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न्याय-व्यवस्था से झूठी उम्मीद जगाती ‘जय भीम’

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 17, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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‘जय भीम’ को लेकर यदि संपूर्णता में बात करें तो यह मौजूदा व्यवस्था में ही हल तलाशने की हद में बंधी हुई फ़िल्म है. यह दर्शक को यह झूठी उम्मीद देती है कि हालाँकि इस व्यवस्था में लड़ना मुश्किल है, लेकिन यह असंभव नहीं है. फ़िल्म यह संदेश उन वक़्तों में देती है जब फासीवादी सत्ता के दबाव तले अन्य संस्थाओं की तरह न्याय-व्यवस्था भी सभी पर्दे उतारकर एक के बाद एक सरकारपरस्ती और जनविरोधी फ़ैसले दे रही है.

न्याय-व्यवस्था से झूठी उम्मीद जगाती ‘जय भीम’

‘जय भीम’ फ़िल्म को लेकर भारत में चर्चा हो रही है. 2 नवंबर 2021 को अमेज़न प्राइम पर रिलीज़ हुई ‘जय भीम’ कुछ ही दिनों में इस ओ.टी.टी. प्लेटफ़ॉर्म पर सबसे अधिक देखी जाने वाली फ़िल्मों में शामिल हो गई है. दूसरी ओर ‘इंटरनेट मूवी डाटाबेस’ पर ‘जय भीम’ 9.6 नंबर लेकर पहले स्थान पर पहुँचने वाली पहली फ़िल्म बन गई है. मूल रूप में तमिल भाषा में बनी ‘जय भीम’ को तेलुगू, मलयालम, कन्नड़ और हिंदी भाषाओं में डब करके भी रिलीज़ किया गया है. फ़िल्म का निर्देशन टी. जे. गननावल ने किया है.

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तमिल फ़िल्मों का चोटी का नायक सूर्य इस फ़िल्म का नायक ही नहीं बल्कि सह-निर्माता भी है. सूर्य की कंपनी द्वारा सामाजिक मुद्दे को उठाने वाली संज़ीदा फ़िल्म पर पैसा लगाना अपने आपमें हिम्मत और जोख़िम भरा काम था. यह अलग बात है कि बाद में यह फ़िल्म बड़ी क़ीमत पर अमेज़न प्राइम ने ख़रीदी.

‘जय भीम’ के नायक का किरदार चंदरू नामक एक वकील पर आधारित है, जिसकी पृष्ठभूमि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारत से जुड़ती है. 1988 में चंदरू को श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेजने के ख़िलाफ़ स्टैंड लेने के चलते पार्टी में से बाहर निकाल दिया गया था. बाद में चंदरू वकील बनकर हाशियाग्रस्त लोगों के केस लड़ता है. 2006 में चंदरू जज बन जाता है. अपने कार्यकाल में चंदरू 96,000 केसों का निपटारा करके दलितों और हाशियाग्रस्त लोगों का ‘मसीहा’ बनकर उभरता है.

‘जय भीम’ चंदरू द्वारा लड़े गए केस पर आधारित है. इस तरह फ़िल्म की कहानी 1993 में तमिलनाडू में घटित एक सच्ची घटना पर आधारित है.

इरूसा क़बीले के लोग खेतों में चूहे पकड़ने और सांप पकड़ने का काम करते हैं. खेतों के मालिक तथाकथित उच्च-जाति के हैं, जो उनसे काम तो लेते हैं लेकिन उनके साथ जातिगत नफ़रत का सलूक करते हैं. राजाकानू और उसकी पत्नी सिंगानी और बेटी अल्ली भी इरूसा क़बीले से संबंधित अन्य लोगों की तरह कच्ची झुग्गी में रहते हैं. अपने लिए पक्का मकान बनाने की ख़्वाहिश रखता राजाकानू ईंटों के भट्ठे पर काम करने लगता है.

बाद में गांव में चोरी हो जाती है. राजाकानू, उसके रिश्तेदारों इरूतूपन और मौसूकुट्टी को चोरी के इलज़ाम में पुलिस गिरफ़्तार करके दमन करती है. बाद में पुलिस उन्हें हवालात में से फ़रार दिखा देती है. फ़िल्म की कहानी राजाकानू की पत्नी सिंगानी की इन तीनों को ढूंढ़ने का क़ानूनी संघर्ष है. इस तलाश में दमन में उसका साथ ग़ैर-सरकारी संस्था की कार्यकर्ता मीथरा और वकील चंदरू देते हैं.

‘जय भीम’ में कहानी कहने के लिए फ़्लैशबैक तकनीक का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल किया गया है. चुस्त पटकथा, कोर्टरूम ड्रामा और अति-यथार्थवादी पेशकारी फ़िल्म को और भी दिलचस्प बनाते हैं. फ़िल्म के किरदारों की अच्छी अदाकारी दर्शक को बांध कर रखती है. फ़िल्म में दिखाया गया जाति आधारित भेदभाव, तथाकथित निम्न जातियों द्वारा पुलिस के पूर्वाग्रह और उन पर किया जाता पुलिस दमन काफ़ी हद तक यथार्थ के आस-पास है.

फ़िल्म का नाम दलित राजनीति के नारे ‘जय भीम’ पर रखा गया होने के कारण दलित हिस्सों में इसे मान्यता मिली है. दूसरी ओर फ़िल्म में दिखाए गए संघर्ष में लाल झंडों का इस्तेमाल और दलित तथा मार्क्सवादी विचारकों के चित्रों/बुतों के इस्तेमाल के कारण कई वामपंथी हलकों ने भी इसकी तारीफ़ की है.

इन सभी तथ्यों के बावजूद भी ‘जय भीम’ को लेकर यदि संपूर्णता में बात करें तो यह मौजूदा व्यवस्था में ही हल तलाशने की हद में बंधी हुई फ़िल्म है. यह दर्शक को यह झूठी उम्मीद देती है कि हालांकि इस व्यवस्था में लड़ना मुश्किल है, लेकिन यह असंभव नहीं है. बस आपके पास लड़ने की इच्छा-शक्ति, मिथरा जैसे ग़ैर-सरकारी संस्था की कार्यकर्ता और चंदरू जैसा क़ाबिल-समर्पित वकील होना चाहिए.

‘जय भीम’ यह साबित करने की कोशिश करती है कि रस्मी पढ़ाई ही हाशियाग्रस्त लोगों की सारी समस्याओं को हल कर देगी. फ़िल्म में पहली बार इथरू क़बीले के लोगों को पढ़ा रही ग़ैर-सरकारी संस्था कार्यकर्ता मिथरा समझाती है. यही बात फ़िल्म के अंतिम दृश्य में दोहराई गई है जब छोटी लड़की अल्ली अख़बार पढ़ने लगती है तो चंदरू इशारों से उसका हौसला बढ़ाता है.

‘जय भीम’ में सारे ज़ुल्म छोटे अफ़सरों द्वारा ही किए गए दिखाए जाते हैं. यह दिखाया गया है कि तरक़्क़ी हासिल करने के लिए वे ऐसे अमानवीय काम करते हैं. सीनियर अफ़सर अच्छे दिखाए गए हैं, जिनका काम या तो ईमानदारी से काम करना होता है और या फिर पुलिस की अच्छी साख क़ायम रखने के लिए निम्न मुलाज़िमों द्वारा किए गए ग़लत कामों को ढंकना होता है.

फ़िल्म में बिना शक सिंगानी का संघर्ष वामपंथियों के नेतृत्व में लोगों द्वारा किए गए संघर्ष को पेश किया गया है, लेकिन ‘जय भीम’ में यह संघर्ष कहीं भी एक हद से आगे नहीं बढ़ता. इसके मुक़ाबले अदालती लड़ाई के पक्ष को ही तरजीह दी गई है. अदालती व्यवस्था को पाक़-साफ़ दिखाया गया है, जहां सत्ता-पक्ष के वकीलों की तिकड़मों के बावजूद अदालत ‘हेबियस कॉर्पस’ की पि‍टीशन को तरजीह के आधार पर ही नहीं सुनती बल्कि उसे बाक़ायदा मुक़द्दमे में तब्दील करके पड़ताल कराकर सरकारी मुजरिमों को सज़ा भी देती है.

उल्लेखनीय है कि फ़िल्म यह संदेश उन वक़्तों में देती है जब फासीवादी सत्ता के दबाव तले अन्य संस्थाओं की तरह न्याय-व्यवस्था भी सभी पर्दे उतारकर एक के बाद एक सरकारपरस्ती और जनविरोधी फ़ैसले दे रही है. जम्मू कश्मीर में धारा 370 ख़त्म करने के बाद अदालतों में दाख़िल की गई ‘हेबियस कॉर्पस’ की याचिकाएं तो अदालतों में महीनों ही धूल चाटती रही.

इस तरह ‘जय भीम’ मौजूदा व्यवस्था में आम लोगों को न्याय की झूठी उम्मीद एक ऐसे समय में दे रही है, जब भारतीय न्याय व्यवस्था हर रोज़ पतन की गहराइयों को छू रही है और आम लोगों का भरोसा इस न्याय-व्यवस्था से उठ रहा है.

  • कुलविंदर (मुक्ति संग्राम से)

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