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हेडलेस सेंट…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 13, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
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हेडलेस सेंट...
हेडलेस सेंट…

हाथ में कटा हुआ सर लेकर घूमते हुए, ये संत डेनिस हैं. सन्तजी, पेरिस शहर के स्थापक सन्त माने जाते हैं. पर ये सदा से अपना सर हाथ में लेकर नहीं घूमते थे. एक समय जब उनका सर, गर्दन पर ही था, तब वे प्रीस्ट हुआ करते थे. इटलीवासी थे, और उन्हें दो साथियों के साथ, क्रिस्चियनिटी का प्रसार करने गॉल की तरफ भेजा गया.

यह इलाका अब फ्रांस में पड़ता है. तो यहां सन्त जी, क्रिस्चियनिटी का प्रचार प्रसार करने लगे. उनके प्रवचनों से प्रभावित होकर, भर- भर के लोग अपना धर्म बदलने लगे. यह बात लोकल पंडितों पुरोहितों, और लोकल राजा साहब को हजम नहीं हुई.

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तीनो को पकड़ लिया गया. खूब टॉर्चर किया गया और उन्हें क्रिस्चियनिटी छोड़कर लोकल पेगन गॉड्स की पूजा करने, धर्म बदलने पर मजबूर किया गया. मगर सन्तजी टस से मस न हुए. आखिर में उन्हें सजा-ए-मौत तजवीज की गई. शहर की सबसे ऊंची पहाड़ी पे ले जाकर तीनों का सर काट डाला गया.

सन्त डेनिस की महानता के लिए, उनका कर्तव्य से न डिगना और निर्भय होकर शहादत दे देना पर्याप्त होता. कहानी खत्म हो जानी चाहिए. लेकिन पिक्चर, अभी बाकी है मेरे दोस्त.

कथा के मुताबिक, सन्तजी ईश्वर की भक्ति में इतने लीन थे कि उन्हें सर कटने का फर्क नहीं पड़ा. उन्होंने अपना कटा सर उठाया, और उसे एक नदी में प्रवाहित कर दिया. फिर 6 मील तक प्रभु का नाम जपते हुए चलते रहे. अंततः एक जगह गिर गए. वहीं उनकी श्राइन बनाई गई है.

कहानी में यह एक्स्ट्रा ट्विस्ट, उन्हें यूनिक पहचान देता है. जहां चार सन्त की तस्वीर या मूर्ति लगी हो, वहां सेंट डेनिस को कटा सर, अपने हाथ मे पकड़े देखकर पहचाना जा सकता है. लेकिन आगे यह ट्रिक कुछ और लोगो ने भी अपनायी. तो अब यूरोप में आधा दर्जन, दूसरे भी इलाकाई सन्तों के किस्से हैं, जो कटा सर हाथ मे लेकर घूमते है.

ऐसी कहानियां भारत में भी खूब हैं. कुछ सजीव वीर थे, तो कुछ लोग मिथक है. सिर कटने के बाद घण्टों बाद तक लड़ते है. सौ दो सौ किलोमीटर घोड़ा दौड़ा लेते हैं. यह बातें, कायदे से अनसाईंटिफिक हैं, फिक्शन है, और वास्तविकता से दूर है.  हैरी पॉटर, स्पाइडरमैन, सुपरमैन जैसे किस्से हैं. ऐसे आख्यानक को सुना, माना, आनंद लिया, और धार्मिक किस्सा है, तो प्रणाम किया. फिर भूल जा भई !!

पर गर्व नाम के हशीश की खेती हमारे देश मे ऐसी चल पड़ी है, कि जहां से जितना मिले, उसे लूट लेने की होड़ है. दरअसल जिन कौम, जिन जातियों, जिन धर्मों के युवाओं की टांगें .. किसान, जवान, छात्र, गरीब के साथ खड़े होने के नाम पर थर-थर कांपती है…वही खोखले, कायर लोग अपनी पोल ढांपने की कोशिश में, सरकटे योद्धाओं की कहानियां सुना सुनाकर, मुफ्त का जातीय गर्व गांठ रहे हैं.

जिन लोगों ने इस देश पर, कौम और समाज के लिये जान दी, लड़े, पीछे न हटे.. वे तो धर्म जाति और भाषा की सीमाओं से परे, हर जगह पूजे जाते हैं. उन्हें पहचान का संकट नहीं. वे भारत के पुरोधा है, सबके पुरखे हैं, सबका गर्व हैं. पर आपके पास, कोई ऐसे सरकटे लड़ाके का किस्सा, और उसके नाम पर जातीय गर्व करने के आह्वान भेजे, तो उस पागल को तुरन्त ब्लॉक करें. इसलिए कि वह खोखला प्राणी है. मेंटली डिस्टर्ब है. सस्ते गर्व की हशीश के, गहरे कश लगाकर, किसी और ही दुनिया मे विचरता हुआ…एक हेडलेस डेमन है.

2

ईमानदारी से कहूं तो न मेरी मोदी पर लिखने में रुचि है, राहुल में, और न शहीद की पत्नी, या उसके पारिवारिक विवाद में…मैं सोसायटी पर लिखना चाहता हूं. और हमेशा वही लिखता भी हूं. इतिहास के कैरेक्टर हों, या समकालीन विषय, केंद्रीय भाव समाज ही है. इसलिए भक्त, फारवर्डीये, जातीय गर्वोन्नतों को दुत्कारना, ललकारना हर पोस्ट में दिखेगा, लक्ष्य भी वही है. याने नेता, या जिसकी तसवीर लगी हो, वो महज तो आलम्बन है.

जिन्होंने हिंदी साहित्य पढ़ा होगा, वे आलम्बन का अर्थ समझते हैं. याने जब कवि … चांद, तारे, बिजली, हिरणी, तितली फूल की बात करता है, वह उन पर कविता नहीं करता. वह करता है अपनी प्रेयसी पर, मगर आलम्बन, उपमान यही तमाम चांद-सितारे- तितलियां बनती हैं. शायरी उनके गिर्द घूमती प्रतीत होती है. असल में उन पर होती नहीं.

तो जिस तरह की सोसायटी देखना चाहता हूं, उसका प्रतिनिधि राहुल बनते हैं, तो उसके माध्यम से अपनी बात लिखता हूं. जैसा समाज बनते नहीं देखना चाहता, उसके प्रतिनिधि मोदी, उनके भक्त, हिटलर, तुगलक बनते हैं, तो उनकी आलोचना में मुझे गुरेज नहीं.

मैं खुद राजपूत हूं पर सरकटे वीरों की गाथा और राणा प्रताप के 200 किलो के जिरहबख्तर पढ़ाकर मुझे वीरता का अहसास कराने वालो से अप्रभावित हूं. तब मुझे अपनी जाति के पगलों भी खिल्ली उड़ाने से परहेज नहीं.

एम्प्लॉयर हूं, देखता हूं कि पहले 10 में से 4 कैंडिडेट यूजलेस, निकम्मे, नकारा, विवादप्रिय मूर्ख आते थे, पर अब तो दस में से दो काम के लोग छांटना कठिन है.

सामाजिक संगठनों से जुड़ा हूं, तो देखता हूं कि अनावश्यक एग्रेशन, स्वार्थपरकता, लोभ, बदजुबानी, धूर्तता, फालतू की चाणक्यगिरी कैसे बढ़ रही है, परिवार, समाज तोड़ रही है.

फटीचर, कौड़ी भर की औकात नहीं, पर फिल्मी डायलॉग मारते देखता हूं. मोटरबाइक पर ‘तेरा बाप आया’ लिखवाया हुआ है. किसी के घर में घुसकर मारने को तैयार है. बन्दा दिन रात देश बचाएगा, मगर रोजगार नहीं, संस्थान नहीं, परिवार नहीं. ये लोग समाज के बड़ों की नकल कर रहे हैं. पद में ऊंचे, कद में बौनों की नकल कर रहे हैं.

तो लिख सकता हूं. लिख देता हूं. और तब वाहवाही की आशा नहीं रखता. आखिर पाकिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ सेंचुरी मारने पर स्टेडियम झूम तो उठेगा नहीं. गालियां, निराशा, खीज मिलेगी. तो यही देखकर मान लेता हूं कि याने स्कोर बढ़िया बना है. यही एप्रिशियेशन है. देते रहिये. ऊर्जा मिलती है.

  • मनीष सिंह

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