Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

बिहार में गठबंधन की सरकार और संसदीय वामपंथियों का संकट

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 30, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
बिहार में गठबंधन की सरकार और संसदीय वामपंथियों का संकट
बिहार में गठबंधन की सरकार और संसदीय वामपंथियों का संकट

बिहार के महागठबंधन सरकार के तौर तरीके और कई जनविरोधी हरकतों के कारण कार्यकर्ताओं का धैर्य टूट रहा है. नेताओं के द्वारा गुलदस्ते और स्वागत के कार्यक्रम से वे क्षुब्ध दिख रहे हैं. उनका असंतोष लाजमी है. जब ये विपक्ष में थे, तो जनता को आंदोलन के रूप में संगठित कर रहे थे, अब सरकार को समर्थन देने के बाद वामपंथी पार्टियां अब सड़क पर विरोध से कतरा रही हैं.

क्या वामपंथी विधायक सरकार की नीतियों का विधानसभा में आलोचना करने के लिए अब स्वतंत्र हैं ? क्या सड़क पर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन आंदोलन करने के लिए वे स्वतंत्र हैं ? आंदोलन की जगह अब वे पैरवीकार और चिरौरी वाले नेता बनते जा रहे हैं ?

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

सरकार का हिस्सा बनकर पार्टी ने कार्यकर्ताओं के आंदोलन के अधिकार को बक्से में बंद कर दिया है, दूसरी तरफ सरकार पुराने ढर्रे पर ही चल रही है. पुलिस तथा प्रशासन का दमन जारी है. पटना की सड़कों पर जुलूस और प्रदर्शन करने और धरना देने के अधिकार पर पाबंदी अभी भी जारी है ? क्या वामपंथी पार्टियों ने गांधी मैदान तथा डाक बंगला चौराहा के इलाके में प्रदर्शन कराने पर लगाए गए रोक को हटाने के लिए सरकार पर दबाव बनाया ? वामपंथी पार्टियों के आंदोलन में भाग नहीं लेने से आंदोलन तो नहीं रुकेगा ?

स्वतंत्र जन संगठनों या विद्यार्थियों के द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन और प्रदर्शनों की बेरहमी से पिटाई हो रही है. मेहनतकशों के अधिकार और कल्याण लिए कोई नये कार्यक्रम नहीं किए जा रहे हैं. पूरी सरकार पर नौकरशाही का दबदबा जारी है. आंदोलनकारियों की पिटाई की जा रही है. आखिर क्या कारण है कि सरकार बदलने के बावजूद भी पुलिस तथा नौकरशाहों का मिजाज उतना ही घमंड में है ? क्या सरकार का पुलिस और नौकरशाही पर नियंत्रण नहीं है या सरकार पार्टी और कार्यकर्ताओं के बजाय सिर्फ नौकरशाही और पुलिस पर निर्भर है ? इन सारे प्रश्नों पर बहस होनी चाहिए.

वामपंथी संगठन आंदोलन और संघर्ष के बदौलत अस्तित्व में रहता है. अपनी जीवन धारा से कट करके ये और खत्म हो जाएगी. कांग्रेस तथा लालू प्रसाद यादव की पहली सरकार को समर्थन देने के कारण पूरे देश और बिहार में सीपीआई का अस्तित्व हाशिए पर आता गया. वे ही इनके जनाधार को खा गये. 90के दशक में भी लालू प्रसाद ने ही सीपीआई (एमएल) लिबरेशन के विधायकों को तोड़ा था. इस बार दीपंकर के नेतृत्व वाली सीपीआई (एमएल) लिबरेशन फिर वही गलती कर रही है.

ज्योति बसु की सरकार ने ‘वर्गा आपरेशन’ में किसानों को जमीन और कई अधिकार दिये जो देहातों में उनके जनाधार को मजबूत किया लेकिन बाद में सीपीआई (एम) की सरकार अपने ही जनाधार किसानों पर पूंजीपतियों के पक्ष में सिंगूर तथा नंदीग्राम में दमन चलाया, परिणामस्वरूप सीपीएम को सत्ता से हाथ धोना पड़ा और बाजपेई की सरकार में मंत्री रहने वाली ममता बनर्जी ने आंदोलन की नायिका बनकर के बंगाल की सत्ता पर कब्जा कर लिया.

सीपीआई (एम) में राजनीतिक कार्यकर्ता की जगह धंधेबाजों ने कार्यकर्ताओं की जगह ले ली. पंचायत स्तर पर लूट बढ़ा और राजनीति से लैश कार्यकर्ताओं की जगह भोट लूटने वाले गैंगों का पार्टी में महत्व बढ़ता गया. नंदीग्राम में ऐसे ही लोग किसानों पर हमले का अगुआई किया. सत्ता चलाते हुए जो दमन और जनविरोधी नीतियों को सीपीआई (एम) ने बंगाल में लागू किया उसका परिणाम सामने है. सीपीआई (एम) के हाथ से सत्ता खिसकने पर सत्ता में बने रहने के लिए यही गैंग यानी कल के वामपंथी नेता बाद में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में शामिल होने लगे.

तो इतिहास की इन तमाम घटनाओं से वामपंथियों को सीखना चाहिए लेकिन वह नहीं सीखेंगे, क्योंकि कहीं ना कहीं सरकार चलने के लिए सभी पार्टियों की तरह उन्हें भी पूंजी और पूंजीपतियों से समझौते, यहां तक कि उनकी चाकरी करनी पड़ती है. और वे सरकार में ही रहना चाहते हैं, जन आंदोलन के द्वारा पूंजीवाद का विकल्प पेश करना अब उनके कार्यक्रम से गायब हो चुका है.

यह अकारण थोड़े है कि केरल की सरकार को पूंजी की चिंता है. वह कह रहे हैं कि मिलिटेंट ट्रेड यूनियन आंदोलन से पूंजी निवेश पर प्रभाव पड़ेगा. यानी सरकारों को हर हाल में पूंजी निवेशकों के हितों की रक्षा करनी है और पूंजी निवेशक यानी कि पूंजीपतियों का सेहत तभी ठीक रहेगा, जब मजदूरों सको कम से कम मजदूरी देकर काम कराने में सरकारी मदद करेंगी ! इसलिए कार्यकर्ताओं को फासीवाद का भय दिखाकर सत्ताधारी पार्टियों के पीछे-पीछे घिसटते रहने की सलाह दी जा रही है.

पार्टी नेताओं से सवाल कीजिए कि क्या वर्ग संघर्ष को बढ़ाए बगैर फासीवाद पराजित हो जायेगा ? फासीवाद का मुख्य स्रोत शोषक वर्ग होता है, आज वह एकाधिकार पूंजी है जो साम्राज्यवाद और वित्त पूंजी के साथ मजबूत एकता बनाए हुए है. लेकिन सभी सरकारें अडानी अंबानी जैस एकाधिकार पूंजी के मालिकों के लिए काम कर रही हैं. यूं ही इतनी तेजी से इनकी पूंजी नहीं बढ़ रही है.

कांग्रेसी सरकारें राजस्थान और छत्तीसगढ़ में इन्हीं की सेवा में लगी है. फासीवाद का विकल्प सिर्फ आंदोलन से गुजर कर ही आ सकता है. आज पूंजीवादी लोकतंत्र इंग्लैंड में हड़ताल और प्रदर्शन का अधिकार छीन रहा है, तो विकल्प हड़ताल और प्रदर्शन की झड़ी लगा कर ही दिया जा सकता है.

वामपंथी कार्यकर्ताओं को सरकार के पीछे नहीं आगे चलना चाहिए, लेकिन उनके नेता सीटों के लिए मोहताज दीख रहे हैं. कार्यकर्ताओं से अपील है कि पार्टी में सवाल उठाइए. कभी-कभी पार्टी में प्रेशर भी बनना पड़ता है और कभी कभी विद्रोह भी करना पड़ता है. सीपीआई (एमएल) लिबरेशन खुद इस विद्रोह का नतीजा है, विद्रोह और सृजन की इस परंपरा को जारी रखिए. जो नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन और चारू मजूमदार के संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष की परंपरा को बढ़ाने वाले कार्यकर्ता हैं, वे अवश्य एक बार फिर अपने ऐतिहासिक कार्यभार के लिए कमर कसेंगे.

  • नरेन्द्र कुमार

Read Also –

संसदीय वामपंथी : भारतीय सत्ताधारियों के सेफ्टी वॉल्व
अप्रसांगिक होते संसदीय वामपंथी बनाम अरविन्द केजरीवाल
अप्रसांगिक होते संसदीय वामपंथी बनाम अरविन्द केजरीवाल
संसदीय चुनावों के रणकौशलात्मक इस्तेमाल की आड़ में क्रांतिकारी कार्यों को तिलांजलि दे चुके कम्युनिस्ट संगठनों के संबंध में कुछ बातें
भारत में फासीवाद और उसका भविष्य : फासीवादी विचारधारा वामपंथी सड़ांध पर पैदा होता है
बिहार में सिकुड़ता वामपंथी संघर्ष की जमीन ?
बिहार में वामपंथियों के गढ़ एक-एक कर क्यों ढ़हता चला गया ?
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास, 1925-1967 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

भाड़े के सैनिक (अग्निवीर) यानी जनता पर जुल्म ढ़ाने के लिए तैयार होता एसएस गिरोह

Next Post

गांधी : ‘भारतीय’ बुर्जुआ मानवतावाद के मूर्त रूप

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

गांधी : ‘भारतीय’ बुर्जुआ मानवतावाद के मूर्त रूप

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

चरित्रहीन लड़की

July 9, 2020

देश के सभी ‘अर्बन नक्सलों’ से एक ‘अर्बन नक्सल’ की कुछ बातें

July 8, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.