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Home कविताएं

लाशों के भी नाखून बढ़ते हैं…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 31, 2025
in कविताएं
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लाशों के भी नाखून बढ़ते हैं…
लाशों के भी नाखून बढ़ते हैं…

1. संभव है

संभव है कि
तुम्हारे द्वारा की गई हत्या के जुर्म में
मुझे फांसी पर लटका दिया जाए

यह भी संभव है कि
तुम्हारे द्वारा फैलाए गए झूठ को
सच नहीं मानने की सज़ा
मुझे अपनी जान दे कर चुकानी पड़े

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कौन है श्रेष्ठ ?

संभव है कि
तुम्हारे द्वारा खींची गई लकीरों को
किसी देश की सीमा मान कर
मुझे देश निकाला दे दिया जाए

संभव है कि
वे मेरी शराब में डूबी हुई
निःसंग रातों को
मेरे विद्रोही कविताओं की जननी मान लें
जबकि मैं सिर्फ़ तुम्हारी यादों में डूबा था

संभव है कि
मुझे काग़ज़ पर
किसी अबोध लिपि में
दाहिने से बाएं लिखते देख कर
आतंकवादी समझ लें

गुफा चित्रों के व्यापक परिधि से निकल कर
आदमी जब अलग अलग ज़ुबानों में बोलता है
तो अक्सर ऐसा भ्रम पैदा होता है

मुझे न तो तुम्हारी समझ पर अफ़सोस है
और न ही अपनी सोच पर कोई गर्व है

जो जैसा है वह वैसा ही है
लेकिन तुम्हारी ज़ुबान में
अगर आदमी के लिए
एक से ज़्यादा शब्द नहीं है
तो मुझे इसका अफ़सोस है

2. रोटी एक तमाशा है

एक अरसे के बाद
उस बच्ची ने
अपने से दस गुना बड़े
बाँस के सहारे
ज़मीन से बीस फुट उपर बँधी
रस्सी के सहारे
पार किया है राजपथ

एक अरसे के बाद
ह्यूम पाइप के खोह में बने
उसके घर के बाहर
ईंटों के तिर्यक के सीने में
सुलगी है आग

एक अरसे के बाद
ज़मीन पर नहीं गिरने के एवज़ में
ज़मीन पर उगी है रोटी की आस

तमाशा और रोटी के इस संबंध को
जब तक पूरी तरह से समझ पाएगी वह बच्ची
तब तक वह रस्सी पर चलने लायक़ नहीं रह जाएगी

उस दिन
उसका देह सिर्फ़ एक बिस्तर के काबिल रह जाएगा
जिस पर वह जन्म देगी और बच्चियां
करतब दिखाने के लिए

एक अरसे के बाद
हटा लिए जाएंगे खोखले ह्यूम पाइप भी
तुम्हारे प्यासे शहर को पानी पिलाने के लिए

एक अरसे के बाद
उस औरत और उसके बच्चों के सर पर
सिर्फ़ आसमान होगा
और सामने एक ईंटों का तिर्यक

तमाशे की रोटी सेंकती हुई…

3. प्रतिशोध

अगर अंतिम क्रिया को तुमने
दो चार दिन टाल दिया
या, अगर किसी वजह से कोई लाश
कुछ दिनों तक
किसी को नहीं मिली
तो उस मौक़े का फ़ायदा उठाकर
बढ़ जाते हैं उसके
हाथ और पांव के नाखून

मुझे नहीं मालूम कि
अतृप्त आत्माएं प्रतिशोध लेती हैं या नहीं

मुझे नहीं मालूम कि
कौन सी आत्मा मृत्यु को सहज रूप से लेती हैं

लेकिन
लाशों के भी नाखून बढ़ते हैं

शायद
वे नोच कर फाड़ देना चाहते हैं
उन मुखौटों को
जिन्हें वे ता-उम्र अपने चेहरे पर लगाते रहे

शायद
वे बेनक़ाब करना चाहते हों
उन ताक़तों को
जिन्होंने उन्हें किसी जानवर की तरह
बांध कर घसीट कर ले आए
उनके वध स्थल तक

लाशों के नाखून बढ़ने की कई वजहें हो सकती हैं
लेकिन
एक बात तो तय है कि
कफ़स की सख़्त दीवारों पर उभरे हुए
नाखून के निशान
यातनाओं की कहानियां
चित्र लिपि में बतातीं हैं

मृत्यु से भी ज़्यादा भयावह होते हैं ये चित्र

ऐसे ही बढ़े हुए नाखूनों वाले
गुमनाम लाशों को जलाने के बाद
घटवार संभाल कर रख लेते हैं
बिन जले प्रोस्थेटिक

स्टील के बने कुल्हे की हड्डियां
पांव में घुसेड़े हुए स्टील के रॉड
या कोई पेसमेकर

बेच देता है कबाड़ के भाव
कबाड़ी अपने सख़्त नाखून से
खुरच खुरच कर हटाता है
उन पर लगी कालिख़

लाशों के बढ़े हुए नाखून
गुम हो जाते हैं धीरे-धीरे
मनुष्य की स्मृतियों से

फिर…
एक और होलोकॉस्ट की तैयारी में
लग जाते हैं हम

  • सुब्रतो चटर्जी 

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