
परिचय : भारतीय क्रांति में भ्रमित निम्न बुर्जुआ वर्ग
वर्ग-आधारित समाज की शुरुआत से ही, मानवीय जीवन के विभिन्न पहलुओं (सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, जैविक आदि) में संकट उभरने लगे हैं. जब पूंजी का शासन संस्थागत रूप ले लिया, तो ये संकट और अधिक गंभीर होने लगे. विश्व पूंजीवाद के मौजूदा दौर में संकट एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है; असल में यह पूंजीवाद के अंतर्निहित विरोधाभास का परिणाम है. पूंजीवाद ‘व्यक्तिगत स्वामित्व’ (जहां मानवीय श्रम से बनी चीजों पर पूंजीपति का कब्जा होता है) और ‘सामूहिक उत्पादन’ (जहां मजदूर मिलकर उत्पादन प्रक्रिया को अंजाम देते हैं) के मॉडल पर आधारित है. यही बुनियादी विरोधाभास आज के सभी संकटों की जड़ है—चाहे वह शेयर बाजार हो, डेटा बाजार हो, खनन उद्योग, जमीन, औद्योगिक इकाइयां या रियल-स्टेट बाजार हों. ये संकट अर्थव्यवस्था, समाज और व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं और लोगों की मानसिक व शारीरिक क्षमताओं को आकार देते हैं. इसका नतीजा यह होता है कि व्यक्ति उत्पादन प्रक्रिया से अलग-थलग (alienated) महसूस करने लगता है और सामाजिक व प्राकृतिक संरचनाओं में उसकी भागीदारी कम हो जाती है. इसी स्थिति को ‘अलगाव’ (Alienation) कहा जाता है.
कॉमरेड मार्क्स ने कहा था कि अलगाव केवल अंतिम परिणाम में ही नहीं, बल्कि उत्पादन की प्रक्रिया और खुद उत्पादक गतिविधि में भी दिखाई देता है. मजदूर अपने काम में सहज महसूस नहीं करता; वह काम को केवल अपनी अन्य जरूरतों को पूरा करने का एक जरिया मानता है. मजदूर के लिए काम एक ऐसी गतिविधि है जो उसके अपने ही खिलाफ होती है—जो उससे स्वतंत्र है और जिस पर उसका अपना कोई अधिकार नहीं है. इस तरह का ‘अलगावपूर्ण श्रम’ मनुष्य को उसकी अपनी प्रजाति (species) यानी अन्य मनुष्यों से भी दूर कर देता है. मानवीय-जीवन, उत्पादक-जीवन या जीवन-निर्माण की प्रक्रिया महज मजदूर के व्यक्तिगत अस्तित्व को बनाए रखने का साधन बनकर रह जाती है, और मनुष्य अपने ही साथी इंसानों से कट जाता है. अंततः, प्रकृति भी मनुष्य से दूर हो जाती है, और इस तरह वह अपने ‘अकार्बनिक शरीर’ (inorganic body) को खो देता है. यानी प्रकृति से भी कट जाता है.
उत्पादन प्रक्रिया में शामिल व्यक्ति का ऐसा मानसिक संकट मिडिल क्लास में भी दिखाई देता है. भारत में कोरोना संकट के दौरान लाखों मज़दूर और मिडिल क्लास के लोग अपने गांवों की ओर चले गए. महामारी ने समाज की उस अंदरूनी दरार को उजागर कर दिया जो ऊंचे हाईवे, एक्सप्रेस-वे और सड़कों के नीचे छिपी हुई थी. मज़दूर वर्ग और मिडिल क्लास का एक हिस्सा अपनी काम की जगहों से गांवों की ओर चला गया; इस दौरान कई लोगों की मौत भी हो गई. इस पलायन की क्या वजह है ? क्या यह सामाजिक अलगाव नहीं है ? किसी जगह से अपनापन महसूस न होने के कारण वे खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे. साफ़ है कि शहर मज़दूरों के लिए नहीं हैं; ये तो बस ताकत (पैसा) कमाने की जगह है ताकि बाद में गांवों में वापस लौटा जा सके. लेकिन शहर मिडिल क्लास के लोगों के लिए भी जुड़ाव की जगह नहीं हैं. मिडिल क्लास के लिए शहर एक आदर्श जगह है. मिडिल क्लास शहर को पाना चाहता है, लेकिन शहर उसे कभी पूरी तरह अपनाता नहीं है; इस क्लास का ऊपरी हिस्सा हमेशा दिखावटी शहरी शासकों की ‘रिज़र्व आर्मी’ (अतिरिक्त श्रम शक्ति) बना रहता है.
मिडिल क्लास के निचले और मध्यम हिस्से के बहुत से लोग, जिनके पास नौकरी नहीं है या जो लगभग 20 घंटे काम करके बुरी तरह शोषित होते हैं, वे खुद को संभाल नहीं पाते; वे बेरोज़गार या बिना किसी सार्थक काम के लगे लोगों का एक बड़ा वर्ग बनाते हैं. वे समाज और पारिवारिक संस्थाओं से अलग-थलग पड़ जाते हैं; परिवार की उम्मीदें और साथ ही समाज या गांवों में सामंती दबदबा बनाए रखने की ज़रूरत मिडिल क्लास का दम घोंट देती है. आखिरकार, व्यक्ति अपनी ही कमियों को दोष देता है और परिवार व समाज को खुश न कर पाने की अपनी अक्षमता से घबरा जाता है. अपनी सभी नाकामियों के लिए व्यक्ति खुद को ही दोषी मानता है. अपनी तकलीफ़देह स्थिति के लिए खुद को दोष देने का यह तर्क, पूंजीवाद की सबसे बुनियादी और पुरानी सोच है.
यह लोगों के गुस्से को पूंजी-केंद्रित विश्व व्यवस्था से हटाकर खुद की ओर मोड़ देता है. जीवन में खालीपन और निरर्थकता का सवाल बुर्जुआ नैतिकता का विषय बन जाता है, जिससे व्यक्ति कई तरह की मानसिक और शारीरिक बीमारियों का शिकार हो जाता है. व्यक्ति मदद के लिए तड़पता है लेकिन कोई आगे नहीं आता; बुर्जुआ नैतिकता परेशान वर्ग के लिए कोई समाधान नहीं है. मध्यम वर्ग की अनिश्चित स्थिति उसकी राजनीतिक स्थिति के कारण है. अर्थव्यवस्था में जो कुछ भी होता है, वह राजनीति में भी झलकता है. मध्यम वर्ग का एक हिस्सा मजदूर वर्ग के संघर्ष और उसकी पार्टी से जुड़ता है, जिससे यह हिस्सा अपनी पहचान बनाए रखता है और अपनी मुक्ति की ओर बढ़ता है. वहीं, इसका ऊपरी हिस्सा उदारवादी बुर्जुआ प्रचार से प्रभावित होकर ड्रग्स, सुपरमार्केट, सेक्स आदि में सुकून ढूंढता है. यह शासक वर्गों के प्रचार से इतना पंगु हो जाता है कि उसे कम्युनिस्ट पार्टी में सर्वहारा वर्ग की धीमी लेकिन लगातार बढ़ती ताकत में कोई उम्मीद नहीं दिखती. राजनीतिक रूप से तटस्थ होने का दिखावा करते हुए यह शासक वर्ग की पार्टियों का साथ देता है; वैचारिक रूप से लचीला होने का दावा करते हुए भी यह शासक वर्ग और उसकी पार्टियों की विचारधारा और राजनीति का ही पालन करता है, लेकिन फिर भी उसे कुछ कमी महसूस होती है. यह ‘गायब कड़ी’ (missing link) उसका पीछा करती रहती है और वह कभी भी पूरी तरह से शासक वर्गों में घुल-मिल नहीं पाता. जीवन के हर क्षेत्र में अनिर्णय की स्थिति ही इस वर्ग की पहचान है.
चीन में पूंजीवादी बदलाव के बाद यह स्थिति और भी मजबूत हो गई. जब से चीन में संशोधनवादी सत्ता में आए हैं, मध्यम वर्ग का एक हिस्सा शासक वर्ग के बहुत करीब आ गया है और साम्यवाद तथा उसकी अनिवार्यता के बारे में झूठ फैला रहा है. यह मध्यम वर्ग के उस चरित्र की खासियत है जिसे कॉमरेड मार्क्स ने लासाल के मामले में पहचाना था, और ऐसी प्रवृत्तियों के खिलाफ कॉमरेड लेनिन और कॉमरेड माओ ने एक सच्ची बोल्शेविक पार्टी बनाने के लिए संघर्ष किया था.
मुश्किल समय में, जब हमारा आंदोलन बहुत कमज़ोर हो जाता है, तो मध्यम वर्ग ही सबसे पहले मज़दूर वर्ग की विचारधारा वाले आंदोलन से दूर भागता है और बुर्जुआ विचारधारा का गुलाम बन जाता है. यह पलायन क्रांतिकारी भावना की कमी और मज़दूर वर्ग जैसा जीवन जीने में असमर्थता को दिखाता है. अवसरवादी (छोटे बुर्जुआ उदारवादी बुद्धिजीवी) लोग बौद्धिक ईमानदारी भी नहीं दिखाते; अपनी कमियों का विश्लेषण करने के बजाय, वे उस सिद्धांत और राजनीतिक लाइन पर ही शक करने लगते हैं जिसे वे कुछ समय पहले तक अपना रहे थे. आखिर में, वे कुछ पुराने और बेकार सिद्धांतों के साथ सामने आते हैं, जिनके ज़रिए वे MLM के क्रांतिकारी सिद्धांत पर हमला करते हैं और प्रतिक्रियावादी ताकतों के साथ मिल जाते हैं.
भारतीय संदर्भ में, सामंतवाद और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ क्रांतिकारी आंदोलन खासकर भारतीय समाज की ब्राह्मणवादी सामंती व्यवस्था के ख़िलाफ़, ने छोटे बुर्जुआ वर्ग को प्रेरित किया; उन्हें इस आंदोलन में पितृसत्तात्मक परिवार, श्रेष्ठता की भावना, अंधविश्वास, जाति और नाते-रिश्तेदारी की रूढ़िवादी जकड़न से आज़ादी की उम्मीद दिखी. यह वह दौर था जब देश भर के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से छोटे बुर्जुआ वर्ग के बहुत से लोग सामंतवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन में शामिल हुए. छोटा बुर्जुआ वर्ग सामंतवाद की बेड़ियों से आज़ादी और अपनी पसंद की कला और राजनीति को अपनाने की अपनी इच्छा को, समाजवाद और अंततः साम्यवाद की ओर बढ़ने के लिए NDR (नव जनवादी क्रांति) को पूरा करने की मज़दूर वर्ग की ज़रूरत से जोड़ सका, जिसके परिणामस्वरूप क्रांतिकारी आंदोलन में मध्यम वर्ग की भारी भागीदारी हुई.
लेकिन जब क्रांतिकारी आंदोलन कमज़ोर पड़ गया, उसके सदस्य शहीद हो गए और उसके नियंत्रण वाला इलाका सिमट गया, तो ये निम्न-बुर्जुआ वर्ग के लोग ही सबसे पहले यह कहने लगे कि जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं वह थकाऊ और लंबा है, भविष्य अंधकारमय है और मुझे तो बस तबाही ही दिखाई देती है. वे अपनी राय अनुभव के आधार पर बनाते हैं, और वह भी अपने निजी अनुभवों के आधार पर. सैद्धांतिक पहलू को दबा दिया जाता है और भुला दिया जाता है; अब उनके पास बस हार का अनुभव होता है, जिसके आधार पर वे किसी भी ऐसे व्यक्ति को रोकने की कोशिश करते हैं जो पुरानी चीज़ों को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहा हो. वे क्रांतिकारियों का साथ छोड़ देते हैं. सिद्धांत को जो कार्रवाई के लिए एक गाइड का काम करता है और आंदोलन या घटनाक्रम के आगे के विकास और सफलता को समझने का विज्ञान है—किनारे कर दिया जाता है. आखिर में हमारे सामने एक ऐसा वर्ग बचता है जो एक तरफ तो मौजूदा शासक वर्ग की व्यवस्था से अलग-थलग पड़ गया है, और दूसरी तरफ सुकून पाने के लिए क्रांतिकारी आंदोलन का साथ छोड़ चुका है. इस जीवन का सचेत हिस्सा क्या होगा ? उनकी तसल्ली किस विचारधारा पर टिकी होगी ? ज़ाहिर है, इसका जवाब ऐसी विचारधारा है जो लक्ष्य को तो नकारती है, लेकिन बहुत चालाकी से शासक वर्ग की विचारधारा के वर्चस्व के लिए जगह बना देती है.
ये अपने सिद्धांत समय और जगह के हिसाब से बदलते रहते हैं; कहीं ये माखवादी (अनुभववादी) बन जाते हैं, तो कहीं ‘अंबेडकरवादी’ (Ambedkrite), और आगे चलकर ‘उत्तर-आधुनिकतावाद’ (post-modernism) का रूप ले लेते हैं. मौजूदा भारतीय और वैश्विक राजनीतिक हालात में, उत्तर-आधुनिक विचारधारा ही छोटे बुर्जुआ वर्ग (petty bourgeoisie) के प्रतिक्रियावादी हिस्से का मार्गदर्शन करती है और उसे मज़बूत बनाती है. अवसरवादी लोग फूको (Foucault) और अन्य उत्तर-आधुनिक विद्वानों व प्रतिक्रियावादियों की बातों का हवाला देते हैं. लेनिन और माओ के समय के अवसरवादी ‘माखवादी’ या ‘कन्फ्यूशियस’ विचारधारा को मानने वाले थे. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज के सभी अवसरवादी उत्तर-आधुनिक विचारों और सोच को मानने वाले हैं.
अवसरवादियों की दुविधा और उत्तर-आधुनिक सिद्धांतकारों द्वारा वस्तुनिष्ठ सत्य (objective truth) व ‘मेटा-नैरेटिव’ (meta-narrative) (यानि पूरी दुनिया को समझने का दावा करने वाली किसी एक विचारधारा के अस्तित्व जैसे मार्क्सवाद) को नकारना, अवसरवाद और उत्तर-आधुनिक विचारों के बीच एकता का सबसे बड़ा आधार बनता है. साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजी को उत्तर-आधुनिक विचारों और सोच के रूप में एक बहुत अच्छा सहयोगी मिल गया है. यह गठबंधन बहुत मज़बूत है; पार्टी के भीतर भी, दो विचारधाराओं के बीच का संघर्ष मुख्य रूप से उत्तर-आधुनिक विचारों और सोच के विरोध पर केंद्रित है.
अगस्त 2024 के पोलित ब्यूरो प्रस्ताव में उत्तर-आधुनिकतावाद को आंदोलन को पीछे धकेलने वाले कारकों में से एक माना गया है. इसलिए, हमारे लिए यह ज़रूरी हो गया है कि हम पार्टी के भीतर उत्तर-आधुनिकतावाद के प्रभाव को पहचानें और समझें कि अवसरवादी इससे अपनी सैद्धांतिक और राजनीतिक ताकत कैसे हासिल करते हैं.
हमारी पार्टी ने पीपुल्स वार PW-20 अंक में उत्तर-आधुनिकतावाद पर एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें संगठन के भीतर उत्तर-आधुनिकतावाद के विभिन्न रुझानों और साथियों पर इसके असर को उजागर किया गया था. लेख में बताया गया था कि हमारी पार्टी पर उत्तर-आधुनिकतावाद का हमला राज्य द्वारा किए जा रहे बड़े मनोवैज्ञानिक हमले का ही एक हिस्सा है. लेख में यह भी कहा गया था कि वैचारिक भूमिका के अलावा, उत्तर-आधुनिकतावाद शासक वर्गों का एक ऐसा राजनीतिक हथियार है जिसका इस्तेमाल सर्वहारा वर्ग को उसकी पार्टी से वंचित करने के लिए किया जाता है. ऐसे समय में जब हमारी पार्टी अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद के खिलाफ़ तीखा राजनीतिक-वैचारिक संघर्ष कर रही है, यह पहचानना बहुत ज़रूरी हो जाता है कि शासक वर्ग की वे कौन-सी प्रमुख विचारधाराएं हैं जो अवसरवाद को बनाए रखने में मदद करती हैं.
क्रमशः …
- जून, 2026, ‘maoist road’ का हिन्दी अनुवाद
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