वरिष्ठ माओवादी राजनैतिक बंदी और भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य कॉमरेड प्रमोद मिश्रा (उम्र 74 वर्ष) का पूरा पत्र, जो उन्होंने न्यायालय को लिखा है और जनता को भी भेजा है.=अभी तक कुछ साथियों ने उनका पत्र साझा किया था लेकिन वो पत्र का सिर्फ कुछ अंश था. इस पूरे पत्र को पढ़कर आप एक क्रांतिकारी की दृढ़ता, वैचारिक प्रतिबद्धता और अविचल व्यक्तित्व को समझ सकते हैं - सम्पादक
भागलपुर, विशेष केन्द्रीय कारा (तृतीय खण्ड) में बंद एक प्रशासनिक बन्दी प्रमोद मिश्रा का पत्र भागलपुर, विशेष केन्द्रीय कारा (तृतीया खण्ड) में बंद एक प्रशासनिक बन्दी का आवेदन

प्रेषक : प्रमोद मिश्रा (74 वर्ष) पिता- स्व. तारकेश्वर मिश्रा ग्राम पोस्ट थाना - कासमा जिला - औरंगाबाद (बिहार) पिन - 824125

केस का विवरण :

कारा प्रवेश तिथि: 11/08/2023 विचाराधीन बंदी

प्रेषित :

सेवा में, श्रीमान् ......

द्वारा: श्रीमान् कारा अधीक्षक, विशेष केन्द्रीय कारा भागलपुर. विषय : माननीय न्यायालय में कानूनी सहायता हेतु ऐसे सुयोग्य, सुदक्ष, कुशल अधिवक्ता सरकारी खर्च पर मुहैया कराई जाय, जो मुझसे जीवंत संपर्क रख सकें तथा चिकित्सकीय शोध एवं जरूरतमंदों को अंग प्रत्यारोपण हेतु जीवित देह' राष्ट्र को समर्पित किए जाने के संबंध में. महाशय, नम्र निवेदन के साथ कहना चाहता हूं कि मैं प्रमोद मिश्रा, पिता स्व. तारकेश्वर मिश्रा, ग्राम पोस्ट थाना- कासमा, जिला औरंगाबाद, राज्य बिहार का स्थाई निवासी हूं तथा फिलहाल विशेष केन्द्रीय कारा भागलपुर के तृतीय खण्ड में कैद हूं. उपर्युक्त विषयांकित के संबंध में सादरपूर्वक कहना है कि मुझे झारखण्ड राज्य पुलिस ने कई झूठे मुकदमों में अभियुक्त बनाया है, जिसमें टोंटो थाना काण्ड संख्या- 63/2022 भी माननीय न्यायालय में विचाराधीन है. मैं आपका ध्यान इस ओर आकृष्ट कराना चाहता हूं कि इसी तरह के दर्जनों झूठे मुकदमों में विभिन्न राज्यों के राज्य सरकार तथा भारत सरकार द्वारा अपने अधीनस्थ विभिन्न एजेंसियों एनआईए, एसटीएफ एवं राज्य पुलिस इत्यादि का दुरूपयोग कर मेरे विरूद्ध दर्जनों झूठा मुकदमा दर्ज करवाया गया है ताकि मुझे लंबे समय तक जेल में कैद करके रखा जा सके और इस अवधि में मुकदमों का विचारण लंबित रखकर जेल की काल कोठरी में सड़ाकर मेरी हत्या किया जा सके. (अब तक लगाए गए मुकदमों की सूची आवेदन के साथ संलग्न है.) केन्द्र सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों की घृणित मंसूबों की खास वजह यह है कि मैं एक कम्युनिस्ट हूं, क्रांतिकारी हूं, तथाकथित आजादी के बाद से ही मैं देश की सारी जल-जंगल-जमीन पर जनता का अधिकार, जनवाद व राजनीतिक स्तर पर जनता का अधिकार तथा सच्ची लोकतंत्र की स्थापना हेतु होश संभालने के बाद से ही संघर्षरत रहा हूं तथा मृत्युपर्यंत तक संघर्षरत रहने को कृत संकल्पित हूं. एक राजनीतिक-सामाजिक एवं क्रांतिकारी होने के नाते मैं यह सच्चाई दृढ़ता के साथ आपको बताना चाहता हूं कि किसी भी राजसत्ता के संचालन की वास्तविक शक्ति राजनीति में निहित होती है, न कि कानून और न्याय में. 'Political power is very big power for every nations and all countries of the world.' पूरे संसार के लिए यह सत्य है कि कोई राजनीतिक सत्ता, जो सबसे बड़ी शक्ति होती है, उसका जन्म शस्त्र की शक्ति के बल पर होता है और उसका टिका रहना भी शस्त्र की शक्ति में ही संभव होता है. वर्तमान समय में परमाणु बम का आविष्कार के बाद से ही परमाणु शक्ति के सहारे अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश सुपरपावर बन चुके हैं. राज्य की सत्ता कोई वर्गोपरि निकाय नहीं है, बल्कि वह समाज के किसी खास वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्व करती है तथा उसकी रक्षा के लिए अन्य विशेष वर्गों पर दमन और शासन करने की नीति को क्रियान्वित करती है. एक बार समाज में राजसत्ता का उदय होने के बाद से यह नियम सर्वमान्य है. इसका कोई अपवाद नहीं है. समाज विज्ञान के शोधकर्ताओं व बड़े-बड़े विद्वानों के अनुसार मानव समाज के आदिकाल से सभ्यता के विकास का एक लंबी अवधि तक राजसत्ता का कोई अस्तित्व नहीं था. समाज विकास के क्रम में जीविकोपार्जन के स्रोत एवं संसाधनों की खोज के क्रम में प्रकृति के साथ गहरे लगाव और निरंतर संघर्ष ने विभिन्न उत्पादों का संग्रह एवं उत्पादन कला का उत्तरोत्तर बढ़ता ज्ञान मानव जाति को आत्मनिर्भर बनना सिखाया. स्वभावतः नई-नई समस्याओं का उदय भी हुआ तथा उन उदयमान समस्याओं का समाधान हेतु नियम, नीति, कानून बनाना एवं उसका अनुपालन करना भी सीखा. सामाजिक उत्पादन पर सामाजिक उपयोग की सर्वसम्मत नीतियों में व्यवधान तब पड़ने लगा, जब जरूरत से ज्यादा उत्पादन और उसके संरक्षण व संग्रह की अनिवार्यता सामने आई. आदिम साम्यवादी समाज में विघटन की प्रक्रिया तब शुरू हुआ जब संरक्षण और सुरक्षा के नाम पर, विशेषज्ञता एवं दक्षता के नाम पर सामाजिक उत्पादन पर व्यक्तिगत मिल्कियत का प्रावधान मान्य हुआ. वाद-विवाद, द्वन्द्व, विरोध व तरह-तरह के भेद-प्रभेद बढ़ना और उसे आपस में सुलझाना असाध्य हुआ तभी राजसत्ता के भ्रूण दमन और शक्तिशासन के रूप में अस्तित्वमान हुआ अर्थात् राजसत्ता का प्रादुर्भाव हुआ. राजसत्ता कोई समाज के ऊपर से या पूर्व के पैदा हुई शक्ति नहीं है, बल्कि समाज के एक खास वर्ग द्वारा एवं उनके द्वारा गठित नियम, नीति, कानून को तीर-धनुष, भाला, लाठी व तलवार से लैश दमनकारी शक्ति से समाज को मनाने व विवश करने के लिए बाध्यकारी निकाय है. सहस्त्राब्दियों से होते आ रहे वर्ग संघर्षों के दौरान जीतनेवाली शक्तियों ने अगर किसी चीज को सबसे अधिक चोख और उन्नत बनाया है तो वह है "राजसत्ता". वह वर्ग संघर्ष ही है कि जिससे आरंभ में पैदा हुए छोटे-छोटे राज्य, बड़े-बड़े राज्य में और बड़े-बड़े राज्य विशाल साम्राज्य में तब्दील होते गए. पूरी पृथ्वी पर मुट्ठीभर साम्राज्यवादियों का विशाल उपनिवेश कायम है. उसी प्रकार, साम्राज्यवादियों-उपनिवेशवादियों के खिलाफ संगठित असंगठित बागियों, क्रांतिकारियों का हुजूम अपनी भारी कुर्बानी देकर सशस्त्र संघर्ष के सहारे चुनौती पेश कर रहा है. ब्रितानी साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद में कथित आजादी के बाद से ही भारत की जनता पर साम्राज्यवाद के पिछलग्गू भारतीय सामंत, दलाल पूंजीपति व दलाल राजनीतिज्ञों ने अंग्रेजों द्वारा विरासत में मिली औपनिवेशिक नौकरशाही राजतंत्र तथा उसी के द्वारा बनाए गए नियम कानूनों के तहत भारत की राजनीतिक व्यवस्था चलाती आ रही है. जिसका मूल उद्देश्य 'फूट डालो राज करो, दमन करो शासन करो' रहा है. बस अंतर इतना है कि उस समय कोई अंग्रेज अधिकारी या न्यायाधीश भारतीय क्रांतिकारियों को जेल की काल कोठरी में कैद रखते थे या फांसी पर चढ़ाते थे और अब न्यायालयों में काली चमड़ी वाला काला कोट पहने भारतीय अधिकारी या न्यायाधीश संघर्षरत जनता व क्रांतिकारियों को जेल की काल कोठरी में कैद रखने अथवा फांसी देने का आदेश सुनाता है. आप सभी माननीय महोदय / महोदया एक जिम्मेवार पद पर आसीन देश-दुनिया का राजसत्ता और कानून पर ज्ञान के बारे में अच्छी दखल रखते हैं और यह जानते हैं कि दुनिया के प्रायः सभी देशों में राजनीतिक सत्ता के मातहत कई सामाजिक सत्ताएं क्रियाशील हैं, जैसे पितृसत्ता (पुरुषों की सत्ता), जाति विरादरी की सत्ता और धर्म की सत्ता. भारतीय समाज में इन तीन सामाजिक सत्ताओं के अलावे ब्राह्मणीय हिन्दुत्ववादी मनुवादी दर्शन पर आधारित चतुर्वर्णीय सामाजिक व्यवस्था बहुप्राचीन काल से जारी है. यह अन्य सभी सत्ताओं- पितृसत्ता, जाति विरादरी सत्ता और धर्म सत्ता, यहां तक कि राजसत्ता पर भी न सिर्फ भारी प्रभाव रखता है, बल्कि उसे अपनी मर्जी पर संचालित होने के लिए बाध्य करता है. भले ही हम खुद को इक्कीसवीं सदी के और लोकतंत्र के युग में होने का दंभ भरें लेकिन यह सिर्फ कथनी, कथनी ही है, यथार्थ नहीं. ऊंच-नीच, छुआछूत जैसे सामाजिक भेदभाव ने भारतीय समाज को भीतर से जर्जर करके रखा है. आधा आसमान यानि संपूर्ण महिला समाज और शुद्र वर्ग के नाम से घोषित समाज का विशाल तबका आज भी समाज में शोषण, उत्पीड़न और बर्बर दमन झेलता हुआ कष्टकारी जीवन जीने को अभिशप्त है. यह ऐसा नासूर है, जो भारतीय समाज को शताब्दियों से विदेशी गुलामी के जंजीरों में बंधने को बाध्य करता रहा है. यही वजह है कि अंग्रेजों के जाने के इतने दिनों बाद भी, भारतीय समाज वास्तविक आजादी से आज भी दूर है, और मंदिर-मस्जिद, हिन्दु-मुस्लिम, छुआछूत, आरक्षण-अनारक्षण जैसे क्षुद्र विचार और धर्मान्धता-धर्मोन्माद व धर्मभिरूता का शिकार बने बैठे हैं. अब मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि मेरे खिलाफ या मुझ जैसे अनगिनत बेगुनाह निर्दोषों पर, घृणित राजनीतिक साजिशों के तहत लादे जा रहे मुकदमें देश में बढ़ रहे अपराधों और असंतोष के लिए आपकी व्यवस्थाएं, आपका कानून और आपकी सरकारें पूर्णरूप से उत्तरदायी है. मेरी दृष्टि में 'अपराधी वह नहीं है जो अपराध किया है और जेलों में कैद है, बल्कि अपराधी वह है जो अपराध का जनक है'. मैं इसके लिए आपके अन्यायकारी, दमनकारी तथा कथित पवित्र भारतीय संविधान, कानून व न्याय व्यवस्था की सख्त निंदा करता हूं और साथ ही साथ कहता हूं कि मेरे मुकदमें की पैरवी हेतु अधिवक्ता एवं अन्य आर्थिक व्यय, फिलहाल मेरी चमड़ी दुहने से भी उसकी आपूर्ति संभव नहीं है. मैं शासक वर्ग के निशाने पर क्यों हूं ? इसका स्पष्टीकरण ऊपर में कर चुका हूं. मैं जोर देकर कहता हूं कि हम कम्यूनिस्टों का पथ प्रदर्शक, दिग्दर्शन, वैचारिक, दार्शनिक, राजनीतिक, सांगठनिक लाईन जिसे मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद कहा जाता है, यह कोई आतंकवादी, उग्रवादी लाईन नहीं है, जैसा कि शोषक, शासक, प्रतिक्रियावादी, अराजकतावादी, फासीवादी भारत सरकार कहती है. 'Marxism-Leninism-Maoism is not terrorism and extremism. Marxism-Leninism-Maoism is philosphy of world prolateriat class. That says dialectical materlism, political, economical and politics of social democratic world people.' मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद विश्व सर्वहारा का दर्शन है, जिसे द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद कहा जाता है. यह समाजवादी, जनवादी, राजनीति और राजनीतिक अर्थशास्त्र का सैद्धांतिक बुनियाद है. यह एक उन्नत वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक चेतना का आधारभूत संरचना का निर्धारक, वाहक, निर्णायक तत्व है, जो मानव जाति को पूर्ण मुक्ति का राह प्रस्तुत करता है. क्या विश्व मानव समाज और भारतीय समाज का ज्ञान वैभव तथा आर्थिक सामाजिक-राजनीतिक अनिवार्यताओं की आपूर्ति कई-कई मिलियन-बिलियन ट्रिलियन डॉलरों-रूपयों या अन्य मुद्राओं के आय या अंधाधुंध मुनाफा के लिए प्राकृतिक संरचनाओं- जंगल-पहाड़-नदी-सागर खान-उद्यान तथा जैव-अजैव प्रजातियों की विनाश लीला से पूर्ण होगा? क्या साम्राज्यवादी पूंजी से विश्व के जन-इच्छाओं, आकांक्षाओं के ऊपर थोपा जा रहा भोड़ा विकास के सहारे प्रकृति और समाज के नेचर (स्वभाव) में लाया जा रहा असंतुलन का मानव और संपूर्ण जैव प्रजाति के जीवन का संकट की जिम्मेवारी अपने ऊपर लेना नहीं चाहिए ? मानव सृजित स्रोतों-साधनों और प्रकृति पर उसका समान उपयोग की नीति पर केन्द्रित समाज के प्रत्येक व्यक्ति की 'क्षमता के अनुसार काम और जरूरत के अनुसार चीजों की आपूर्ति से मानव जाति और प्रकृति का सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करें, जो हम कम्युनिस्टों का निर्धारित लक्ष्य है.' आप महानुभावों से नम्र निवेदन मात्र इतना है कि मेरे मुकदमा में कोई सुयोग्य, सुदक्ष अधिवक्ता माननीय न्यायालय की ओर से नियुक्त किया जाय तथा मुकदमा का विचारण प्रक्रिया यथाशीघ्र आरंभ कर मुकदमा को खारिज, निष्पादन किया जाय. ऐसा इसलिए कि विचारण के नाम पर मुकदमा को सालों-दर-साल लंबित रखना, मुकदमा को पीढ़ी दर पीढ़ी लंबा खींचना कहीं से ही न्यायोचित प्रतीत नहीं होता. वैसी स्थिति में मिलनेवाला सही न्याय भी अन्याय के समतुल्य होता है. किसी मामले में न्यायालय द्वारा उचित समय पर फांसी या आजीवन कारावास की सजा भी उतनी विचारण के नाम पर अनन्तकाल तक खींचने तथा लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रखने से होती है. हालांकि मेरी आत्मा को ज्यादा खुशी तब मिलती जब मेरा भी हश्र प्रिय नेता, शिक्षक, साथी और महान क्रांतिकारी मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी कॉ. प्रशांत बोस के जैसा ही होता, जो शारीरिक तौर पर 95 प्रतिशत दिव्यांग हो चुके थे, उनके शरीर का आधा अंग पक्षाघात (लकवा) से ग्रसित हो चुका था. उनके एक हाथ की अंगुलियां अनायास बराबर हिलती रहती थी तथा मुंह से लार टपकते रहता था. कॉ. प्रशांत बोस अपने पैरों पर चलने-फिरने तथा स्वयं से भोजन-पानी ग्रहण करने में भी पूर्णतः असमर्थ थे. कॉ. बोस स्वयं से ना शौच के लिए जा सकते थे और ना ही पेशाब कर सकते थे. स्वास्थ्य इतना गिर चुका था कि उनके कंठ से साफ या स्पष्ट आवाज भी नहीं निकलता था. 80 वर्षीय वयोवृद्ध, अतिअस्वस्थ क्रांतिकारी, प्रिय जननेता कॉ. प्रशांत बोस को, चरमपंथी हिन्दुत्त्ववादी आरएसएस-भाजपा की मोदी सरकार तथा उनके पदचिह्नों पर चलने वाली झारखण्ड व अन्य राज्य सरकारों की पुलिस तथा अन्य एजेंसियों ने जीरो टॉलरेंस के नाम पर तब गिरफ्तार कर लिया, जब वे अपने शुभचिंतकों और 65 वर्षीय अस्वस्थ पत्नी शीला मरांडी के साथ बेहतर स्वास्थ लाभ हेतु अस्पताल जा रहे थे. अति अस्वस्थता की स्थिति में भी झारखण्ड राज्य के न्यायालय में बैठे न्यायाधीश ने बेहतर इलाज हेतु अस्पताल में भर्ती कराने का आदेश देने के बजाय पुलिस कस्टडी में भेजा और अंततः बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारा होटवार भेज दिया. न्यायिक हिरासत में रहने के दौरान विभिन्न राज्यों की पुलिस तथा केन्द्र सरकार की एजेंसियों ने उनके ऊपर असंख्य झूठे मुकदमें लादे. न्यायिक निष्क्रियता के कारण पांच साल बाद अंततः कॉ. प्रशांत बोस का मृत शरीर जेल से बाहर निकला तथा उनके निष्प्राण शरीर को भी किसी परिजन अथवा शुभचिंतकों को राज्य सरकार ने स-सम्मान सौंपना उचित नहीं समझा. सरकार के इशारे पर अधीनस्थ अधिकारी सरकारी भेड़ियों ने उनके निर्जीव शरीर को अंततः अपना निवाला बना ही लिया. शायद इसी आशय पर किसी विद्वान कवि ने लिखा था- 'मरनो भलो विदेश में जहां न आपन कोय, माटी खाय जनावरा, महामहोत्सव होय.' शहीद कॉ. प्रशांत बोस की तरह का वाकया यदि मेरे साथ भी हो तो, मैं अपने जीवन को सार्थक और धन्य मानूं. मेरी सोच में ऐसी मूल्यवान कीर्तियां, महान हस्तियों के साथ अति दुर्व्यवहार करने से, भारतीय राज्य हिन्दुत्व के शिखर पुरुष, और भारतीय न्याय व्यवस्था का वैश्विक महिमा मंडन से, दशों-दिशाएं गुंजायमान होकर, भारत को विश्व गुरू के रूप में पूज्यमान बनाएगा. अंत में, मैं अपने मुकदमों से जुड़े सभी न्यायालय के माननीय दण्डाधिकारियों-माननीय न्यायाधीशों से साग्रह यह कहना चाहता हूं कि मैं गुनाहगार हूं ! अतिमुनाफावादी-पूंजीवादी साम्राज्यवादी विश्व के बड़े-बड़े पूंजीपतियों, बड़ी-बड़ी कारपोरेट कंपनियों तथा उनके छुटभैये भारत जैसे अर्धऔपनिवेशिक अर्धसामंती देशों के बड़े पूंजीपतियों और भूस्वामियों के शरणायन्न होकर उनकी निरंतर सेवा में जुड़े रहकर उनकी संपत्ति में लाखों-लाख मिलियन-बिलियन, ट्रिलियन की मात्रा में मुद्रा का भण्डार भरने के लिए उनके तमाम आय के स्रोत प्राकृतिक और सामाजिक उत्पादों को आमजन समुदाय से छीनकर, उन्हें सारे हक से वंचित कर, हम कम्युनिस्टों का सर्वोपरि स्वप्न- शोषणहीन, वर्गहीन समाज बनाने के लक्ष्य में अनवरत संघर्ष में जुड़े रहने का सबसे बड़ा गुनाहगार हूं. अतः माननीयगण मुझे मेरे मुकदमों में त्वरित फैसला सुनाने का समुचित व्यवस्था करें. मैं आपकी व्यवस्था के कर्ज से पूर्णतः उऋण होना चाहता हूं. माननीय महोदयगण कोई भी सजा दे सकते हैं- आजीवन कारावास या मृत्युदण्ड अथवा बाईज्जत बरी किये जाने का. चूंकि कारा मुक्ति के बाद भी मेरी अदम्य इच्छा मरकर प्रकृति और समाज निर्मित इस शरीर को जलाकर राख बनाए जाने या मिट्टी में दफनकर सड़ाए जाने के प्रचलित सामाजिक नियम के विरूद्ध है और हमारे परिजनों द्वारा समाज में जारी आध्यात्मिक सामाजिक रीति नीति के अनुसार कर्म काण्डों के जरिए स्वर्ग में जाने के भी मैं खिलाफ हूं. इसलिए 'मैं घोषणा करता हूं कि माननीयगण के फैसला सुनाने के तुरंत बाद मेरे इस जीवित शरीर को भारत सरकार अपने नियंत्रण में लेकर राष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन (NHO) तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अन्तर्गत कार्यशील विभाग इस शरीर के अंगों-उपांगों को अनेक व्याधियों से गुजर रहे जरूरतमंद लोगों में प्रत्यारोपित कर दिया जाय तथा जो शेष बचे उसे रसायनों के जरिए सुरक्षित कर उस पर शोधकार्य जारी रखा जाय.' आज विज्ञान की प्रगति में दुनिया एवं हमारे देश के प्रतिभाशील वैज्ञानिक अनवरत प्रयासरत हैं, मैं आशा करता हूं कि मेरे इस निर्णय से मेरा शरीर भी अवश्य ही कुछ लाभ पहुंचायेगा. मेरे इस इच्छा को पूरा कराने में भागीदार समस्तजनों का मैं पूर्ण आभारी रहूंगा. इसी आशय के साथ अपने मुकदमों को त्वरित निष्पादन हेतु माननीय न्यायायल से कुशल, सुदक्ष, सुयोग्य एवं संपर्क में रहने वाले अधिवक्ता की नियुक्ति हेतु साग्रह के साथ. आपका विश्वासी प्रमोद मिश्रा

अनुलग्नक :

अब तक लगाए गए मुकदमों की सूची -

CASE LIST Bihar:
  1. Madanpur PS Case No. 53/2019
  2. Madanpur PS Case No. 56/2019
  3. Madanpur PS Case No. 94/2019
  4. Madanpur PS Case No. 105/2019
  5. Madanpur PS Case No. 315/2022
  6. Madanpur PS Case No. 319/2022
  7. Madanpur PS Case No. 369/2022
  8. Madanpur PS Case No. 401/2022
  9. Madanpur PS Case No. 442/2022
  10. Madanpur PS Case No. 349/2022
  11. Madanpur PS Case No. 459/2022
  12. Madanpur PS Case No. 490/2022
  13. Madanpur PS Case No. 511/2022
  14. Madanpur PS Case No. 564/2022
  15. Madanpur PS Case No. 618/2022
  16. Madanpur PS Case No. 44/2023
  17. Deo PS Case No. 50/2019
  18. Deo PS Case No. 95/2019
  19. Deo PS Case No. 155/2018
  20. Deo PS Case No. 49/2019
  21. Amba PS Case No. 68/2019
  22. Amba PS Case No. 78/2011
  23. Amas PS Case No. 196/2017
  24. Amas PS Case No. 266/2018
  25. Dumaria PS Case No. 55/2018
  26. Dumaria PS Case No. 72/2021
  27. Roushanganj PS Case No. 170/2018
  28. Roushanganj PS Case No. 25/2020
  29. Lutua PS Case No. 01/2022
  30. Lutua PS Case No. 05/2022
  31. Bhagwanpur PS Case No. 225/2023
  32. Aghaura PS Case No. 42/2023
Jharkhand:
  1. Dhanbad PS Case No. 326/2008
  2. Goilkera PS Case No. 41/2022
  3. Goilkera PS Case No. 05/2023
  4. Tonto PS Case No. 63/2022
  5. Tonto PS Case No. 01/2023
  6. Mufassil PS Case No. 15/2023
JAIL ADDRESS:

Special Central Jail, Third Sector Bhagalpur, Bihar Office Contact: 9608669761

HOME ADDRESS:

Village + Post Office + Police Station: Kasma District: Aurangabad, Bihar PIN: 824125 Contact: 993933918