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हिंसा और हिंसा में फ़र्क़

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 10, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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हिंसा और हिंसा में फ़र्क़

हिंसा और हिंसा. क्या इन दोनों में फ़र्क़ करना, बिल्कुल अहम नहीं ? क्या हम इनको महसूस किए बिना, इनका फ़र्क कर सकते हैं ? क्या इनका फ़र्क़ किए बिना, न्याय का तकाज़ा पूरा होता है ? क्या हिंसा है भी या हिंसा भड़काई गई या हिंसा किसी अंतहीन दु:ख और विकल्पहीनता से उपजी है ?आप कहेंगे कि किसी भी तरह, हिंसा को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. और फिर आप समझेंगे भी कि नहीं कि हिंसा केवल हिंसा ही नहीं होती !

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ठीक वैसे ही, जैसे आप रोटी चुराने वाले और देश चुरा लेने वाले के बीच फ़र्क करना या तो भूल जाते हैं या फिर आप देश चुराने वाले का माल्यार्पण कर के, रोटी चुराने वाले की लिंचिंग कर देते हैं. दोनों ने चोरी की है, पर एक ने भूख से परेशान होकर चोरी की है, दूसरे के लालच की भूख शांत ही नहीं हो रही. क्या आप इन दोनों चोरियों में फ़र्क़ कर पाते हैं ? अगर नहीं, तो ये लेख आपके लिए नहीं है. आप आगे इसे न पढ़ें, तो इस अहम बात का तिरस्कार होने से आप बचा सकते हैं !

हिंसा. अरबन प्लैटर, ऑनलाइन मक्के का आटा 247 रुपए किलो बेच रहा है. आप में से कई लोग, उस को खरीद कर, मूर्खता वाला गर्व करते होंगे. वेकफील्ड उसे 270 रुपए किलो बेच रहा है लेकिन आपको पता है, मक्के की खरीद किसान से पिछले सीज़न में किस भाव से हुई है ? 700 रुपए क्विंटल. 1 किलो हुए 7 रुपए का. एमएसपी लीगल बिना किए, कॉरपोरेट को सीधी खरीद का फ़ायदा दे दिया गया है. और सुन लीजिए, एमएसपी भी लागत से अधिक नहीं है, कई बार उससे कम है. स्वामीनाथन कमेटी ने कहा था – कॉम्प्रिहेंसिव कॉस्ट + कॉस्ट का 50 फीसदी मिलेगा, तब किसान ज़िंदा रहेगा.

ये होती है हिंसा. जब आप किसी की मेहनत का मूल्य छोड़िए, उसे लागत भी नहीं देते. वो कर्ज़ में डूबता जाता है और आत्महत्या करता है. इस हिंसा को आप हिंसा नहीं मानते ?

जब रात 8 बजे टीवी पर आकर, 12 बजे से करेंसी नोटों की वैधता ख़त्म कर दी जाती है. लाइन में लगे लोग मर जाते हैं. छोटे व्यापार में मज़दूरी या तो नहीं मिलती या पुराने नोटों में मिलती है, जो बदले ही नहीं जा पाते, क्योंकि लाइन ख़त्म ही नहीं होती. औरतें और बूढ़े ख़ुदकुशी कर लेते हैं, क्योंकि उनकी जीवन भर की जोड़ी गई, महज कुछ हज़ार या 1 लाख रुपए की घरेलू बचत, आपके जैसे मूर्ख-अपने अपार्टमेंट में बैठ कर, काला धन मान रहे होते हैं. लोगों का अस्पताल में इलाज नहीं हो पाता.

ये होती है हिंसा. जब आपके खून और पसीने को काला धन घोषित कर दिया जाए, जबकि जिनके पास काला धन है, वो हंस कर इसे मास्टरस्ट्रोक बताएं. इस हिंसा को आप हिंसा नहीं मानते ?

कोविड 19 के बाद लॉकडाउन होता है. छोटा व्यापार खत्म हो जाता है. उसे 1 हफ्ते का भी वक़्त नहीं मिलता लेकिन बड़े स्टोर को इजाज़त मिल जाती है व्यापार की. ऑनलाइन व्यापार चलता रहता है. दूधवाला आपके घर नहीं आ सकता लेकिन नेस्ले का दूध है न ! अंबानी की संपत्ति बढ़ जाती है और फिर वो बिग बाज़ार खरीदने निकल पड़ता है.

आप को नहीं मिलते, वो छोटे व्यापारी, खुदरा दुकानदार, मज़दूर, फैक्ट्री वर्कर, कैब ड्राइवर…जो इस दौरान बर्बाद हो गए, जिन्होंने आत्महत्या की. सड़क पर पैदल अपने गांव लौटे, रास्ते में मर गए और 1 महीने ये सब चलने के बाद रेल चलाई गई, किसी अहसान की तरह. ये होती है हिंसा. पर चूंकि ये आपके साथ नहीं हुई, इसलिए हिंसा नहीं है ये. क्यों, इस हिंसा को आप हिंसा नहीं मानते न ?

शांतिपूर्ण प्रदर्शन को दंगे की साज़िश बताकर, गिरफ्तारियां होती हैं. आंतकवाद निरोधी धाराएं लगा दी जाती हैं, प्रदर्शनकारियो पर जबकि जो दंगे खुलेआम फैला रहा था, उस पर एफआईआर तक दर्ज नहीं होती. ये हिंसा नहीं है ?

देश में रोज़गार इतना कम कभी नहीं था. सोचा भी है कि गरीब की हालत क्या है ? कैसे जी रहे हैं लोग ? और फिर वो अपराध करेंगे, तो क्या होगा उनका ?

ये हिंसा ही है.

हिंसा ही होती है, जब छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा में, खनिज निकालने के लिए आदिवासियों को हटाया जाता है. उनके ऊपर गोली चलती है. रेप होते हैं औरतों के और अदालतें चुप रहती हैं. पुलिस और पैरामिलिटरी फोर्स, नौकरी के नाम पर कारपोरेट की सेवा में लगा दी जाती है. सरकार तो साथ मिली ही है और फिर वो हिंसा करते हैं, क्योंकि उनको नहीं पता कि क्या किया जा सकता है आख़िर… ! आपको पता हो तो बताइए उनको कि उनको क्या करना है ?

गाय के नाम पर बेगुनाह लोग मारे जाते रहते हैं.गाय के नाम पर ? सर, गाय केवल एक जानवर है. हां, मनुष्य से बेहतर है, क्योंकि वो बकरी के नाम पर, गाय को नहीं मारती. 2014 में ये सरकार आने के बाद लिंचिंग होती हैं, धर्मविशेष के लोगों की. 2019 का चुनाव जीतते ही, लिंचिंग बंद हो जाती हैं. अब कोई बीफ नहीं खाता. अब गाय, अंबानी के घर एंटिला में रहती है.

दलितों पर जातीय हिंसा होती है. औरतों पर हिंसा होती है, लैंगिक हिंसा.ये तो हिंसा थी ही नहीं. बिल्कुल नहीं. वैदिकी धूर्तता, हिंसा न भवति…!

अदालतें, आपकी निजता को लेकर अजीब फैसले देती हैं. बाबरी मस्जिद किसी ने नहीं गिराई थी. दिल्ली के दंगे, पीड़ितों ने ख़ुद किए थे. किसी सरकारी हवाई जहाज़ की खरीद में किसी कारपोरेट को फ़ायदा नहीं पहुंचाया गया. एचएएल का नुकसान नहीं हुई, उसके कर्मचारियों का भविष्य वैसे ही सुरक्षित है, जैसे बीएसएनएल के लाखों कर्मचारी, उसके बंद होने और अपनी छंटनी की खुशी मना रहे हैं !

आपकी गाढ़ी कमाई के पैसे लेकर, कितने ही लोग विदेश भाग गए. आपके टैक्स के पैसे से कभी मूर्ति लगती है बहुत ऊंची. कभी सेंट्रल विस्टा बनता है. कभी कुछ और … और हां, पीएम की विदेश यात्रा. पीएम समेत एक-एक सांसद-विधायक की सैलरी, उनके फोन के बिल, उनके यात्रा के किराए, घर, खाने की सब्सिडी…सुरक्षा…ये सब आपके टैक्स के पैसे से है. पर छात्रों को सस्ती पढ़ाई नहीं मिलनी चाहिए. वो मांगे, तो वे देशद्रोही हैं.

रेलवे से हवाई अड्डों तक, सब निजी क्षेत्र के हवाले और बेरोज़गार नौजवान आत्महत्या करते हैं. किसान आत्महत्या करता है. औरतें आत्महत्या करती हैं. गरीब मर के भी जी नहीं पा रहा है. पर ये सब हिंसा कहां है ! बिल्कुल नहीं… !

लेकिन 60 दिन से दिल्ली की सीमा पर, इस भीषण सर्दी में टैक्टरों के नीचे, ट्रॉली में खुले में, तंबू में, बारिश से भीगते हुए सो कर अपनी 3 मांगें लेकर बैठा किसान. उसमें से कुछ नौजवान आक्रोशित हो जाते हैं, तो वो ही हिंसा है. बस वो ही…बस उसी हिंसा की निंदा होनी चाहिए क्योंकि वो दु:ख और निराशा की उस इंतेहा से उपजी है, जहां कोई विकल्प नहीं सूझता. जबकि सत्ता की हिंसा जो केवल शारीरिक नहीं है, आर्थिक भी है, मानसिक भी है, भावनात्मक भी है. वो हिंसा नहीं है…!

क्यों ? क्योंकि वो लालच से उपजी है. अभाव, दु:ख, निराशा से उपजी हिंसा ही, हिंसा है. लालच से उपजी हिंसा, हिंसा नहीं है…वो विकास है, रामराज्य है…!

हां, तो क्या हुआ, अगर अभाव की हिंसा, लालच की हिंसा से ही उपजती है. हिंसा फिर भी नहीं होनी चाहिए…! लेकिन लालच की हिंसा न हो तो…? नहीं, वो तो विकास है ! लोकतंत्र के इस नज़ारे को आप को भी देखना होगा. नंबर आपका भी आएगा. बस बाद में आएगा. बाकी किसान को हिंसा नहीं करनी चाहिए. करनी भी है, तो ख़ुद पर करे. आत्महत्या कर ले…!

ये नियम बाकी सब पर भी लागू होता है, जो सत्ता, व्यवस्था, कॉरपोरेट या न्याय व्यवस्था के पीड़ित हैं. जज, पत्रकार, नौकरशाह को राज्यसभा सीट मिल जाती है.

आपको इस तरह की बातों के लिए क्या मिलता है ? सोचिएगा. आप लालच की हिंसा के भी शिकार हैं और उससे उपजी हिंसा के भी. आप ज़्यादा मूर्ख और ज़्यादा पीड़ित हैं दरअसल…क्योंकि आप ज़ेहनी अंधेपन के शिकार हैं. आप पीड़ित भी हैं और आपको पता भी नहीं…!

हां, आपको पता चलेगा. पर आप हिंसा नहीं करेंगे. बिल्कुल नहीं…! लेकिन आप तो सड़क पर कोई गाड़ी भी छुआ दे आपकी कार से, तो उससे मारपीट कर लेते हैं ! ओह, वो सभ्यता है…!

आपकी अहिंसा में अंदर इतनी हिंसा है कि आप का होना भी, मनुष्यता पर हिंसा है सर. आपने नेता भी वैसा ही चुना है. आपको बधाई…! आपकी अहिंसा गरीबों के ख़ून से नहाई हुई है…

  • मयंक सक्सेना

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