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Home गेस्ट ब्लॉग

हिंदुस्तान के बेटे बहादुरशाह जफर

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 10, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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हिंदुस्तान के बेटे बहादुरशाह जफर

जब मुगलों ने पूरे भारत को एक किया तो इस देश का नाम कोई इस्लामिक नहीं बल्कि ‘हिन्दुस्तान’ रखा, हालांकि इस्लामिक नाम भी रख सकते थे, कौन विरोध करता ? जिनको इलाहाबाद और फैजाबाद चुभता है, वह समझ लें कि मुगलों के ही दौर में ‘रामपुर’ बना रहा तो ‘सीतापुर’ भी बना रहा. अयोध्या तो बसी ही मुगलों के दौर में.

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आज के वातावरण में मुगलों को सोचता हूं, मुस्लिम शासकों को सोचता हूं तो लगता है कि उन्होंने मुर्खता की. होशियार तो ग्वालियर का सिंधिया घराना था. होशियार मैसूर का वाड़ियार घराना भी था और जयपुर का राजशाही घराना भी था तो जोधपुर का भी राजघराना था. टीपू सुल्तान थे या बहादुरशाह जफर सब बेवकूफी कर गये और कोई चिथड़े-चिथड़ा हो गया, तो किसी को देश की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई और सबके वंशज आज भीख मांग रहे हैं. अंग्रेजों से मिल जाते तो वह भी अपने महल बचा लेते और अपनी रियासतें बचा लेते और वाडियार, जोधपुर, सिंधिया और जयपुर राजघराने की तरह उनके भी वंशज आज ऐश करता. उनके भी बच्चे आज मंत्री-विधायक बनते.

यह आज का दौर है. यहां ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदेमातरम’ कहने से ही इंसान देशभक्त हो जाता है, चाहें उसका इतिहास देश से गद्दारी का ही क्युं ना हो. बहादुर शाह जफर ने जब 1857 के गदर में अंग्रेजों के खिलाफ पूरे देश का नेतृत्व किया और उनको पूरे देश के राजा-रजवाड़ों तथा बादशाहों ने अपना नेता माना. भीषण लड़ाई के बाद अंग्रेजों की छल-कपट नीति से बहादुरशाह जफर पराजित हुए और गिरफ्तार कर लिए गये.

ब्रिटिश कैद में जब बहादुरशाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए. उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि ‘हिंदुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं.’ बेवकूफ थे बहादुरशाह जफर. आज उनकी पुश्तें भीख मांग रहीं हैं. अपने इस हिन्दुस्तान की जमीन में दफन होने की उनकी चाह भी पूरी ना हो सकी और कैद में ही वह ‘रंगून’ और अब वर्मा की मिट्टी में दफन हो गये. अंग्रेजों ने उनकी कब्र की निशानी भी ना छोड़ी और मिट्टी बराबर करके फसल उगा दी. बाद में एक खुदाई में उनका वहीं से कंकाल मिला और फिर शिनाख्त के बाद उनकी कब्र बनाई गयी.

सोचिए कि आज ‘बहादुरशाह जफर’ को कौन याद करता है ? क्या मिला उनको देश के लिए दी अपने खानदान की कुर्बानी से ? आज ही के दिन 7 नवंबर, 1862 को उनकी मौत हुई थी. किसी ने उनको श्रृद्धान्जली भी दी ? कोई नहीं. किसी ने उनको याद भी किया ? कोई नहीं. ना राहुल ना मोदी. ऐसा इतिहास और देश के लिए बलिदान किसी संघी का होता तो अब तक सैकड़ों शहरों और रेलवे स्टेशनों का नाम, उनके नाम पर हो गया होता.

हलांकि म्यांमार दौरे के आखिरी दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रंगून में आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की मजार पर पहुंचे थे और मुगल बादशाह जफर को श्रद्धांजलि देने का नाटक जरूर किया. लेकिन उनकी यह श्रद्धांजलि उनके द्वारा लगातार किये जा रहे कुकृत्यों पर पर्दा नहीं डाल सकता, ठीक उसी तरह जैसे गांधी के हत्यारे का मंदिर बनाने वाले गांधी को श्रद्धांजलि देने का नाटक करता है.

भाजपा और आरएसएस देनों ही मुगलों के इतिहास को लगातार मिटाने या बदलने का कोशिश करता रहता है. भाजपा शासित राज्यों के स्कूली पाठ्यक्रमों में मुगलों के ऐतिहासिक इतिहास को लगातार बदला या मिटाया जा रहा है, भाजपा शासित राजस्थान के स्कूली पाठ्यक्रमों में वसुंधरा राजे की भाजपा सरकार ने सत्ता में आते ही सबसबे पहले ‘अकबर महान’ नाम के चैप्टर को हटा दिया. भाजपाद के नए इतिहास के अनुसार महाराणा प्रताप अपनी जन्मभूमि की रक्षा के लिए लड़े थे और उनकी सेना ने अकबर की सेना को धूल चटा दी थी और अकबर की सेना डरकर युद्ध के मैदान से डरकर भाग खड़ी हुई. वहीं महाराष्ट्र शिक्षा बोर्ड ने भी इतिहास की पुस्तकों से मुगल शासक के समूचे इतिहास ही गायब कर दिया है.

मराठों ने जब मुल्क से ग़द्दारी की थी, तब टीपू सुलतान ने अपने दोनों बेटों को अंग्रेजों के यहां गिरवीं रखकर देश को गुलाम होने से बचाया था. वहीं बहादूर शाह ज़फर ने ग़ुलामी के दस्तावेज़ पर दस्ताख़त नहीं किये और अपने दोनों बेटों को मुल्क पर क़ुर्बान कर दिया, परन्तु आरएसएस-भाजपा की नज़रों में ये दोनों मुल्क के ग़द्दार हैैंं, इसका मतलब क्या है ?

मुगलों के इतिहास को मिटाने या उसे बदलने वाले भाजपा-आरएसएस आखिर किस मूंह से मुगल के अंतिम शासक बहादुर शाह जफर के मजार पर अपना घड़ियाली आंसू बहाने पहुंच जाता है ? जबकि इसी नरेन्द्र मोदी के शासकाल में ही दिल्ली स्थित औरंगजेब सड़क का नाम बदल दिया जाता है. मुगलसराय स्टेशन का नाम बदल कर कायर दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रखा जाता है.

-अरविंद शुक्ला (इस लेख के कुछ हिस्से हमारे लिखे हुए हैं)

साम्प्रदायिकता की आग में अंधी होती सामाजिकता
अमित शाह का इतिहास पुनरलेखन की कवायद पर भड़के लोग
मोदी की ताजपोशी के मायने
अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्षों में मुसलमानों की भूमिका (1763-1800)
इतिहास बदलने की तैयारी में भाजपा सरकार
टीपु के इतिहास के साथ तथ्यात्मक छेड़छाड़ का एक उदाहरण

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Comments 1

  1. ANWAR KHAN says:
    5 years ago

    Good writing

    Reply

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