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भारत में दलित समाज

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 8, 2024
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भारत में दलित समाज
भारत में दलित समाज
आनंद तेलतुंबडे

दलित, जिन्हें पहले अछूत कहा जाता था, वो भारत की कुल आबादी का 16.6 फ़ीसद हैं. इन्हें अब सरकारी आंकड़ों में अनुसूचित जातियों के नाम से जाना जाता है. 1850 से 1936 तक ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार इन्हें दबे-कुचले वर्ग के नाम से बुलाती थी. अगर हम दो करोड़ दलित ईसाईयों और 10 करोड़ दलित मुसलमानों को भी जोड़ लें, तो भारत में दलितों की कुल आबादी करीब 32 करोड़ बैठती है.

ये भारत की कुल आबादी का एक चौथाई है. आधुनिक पूंजीवाद और साम्राज्यवादी शासन ने भारत की जातीय व्यवस्था पर तगड़े हमले किए. फिर भी, दलितों को इस व्यवस्था की बुनियादी ईंट की तरह हमेशा बचाकर, हिफ़ाज़त से रखा गया, ताकि जाति व्यवस्था ज़िंदा रहे. फलती-फूलती रहे. दलितों का इस्तमाल करके ही भारत के संविधान में भी जाति व्यवस्था को ज़िंदा रखा गया.

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बंटे हुए हिंदू समाज का आइना हैं दलित

सभी दलितों के साथ भेदभाव होता है, उन्हें उनके हक से वंचित रखा जाता है. ये बात आम तौर पर दलितों के बारे में कही जाती रही है. लेकिन करीब से नजर डालें, तो दलित, ऊंच-नीच के दर्जे में बंटे हिंदू समाज का ही आईना हैं. 1931-32 में गोलमेज सम्मेलन के बाद जब ब्रिटिश शासकों ने समाज को सांप्रदायिक तौर पर बांटा तो, उन्होंने उस वक्त की अछूत जातियों के लिए अलग से एक अनुसूची बनाई, जिसमें इन जातियों का नाम डाला गया.

इन्हें प्रशासनिक सुविधा के लिए अनुसूचित जातियां कहा गया. आज़ादी के बाद के भारतीय संविधान में भी इस औपनिवेशिक व्यवस्था को बनाए रखा गया. इसके लिए संवैधानिक (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 जारी किया गया, जिसमें भारत के 29 राज्यों की 1108 जातियों के नाम शामिल किये गए थे. हालांकि ये तादाद अपने आप में काफी ज्यादा है.

फिर भी अनुसूचित जातियों की इस संख्या से दलितों की असल तादाद का अंदाज़ा नहीं होता. क्योंकि ये जातियां भी, समाज में ऊंच-नीच के दर्जे के हिसाब से तमाम उप-जातियों में बंटी हुई हैं.

दो हज़ार से चल रही है जातीय व्यवस्था

यूं तो, भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों की ज़िंदगी को संचालित करने वाली ये ज़ातीय व्यवस्था पिछले क़रीब दो हज़ार सालों से ऐसे ही चली आ रही है. लेकिन, इस ज़ातीय व्यवस्था के भीतर जातियों का बंटवारा तकनीकी-आर्थिक तौर पर और सियासी उठा-पटक की वजह से बदलता रहा है.

भारत के ग्रामीण समाज में तमाम जातियां अपनी जाति के पेशे करती आई हैं. लेकिन, देश के अलग-अलग हिस्सों में कई जगह दलित ज़ातियों की आबादी इतनी ज़्यादा हो गई कि उन्हें किसी ख़ास पेशे के दायरे में बांधकर रखना मुमकिन नहीं था. सो, नतीजा ये हुआ कि इन दलितों ने अपना अस्तित्व बचाने के लिए जो भी पेशा करने का मौक़ा मिला, उसे अपना लिया.

जब भारत में मुस्लिम धर्म आया, तो ये दलित और दबे-कुचले वर्ग के लोग ही मुसलमान बने. जब यूरोपीय औपनिवेशिक का भारत आना हुआ, तो समाज के निचले तबके के यही लोग उनकी सेनाओं में भर्ती हुए. जब ईसाई मिशनरियों ने स्कूल खोले, तो इन दलितों को उन स्कूलों में दाखिला मिला और वो ईसाई बन गए. हर मौके का फायदा उठाते हुए, वो औपनिवेशिक नीति की मदद से आगे बढ़े और इस तरह से दलित आंदोलन संगठित हुआ. डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर जैसे नेता इसी व्यवस्था से आगे बढ़े और उन्होंने दलितों की अगुवाई की.

दलित आंदोलन के फायदे

बीसवीं सदी की शुरुआत में दलितों की हालत, सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक तौर पर एक जैसी ही थी. गिने-चुने लोग ही थे, जो दलितों की गिरी हुई हालत से ऊपर उठ सके थे. डॉक्टर आम्बेडकर की अगुवाई में दलित आंदोलन ने दलितों को कई फ़ायदे मुहैया कराए. इनमें आरक्षण और कानूनी संरक्षण जैसी सुविधाएं को गिनाया जा सकता है. आज शासन व्यवस्था के हर दर्जे में कुछ सीटें दलितों के लिए आरक्षित होती हैं. इसी तरह सरकारी मदद से चलने वाले शैक्षिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में भी दलितों के लिए आरक्षण होता है.

आज़ादी के बाद बने भारत के संविधान में दलित हितों के संरक्षण के लिए ये व्यवस्थाएं की गई हैं. हालांकि उन्हें लागू करने की प्रक्रिया आधी-अधूरी ही रही है. फिर भी इनकी वजह से दलितों के एक तबके को फ़ायदा हुआ है. अस्तित्व के लिए उनकी लड़ाई आसान हुई है. इन कदमों की वजह से आज दलितों की हर जगह नुमाइंदगी होती है. राजनीति (संसद और विधानसभाओं-स्थानीय निकायों) में ये संख्या सुनिश्चित है. लेकिन शैक्षिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों (अफसरशाही) में भी हम दलितों की नुमाइंदगी देखते हैं.

एक सदी पुरानी हालत में दलित

हालांकि, अकादेमिक और ब्यूरोक्रेसी के विकास में उनकी तादाद घट रही है. पिछले सात दशकों में दलितों की दूसरी और तीसरी पीढी, तरक्की की नई ऊंचाइयां छू रही है. ज़्यादातर मामलों में अब उन्हें आरक्षण की ज़रूरत नहीं मालूम होती. आज अमरीका और दूसरे देशों में दलित अप्रवासियों की अच्छी-ख़ासी आबादी रहती है. आज कई दलितों ने कारोबार में भी सिक्का जमाया है और यहां तक कि उनके अपने दलित इंडियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री भी है.

तो, ऐसा लगता है कि दलितों के एक तबके ने काफी तरक्की कर ली है, लेकिन अभी भी ज़्यादातर दलित उसी हालत में हैं, जिस स्थिति में वो आज से एक सदी पहले थे. जिस तरह से आरक्षण की नीति बनाई गई है, ये उन्हीं लोगों को फ़ायदा पहुंचाती आ रही है, जो इसका लाभ लेकर आगे बढ़ चुके हैं. नतीजा ये है कि दलितों में भी एक छोटा तबका ऐसा तैयार हो गया है, जो अमीर है. जिसे व्यवस्था का लगातार फ़ायदा हो रहा है. ये दलितों की कुल आबादी का महज़ 10 फ़ीसद है.

आम्बेडकर ने कल्पना की थी कि आरक्षण की मदद से आगे बढ़ने वाले दलित, अपनी बिरादरी के दूसरे लोगों को भी समाज के दबे-कुचले वर्ग से बाहर लाने में मदद करेंगे. मगर, हुआ ये है कि तरक्कीयाफ़्ता दलितों का ये तबका, दलितों में भी सामाजिक तौर पर ख़ुद को ऊंचे दर्जे का समझने लगा है. दलितों की ये क्रीमी लेयर बाक़ी दलित आबादी से दूर हो गई है.

इनके दलित समुदायों से इतर अपने अलग हित हो गए हैं. इनकी तरक़्क़ी से समाज के दूसरे तबक़ों को जो शिकायत है, उसका निशाना आम तौर पर वो दलित बनते हैं, जो गांवों में रहते हैं, और, तरक़्क़ी की पायदान में नीचे ही रह गए हैं. देश में कृषि व्यवस्था के बढ़ते संकट ने ऊंचे तबके के किसानों और दलितों के रिश्तों में और तनातनी बढ़ाई है. क्योंकि दलित भूमिहीन हैं, तो उन पर इस संकट का असर नहीं होता.

साथ ही शिक्षा और रोज़गार के बढ़ते मौक़ों का फ़ायदा उठाकर और लामबंदी करके दलित आज ऊंचे तबके के ग्रामीणों से बेहतर हालात में हैं. दलितों के प्रति ये नाराज़गी कुछ छोटी हिंसक घटनाओं की वजह से भयंकर जातीय संघर्ष में बदल जाते हैं. ये पूरी तरह से आज़ादी के बाद की आर्थिक सियासत का नतीजा है. ज़ुल्मों का ये नया वर्ग तैयार हुआ है, जिसमें ऊंची जाति के हिंदू, दलितों को निशाना बनाते हैं, ताकि वो पूरे दलित समुदाय को एक सबक सिखा सकें. आज पूरे देश में दलित ऐसे हालात और ज़ुल्म का सामना कर रहे हैं.

दलित आज भी ज़्यादातर गांवों में रहते हैं. गैर दलितों के मुक़ाबले दलित आबादी का शहरीकरण आधी रफ़्तार से हो रहा है. ज़मीन के मालिक न होने के बावजूद वो आज भी भूमिहीन मज़दूर और सीमांत किसान के किरदार में ही दिखते हैं. दलितों के पास जो थोड़ी-बहुत ज़मीन है भी, तो वो छिनती जा रही है.

स्कूलों मे आज दलितों की संख्या दूसरी जातियों के मुक़ाबले ज़्यादा है, लेकिन ऊंचे दर्जे की पढ़ाई का रुख़ करते-करते ये तादाद घटने लगती है. आज ऊंचे दर्जे की पढा़ई छोड़ने की दलितों की दर, गैर दलितों के मुक़ाबले दो गुनी है. कमजोर तबके से आने की वजह से वो घटिया स्कूलों में पढ़ते हैं. उनकी पढ़ाई का स्तर अच्छा नहीं होता, तो उनको रोज़गार भी घटिया दर्जे का ही मिलता है.

दलितों के ख़िलाफ़ बढ़ रहा है जुल्म

1990 के दशक से उदार आर्थिक नीतियां लागू हुईं, तो दलितों की हालत और ख़राब होने लगी. डार्विन के योग्यतम की उत्तरजीविता और समाज के ऊंचे तबक़े के प्रति एक ख़ास लगाव की वजह से नए उदारीकरण ने दलितों को और भी नुक़सान पहुंचाया है. इसकी वजह से आरक्षित नौकरियों और रोज़गार के दूसरे मौक़े कम हुए हैं. 1997 से 2007 के बीच के एक दशक में 197 लाख सरकारी नौकरियों में 18.7 लाख की कमी आई है. ये कुल सरकारी रोज़गार का 9.5 फ़ीसद है.

इसी अनुपात में दलितों के लिए आरक्षित नौकरियां भी घटी हैं. ग्रामीण इलाक़ों में दलितों और गैर दलितों के बीच सत्ता का असंतुलन, दलितों पर हो रहे ज़ुल्मों की तादाद बढ़ा रहा है. आज ऐसी घटनाओं की संख्या 50 हज़ार को छू रही है.

उदार आर्थिक नीतियों की वजह से हिंदुत्व के उभार और फिर इसके सत्ता पर क़ाबिज़ होने की वजह से दलितों के ख़िलाफ़ ज़ुल्म बढ़ रहा है. 2013 से 2017 के बीच ऐसी घटनाओं में 33 फ़ीसद की बढ़ोतरी देखी गई है. रोहित वेमुला, उना, भीम आर्मी और भीमा कोरेगांव की घटनाओं से ये बात एकदम साफ़ है. दलितों के मौजूदा हालात से एकदम साफ़ है कि संवैधानिक उपाय, दलितों की दशा सुधारने में उतने असरदार नहीं साबित हुए हैं, जितनी उम्मीद थी. यहां तक कि छुआछूत को असंवैधानिक करार दिए जाने के बावजूद ये आज तक क़ायम है.

आरक्षण का मक़सद दलितों की भलाई और उनकी तरक़्क़ी था, लेकिन इसने गिने-चुने लोगों को फ़ायदा पहुंचाया है. इसकी वजह से ज़ाति-व्यवस्था के समर्थक इस ज़ातीय बंटवारे को बनाए रखने में कामयाब रहे हैं, जो कि दलित हितों के लिए नुक़सानदेह है.

चुनाव के ‘फ़र्स्ट पास्ट द पोस्ट’ सिस्टम की वजह से और सत्ताधारी वर्ग की साज़िशों का नतीजा ये है कि आज दलित उधार की राजनीति में ही जुटे हुए हैं. दलितों के शिक्षित वर्ग को अपने समुदाय की मुश्किलों की फ़िक्र करनी चाहिए थी, लेकिन वो भी सिर्फ़ ज़ातीय पहचान को बढ़ावा देने और उसे बनाए रखने के लिए ही फ़िक्रमंद दिखते हैं.

  • आनंद तेलतुंबडे का यह आलेख बीबीसी से लिया गया है, जिसे बीबीसी ने 24 मई, 2018 को प्रकाशित किया था.

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