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Home गेस्ट ब्लॉग

आजादी के 75 साल बाद भी भारत में लोकतंत्र को लागू नहीं कर पाए – हिमांशु कुमार

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 19, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
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एक शब्द है बहुसंख्यवाद. यह लोकतंत्र का विरोधी शब्द है. कुछ लोग गलती से समझते हैं कि लोकतंत्र का मतलब है जहां बहुसंख्य लोगों की मर्जी से कामकाज चलाया जाए, उसे लोकतंत्र कहा जाता है. लेकिन यह गलतफहमी है.

लोकतंत्र का अर्थ है जहां बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक सब का ध्यान रखा जाए. सब के अधिकारों की रक्षा हो. प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा की जाए और जो लोकतांत्रिक सामाजिक राजनैतिक आधुनिक प्रगतिशील मूल्य है, उन्हें बढ़ावा दिया जाए. उनकी रक्षा की जाए.

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प्रगतिशील मूल्यों का मतलब है जातिवाद मुक्त समाज, पितृसत्ता मुक्त समाज, स्त्री पुरुष की समानता, सभी धर्मों को मानने वाले लोगों के बराबर अधिकार, हर लिंग के व्यक्ति के बराबर अधिकार, भारत में लोकतंत्र को कुचलकर बहुतवादसंख्य लादा जा रहा ह.

इसका एक उदाहरण है भारत के बहुसंख्यक हिंदू लोग मुसलमानों पर खाने-पीने की आदत के बारे में जबरदस्ती कर रहे हैं. उत्तर भारत के हिंदू गाय को माता मानते हैं लेकिन वह कोशिश करते हैं कि अपनी मान्यता को दूसरे धर्मों को मानने वाले लोगों पर भी लागू करें.

यहां तक कि वे गाय खाने का इल्जाम लगाकर मुसलमानों पर हमला करते हैं, उनकी जान ले लेते हैं, हत्या कर देते हैं. यह पूरी तरह तानाशाही बहुसंख्यवाद और गुंडागर्दी का उदाहरण है.

महात्मा गांधी ने भी कहा था कि अगर हिंदू गाय को माता मानते हैं तो वे ना खाएं लेकिन वह दूसरे धर्म वालों के साथ जबरदस्ती नहीं कर सकते कि वह भी उसको माता माने.

इसके अलावा लोकतांत्रिक मूल्य यह कहते हैं कि देश में एक समुदाय दूसरे समुदाय पर अपनी मान्यताओं को नहीं लाद सकता लेकिन भारत में वह लादा जाता है. अपनी इस गुंडागर्दी पर हिंदू बहुत गर्व भी करते हैं. वे इसे अपनी शक्ति के रूप में प्रदर्शित करते हैं. जबकि यह उनकी मूर्खता, नासमझी और अलोकतांत्रिक व्यवहार का साफ-साफ उदाहरण है.

भारत के पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में और गोवा में बीफ खाया जाता है. लेकिन उत्तर भारत के जो हिंदू लोग मुसलमानों पर हमला करते हैं उनकी इतनी हिम्मत नहीं है कि वह दक्षिण भारतीय, उत्तर पूर्व या गोवा के भारतीय लोगों के ऊपर अपनी जबरदस्ती तानाशाही लाद सकें.

हमारे टटपूंजिए नेता और पार्टियां इस तानाशाही को समर्थन देती हैं. यह भारत के लिए एक बहुत शर्मनाक स्थिति है कि हम आजादी के 75 साल बाद भी भारत में लोकतंत्र को लागू नहीं कर पाए हैं.

किसे किसे वो सब साथी याद हैं जिन्हें हमारे ही दौर में इसलिए जेलों में डाल दिया गया है क्योंकि उन्होंने गरीबों की ज़मीन, जंगल और पानी की लूट के खिलाफ आवाज़ उठाई ? सैंकडों परिचित और अनाम साथी आज भी जेलों में पड़े हैं.

सत्ता पर पैसे वाले लुटेरों का कब्ज़ा है. इन लुटेरों की लूट का विरोध करने वालों को जेल में डाला जा रहा है. जो काम ईस्ट इण्डिया करती थी, व्यापार का संरक्षण और जनता पर हमला, वही काम अब हमारी सरकार खुलेआम कर रही है.

आप जानते हैं आज हमारे ज्यादातर अर्धसैनिक बलों के सैनिक कहां हैं ? हमारे सैनिक आदिवासी इलाकों में भेज दिए गए हैं. क्या हमारे सैनिक जंगलों में आदिवासियों की रक्षा करने के लिए गए हैं ?

नहीं, सैनिक अमीरों की कंपनियों के लिए जंगल की खदानों, पहाड़ों और नदियों पर कब्ज़ा करने वहां गए हैं. और ये सैनिक जंगल में रहने वालों के साथ क्या कर रहे हैं, उसका नमूना बीच-बीच में आप सोनी सोरी, आरती मांझी और सारकेगुडा में बच्चों के संहार के रूप में देख ही लेते हैं.

हमें बताया गया है कि विकास के लिए यह जनसंहार और दमन ज़रूरी है. गांधी ने कहा था कि अगर भारत अंग्रेजों का विकास का माडल अपनाएगा तो भारत को एक दिन अपनी ही जनता से युद्ध करना पड़ेगा.

कहा जाता है कि अंग्रेज़ी राज में कभी सूरज नहीं डूबता था, लेकिन एक अंगरेज़ ने ही लिखा था कि अंग्रेज़ी राज में कभी खून भी नहीं सूखता. अंगरेज़ सारी दुनिया के संसाधन लूटते थे और उसके लिए अपने सैनिकों का प्रयोग करते थे.

गांधी ने कहा कि अंग्रेजों ने तो अपने इस तरह के विकास के लिए सारी दुनिया पर हमला किया. गांधी ने कहा अंग्रेजों का यह विकास का माडल शैतानी माडल है. यह विकास का माडल ज़्यादा उपभोग और दूसरे के संसाधनों को छीनने पर आधारित है. लेकिन अगर भारत भी अंग्रेजों के विकास का माडल अपनाएगा तो भारत किसके संसाधन छीनेगा और भारत किस पर हमला करेगा ?

गांधी ने कहा कि एक दिन आप अपने ही गरीब देशवासियों पर हमला कर बैठेंगे. गांधी ने कहा इस विकास के माडल में से सिर्फ युद्ध निकलेगा. आज हमारी सेना आदिवासी इलाकों में पहुंच चुकी है. भारत के अमीर लोग भारत के गरीब इलाकों में सेना भेज रहे हैं, और आपको अभी भी नहीं लगता कि हम गृह युद्ध की तरफ बढ़ रहे हैं ?

सोचिये आज ही सोचिये कि क्या भारत को अपने विकास की दिशा के बारे में फिर से नहीं सोचना चाहिए ? जो विकास देश में हिंसा बढाए हमें वैसा विकास चाहिए या जो शांति बढाए वो विकास अपनाना चाहिए ?

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