दी.’

न्यायमूर्ति गोगोई ने जो कहा था, उसे भी पढ़िए, ‘कोई भी अनुशासन भंग नहीं कर रहा है, और यह जो हमने किया है वह तो राष्ट्र का क़र्ज़ उतारना है.’ जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट में बहुत कुछ ऐसा हुआ, जो नहीं होना चाहिए था. हमें लगा, हमारी देश के प्रति जवाबदेही है और हमने मुख्य न्यायाधीश को मनाने की कोशिश की, लेकिन हमारे प्रयास नाकाम रहे अगर संस्थान को नहीं बचाया गया, लोकतंत्र नाकाम हो जाएगा.’

इसका सीधा मतलब यह है कि सुप्रीम कोर्ट से असहमति रखी जा सकती है, और सुप्रीम कोर्ट को उसके दायित्व और कर्तव्यों को याद दिलाया जा सकता है. न्यायपालिका के न्यायिक आदेशों की अवहेलना, अवज्ञा और कोर्ट रूप में किए गए कदाचरण के अतिरिक्त अन्य कुछ भी अवमानना के रूप में लेना, असहमति, न्यायिक बहस, और स्वस्थ विचार विमर्श को हतोत्साहित करना है. संसार में कुछ भी पूर्ण नहीं है. न व्यक्ति, न संस्था, न विचार.

न्यायपालिका को चाहिए कि वह आलोचनाओं का स्वागत करें और जो आलोचनाएं उसे रचनात्मक लगें उसका उपयोग करे और जो अनुचित हो उसे नज़रअंदाज़ कर दे, लेकिन किसी भी आलोचना में चाहे वह व्यक्ति की हो या संस्था की, शाब्दिक मर्यादाओं का पालन अनिवार्य है.

  • विजय शंकर सिंह

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