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आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक 2022 : जनता की जासूसी का एक और हथकण्डा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 2, 2022
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आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक 2022 : जनता की जासूसी का एक और हथकण्डा
आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक 2022 : जनता की जासूसी का एक और हथकण्डा

पिछले 8 सालों में अपराध की परिभाषा बदल गई है, इसलिए अब अपराधी के पहचान की प्रक्रिया भी बदल रही है. अब हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार, चोरी, डकैती आदि जैसे ‘अपराध’ अब सदाचार की गिनती में आ गए हैं, देशद्रोह और आतंकवाद की परिभाषा बदल गई है. इसलिए भारत सरकार के अपराध के नये मानक के अनुसार किसी अपराध या भ्रष्टाचार को उजागर करना, किसानों-मजदूरों के हितों की बात करना, सरकार से सवाल करना अपराध की श्रेणी में आ गया है. यही कारण है कि अपराधी की ‘पहचान’ के लिए भी एक नये कानून की जरूरत पड़ गई है.

लखीमपुर खीरी में किसानों और पत्रकारों को कार से कुचलकर मार डालने वाले के पिता अजय मिश्र टेनी ने, जिसने किसानों को देख लेने और नरसंहार करने तक की धमकी सरेआम दे चुका है, ने अब नये किस्मों के ‘अपराधियों’ की पहचान के लिए आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक 2022 कानून संसद में पेश किया है. इस कानून.का अन्तर्वस्तु से ही स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में सरकार से सवाल पूछने वाले समूह और उन सवालों को उठाने वाले पत्रकार अपराधी माने जायेंगे.

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28 मार्च को लोकसभा में केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा ‘टेनी’ ने एक विधेयक पेश किया. लखीमपुर खीरी से चर्चित किसान हत्याकाण्ड के आरोपी मंत्री द्वारा प्रस्तुत विधेयक का नाम आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक 2022 है. इस विधेयक के तहत पुलिस-प्रशासन को यह अधिकार मिल जायेगा कि वह किसी भी आरोपी या अपराधी के बायोलाजिक सैंपल, अंगुलियों-पैरों के निशान, आंख की पुतलियों का, उसके फोटो-लिखावट के सैंपल एकत्र कर सकेगा और 75 वर्षों तक यह डेटा संभाल कर रख सकेगा.

सरकार का तर्क है कि इस विधेयक के पारित होने से जांच एजेंसियों को अपराध की जांच में मदद मिलेगी व इससे दोष सिद्धि की दर बढ़ जायेगी. यह विधेयक 1920 के उस कानून में बदलाव करता है जिसे कैदियों के पहचान कानून 1920 के नाम से जाना जाता है. इस कानून के तहत आरोपी-अपराधी घोषित व्यक्तियों की पहचान के लिए उनके अंगुली-पैरों के निशान व फोटो लिये जा सकते थे.

अब 1920 के कानून के दायरे को नये विधेयक में काफी विस्तारित कर दिया गया है. पहले अंगुली-पैरों के निशान व फोटो मात्र उन आरोपी-अपराधियों की ली जा सकती थी जिन्होंने ऐसा अपराध किया हो या अपराध के आरोपी हो, जिसमें एक वर्ष की कठोर कैद का न्यूनतम दण्ड हो. अब नये विधेयक में यह सभी तरह के गिरफ्तार, अपराधसिद्ध व्यक्तियों के लिए लागू हो जायेगा, यहां तक कि जिन्हें किसी अपराध की आशंका में कैद किया जायेगा उन्हें भी यह व्यक्तिगत डेटा देना पड़ेगा. केवल बायोलाजिकल डेटा (डीएनए, वीर्य, स्वैब आदि) देना उन्हीं के लिए अनिवार्य होगा, जिन्होंने किसी महिला-बच्चे के खिलाफ अपराध किया हो या ऐसे अपराध का आरोपी हो जिसमें न्यूनतम 7 वर्ष कैद की सजा हो.

इस तरह पुलिस-प्रशासन को व्यवहारतः किसी भी व्यक्ति का निजी डाटा एकत्र करने का अधिकार हासिल हो जायेगा। इस डेटा को एकत्र करने व 75 वर्ष तक सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) को दी गयी है. उसे मजिस्ट्रेट के आदेश पर उन रिकार्डों को समाप्त करने का भी अधिकार होगा, जिसमें कोई व्यक्ति अदालत से अपराधमुक्त हो गया हो.

इसके साथ ही विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि अगर कोई व्यक्ति अपने उपरोक्त डेटा को देने से इनकार करता है तो उसे सरकारी काम-काज में बाधा माना जायेगा.

इसी के साथ जहां पहले यह डेटा एकत्र करने का अधिकार किसी पुलिस थाने में प्रभारी, जांच अधिकारी या न्यूनतम सब इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी को था, अब डेटा एकत्र करने का अधिकार हेड वार्डन स्तर के जेल अधिकारी व हेड कांस्टेबल स्तर के पुलिस अधिकारी को भी मिल गया है.

जहां पहले के कानून में इससे संबंधित नियम बनाने का अधिकार केवल राज्य सरकारों को था अब नये विधेयक में यह अधिकार केन्द्र व राज्य सरकार दोनों को दे दिया गया है. व्यवहारतः इसका अर्थ यह होगा कि चूंकि राज्य सरकारें केन्द्रीय नियमों के विपरीत नियम नहीं बना सकती हैं, अतः उन्हें केन्द्र के नियम ज्यादातर मामलों में मानने होंगे.

इस विधेयक से लोगों की निजी पहचानों से जुड़े निजता के अधिकार और राज्य द्वारा उनकी जासूसी की बहस एक बार फिर उठ खड़ी हुई है. अपने करोड़ों नागरिकों का डेटा एकत्र कर पुलिस-प्रशासन लोगों पर मनमाने आरोप लगाने और सबूत बनाने में और सक्षम हो जायेगा. अभी ही बेगुनाहों को कच्ची शराब या कोई चाकू-ड्रग बरामद दिखाकर पुलिस मनमानापन करती रही है, अब वह लोगों के निजी डेटा से और मनमाने सबूत पैदा कर बेगुनाहों को फंसाने लगेगी.

जहां स्थानीय पुलिस-थाना फुटकर तौर पर लोगों को अपना शिकार बनायेगा वहीं राज्य थोक ढंग से किसी समूह को टारगेट कर उसे अपराधी घोषित कराने में इस डेटा का इस्तेमाल कर सकता है. मौजूदा फासीवादी सरकार जो एक खास धर्म के लोगों पर हमलावर है वह उक्त धर्म के लोगों को बदनाम करने के लिए भी इस डेटा का सहारा ले सकती है, साथ ही इस डेटा के चोरी होने व दूसरे दुरुपयोग के खतरे भी बढ़ जायेंगे.

कुल मिलाकर इस नये विधेयक के कानून बनने से अपराधी की पहचान व दोष सिद्धि में भले ही कुछ मदद मिले न मिले पर इससे पुलिस-प्रशासन नागरिकों के व्यक्तिगत डेटा पर नियंत्रण कर कहीं ज्यादा खूंखार हो जायेगा. हिन्दू राष्ट्र नाम से फासीवादी हुकूमत कायम करने के उद्देश्य से प्रेरित संघ-भाजपा इस कानून के जरिये अपने विरोधियों को अपराधी घोषित करने में मनमानापन करने की ओर बढ़ेंगी जो समस्त जनता के अधिकारों पर बड़ा हमला होगा इसीलिए इस विधेयक का वक्त रहते विरोधी जरूरी है.

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