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इलाहाबाद शहर के वास्तविक संस्थापक थे बादशाह अकबर

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 9, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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इलाहाबाद शहर के वास्तविक संस्थापक थे बादशाह अकबर

इलाहाबाद शहर के मूल संस्थापक अकबर थे. अकबर की देन से इलाहाबाद आज भी जिंदा है. मैं इलाहाबादियों से पूछता हूं आज भी गंगा यमुना की बाढ़ से शहर को कौन बचाता है ? अगर अकबर का बनवाये बांध न हो तो आज भी इलाहाबाद का अस्तित्व एक बरसात ही है.

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जो इलाहाबाद को जानते हैं मैं उनसे पूछता हूं अकबर के बांध के पहले इलाहाबाद में आबादी की संभावना कैसी रही होगी ? गंगा-कछार के धरातल से भी नीचे है अल्लापुर, अलोपीबाग, बैरहना और तुलारामबाग टैगोरटाउन का धरातल. सिविललाइंस कटरा और मम्फोर्डगंज का कुछ हिस्सा ऊंचा है. भारद्धाज आश्रम और आनंद भवन के आसपास भी कुछ ऊंचे भूभाग हैं. यहां तब भी मुनियों के आश्रम रहे होंगे लेकिन आबादी का कहीं कोई जिक्र नहीं है.

इलाहाबाद वालों, जो आपको दो महान नदियों की बाढ़ की विभीषिका से बचाता है वह निर्माण हुमायूं के पुत्र अकबर का है, दारागंज से एलनगंज के बीच लगभग 2 किलोमीटर का बांध, जिसे आप अब केवल बांधरोड कहते हो. दूसरी ओर जमुना के तट को बांधा.

अकबर के पहले के मध्यकाल में उस इलाके में शासन और सत्ता के केन्द्र कड़ा, मानिकपुर, जौनपुर और चुनार थे. अकबर ने संगम पर एक मजबूत किला बनवाकर कड़ा और कोसम की जगह जंगलों, वन और डूब वाली भूमि पर एक नगर संभव किया.

जिसे भी मेरी इस स्थापना पर आपत्ति हो वह बताए कि बांधों का चौतरफा घेरा जब न था तो गंगा का पानी बघाड़ा वाले कछार से और जमुना की ओर से शहर में दाखिल होने से कौन रोकता था ?

आप नाम बदलो हारे हुए लोगों और उनके नगरों के नाम बदले जाने की एक सामंती परम्परा रही आई है लेकिन अकबर ने काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, उज्जैन, विन्ध्याचल, मैहर, चित्रकूट इन बड़े तीर्थों के नाम क्यों नहीं बदले ? अगर काफिरों को नीचा दिखाना होता तो ये बदलाव व्यापक प्रभाव डालते.

रोचक बात है कि किसी नदी का नाम नहीं बदला गया. किसी पहाड़, किसी झरने का नाम नहीं बदला गया पूरे मुगल सरकार में. गंगा, यमुना, सरयू, चंबल, केन, बेतवा, बरुणा, गंडक, सोन, घाघरा, व्यास, झेलम, रावी, सिंध, चेनाब, सतलज, जंमू तवी किसी नदी नाले का नाम नहीं बदला. हिमालय हरिद्वार से मंगाकर गंगा जल पीता रहा अकबर.

कितने कम दूरंदेश थे मुगल. अकबर तो पूरा मूर्ख था. सूर्यसह्रनाम रटने में लगा था. टोडरमल खत्री, बीरबल पाण्डे, मानसिंह कछवाहा को नवरत्न बनाकर सरकार चलाता रहा. हारे लोगों के भगवानों के प्रिय भगवान राम और सीता के नाम पर सिक्के जारी करना यह बताता है कि पराजितों के समूल नाश की मानसिक औकात नहीं थी उसमें और उसका नवरत्न मानसिंह बरसाने में राधारानी का मंदिर बनवाता रहा, सरकार की नाक के ठीक नीचे. वह मंदिर आज भी मान मंदिर के नाम से मौजूद है. विधर्मियों की धार्मिक संस्थापनाएं होती रही और अकबर तानसेन से राग-रागिनी सुनता रहा.

तुलसीदास राम का चरित गाते रहे उसके शासन में. सूर की कृष्ण लीला वृंदावन में चलती रही. पूरी भक्ति कविता गाई गई उस अकबर की सरकार में. उसे रोकना होता तो यह साहित्य सृजन रोकना था. उल्टे उसका एक प्रिय सिपहसालार कवि रहीम तो वैष्णव हो गया, पुष्टि मार्ग का अनुयायी. बीस भाषाओं का ज्ञानी फारसी, तुर्की, अरबी, संस्कृत का प्रकांड पंडित होकर ब्रज में बरवै और नीति के दोहे रचता रहा.

हारे लोगों की भाषा संस्कृति से प्रेम करने वाले मूर्ख थे सब मुगल। रहीम को फारसी से हिलना नहीं था और तुलसी सूर कुम्भन सबको दो थप्पड़ लगा कर आगरे से लेकर अगरोहा तक कहीं कैद रखना एक अपराजेय सम्राट के लिए इतना कठिन काम तो न रहा होगा. उसे जौनपुर में पुल नहीं बनवाना था. बस जौनाशाह की जगह हर नये पुराने निर्माण को ‘अकबर द्वारा तामीर किया गया’ की मुनादी करवानी थी.

लेकिन तब उसके इंतकाल पर जौनपुर, इलाहाबाद, मीरजापुर, बनारस शोक में न डूबते. यहां के बाजार हफ्तों अपने शहंशाह के जाने का मातम न मनाते. अकबर के समकालीन कवि बनारसीदास जैन के अर्धकथानक में अकबर के न रहने का शोक देखा जा सकता है. आप अकबर के संस्थापित शहर का नाम बदलो लेकिन जन के मन से खुरचकर अकबर को मिटाने की क्या तरकीब निकालोगे ?

A. अकबर ने सियाराम सिक्का जारी किया, नीचे उसका चित्र नीचे दे रहा हूं. अकबर के सिक्के की जानकारी मुझे पहली बार गीताप्रेस की कल्याण पत्रिका से मिली थी. वह अंक अभी भी मेरे पास है.

इलाहाबाद शहर के वास्तविक संस्थापक थे सम्राट अकबर!

B. अकबर द्वारा इलाहावास या इलाहाबाद की नींव डालने का संदर्भ पृष्ठ भी यहां जोड़ दिया है. यह प्रयाग प्रदीप नामक किताब का एक पृष्ठ है, जो मूल रूप से इलाहाबाद का एक जीवंत और प्रमाणिक इतिहास है. इसके लेखक श्री सालिग्राम श्रीवास्तव जी हैं. यह किताब 1937 में हिंदुस्तानी अकादमी से प्रकाशित है. यहां दिए पृष्ठ में तीन लाल निशान वाले स्थान देखें.

  1. ‘गंगा यमुना के बीच की सुरक्षित भूमि’ नगर नहीं भूमि.
  2. प्रयाग में ठहरा जिसे लोग प्रायः ‘इलाहाबास’ कहते थे, और
  3. प्रयाग में जहां गंगा यमुना का जल एक साथ पहुंचता है, एक नगर की नींव डाली और कुछ किलों को भी बनवाया.

तथ्य यही है कि प्रयाग एक तीर्थ भर था. यहां कुछ मंदिर और पुजारी थे. मुनियों के आश्रम थे लेकिन कोई नगर न था. नगर की नींव सम्राट अकबर ने डाली. उस भूभाग को ‘इलाहाबास’ स्थानीय लोग कहते थे. वह इलावास की ही स्मृति थी जो बिगड़ कर इलाहाबास के रूप में बनी रही. अकबर ने नींव पूज कर नगर बसाया. आप उसके द्वारा स्थापित शहर का नाम बदल कर नगर का इतिहास बदल रहे हैं. यह अन्याय है, अराजकता है, कुराज है, अनैतिहासिक कदम है.

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