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दंगे होने लगे जटिल, गांंठ खोलना नहीं है आसान 

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 1, 2018
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 दंगे होने लगे जटिल

20वीं शताब्दी के अंत और 21वीं शताब्दी की शुरुआती दौर में इस देश की धरती को, अगर वही लोग, रक्तरंजित करने में लिप्त हो जाएँ, जो इसे अपनी “मांं” के समान “आदरणीय और पूज्य” बताते नहींं थकते; तो इस पर रोया जाय या हंसा जाए?

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जमीन पर बहे खून की हर बूंंद यदि “कमल” की फसल उगाने में उर्वरक की भूमिका निभाये, तो खून बहाते रहने के षड्यंत्रों के कौशलपूर्ण “आयोजनों” का खाका तैयार करने से लेकर, उत्पादन और वितरण तक के जाल को, सुदृढ़ क्यों न बनाया जाय ? कौशल इस बात का कि—“खून भी बहे और ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तरह हमलावरों की पहचान भी न हो पाए”.

पहचान पहले भी मुश्किल से हो पाती थी, पर अब पहचान कभी न हो सकने के इंतजाम बहुत पुख्ता ही नहीं, त्रुटीरहित डिजाईन कर लिए गए हैं. गोधरा काण्ड हो, नरोदा पाटिया काण्ड हो, गुलबर्गा सोसाईटी काण्ड हो, शोहराबुद्दीन शेख के एनकाउंटर का मामला हो, मक्का मस्जिद काण्ड हो, समझौता एक्सप्रेस विस्फोट काण्ड हो, दाभोलकर, कलबुर्गी, पंसारे, गौरी लंकेश की नृशंस हत्या हो, सहारनपुर, हाशिमपुरा, दादरी,के दंगे हों वगैरह-वगैरह. बाढ़ के बाद जब तबाही इंसानों को निगलने लगाती है तो नदी के पानी की ऊंंचाई नापना छोड़, लोगों की जान बचाने का सवाल अहम् बन जाता है.

अभी हाल ही में प० बंगाल और बिहार के दंगों में जिस “चुनावी कर्मकांड” का रिहर्सल किया गया, वह इसलिए ध्यान देने योग्य है कि भविष्य के बड़े चुनावों में, सडकों पर उन्हीं का मंचन बड़े पैमाने पर किया जाना है.

शौर्य प्रदर्शन के लिए, सामने एक दुश्मन चाहिए. हमलावर होने के लिए “हुंकार” भरने, “ललकारने”, मुकाबले के लिए “उकसाने” और दुश्मन को “इंसान नहीं, फसल समझने” की मानसिकता चाहिए. हमारे देश में ऐसे संगठन भी हैं, जिनके निशाने पर दुश्मन भी है और दुश्मन को उकसाने, इंसान नहीं फसल समझने, हुंकार भरने, ललकारने और अन्ततोगत्वा हमलावर होने की क्षमतावान प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की अच्छी खासी फ़ौज भी. इसी फ़ौज के कमांडर ने इसी वर्ष मुजफ्फरपुर में कहा था कि- “अगर जरूरत पड़ी तो देश के लिए लड़ने की खातिर आरएसएस के पास तीन दिन के भीतर ‘सेना’ तैयार करने की क्षमता है.”

मेरे पास भी इस सेनापति की बात पर भरोसा न करने का कोई आधार नहीं है. जब तक इन कार्यकर्ताओं को फ़ौज में कोई रोजगार नहीं मिलता तो क्या ये “पकौड़े” बेंचेगे ? नहीं, पकौड़े तो वे बेंचें, जो इस कौशल का विकास नहीं कर पाए हैं. देश के भीतर, देश के दुश्मनों और उनकी सम्पत्तियों की पहचान और सफाए के अभियान चलाते रहने और उनमें इन्हें खपाने में हर्ज ही क्या है ? फिलहाल सरहदों की रक्षा का काम न सही, राष्ट्रभक्तों से घर की सुरक्षा का काम तो लिया ही जा सकता है. सरकार के सामने सैकड़ों चिंताएं मुह बांंए खड़ी है, एक चिंता तो दूर हो कि वह अपने घर में कुर्सियों पर सुरक्षित है. 

वर्ष 1986 में अयोध्या में वर्षों से बंद पडी रामलला के दर्शन पूजा को सुचारू रूप से फिर चालु करने के कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार के प्रयासों पर पानी फेरने वाले, 1987 में मेरठ के हाशिमपुरा और मलियाना कांडों को देश 31 सालों बाद भी भूला नहीं है. भले ही तब के जवान आज बुढ़ापे की देहलीज पर खड़े हैं. हाशिमपुरा मोहल्ले और मालियाना गांंव के पीड़ितों के सीने पर कान रख कर उनके दर्द की पड़ताल करके तो देखिये, पर आप नहीं सुनेंगे क्योंकि वे उस वर्ग से नहीं आते जिनके सीने जन्मजात 56 इंच के ही होते हैं.

साम्प्रदायिक दंगों में आगजनी, लूट-पाट, मारपीट और भीड़ द्वारा पीट-पीट कर मार डालने की अब तक इस्तेमाल के तरीके, अब बाबा आदम के कबाड़ खाने की शोभा बढ़ाएंगे. अब दंगों की स्क्रिप्ट पहले लिख ली जाती है, योजनाबद्ध तरीके से उन्हें अमलीजामा पहनाया जाने लगा है. उनमें कई नए आयाम जैसे चिन्हित स्थान पर भीड़, हथियार, विस्फोटक सामग्री आदि इकठ्ठा करना जुड़ गए हैं, अब वे पहले से ज्यादा जटिल हो गए हैं, जिन्हें हर आदमी के लिए समझ पाना और क़ानून और शान्ति व्यवस्था के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के लिए उनकी गांंठ खोल पाना सम्भव नहीं है. समय, परिस्थितियों और स्थान विशेष के साथ दंगों की संरचना भी हर बार बदली हुई होने लगी है. पारंपरिक तौर पर होने वाले दंगों में गली मोहल्ले के पडौसी ही दंगाई हुआ करते थे. दंगों की अवधि भी छोटी होती थी और वे आसानी से शांत भी हो जाया करते थे. दंगों की नई घटनाओं में हिंसा की काली छाया अलग तरह की ही होने लगी है.

इसे समझने के लिए राम के जन्म से जुड़े रामनवमी महोत्सव पर बिहार के नवादा और पश्चिम बंगाल के रानीगंज और आसनसोल की सड़कों पर जो खेल खेला गया, उसकी संरचना को समझना जरूरी है.

बिहार में 17 और 30 मार्च को हुए दंगों के बारे में राज्य पुलिस और इंटेलिजेंस विभाग के अधिकारियों ने स्थानीय समाचार पत्रों के साथ कुछ तथ्य साझा किये थे तो कुछ को अतिसंवेदनशील बताकर नहीं भी किये थे, जिनके अनुसार- “दंगे के एक दिन पहले बड़ी मात्रा में देसी हथियार खरीदे गए थे. जिस दुकान से ये ऑर्डर दिए गए थे उसकी पहचान कर ली गई है और दुकानदार से पूछताछ की जा रही है. दंगों के बाद पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया. इनमें से एक धीरज कुमार है जो कि नालंदा ज़िले के सिलाव में बजरंग दल का कन्वीनर है. धीरज कुमार का नाम नालंदा व नवादा दो ज़िलों में दंगे भड़काने में आया है.

“दंगाइयों की भीड़ में कम से कम तीन ऐसे व्यक्ति देखे गए जो अलग-अलग तीन ज़िलों में दंगे भड़काने में शामिल थे.
इंटेलीजेंस अधिकारियों को तीन ऐसे वाहन भी मिले, जो इन ज़िलों में दंगाइयों द्वारा प्रयोग किए गए थे. इससे साबित होता है कि ये दंगे स्थानीय और एकाएक नहीं हुए थे. इन वाहनों में दो काली स्पलेंडर व एक महिंद्रा स्कॉर्पियो शामिल थी.”

पुलिस अधिकारी ने बताया कि “ये बात साबित हो चुकी है कि धीरज कुमार नालंदा और नवादा में दंगे भड़काने में शामिल था.”

झारखंड व बिहार में बजरंग दल के प्रभारी अनिल सिंह से जब पूछा गया कि “क्या धीरज कुमार बजरंग दल से संबंधित है ?” तो न उन्होंने स्वीकार किया और न ही इंकार किया. उन्होंने कहा कि आजकल हर युवा अपने आप को बजरंग दल का सदस्य बता देता है.

सिर्फ इंटेलीजेंस के सूत्र व पुलिस अधिकारियों ने ही नहीं बल्कि वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने भी प्रायोजित दंगों के बारे में बात की. औरंगाबाद जि़ले के ज़िलाधिकारी राहुल रंजन महीवाल ने बताया कि “इस बार रामनवमी में तीन चीज़े असामान्य रहीं.

“पहला, रामनवमी के करीब एक हफ्ते पहले सिर पर केसरिया रंग की पट्टी बांधे हुए काफी बाहरी लोग आने शुरू हो गए थे.

“दूसरा, इन लोगों के पास काफी संख्या में तलवारें थीं. और,

“तीसरा, जुलूस के लिए मोटरसाइकिल रैली की योजना बनाई गई थी जो कि इससे पहले कभी भी नहीं हुआ.”

इंटेलीजेंस सूत्रों ने मीडिया को बताया कि, “रामनवमी के एक महीने पहले तलवारें और कई घरों में बने छोटे धारदार हथियार आने शुरू हो गए थे. सूत्रों ने बताया कि इनमें से अधिकतर हथियार बाहर से लाए गए थे ताकि अधिकारियों की नज़रों से बचा जा सके.”

पूरे राज्य में दंगाइयों के हाथों में न सिर्फ घातक हथियार थे बल्कि वे ऐसे गाने भी गा रहे थे ताकि मुस्लिम समुदाय को भड़काया जा सके. मुस्लिम क्षेत्रों से गुजरते वक्त भड़काऊ गाने गाए जा रहे थे. किसी एक समुदाय को अपमानित करने वाले इस तरह के गानों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म व यूट्यूब पर पॉपुलर वीडियो के रूप में भी प्रमोट किया गया

यानी दंगों की लिखी स्क्रिप्ट और तय योजना के अनुसार, शौर्य प्रदर्शन, ललकारना, उकसाना और फिर इन सब बातों से गुसाए उन लोगों के साथ आमादा फसाद हो जाना, जो पहले से इस अनहोनी से निबटने को कतई तैयार नही हैं. जाहिर है, नुकसान उन्ही लोगों का होना है जो उन गली-मोहल्लोंं के निवासी हैंं, जिनमें दंगे भड़काए जाते हैं.

अब एक सरसरी नजर पश्चिम बंगाल के रानीगंज और आसनसोल में हुए दंगों की बारीकियों पर भी डालते हैं–रानीगंज इलाक़े के एक पुलिस अधिकारी और स्थानीय पत्रकारों ने नाम न बताने की शर्त पर एक प्रतिष्ठित न्यूज चैनल को बताया कि “रामनवमी के जुलूस में जो गाने बजाए जा रहे थे वो वाक़ई भड़काने वाले थे. ज़्यादातर गाने पाकिस्तान विरोधी शब्दों के साथ शुरू होते हैं लेकिन उसके बाद उनका पड़ोसी मुल्क़ से कोई लेना-देना नहीं होता. जय श्री राम का जाप करते-करते वो कहने लगते हैं कि ‘टोपीवाला भी सिर झुका कर बोलेगा जय श्री राम, जय श्री राम’ और ‘जिस दिन खौला खून मेरा, दिखला देंगे औक़ात तेरी, फिर तो हम नहीं बोलेंगे, बस बोलेगी तलवारें मेरी.” इन शब्दों का क्या मतलब है कि टोपी वाला भी जय श्रीराम का जाप करेगा ?

“हां, हमने गाने बजाए. वो सभी गाने पाकिस्तान विरोधी गाने थे. लेकिन उनमें से किसी में भी भड़काऊ नारे नहीं थे.” लेकिन जब उनसे पूछा गया कि “रामनवमी और पाकिस्तान विरोधी गानों का क्या मेल है ?” तो उन्होंने कहा, “हम अपनी देशभक्ति और राष्ट्रवादी सोच को ज़ाहिर करने के लिए कोई भी मौक़ा खाली नहीं जाने देना चाहते. अगर भारत में पाकिस्तान विरोधी गाने नहीं बजेंगे, तो फिर कहांं बजेंगे ?” पश्चिमी बर्धमान ज़िले में भाजपा के प्रवक्ता प्रशांत चक्रवर्ती का कहना है कि “मुझे नहीं पता कि रामनवमी के जुलूस में इस तरह के गाने बजे थे या नहीं.”

दंगों को इतने बड़े पैमाने पर और योजनाबद्ध तरीके से नियोजित और ताबड़तोड़ अंजाम दिया जाता  है कि स्थानीय प्रशासन उनसे निपटने में पूरी तरह पंगु साबित होता है. एक बात और महत्वपूर्ण है कि बाहरी व्यक्तियों का जमावड़ा बहुत बड़ा होता है, जिनको न तो स्थानीय लोग पहचानते हैंं और न प्रशासन उनकी शिनाख्त कर पाता है. बहुत सर खपाने के बाद कुछ चुनिंदा नेताओं की पहचान हो भी जाय तो अदालतों में उनकी संलिप्तता सिद्ध कर पाना टेढ़ी खीर ही साबित होती है. अक्सर कुछ पुलिस वाले भी दंगाईयों का साथ देने लगते हैंं. एक अधिकारी ने इसे दबी जुबान से स्वीकार तो किया परन्तु कहा कि “पुलिसकर्मी भी तो आखिर इसी समाज का हिस्सा हैं, भावनाओं में बह जाना स्वाभाविक है.”

कुल मिलाकर सारांश यह है कि शौर्य प्रदर्शन के लिए बहुत सोच-समझ कर सामने एक स्थायी दुश्मन खडा कर दिया गया है. हमलावर होने के लिए घातक हथियारों और विनाशकारी विस्फोटकों की मौके पर सुनिश्चित और सुरक्षित उपलब्धता का इंतजाम, “हुंकार” भरने, “ललकारने” के लिए धार्मिक और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े नारे, मुकाबले के लिए “उकसाने” के लिए म्यूजिक सिस्टम और उस पर तेज आवाज में गानों का बजाना, हथियारों का लहराना, दुश्मन को “इंसान नहीं, फसल समझने” की मानसिकता वाले उन्मादी युवाओं की तैयार फ़ौज की व्यापक उपलब्धता ने दंगों को न सिर्फ जटिल ही बना दिया है बल्कि क़ानून के व्यवस्थापकों के लिए इसकी गांंठ खोल पाना लगभग असंभव बन गया है तो वहीं अदालतों में दोषियों को सजा दिला पाना और भी दुष्कर.

कडवी सच्चाई तो यह भी है कि जिस वर्ग को दुश्मन बना के खड़ा किया गया है, ऐसी परिस्थितियों से निबटने के लिए बहुत नहीं तो थोड़ी बहुत तैयारी तो वो भी करता ही है. ये बात दूसरी है कि इसे आत्मरक्षार्थ की गयी तैयारी का नाम दे दिया जाय.

-विनय ओसवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विशेषज्ञ
सम्पर्क नं. 7017339966

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