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भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की मीडिया से दो-टुक – ‘जनताना सरकार के क्षेत्रों में भूख से कोई भी नहीं मरा है, फिर भी…!’

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 26, 2025
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भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की देश की मीडिया से दो-टुक - 'जनताना सरकार के क्षेत्रों में भूख से कोई भी नहीं मरा है!'
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की मीडिया से दो-टुक – ‘जनताना सरकार के क्षेत्रों में भूख से कोई भी नहीं मरा है, फिर भी…!’ 

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की उत्तर तालमेल कमेटी (NCC) ने प्रेस रिलीज़ जारी करते हुए देश की मीडिया के नाम 24 नवम्बर, 2025 को अपील जारी किया है. यह अपील बकायदा कई मीडिया संस्थानों को सीधे संबोधित किया है. इसमें मुख्यतः देशीय स्तर पर द वायर, स्क्रोल, द हिंदू, इंडियन एक्सप्रेस, ट्रिब्यून, स्क्रोल, रविश कुमार, अभिसार शर्मा, मंदीप पुनिया (गांव सवेरा), बस्तर टाकिज, रेडमाइक, पुण्य प्रसून वाजपेयी, न्यूज़लौंड्री, चढ़ती कला टाइम्स, कश्मीर टाइम्स, हरिभूमि हरियाणा, कारवाँ, वायस ओफ ईस्ट पंजाब, रोज़ाना सपोकसप्रशन इत्यादि और दुनिया के स्तर पर बीबीसी, डेमोक्रेसी नाओ, DW, पोलिस प्रोजेक्ट, अलजजीरा, इत्यादि मीडिया संस्थान का नाम है.

प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि हमारी पार्टी भाकपा (माओवादी) एक भीषण अस्थाई सेटबैक का सामना कर रही है और इसीलिए ही भारतीय जनता भी. भारतीय जनता रोज़मर्रा के वर्ग संघर्ष में भीषण अस्थाई सेटबैक का सामना कर रही है. वे भूख के कारण मर रहे हैं और शासक वर्ग बाढ़ और भूस्खलन जैसी तबाही पैदा कर रहा है; उनके पास आम वायरल के हमले में जीवित रहने के लिए भी उचित स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं हैं; उनको जाति, नस्ल, धर्म और लिंग के कारण रोज़ाना जलील होना पड़ता है; उनको बड़े पूंजीपतियों और बड़े ज़मींदारों के द्वारा न्यूनतम वेतन और आजीविका से वंचित किया जा रहा है; भारतीय राज्य के निरकुंश विस्तारवादी चरित्र के ख़िलाफ़ देश की उत्पीड़ित राष्ट्रीयताएं जैसे कश्मीर, मणिपुर, पंजाब आदि आज़ादी और स्वायत्ता की निरंतर चाहत रख रहे हैं. और ये सभी हालात मौजूद हैं क्योंकि हमारा प्यारा देश भारत भी संकट में है और वह संकट इसीलिए है क्योंकि वह साम्राज्यवाद और भारतीय राज्य का मुख्य निशाना है. वास्तव में साम्राज्यवादी ताक़तों के दलाल भारतीय शासक वर्ग बुनियादी रूप से देश विरोधी ही हैं.

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कोरोना संकट के बाद से अमेरिकी साम्राज्यवाद अपने आपको पुनर्जीवित करने के लिए प्रयास कर रहा है, एकाधिकार वित्तीय पूंजी द्वारा देश को बड़े पैमाने पर आर्थिक रूप से लूटने के लिए खनन, इंफ्रास्ट्रकचर विकास और सॉफ़्टवेयर उद्योग में निवेश करना साम्राज्यवादी लूट के उदाहरण हैं. ये निवेश परजीवी है, जो एक तरफ़ लोगों की जल, जंगल और ज़मीन को लूट रहे हैं और दूसरी तरफ़ स्थानीय मैनुफैक्चरिंग और बिज़नेस को फलने-फूलने की अनुमति नहीं देता है. राजनीतिक आर्थिक स्तर पर AI का जादू और सैन्यी स्तर पर मनोवैज्ञानिक हमले का पुनः उभार (अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा हमास और इज़राइल के बीच सम्पन्न की गई शांति वार्ता) साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजी के परजीवी चरित्र को तेज करने में मदद कर रहा है.

हमारी पार्टी के छापामार आधार क्षेत्रों में चाहे वह दंडकारण्य हो या बिहार-झारखंड हो, में जारी ऑल आउट वार अमेरिकी साम्राज्यवादी ताक़तों की पुनर्जीवित नीति का एक हिस्सा है. मनोवैज्ञानिक हमले के हिस्से के बतौर सूरजकुण्ड योजना को हमारी पार्टी और क्रांतिकारी आंदोलन के अंतर्गत गद्दारों को पैदा करने के लिए अमेरिकी CIA और भारतीय दलाल राज्य ने तैयार किया है. परंतु अमेरिकी साम्राज्यवाद बार-बार भूल जाता है कि सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में जारी कम्युनिस्ट आंदोलन, शासक वर्गीय ताक़तों के द्वारा नेतृत्व किए जा रहे राष्ट्रीयता आंदोलन से अलग है. सर्वहारा ताक़त वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांत पर आधारित है और इसीलिए इसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता भी अग्रणी है और इसका जीत के मुक़ाम तक पहुंचना भी तय है.

हमारी पार्टी साम्राज्यवाद विशेषकर अमेरिकी साम्राज्यवाद और दलाल नौकरशाह पूंजीपति वर्ग और बड़े जमींदार वर्ग का प्रतिनिधित्वकारी निरकुंश भारतीय राज्य के ख़िलाफ़ अथक संघर्ष कर रही है. इस संघर्ष में पार्टी ने कई उतार और चढ़ाव देखें हैं, पार्टी की स्थापना होने के बाद से ही हमारा इतिहास घुमावदार तरीके आगे बढ़ा है, कई मौक़े ऐसे आए जब हमको राख की तरह समझने लगा, पर हम उसी राख से खुद का नव निर्माण करते हुए सुबह के उस लाल सूरज की तरह क्षितिज पर छा जाते हैं और बादलों द्वारा पैदा की गई बाधाओं के बावजूद आगे बढ़ते हुए और ज़्यादा चमकदार हो रहे हैं. हम युद्ध के मैदानों में हमारे कई महान कामरेडों को खो देने की पीड़ा झेल रहे हैं. हमारी पार्टी हो या इस मामले में किसी भी देश की कम्युनिस्ट पार्टी शासक वर्ग के हाथों नहीं मर सकती है, चाहे वह कितना ही निरकुंश हो.

कम्युनिस्ट पार्टी के ख़त्म होने का सिर्फ़ एक कारण के बतौर पार्टी के अंदर दो लाइनों के संघर्ष में सर्वहारा लाइन का कमजोर हो जाना होता है. हमारी पार्टी जिसका जन्म आधुनिक संशोधनवादी ताक़तों के ख़िलाफ़ संघर्ष में ही हुआ है. ग़द्दार दक्षिणपंथी अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी ताक़तों जैसे बलराज उर्फ़ बच्चा प्रसाद सिंह, दर्शनपाल, अर्जुन प्रसाद सिंह, आसीन उर्फ़ गगन उर्फ़ अनिल, वेणुगोपाल उर्फ सोनू, रूपेश और अंधराष्ट्रवादी संशोधनवादी हरमन गुट के ख़िलाफ़ संघर्ष करते हुए वैचारिक और राजनीतिक तौर पर मज़बूत बनकर उभरेगी.

ये जितने भी ग़द्दार पार्टी में पैदा हुए हैं, उनके कारण हम वैचारिक, राजनीतिक और दार्शनिक रूप से शिक्षित ही हुए हैं क्योंकि इन गद्दारों के द्वारा गढ़े गए जनविरोधी सिद्धांतों के ख़िलाफ़ पार्टी ने लड़ते हुए मालेमा की समझ को साथियों में मज़बूत करते हुए उसे और विकसित करने का काम भी किया है. इन बहसों पर हमारी पार्टी की तरफ़ से आए लेख विश्व सर्वहारा क्रांति में ऐतिहासिक योगदान है. इसी कड़ी में उत्तर तालमेल कमेटी (NCC) ने तय किया है कि वेणुगोपाल के नवप्रचंड आधुनिक संशोधनवाद को ख़ारिज करना और भंडाफोड़ करना ज़रूरी है. आपके सामने मौजूदा यह लेख इसी से जुड़ा हुआ है. हम उम्मीद करते हैं कि विघटनवादियों के ख़िलाफ़ हमारे इस पक्ष को आपके मीडिया में स्थान ज़रूर मिलेगा,

हम मीडिया से यह भी अपील करते हैं कि वे देशभर में हो रहे क्रांतिकारियों के क़त्लेआम का विरोध करते हुए भारतीय दलाल शासक वर्ग के नापाक इरादों का भंडाफोड़ करें, हम सबको याद रखना चाहिए कि इनका अगला निशाना अर्बन नक्सल है जिसमें वे सभी प्रगतिशील और उदार आवाजें शामिल हैं जिन्होंने बीजेपी-आरएसएस के मंसूबों का लगातार विरोध किया है. अब सवाल सिर्फ माओवादियों के साथ खड़ा होने का नहीं है, बल्कि हिंदुत्ववादी मनुवादी राजनीति के विरोध करते हुए एक विकल्प देने का सवाल है.

हमारी पार्टी ही केवल ब्राह्मणवादी हिंदुत्व फ़ासीवादी सरकार का वैचारिक, राजनीतिक और सैन्यी तौर पर एक मज़बूत विपक्ष पेश करती है. हम बोलते रहे हैं कि भारतीय राज्य का चरित्र लोकतांत्रिक मुखौटे की आड़ में बुनियादी रूप से एक निरकुंशवादी ही है. अब हमारा स्टैंड शासक वर्ग के एक हिस्से को भी समझ आने लगा है, जब शासक वर्गीय विपक्षी पार्टियां भी कह रही हैं कि चुनाव का अब कोई मतलब नहीं रहा.

शासक वर्ग के एक हिस्से के समेत पूरा देश अब महसूस कर रहा है कि मौजूदा निरंकुश भारतीय राज्य निरपेक्ष और स्वतंत्र चुनाव नहीं करवा सकता है. हम सभी प्रगतिशील जनवादी मीडिया से अपील करते हैं कि वे स्वयं देखें कि क्या हम एक विपक्ष के रूप में एक ताक़त हैं या नहीं ? वे स्वयं देखें कि हमारे पास जन समर्थन है कि नहीं ? जब हमारे कामरेड दंडकारण्य में शहीद हो रहें हैं तो हमारे साथ लोगों का विशाल समुंदर रोया है.

हम मीडियाकर्मियों से सवाल करते हैं कि बस्तर के आदिवासी उनके लिए महत्व क्यों नहीं रखते ? यह कैसे सम्भव हो सकता है कि मीडिया यह नहीं जानती हो कि दंडकारण्य को वास्तव में किसने विकसित किया है ? हमारी पार्टी ने उनकी भाषा, संस्कृति को सरंक्षित करने और विकसित करने का काम किया है और लोगों को सबसे विकसित विचारधारा मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद से लैस किया है.

डेविड हारवे जैसे बुद्धिजीवी अपने यूरोपियन केंद्रित परिप्रेक्ष्य से मार्क्स की पूंजी की व्याख्या करने में व्यस्त हैं, जबकि हमारी पार्टी में आदिवासी पृष्ठभूमि से आए पार्टी कार्यकर्ता डेविड हारवे के यूरोपियन केंद्रित परिप्रेक्ष्य को नकारते हुए कामरेड मार्क्स की पूंजी को समझ रहे हैं और आदिवासी जनता को शिक्षित करने का काम कर रहे हैं. आर्थिक तौर पर हमने लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए भरसक काम किया है, जिसकी एक मिशाल के तौर पर हमारे जनताना सरकार के क्षेत्रों में भूख से कोई भी नहीं मरा है.

समाजशास्त्र और राजनीति के क्षेत्र में काम करने वाले कई विद्वानों ने हमारी उपलब्धियों को स्वीकारा है. हम मीडिया से अपील करते हैं कि वे खुद देखें कि असल में आदिवासी किस प्रकार का विकास का मॉडल चाहते हैं ? मीडिया को यह जानना चाहिए कि आदिवासियों ने साम्राज्यवाद के विकास मॉडल (एक ऐसा मॉडल जिसके कारण हिमालयी क्षेत्र में बाढ़ और भुस्खलन के कारण हज़ारों लोगों को जान गंवानी पड़ी) को नकार दिया है.

और वे उनके आदर्श शहीद कामरेड हिड़मा की जनताना सरकार के विकास का मॉडल (पूंजी के विस्तार की लालच पर आधारित ना होकर लोगों की जरूरतों पर आधारित एक वैकल्पिक जन लोकतांत्रिक राज्य) के साथ हैं, परंतु अमेरिकी साम्राज्यवाद समर्थित भारतीय राज्य की हमारे आंदोलन से जुड़ी हुई हत्यारी नीतियों ने जनसंहार की सारी सीमाएं पार कर ली हैं. हम मीडिया से पूछते हैं कि जनसंहार पर चुप्पी रखना क्या उसका समर्थन करने जैसा नहीं है ?

दुनिया 1871 के पेरिस कम्यून का समर्थन करती है परंतु उनको दंडकारण्य, जो कि वास्तव में उस समय के पेरिस से इलाके और जनसंख्या के हिसाब से तुलना में बड़ा है, में जनताना सरकार की उपलब्धियों पर समर्थन करने से कौन सी ताक़त रोकती है ? आदिवासी बहुल माओवादी आंदोलन विश्व स्तर की मीडिया का भरपूर समर्थन क्यों नहीं हासिल कर पाया ? क्या इसका कारण यूरोपियन केंद्रियवाद है ? क्या नस्लवाद और ब्राह्मणवाद इसका कारण है ? हमारी पार्टी के नेतृत्व में दंडकारण्य के आदिवासी जनता फ़िलिस्तीन की मुक्ति संघर्ष और यूरोपियन विश्वविद्यालयों के छात्रों के विरोध करने के अधिकारों के साथ खड़ी रही है ? क्या उनके लिए हमारे साथ खड़ा होने का समय नहीं है ?

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