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दिशाहीन, आत्मनिर्भर और लाशों का नया राष्ट्रवाद

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 24, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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दिशाहीन, आत्मनिर्भर और लाशों का नया राष्ट्रवाद

महामूर्ख, असभ्य, गालीबाज, बेशर्म, बेहया मोदी ने अब हम सबको दिशाहीन आत्मनिर्भर बना दिया

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कृष्णन अय्यरकृष्णन अय्यर

अम्बानी मीडिया मैदान में उतर गया. विपक्ष के प्रवक्ताओं पर जबरदस्त रूप से आक्रामक होकर पूछ रहा है : मोदी पर सवाल क्यों ? क्या मोदी महामारी लाया ? बेशक मोदी महामारी नहीं लाया पर खुद की बुलन्द मूर्खता से महामारी लाने के रास्ते खोल दिए. मोदी पर सवाल में दिक्कत क्या है ? हम तो राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ पर सवाल से नहीं बौखलाते ? मोदी पर सवाल क्यों ? इसका जवाब तथ्यात्मक है. मोदी और बीजेपी के शब्दों में जवाब है –

  1. वर्ल्ड इकोनॉमीक फोरम, दावोस, 28 जनवरी 2021, को दुर्भाग्य से भारत का सर्वकालीन सर्वोच्च मंदबुद्धि प्रधानमंत्री मोदी ने सम्बोधित करते हुए कहा : हमने महामारी पर विजय पा ली है और पूरी दुनिया को महामारी के खिलाफ लड़ने में सहायता की है. तो मोदी, जब महामारी को हरा ही दिया था तो ये 3 गुना रफ्तार से लौटी कैसे ? जवाब तो मोदी से ही पूछा जाएगा.
  2. फरवरी 2021, बीजेपी ने प्रस्ताव पारित किया और बोला : बीजेपी गर्व से कहती है कि महामानव मोदी के नेतृत्व में भारत ने महामारी को पराजित कर दिया. एक विजयी राष्ट्रनायक मोदी पर पूरे विश्व को गर्व है. सड़ेले लबनचुसो, क्या अमेरिका/यूरोप के किसी नेता ने कभी ऐसी वैश्विक मूर्खता की ? सवाल पूछने पर डरता क्यों है मोदी ? विश्वगोबर इतना कायर क्यों है ?
  3. देश मे ‘डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट’ लगा हुआ है. इस कानून का चीफ मोदी है. इस कानून के अनुसार देश में हर बंदोबस्त की जिम्मेदारी मोदी की है. TV पर से मोदी का चेहरा गायब कर देने से मोदी बच कर जिम्मेदारी से भाग नहीं पाएगा. राहुल गांधी की बात सच हो कर रहेगी. भाग मोदी भाग, जितना भाग सकता है भाग. तेरे भागने की लिमिट और देश के धैर्य की लिमिट, दोनों का इम्तिहान है.

तकलीफ होती है जब दिखता है कि देश का प्रधानमंत्री महामूर्ख, असभ्य, गालीबाज, बेशर्म, बेहया है. The Telegraph ने आज इन सारे शब्दों के लिए एक शब्द लिखा है : Ingratitude यानी कृतघ्न. मैं कहता हूं, ‘Inborn Ingratitude’ यानी पैदाइशी कृतघ्न. ये संघी है, लाशजीवी है.

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‘मोदी के दिमाग का स्क्रू ढीला हो गया है’- मोदी

संघी दुम दबा कर भागने में PhD है. भाग गया मोदी महामारी के परिदृश्य से. बस दुम नहीं दाढ़ी है और दाढ़ी भी दुम जैसी है. दुमछल्ले एंकर बता रहे हैं कि मोदी ने सबको इंजेक्शन देने का वादा निभा दिया. मोदी ने डॉ. मनमोहन सिंह साहब को सड़कछाप भाषा में जवाब दिलवाया पर MIT, अमेरिका के प्रोफेसर विपिन नारंग साहब तो मोदी को फ्रॉड बता रहे हैं. प्रोफेसर साहब कहते हैं :

  • मोदी को मालूम है कि भारत में इंजेक्शन का प्रोडक्शन जरूरत के आसपास भी नहीं है और निकट भविष्य में पर्याप्त इंजेक्शन मिलने की कोई संभावना भी नहीं है. गरीबों की मौत तय है और मोदी राज्यों के हाथों में जिम्मेदारी डाल कर भाग गया. (MIT पाकिस्तानी नहीं है).
  • क्या करना था मोदी को ? 8 बजे TV पर आना था और कहना था कि ये केंद्र की जिम्मेदारी है कि सबको इंजेक्शन मिलेगा. मैं बहुत सोच समझ कर लिख रहा हूं : ये नोटबन्दी की तरह इलाजबन्दी है. अगले 1 साल तक इंजेक्शन मिलना सहज नहीं होगा.
  • 7 अप्रैल, 2021 को जब राहुल गांधी बोले कि देश के हर व्यक्ति को इंजेक्शन लगना चाहिए तब मोदी ने कहा था कि ऐसा असम्भव है. अम्बानी मीडिया ने राहुल गांधी को गन्दी गालियां दी थी. सच्चाई आज सामने है.

संकट के वक्त दिल और दिमाग मे सामंजस्य होना जरूरी है. पर मोदी के दिल में नफरत और दिमाग में दंगा है. इसकी सोच में गटर और गोबर है. देश को ‘मोदी गटर’ से बाहर निकलना पड़ेगा. नफरत और धर्मांधता से दूर रहिए. ये ‘एन्टी मोदी इंजेक्शन’ है. केंद्र टोटल इंजेक्शन प्रोडक्शन का 50% खुद के पास रखेगा. पर इसका कोई लॉजिक नहीं है ठीक वैसे ही जैसे इंजेक्शन के 3 प्रकार के मूल्यों का कोई लॉजिक नहीं है.

भारत राज्यों में बसता है और साथ में केंद्रशासित प्रदेश (UT) है. केंद्र नाम का कोई राज्य नहीं है पर तर्क के लिए UT को केंद्रीय राज्य मान लीजिए तो 8 UT में लगभग 3.25 करोड़ भारतीय रहते हैं. यानी केंद्र को ज्यादा से ज्यादा 4 करोड़ इंजेक्शन चाहिए. केंद्र अगर बफर 1 करोड़ जोड़ ले तो भी 5 करोड़ से ज्यादा इंजेक्शन की आवश्यकता नहीं है. इस वक्त राज्यों को ज्यादा से ज्यादा इंजेक्शन की जरूरत है.  वैसे भी उनसे 400₹ ले रहे हैं तो फिर सप्लाई में कमी क्यों की जा रही है ? पैसा भी डबल लोगे और कोटा भी बनाओगे ? ये तो गुंडागर्दी है.

मोदी क्या इंजेक्शन का अचार डालेगा ? 5 करोड़ इंजेक्शन केंद्र रखे वो भी स्टेप बाई स्टेप. इस वक्त राज्यों की सप्लाई घटाना एक आपराधिक कदम है. अदार पूनावाला बोल रहे हैं कि 2-3 महीने में प्रोडक्शन स्वाभाविक होगा. यानी 2-3 महीने बाद ही राज्यों को उचित संख्या में इंजेक्शन मिलेंगे. अगर इसका भी 50% मोदी रख लेगा तो हालात ऑक्सीजन वाले होना तय है. इंजेक्शन का कोटा सिस्टम बना देंगे और हाहाकार मच जाएगा.

मोदी कोई राजा वगैरह नहीं है. देश की जनता का अदना सा नौकर है पर मोदी का आचरण एक मूर्ख, दाम्भिक और मंदबुद्धि वाला है. भारत में अबतक कोई इंजेक्शन पॉलिसी नहीं बनी है. सारा काम मोदी की मूर्खता से किया जा रहा है. भारत में हर साल 40 करोड़ महिलाओं और बच्चों को 8 रोगों के इंजेक्शन मुफ्त में लगाए जाते हैं पर केंद्र और राज्य का कोई कोटा नहीं है. हर राज्य को उसकी जरूरत से ज्यादा इंजेक्शन मिलते हैं. मोदी को चाहिए कि कांग्रेस की बनाई पॉलिसी को अपनाए. कांग्रेस की पॉलिसी सदियों से प्रामाणिक है.  क्या मोदी चाहता है कि त्रासदी का रूप हिंसक हो ? मोदी की मूर्खता अब जनता की जान ले रही है.

राष्ट्रवाद का तमाशा लाशों का जुलूस बन चूका है
  • जनवरी 2021, मोदी का भाषण : मितरों, मैंने भारत को ‘फार्मेसी ऑफ वर्ल्ड’ बना दिया. आज क्या दिख रहा है : ‘क्रेमाटोरियम ऑफ वर्ल्ड.’
  • हर्षवर्धन ने उसी वक्त घोषणा कि भारत महामारी को खत्म करने के लिए वैश्विक युद्ध का नेतृत्व कर रहा है (मटर छील कर). हर्षवर्धन भारत का ‘उभरता हुआ नया जोकर’ है.
  • RBI ने तड़का लगाते हुए बोला कि महामारी के कर्व को ‘बेकहम की तरह घुमा’ दिया गया है. ‘डरावना ठंढ़ अब चमकदार ग्रीष्म’ है. बैंकिंग के अलावा RBI आजकल हर काम करती है.

राष्ट्रवाद का नतीजा क्या हुआ ?

  • मोदी TV से गायब हो गया और सारी जिम्मेदारी छोड़ कर बिल में जा छुपा.
  • अदार पूनावाला का अब कोई ज्यादा इंटरेस्ट नहीं रहा. उन्हें 15 डॉलर में माल बेचने का आर्डर था पर आर्डर पूरा नहीं कर पाए. मोदी ने 50 मिलियन इंजेक्शन खरीदने का वादा किया था, पर खरीदा केवल 16 मिलियन. (He is frustrated. पूनावाला को घाटा हुआ है.)
  • विदेशियों को अनुमति नहीं मिली तो उनका इंटरेस्ट भी खत्म. वैसे भी अमेरिका/यूरोप ने अब एक्सपोर्ट पर बैन लगा दिया है तो विदेशी कितना लोकल प्रोडक्शन करेंगे इस पर ही शक है (केवल रूस साथ है.)
  • चिदम्बरम साहब और राहुल गांधी ने बजट में कम से कम 70,000 करोड़ की जरूरत बताई थी पर बजट है केवल 35,000 करोड़. सरकारी खजाना खाली है.
  • राज्यों के पास पैसे नहीं है क्योंकि GST का पैसा ही नहीं दिया और इस वक्त कोई भी इंजेक्शन कम्पनी उधार नहीं देगी.
  • कुल मिला कर 2021 में 30% जनसंख्या को भी इंजेक्शन लगना मुश्किल लगता है. अगर महामारी देवी/देवता खुद शांत हो जाए तो अलग बात है. वरना जो गया वो तो जी गया और जो बच गया उसका जीवन हराम हो गया.
  • भारत को हिरोशिमा/नागासाकी बना डाला. अब मोदी की रिपैकेजिंग और रिलांचिंग होगी. एक नया अवतार, एक नया राष्ट्रवाद और लाशों का एक नया जुलूस.
प्रवासी और गरीब मजदूर

महामारी के दूसरे चरण में सबसे ज्यादा उपेक्षित है प्रवासी मजदूर. और ये गरीब मजदूरों ने खुद कमाया है. गरीब, असहाय मजदूरों ने अपनी नियति खुद बनाई है. याद कीजिए, पिछले साल जब महामारी का प्रकोप बढ़ रहा था, तब क्या हालात थे ? ये लोग 1200 Km तक भूखे प्यासे पैदल चले. रास्तों पर गर्भवती माताओं ने बच्चों को जन्म दिया. बुजुर्ग रास्तों पर मर गए. एक बच्ची ने साईकल पर अपने पिता के साथ 1000 Km का सफर किया. सूटकेस पर बच्चे को घसीटती मां और मरी हुई मां के साथ खेलता बच्चा जैसे हृदयविदारक दृश्य पूरी दुनिया ने देेेखा.

पर इस बार ? नि:शब्द पलायन हो रहा है. फिर से भूख, बेरोजगारी इन मजदूरों के जीवन को ग्रास कर रही है. पर मीडिया, नेता कोई इन पर नहीं बोल रहा है और नाही दिखा रहा है क्योंकि अब मजदूर का कोई महत्व नहीं रहा.

  • पिछली बार इन्हें खाना खिलाने की प्रतियोगिता का दौर चल रहा था. बीजेपी बता रही थी उसके 25 करोड़ कार्यकर्ता 2 टाइम का खाना खिला रहे थे. केजरीवाल का ‘जनता किचन’ दिखाया जा रहा था. कांग्रेस ने 1000 बसें भेजी थी. NGO वगैरह मेहनत कर रहे थे. अबकी बार ऐसा कुछ नहीं है. पर ऐसा क्यों हुआ ?
  • बीजेपी को पता चल गया कि भूख, प्यास, बेरोजगारी कोई मुद्दा नहीं है. चुनाव के वक्त धर्म इन मजदूरों के लिए काफी है. मीडिया को समझ आ चुका है कि कोई कितनी भी सेवा कर ले ये मजदूर एक रोबोट बन चुके हैं. इन्हें नफरत का इंजेक्शन लगते ही ये एक्टिव हो जाते हैं. तो अब राजनैतिक दल/मीडिया केवल इनकी मानसिकता पर फोकस रखते हैं. इनके हालात से कोई सरोकार नहीं है क्योंकि ये मजदूर खुद के हालात नहीं बदलना चाहते. बीजेपी काफी खुश है इस पूरे मसले से.
  • बाकी विपक्षी दलों ने बिहार चूनाव से सीखा की 5000 Km पैदल चल कर भी ये गरीब मजदूर धर्म/नफरत के बाहर नहीं आ सकते तो फिर इतना ध्यान क्यों देना है ? अबकी बार ज्यादातर धार्मिक संस्थान भी भोजन सेवा से दूर है क्योंकि समय आने पर ये मजदूर जिनका खाते हैं उनका ही विरोध करते हैं.

बीजेपी/आरएसएस यही तो चाहती थी. समाज का एक बड़ा हिस्सा धर्म के नाम पर बाकी समाज से कट जाए, जितनी भीख मिले उसमें खुश रहे. असल में इन प्रवासी मजदूरों ने अपना वजूद खत्म कर लिया और जिसका कोई वजूद नहीं उसकी कौन सुनेगा ? प्रवासी मजदूरों से मुझे पूर्ण सहानुभूति है पर समाज का सबसे जीवट हिस्सा अपनी पहचान खो चुका है. दिशाहीन चलते रहना ही अब इनकी नियति है. ये अब आत्मनिर्भर हैं.

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