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नेपाल : श्रीलंका, बांग्लादेश के बाद क्षेत्र में तीसरे जन आंदोलन ने भ्रष्ट हाकिमों की नाक में दम कर दिया, लेकिन बुनियादी परिवर्तन का कार्यभार अभी भी अधूरा है !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 25, 2025
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नेपाल : श्रीलंका, बांग्लादेश के बाद क्षेत्र में तीसरे जन आंदोलन ने भ्रष्ट हाकिमों की नाक में दम कर दिया, लेकिन बुनियादी परिवर्तन का कार्यभार अभी भी अधूरा है !
नेपाल : श्रीलंका, बांग्लादेश के बाद क्षेत्र में तीसरे जन आंदोलन ने भ्रष्ट हाकिमों की नाक में दम कर दिया, लेकिन बुनियादी परिवर्तन का कार्यभार अभी भी अधूरा है !

सितंबर 2025 की शुरुआत में नौजवानों के नेतृत्व में हुए विद्रोह ने नेपाल के हुक्मरानों को हिलाकर रख दिया है. जन-आक्रोश के सामने नेपाली सरकार ने घुटने टेक दिए, 9 सितंबर को प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफ़ा देना पड़ा. सरकारी दमन के दौरान 72 लोगों की जान चली गई और 1300 से अधिक गिरफ़्तारियां हुईं, लेकिन यह दमन भी जन-आक्रोश को रोक नहीं सका. श्रीलंका, बांग्लादेश के बाद नेपाल भारत का तीसरा पड़ोसी देश है, जिसमें पिछले सालों में तख़्ता पलट हुआ है. ज़ाहिर है भारत, पाकिस्तान के हुक्मरान भी इन घटनाओं से घबराए हुए हैं, इनके भी पसीने छूट रहे हैं.

नेपाल सरकार के 4 सितंबर का फ़ैसला नेपाली जनता के आक्रोश के बारूद को चिंगारी देने का क़दम बन गया. नेपाल के संचार और सूचना टेक्नोलॉजी मंत्रालय ने अचानक 26 प्रमुख प्लेटफ़ॉर्मों, जिनमें फे़सबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, यूट्यूब, एक्स, टिकटॉक, रेडिट और लिंक्डइन शामिल थे, पर पाबंदी लगा दी. कारण बताया गया कि ये ‘फ़र्जी ख़बरों, नफ़रती भाषणों और ऑनलाइन धोखाधड़ी’ को रोकने के लिए नए नियमों के तहत रजिस्टर नहीं हुए. लेकिन समझने वाले समझ गए थे कि यह सरकारी सेंसरशिप थी, जो पिछले हफ़्तों में वायरल हुए भ्रष्टाचार विरोधी ऑनलाइन अभियान को दबाने के लिए लागू की गई थी.

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इस चिंगारी ने नेपाल की जनरेशन-जी, 15-24 साल की नौजवान पीढ़ी, जो दक्षिणी एशिया में सबसे अधिक 20.8 फ़ीसदी बेरोज़गारी दर का सामना कर रही है, के सालों के दबे रहे ग़ुस्से को भड़का दिया. नेपालियों के ग़ुस्से के केंद्र में थे – नेपो-बालां राजनेताओं और धनी परिवारों की बिगड़ी हुई औलादें. उनकी शाही जीवनशैली, जैसे कि गुच्ची के पर्स, मर्सिडीज़ कारें, करोड़ों की कोठियां और विदेशी छुट्टियां आदि. इसे साधारण नेपालियों की बदतर ज़िंदगी से जोड़कर देखा गया, जो केवल 1400 डॉलर की प्रति व्यक्ति आय और 20 फ़ीसदी ग़रीबी दर में जी रहे हैं. रैलियों में बैनरों पर लिखा गया, ‘नेताओं के बच्चे विदेश से गुच्ची बैग के साथ लौटते हैं, लोगों के बच्चे ताबूतों में.’

देखते-देखते दसियों हज़ार की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए. प्रदर्शनों पर पुलिस की बेरहमी, जिसमें स्कूली बच्चों पर सीधे गोलियां दागी गईं, ने आग में घी डालने का काम किया.

नेपालियों के संघर्ष का इतिहास

नेपाल के इस संघर्ष की गहराई को समझने के लिए, हमें थोड़ा पीछे जाकर नेपाली लोगों के राजशाही और सामंतवादी अत्याचार के ख़िलाफ़ चले लंबे संघर्ष को समझना पड़ेगा. नेपाल की राजशाही के ख़िलाफ़ संघर्ष 1970 के दशक में ही शुरू हो गया था, जब साधारण नेपाली – ग़रीब किसान, मज़दूर, छात्र, हाशियाग्रस्त जातीय और जनजातीय समूह, बर्बरता और जनवादी अधिकारों के लिए लड़ने लगे.

यह संघर्ष 1970 के दशक के अंत और 1980 की शुरुआत में ज़ोर पकड़ने लगा. नेपाल के राजा महेंद्र ने पंचायत प्रणाली के तहत मौजूद थोड़ी बहुत राजनीतिक आज़ादी को भी कुचल दिया था. राजा के शासन में 90 फ़ीसदी ज़मीन केवल 10 फ़ीसदी आबादी के अधिकार में थी, जिसने लाखों ग़रीबों को निचोड़ दिया था. 1979 में पंचायत की दमनकारी नीतियों के ख़िलाफ़ छात्रों ने विरोध शुरू किया, जिसकी गूंज पूरे देश में फैली. हालांकि यह आंदोलन बुनियादी परिवर्तन लाने में सफल नहीं हो सका, लेकिन इसने सत्ता के बीच के झगड़ों को उजागर किया और नए कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया.

1980 के दशक के अंत तक, लोकतंत्र की मांग बहुत मज़बूत हो चुकी थी. 1990 में पहले जनवादी आंदोलन ने विभिन्न तबक़ों को, जिनमें छात्र, मज़दूर, बुद्धिजीवी, नेपाली कांग्रेस और विभिन्न कम्युनिस्ट ग्रुप-पार्टियां जैसी पाबंदीशुदा पार्टियां शामिल थे, को राजा बीरेंद्र के निरंकुश शासन के ख़िलाफ़ एकजुट किया.

हफ़्तों तक काठमांडू की सड़कों से लेकर गांवों तक, लाखों नेपालियों ने गिरफ़्तारियां, मारपीट और गोलियों का सामना करते हुए बहु-दलीय जनवाद की मांग की. उनकी हिम्मत ने राजशाही को झुकने के लिए मज़बूर किया, जिसके परिणामस्वरूप 1990 का संविधान बना, जिसने राजनीतिक पार्टियों को बहाल किया और राजा की शक्तियों को सीमित किया लेकिन यह जीत अधूरी थी. राजशाही ने अपना दबदबा बनाए रखा और अमीर तबक़ा ही नई संसदीय प्रणाली पर हावी रहा.

इस जारी अन्याय ने जनता के अगले संघर्ष को प्रेरित किया. 13 फ़रवरी 1996 को, नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में सामंतशाही-राजशाही को उखाड़ फेंकने और उस असमानता को दूर करने के लिए लोक युद्ध शुरू किया, जिसने लाखों लोगों को ज़मीन से बेदख़ल कर दिया था. रोल्पा और रुकुम जैसे दूर-दराज़ के पहाड़ी जि़लों में, हाशियाग्रस्त समुदायों ने ‘आधार क्षेत्र’ बनाए, जो सत्ता के आज़ाद केंद्र बन गए.

लगभग दस साल चले इस लोक युद्ध में लगभग 17,000 से अधिक जानें गईं, लेकिन यह स्वयंस्फूर्त उठी बग़ावत नहीं थी, बल्कि बराबरी के लिए लंबे समय से चल रहे नेपाली जनता के संघर्ष की निरंतरता थी, जिसका एक संगठित नेतृत्व था, जो 1990 के सुधारों में छूटे कार्यों को पूरा करना चाहता था.

इस जन-आंदोलन को राजशाही ने बेरहमी से कुचलना चाहा. बाग़ियों को डाकू कहकर बदनाम किया गया और 1998 में ‘दे किल्लो सीएरा’ जैसा बेरहम अभियान चलाया गया, जिसमें बाग़ियों और जन-आंदोलन के समर्थकों का बेरहमी से दमन किया गया. लेकिन इस दमन ने और भी किसानों, नौजवानों और महिलाओं को संघर्ष में शामिल होने के लिए प्रेरित किया.

2001 का शाही क़त्लेआम, जिसमें युवराज दीपेंद्र ने राजा बीरेंद्र और नौ अन्य को मार डाला और फिर आत्महत्या कर ली, ने राजशाही की कथित दिव्य सत्ता को चकनाचूर कर दिया. इसके बाद राजा ज्ञानेंद्र का 2005 में तख़्तापलट हुआ, जिसने संसद को निलंबित कर सीधा शासन लागू करने की हताश कोशिश की, लेकिन यह फ़ैसला उल्टा पड़ गया और इसने नेपाल की सभी राजशाही विरोधी ताक़तों को एकजुट कर दिया.

आंदोलन का शिखर 2006 में जन-आंदोलन के साथ आया, जब शहर के मज़दूरों से लेकर गांव के ग़रीब किसानों तक लाखों नेपाली सड़कों पर उतर आए, गोलियों और डंडों का सामना करते हुए जन-शक्ति की मिसाल पेश की. इस शक्तिशाली आंदोलन ने ज्ञानेंद्र को हार मानने के लिए मज़बूर किया.

28 मई 2008 को संविधान सभा ने 239 साल पुरानी राजशाही को ख़त्म करके नेपाल को गणतंत्रीय गणराज्य के रूप में स्थापित कर दिया. लेकिन इसी दौरान नेपाल की क्रांतिकारी पार्टी ने बड़ी ग़लती की. नेपाल में अभी बुनियादी परिवर्तन नहीं आया था, अभी समाजवादी क्रांति नहीं हुई थी, इसके बावजूद नेपाल के क्रांतिकारियों ने लोक युद्ध ख़त्म करके पूंजीवादी वोटतंत्र का हिस्सा बनने का फ़ैसला लिया, जिसके बाद इसका पतन तय था.

जनता की उम्मीदें धीरे-धीरे मिटने लगी. 2008 के बाद, 14 सरकारें आईं और गईं, लेकिन कोई भी कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई और लोक युद्ध के दिनों के समय देखे समानता और ग़रीबी-बेरोज़गारी को दूर करने के सपने भी टूटने लगे. सत्ता पर काबिज़ पार्टियां, जिनमें पुराने क्रांतिकारी भी थे, अपनी कुर्सी संभालने और अपने कारोबार बढ़ाने की दौड़ में पड़ गए.

धीरे-धीरे भ्रष्टाचार के बड़े मामले सामने आने लगे, जैसे 2017 का एयरबस कांड, जिससे 1 करोड़ डॉलर के घोटालों का मामला सामने आया. मुट्ठी-भर सत्ताधारियों के बच्चे अय्याशियां करते रहे, जबकि आम घरों के नौजवान बेरोज़गारी और ख़राब हालातों के चलते प्रवास करने पर मज़बूर होते गए. नेपाल में 2024 में बेरोज़गारी दर 20.8 फ़ीसदी थी. प्रवासियों की कमाई से नेपाल का जी.डी.पी. का 23-33 फ़ीसदी हिस्सा आता है.

इसलिए सोशल मीडिया से जुड़ी पीढ़ी ने (#नेपोबालां, #NepoKids) जैसे ट्रेंड चलाए, जिनमें प्रधानमंत्री ओली के रिश्तेदारों को 10,000 डॉलर की घड़ियों में दिखाया गया, जबकि नेपाल की 25 फ़ीसदी आबादी ग़रीबी रेखा से भी नीचे ज़िंदगी बसर कर रही थी. इस तरह के अनेकों अन्य वीडियो भी बहुत वायरल होने लगे. यह नीचे ज़मीनी सतह पर अनसुलझे पड़े सवालों का ही इज़हार था.

इस तरह ग़रीबी, बेरोज़गारी, ग़ैर-बराबरी, भ्रष्टाचार, पुराने वादों का पूरा न होना, ये सब चीज़ें थीं, जिन्होंने नेपाल के लोगों, ख़ासकर नौजवानों में ग़ुस्से को बढ़ाया.

ऊपर से नेपाली सरकार के प्रदर्शनों से निपटने के तरीक़ों ने जलते में तेल डाला. जैसे ही 8 सितंबर को लोगों का जुटान बड़ा हुआ, सरकार ने पुलिस की मदद से भयंकर दमन किया. आंसू गैस, रबड़ की गोलियों से लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे नौजवानों के सिरों पर गोलियां चलाई गईं, जिससे अकेले राजधानी में 17 और इटहरी में दो जानें गईं, और देश-भर में 400 से अधिक घायल हुए.

लेकिन यह दमन भी संघर्ष को दबा नहीं सका और 9 सितंबर तक प्रदर्शनकारियों ने सिंघा दरबार, नेपाली कांग्रेस के मुख्य दफ़्तर और शेर बहादुर देउबा जैसे नेताओं के घरों में आग लगा दी. जल्द ही ओली की कैबिनेट ढह गई और उसके मंत्री भाग गए. आख़िर ओली को भी 9 सितंबर को इस्तीफ़ा देना पड़ा.

नए सत्ताधारी और नेपाल का भविष्य

पुरानी सरकार के इस्तीफ़े के बाद कुछ दिनों के लिए नेपाली सेना ने शासन संभाल लिया था. इसके नेतृत्व में 73 साल की, नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को नया प्रधानमंत्री बना दिया गया और रामचंद्र पौडेल को राष्ट्रपति बनाया गया. इस घटनाक्रम ने एक बार फिर स्वयंस्फूर्त उठे आंदोलनों की ताक़त और कमज़ोरी को जगज़ाहिर कर दिया है.

श्रीलंका, बांग्लादेश के बाद यह क्षेत्र का तीसरा स्वयंस्फूर्त उठा आंदोलन है, जिसने पुराने शासकों को तख़्त से उतार दिया. लेकिन स्पष्ट क्रांतिकारी विचारधारा और संगठन के बिना नेपाल का आंदोलन भी अन्य सबकी तरह जल्द ही ठंडा पड़ गया. जबकि ग़रीबी, बेरोज़गारी, असमानता जैसे बुनियादी सवाल, उनसे संबंधित नीतियों का सवाल वहीं खड़ा है.

किसी क्रांतिकारी आंदोलन के सामने मुद्दा केवल चेहरे बदलने का नहीं, बल्कि पूरा ढांचा बदलने का होता है. शोषण पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था को बदले बिना, समाजवाद की स्थापना के बिना बुनियादी सवालों का हल सोचा भी नहीं जा सकता.

नेपाल के क्रांतिकारियों की 2006 में भी यही ग़लती थी कि वे समाजवाद का रास्ता छोड़कर पूंजीवादी जनवाद के जाल में उलझ गए थे. अब के स्वयंस्फूर्त आंदोलन का अंत भी यही होना था और हुआ है. जिस तरह 2006 के बाद हुए सत्ता परिवर्तन ने कोई बुनियादी सवाल हल नहीं किए, वैसे ही नए शासक भी बुरी तरह फ़्लॉप साबित होंगे, यह तय है.

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के ताज़ा अनुभव इस बात की ज़ोर-शोर से गवाही भर रहे हैं कि बुनियादी परिवर्तन के लिए पहली प्रमुख ज़रूरत कम्युनिस्ट क्रांतिकारी विचारधारा पर आधारित पार्टी की है. बिना इसके ऐसे सभी आंदोलन बर्बाद होने के लिए अभिशप्त हैं. उम्मीद है कि नेपाल के लोगों के इस विद्रोह में नौजवानों का एक हिस्सा ज़रूर ही ऐसा होगा, जो इस विद्रोह में से ये बुनियादी नतीजे निकालकर ऐसे संगठन के निर्माण के कार्य को आगे बढ़ाएगा.

  • मानव (मुक्ति संग्राम – सितंबर-अक्टूबर (संयुक्तांक) 2025 में प्रकाशित)

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