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गणतंत्र के सामूहिक सपनों की शवयात्राएं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 2, 2021
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गणतंत्र के सामूहिक सपनों की शवयात्राएं

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

उन सपनों की शवयात्राएं देखनी हों, जो गणतंत्र बनने के बाद भारत ने देखे थे, तो देश के नगरों-महानगरों में बेहद कीमती जमीनों पर खड़ी विशाल अट्टालिकाओं में चल रहे अति महंगे निजी स्कूलों और निजी अस्पतालों की चमक-दमक में देखें, दिन भर के कठोर श्रम के बाद उन्हीं सड़कों के किनारे किसी झुग्गी नुमा दुकान की टूटी सी बेंच पर फ़टी कथरी में लिपटे सोए किसी बच्चे में देखें, किसी सरकारी मेडिकल कॉलेज एन्ड हॉस्पिटल के गन्दे और बदबूदार जेनरल वार्ड में भर्त्ती निर्धनों की आंखों में पसरी उदासियों में देखें, न्याय के बदले अदालतों द्वारा वर्षों से तारीख पर तारीख पा रहे उस निर्बल इंसान के बेबस चेहरे में देखें, जिसकी जमीन पर किसी भू-माफिया या गुंडे ने कब्जा कर लिया है.

शिक्षा और अवसरों की समानता, सबके लिये उचित चिकित्सा, निर्बलों को न्याय…, ये सब ऐसे मूल्य थे जो स्वतंत्रता संघर्ष के महान अध्यायों से जुड़े थे और नए नवेले गणतंत्र बनने के बाद सपनों के रूप में हमारे सामूहिक मानस से जुड़ गए थे.

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सात दशक बीतने के बाद आज के परिदृश्य में हम उन मूल्यों के बारे में बातें करने की भी स्थिति में नहीं हैं. हमारे सामूहिक मानस से वे सपने ओझल हो गए जिनके साथ जीने और जिनके लिये मरने की प्रेरणा हमारे महान पूर्वजों ने हमें दी थी.

हमने शिक्षा को क्रय-विक्रय की बाजारू चीज बना कर देश की दो तिहाई आबादी को अवसरों की दौड़ से बाहर कर दिया और एक नए किस्म का समाज निर्मित कर प्रभु वर्ग की अवधारणा को नए तरह का आधार दे दिया. चिकित्सा की सुविधा को संपन्न और निर्धन के खांचों में बांट कर हमने तय कर दिया कि सरकारी चिकित्सा व्यवस्था कोई आदर्श चीज नहीं, बल्कि साधनहीनों के लिये हारे का हरिनाम है.

वोट देने के अधिकार की समानता के अलावा हमने हर तरह की असमानता को बढ़ावा दिया और इसके पीछे बेहद लिजलिजा-सा तर्क विचारहीन पीढ़ी के मानस में इंजेक्ट करते रहे कि सबको समान तो ईश्वर ने भी नहीं बनाया है.

आज हम असमानता के मामले में दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल हैं. हमारे सपने मर चुके और हम अपने कंधों पर उनके शव लादे एक दिशाहीन पीढ़ी की तरह उस रास्ते चलते जा रहे हैं, जहां भीषण आर्थिक-सामाजिक विषमता तीव्र गति से बढ़ती जा रही है. सपनों की शवयात्राएं इकहरी रेखा में नहीं हैं. कई रेखाएं समानांतर चल रही हैं.

गणतंत्र बनने के साथ ही हमारे पूर्वजों ने संस्थाओं को शक्तिशाली और स्वायत्त बनाने का मंत्र दिया, ताकि राजनीतिक शक्तियां देश को अकेले हांकने की स्थिति में न आने पाएं. ये संस्थाएं हमारे लोकतंत्र की प्रहरी थीं, जिनकी स्वायत्तता और गरिमा न्यायपूर्ण और गतिशील संरचना से जुड़े हमारे सपनों में शामिल रह. लेकिन, इन सपनों पर बार-बार आघात किये गए. जब भी कोई राजनीतिक सत्ता बेहद मजबूत हुई, उसने इन स्वायतत्ताओं और गरिमा पर प्रहार किए. यहां तक कि सबसे महत्वपूर्ण संस्था राष्ट्रपति भवन को भी बख्शा नहीं गया. अदालतें भी इन हस्तक्षेपों से अछूती नहीं रहीं. बाकी, इन्वेस्टिगेशन एजेंसियों आदि की स्वायत्तता तो सदैव, हर कालखण्ड में पाखण्ड और मजाक का विषय बनी रही.

आगे बढ़ती, विकसित होती दुनिया के साथ हमने भी कदमताल किया. आर्थिक,वैज्ञानिक आदि तमाम मानकों पर हम भी विकास की गाथा लिखते रहे. लेकिन, जिस संविधान की शपथ लेकर हम एक गणतंत्र के रूप में विकसित होने का स्वप्न लेकर चले थे, वे एक-एक कर जमींदोज होते गए.

‘हम भारत के लोग’ आज ‘इंडिया’ और ‘भारत’ के बीच की आर्थिक-सामाजिक विभाजक रेखाओं के आर-पार हैं. ‘इंडिया’ नव उपनिवेशवादी शक्तियों और उनकी पिछलग्गू, लाभार्थी जमातों की आरामगाह है, जहां से राज करते हुए वे शोषण और छल के नित नए आख्यान रच रहे हैं, जबकि ‘भारत’ शोषित जमातों के सपनों की ऐसी कब्रगाह है, जहां जीवित रहना एक सतत जद्दोजहद है.

स्वप्नद्रष्टाओं के इस देश में लोग अब सपनों के मामले में दरिद्र हैं. अति संपन्न तबका अपनी प्रभुता का नितांत बेजा इस्तेमाल करते अपनी समृद्धि में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि करता जा रहा है, मध्यवर्गीय लोगों के सपनों में मूल्यों और आदर्शों की जगह नए मॉडल की कार, नए फीचर्स के मोबाइल आते हैं जबकि निर्धनों के लिये सपनों का कोई मतलब ही नहीं रह गया है.

सामूहिक मानस अब कोई सामूहिक स्वप्न नहीं देखता क्योंकि, अब कोई सामूहिक मानस है ही नहीं. उपभोक्तावादी संस्कृति सबसे पहले सामूहिकता की भावनाओं को ही नष्ट करती है. सबके हितों के अलग-अलग द्वीप हैं, सबके अपने-अपने संघर्ष हैं. निरन्तर बढ़ते इस अंतर्विरोध ने समाज को सांस्कृतिक रूप से इतना खोखला कर दिया कि सामाजिक मूल्य और आदर्श नाम की चीजों का अस्तित्व मिटता गया.

सामूहिकता खो चुका और सपनों के मामले में दरिद्र हो चुका समाज प्रतिरोध की शक्ति भी खो देता है. इसलिये, चुनौतियों से प्रायः मुक्त शोषक शक्तियां हमारी राजनीति और अर्थनीति का नियमन करने की हैसियत पा चुकी हैं. प्रतिरोध के स्वर अगर कहीं से निकले तो उन पर कटाक्ष करने में, उनका मनोबल तोड़ने में वही लोग शामिल हो जाते हैं, जिन्हें इस प्रतिरोध का हिस्सा होना चाहिए था.

दिल्ली की सड़कों पर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आंदोलनरत किसानों के प्रति पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के संपन्न और मध्य हैसियत के किसानों की मानसिकता का अध्ययन करें, इनके नौजवान बेटे-बेटियों के द्वारा किसान आंदोलन के संबंध में फारवर्ड किये जा रहे व्हाट्सएप मैसेजों पर निगाह डालें.

उसी तरह, पटना की सड़कों पर सर्द रातों में ठिठुरते आंदोलनकारी शिक्षक अभ्यर्थियों और पुलिस की लाठियां खाते डाटा एंट्री ऑपरेटरों के प्रति बिहार के पढ़े लिखे बेरोजगार नौजवानों की प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करें. लगता ही नहीं कि सड़कों पर ठिठुरते, सरकार की उपेक्षा और पुलिस की प्रताड़ना सहते वे शिक्षक अभ्यर्थी सिर्फ अपनी लड़ाई ही नहीं लड़ रहे, वे उन तमाम बेरोजगारों की लड़ाई लड़ रहे हैं, जिनकी भर्त्ती प्रक्रियाओं को क्रूर मजाक में तब्दील कर दिया गया है.

आउटसोर्सिंग और नौकरी में ठेका पद्धति का विरोध करता कोई आंदोलनकारी समूह कालेजों, विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे विशाल छात्र समुदाय का व्यापक और सक्रिय समर्थन हासिल नहीं कर पाता. हैसियत से बाहर होती फीस का विरोध करते तकनीकी संस्थानों के छात्रों के समर्थन में समाज का कोई प्रभावी तबका मुखर नहीं होता. हर तरफ खुदगर्जी और ठस दिमागी पसरती गई है. यहां तक कि अंध निजीकरण का विरोध करते कर्मियों पर फिकरे और तंज कसते ऐसे लोग भी देखे जा सकते हैं, जिन पर इसका सबसे घातक असर होगा.

गणतंत्र के अपने सामूहिक स्वप्न होते हैं, जो 26 जनवरी, 1950 की सुबह हमारे पूर्वजों ने देखे थे. हमारे लिये आज की तारीख में उनके कोई मायने ही नहीं रह गए. उस ऐतिहासिक सुबह को राष्ट्रवाद की जो परिभाषा जनमानस में थी, आज वह भी बदल गई है और अधिकतर लोग इसकी संकीर्ण, विभाजनकारी व्याख्या की नकारात्मकताओं से ग्रस्त हो चुके हैं.

एक गणतंत्र के रूप में 70 वर्षों की हमारी यात्रा वाकई दिलचस्प है. इसमें आर्थिक-वैज्ञानिक विकास के उत्साहवर्द्धक तथ्य हैं तो शोषण और विषमता की निरन्तर वृद्धि के डरावने आंकड़े भी हैं. सबसे त्रासद यह कि इन सात दशकों में हम सामूहिक चेतना के क्षरण की एक लंबी यात्रा से गुजरे हैं, जिसने हमारे पूर्वजों के महान सपनों को हमसे छीन लिया है.

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