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कोरोना के नाम पर जारी लॉक अनलॉक की भयावह तस्वीर

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 8, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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साल 2012-14 में एक अनुमान के अनुसार हर साल नए 1.25 करोड़ रोज़गार पैदा हो रहे थे. मोदी 2014 के आम चुनाव में इसी रफ्तार को देखते हुए दो करोड़ रोजगार हर साल देने की बात कर रहे थे. लेकिन नए रोजगार की बात तो आप छोड़ ही दीजिए जो लोग नौकरी/रोजगार में हैं, वे ही दूध में मख्खी की तरह बाहर फेंक दिए जा रहे हैं. वहीं दूसरी ओर वैक्सीन पासपोर्ट पूरी तरह से नयी विश्व व्यवस्था को जन्म देने जा रहा है. एक नए तरह का डिस्करमेनेशन यानी नए तरह के भेदभाव की शुरुआत होने जा रही है.

कोरोना के नाम पर जारी लॉक अनलॉक की भयावह तस्वीर
बांये – अमेरिका की तस्वीर; दांयें – भारत की तस्वीर
गिरीश मालवीय

यह तस्वीर आज से देश में हो रहे अनलॉक की भयावह सच्चाई बयान करती है. यह अमेरिका में आए ग्रेट डिप्रेशन की प्रतिनिधि तस्वीर समझी जाती है. भारत में कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के कारण एक करोड़ से अधिक लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है और महामारी की शुरूआत से लेकर अबतक 97 प्रतिशत परिवारों की आय घटी है.

लेकिन यह बेरोजगारी सिर्फ कोरोना के ही कारण नहीं है. अर्थशास्त्री ‘आर्थर ओकुन’ ने ओकुन का नियम प्रतिपादित किया कि – ‘जीडीपी में इसके लंबे समय के स्तर से 3 प्रतिशत की वृद्धि बेरोजगारी में 1 प्रतिशत की कमी करती है. भारत में इस नियम को उल्टा कर के देख लीजिए. मोदी सरकार में GDP ग्रोथ की रफ्तार 2016 के बाद से लगातार नीचे जा रही है. ग्रोथ रेट में हम 8.2 से -7.3 पर जा चुके हैं.

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ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

साल 2012-14 में एक अनुमान के अनुसार हर साल नए 1.25 करोड़ रोज़गार पैदा हो रहे थे. मोदी 2014 के आम चुनाव में इसी रफ्तार को देखते हुए दो करोड़ रोजगार हर साल देने की बात कर रहे थे. लेकिन नए रोजगार की बात तो आप छोड़ ही दीजिए जो लोग नौकरी/रोजगार में हैं, वे ही दूध में मख्खी की तरह बाहर फेंक दिए जा रहे हैं.

कंपनियों ने व्हाइट कॉलर जॉब (ऑफिस और मैनेजमेंट वाली नौकरियां) की हायरिंग रोक दी है, इसके चलते मई में ऑफिस जॉब की हायरिंग में 10 से 15 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. वहीं, 31 फीसदी की गिरावट अप्रैल महीने में आई थी.

कोरोना की दूसरी लहर के बाद अधिकांश वाहन कंपनियों के डीलरों ने अपने शोरूम बंद कर दिए हैं. अभी उनके खुलने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही है क्योंकि मई महीने में गाड़ियों की बिक्री 70 से 80 फीसदी तक गिर गयी है. कोरोना संकट के बाद करीब आठ वाहन कंपनियों ने अपने प्लांट बंद कर दिए हैं.

हवाई यात्रियों की संख्या में करीब 40 फीसदी की गिरावट आ गई है, इससे विमानन कंपनियों की वित्तीय स्थिति फिर से नाजुक होने लगी है. रियल एस्टेट जो बहुत बड़े स्तर पर रोजगार देता है वह भी पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है. हर तरह का मैन्युफैक्चरिंग डिमांड की कमी से बन्द-सा हो गया है. बाजार में सामानों की मांग घटने से उद्योग जगत ने फैक्टरियों में उत्पादन कम कर दिया है. बहुत संभव है इस तरह के दृश्य आपको भारत की सड़कों पर भी नजर आए.

बायस्ड मीडिया

मीडिया कितना बायस्ड है यदि यह देखना हो तो इस खबर पर नजर डालिए. वालस्ट्रीट जनरल, बीबीसी, नवभारत टाइम्स, आजतक सब में पिछले दिनों एक खबर छपी है कि खाड़ी देश बहरीन में चीनी वैक्सीन के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के बाद कोरोना संक्रमण के मामलों में तेज़ी देखी जा रही है.

पश्चिम एशिया का यह द्वीपीय देश बहरीन प्रति व्यक्ति टीकाकरण के लिहाज से दुनिया के सबसे शीर्ष देशों में शामिल होने के बावजूद कोरोना वायरस संक्रमण के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है. वहां संक्रमण बढ़ता ही जा रहा है इसलिए बहरीन में लोगों को चीन के सिनोफार्म के टीके की दो खुराक लेने के छह महीने बाद फाइजर-बायोएनटेक के टीके की बूस्टर डोज लगाना शुरू किया गया है.

बहरीन के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी वलीद ख़लीफ़ा अल मानिया ने बताया कि बहरीन की 60 फ़ीसदी से ज़्यादा आबादी को चीन में बनी सिनोफार्मा वैक्सीन दी गई थी. सरकार ने अब सिफारिश की है कि 50 साल से अधिक उम्र के लोग, मोटे लोग तथा कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोग फाइजर का बूस्टर डोज लें, भले ही उन्होंने पहले सिनोफार्म का टीका लगवाया हो. यह क्या हो रहा है ?

बड़ी बात नहीं है कि आने वाले दिनों में कई देशों में बहरीन जैसे ही स्थिति देखने को मिले और आप लोगों को दूसरी वैक्सीन के दो डोज लगवाने के बाद फ़ाइजर का डोज लगवाना पड़े जैसे कि उन भारतीय प्रवासियों को लगवाने पड़ रहे हैं, जो अमेरिका में जा रहे हैं.

लेकिन यहां समझने की बात यह है कि मीडिया को सेशेल्स और बहरीन की स्थिति तो दिख रही है लेकिन मंगोलिया, थाईलैंड, वियतनाम, ताइवान की स्थिति नहीं दिख रही. यहां तक इतने बड़े देश भारत को भी नजरअंदाज किया जा रहा है, जहां बड़े पैमाने पर एस्ट्राजेन्का की वैक्सीन (कोविशील्ड) का इस्तेमाल किया गया है. इन्हें दक्षिण अमेरिका के चिली में, उरूग्वे में, अर्जेंटीना में, यहां तक कि ब्राजील में बढ़ता हुआ संक्रमण नहीं दिख रहा है. यहां वे क्यों नहीं बोल रहे हैं कि वैक्सीन के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के बाद कोरोना संक्रमण के मामलों में कैसे तेजी दिख रही है ? क्या सिर्फ इसलिए कि इन देशों में भी बिल गेट्स द्वारा फंडेड और UN के कोवेक्स मिशन के तहत दी गई एस्ट्राजेन्का की वैक्सीन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है ?

यहां कोई ब्रेकिंग न्यूज़ क्यों नहीं दिखाते कि ताइवान में संक्रमण कैसे बढ़ा ? वियतनाम में इतने मरीज आने के क्या संभावित कारण है ? साफ है मीडिया उन खबरों से मुंह फेर लेगा और उन खबरों को कभी तरजीह नहीं देगा जो उनके बड़े आकाओं के खेल खराब कर दे.

वैक्सीन पासपोर्ट

जी 7 के देशों के बीच अपने यहां वैक्सीन पासपोर्ट को लागू करने की सहमति बन गयी है, पिछले शुक्रवार को ब्रिटेन में G7 के स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक थी, जिसमें अतिथि के रूप में बुलाए गए भारत के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने जी 7 की बैठक में शिरकत की. उन्होंने यह कहा कि वैक्सीन पासपोर्ट की पहल बेहद भेदभाव वाली साबित हो सकती है.

उन्होंने यह भी कहा कि विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में टीकाकरण के निम्न स्तर के तथ्य को ध्यान में रखते हुए यह पहल उचित नहीं है. हमारा मानना है कि वैक्सीन पासपोर्ट विकासशील देशों के लिए बेहद भेदभावपूर्ण और नुकसानदेह होगा. लेकिन कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूके और अमेरिका के स्वास्थ्य मंत्रियों ने इससे पहले ही घोषणा कर दी थी कि वे ‘कोविड वेक्सीन सर्टिफिकेट के पारस्परिक स्वीकृति की प्रक्रिया की दिशा में’ काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

ब्रिटेन की तरफ से शामिल हैनकॉक ने G7 बैठक से पहले कहा कि ‘यह प्रमाणित करने में सक्षम होना कि आपके पास एक टीका है, अंतर्राष्ट्रीय यात्रा के लिए आवश्यक होने जा रहा है क्योंकि कुछ देशों ने पहले ही निर्धारित कर दिया है कि उन्हें इस बात का प्रमाण चाहिए कि आपको टीका लगाया गया है.’ यानी अब यह बिल्कुल स्पष्ट है कि वैक्सीन पासपोर्ट लागू होकर रहेगा.

भारत की तरफ से डॉ. हर्षवर्धन ने अपनी बात रखने का प्रयास किया है लेकिन हमें ध्यान में रखना चाहिए कि हम बस कहने के ही विश्वगुरु हैं. हमारी हैसियत इतनी भी नहीं है कि हमारे प्रधानमंत्री WHO से कहकर भारत बायोटेक की वैक्सीन कोवेक्सीन को ही WHO से मंजूरी ही दिलवा दे, जबकि चीन की दो दो वेक्सीन को WHO ने कुछ ही दिन पहले अनुमति दी है. यानी भारत की वैक्सीन कही जाने वाली कोवेक्सीन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई मान्यता नहीं है.

वैक्सीन पासपोर्ट पूरी तरह से नयी विश्व व्यवस्था को जन्म देने जा रहा है. एक नए तरह का डिस्करमेनेशन यानी नए तरह के भेदभाव की शुरुआत होने जा रही है. यह मत सोचिए कि यह सब सिर्फ वैक्सीन की दो डोज पर ही रुक जाएगा. अब बूस्टर शॉट आएंगे और आपको उनको भी लगवाना जरूरी होगा जैसे आपके एंड्राइड फोन में हर साल नया अपडेट आता है वैसा ही.

वैसे और आसानी से समझना हो तो जैसे अपने कंप्यूटर में आपको हर साल नया एंटीवायरस डलवाना होता है, अब आपको अपने शरीर में वैक्सीन का सबसे लेटेस्ट और अपग्रेडेड डोज डलवाना होगा, तभी आप सब जगहों पर जाने लायक माने जाएंगे ! इतने दिनों से आपको यही समझा रहा हूं.

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

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