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ख़ालिद सैफी जी से जेल में मिलने का सफर – इंकलाब जिंदाबाद !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 22, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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ख़ालिद सैफी जी से जेल में मिलने का सफर - इंकलाब जिंदाबाद !
ख़ालिद सैफी जी से जेल में मिलने का सफर – इंकलाब जिंदाबाद !

चलिए आज मैं आप सब को जेल के सफर पर लेकर कर चलती हूं. कल 21.4.22 को मेरी मुलाकात की तारीख थी. सेहरी के बाद से ही बैचेनी थी के मुलाकात पर जाना है, खालीद को मेरा इंतजार होगा. मैं सेहरी के बाद सो नही पाई जैसे 7.30 बजे में उठ कर तैयार हो कर बच्चों को सोता हुआ छोड़ कर चली गई.

मैं सुबह 8 बजे के करीब मंडोली जेल पहुंच गई. मुलाकात के लिए लंबी लाइन लगी हुई थी. उस लाइन में लगे लोगों को देख कर लग रहा था कि आधा मुस्लमान दवातों में मशरूफ है और आधा जेल के अंदर, और बाकी उनके बचे हुए घर वाले कोर्ट और जेल की लाइनों में लगे हैं.

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जेलें मुसलमानों से भरी पड़ी है और मैं देखती हूं किसी की बूढ़ी मां लाइन में लगी है, किसी का बूढ़ा बाप वहां खड़ा पुलिस की गाली खा रहा है. खैर मैं खालिद के लिए 2 जोड़ी कपड़े ले कर गई थी. अंदर पहुंचते ही पता चला कि मैं 1 जोड़ी ही ले जा सकती हूं.

वहां बाहर जो ऑफिसर बैठी थी बेइंतहाई बदतमीज थी. मैंने उससे रिक्वेस्ट की कि मैं ये कपड़े कहा रखूंगी ? तो बोली – बाहर कहीं भी फेंक दें, पर जायेंगे 1 हीं. मैंने उससे ज्यादा बहस नहीं की. अकेले होने की वजह से कपड़ों को बाहर आकर एक साइड में किसी पेड़ के नीचे रख दिया और अल्लाह से कहा कि – तेरे सुपुर्द.

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मैं दुबारा लाइन में लगी और वो स्टेप पार किया. फिर नेक्स्ट लेवल पर पर पहुंची. उस के बाद वहां चेकिंग हुई. वहां मेरा बुरखा उतारा गया. उसके बाद मुझे मेरे बाल खोलने के लिए कहा गया. ये प्रोसेस 2 जगह 2 बार हुआ.

उन लेडिस पुलिस के हाथ लगाने और चेकिंग करने से घिन आ रही थी, और उनका रवैया ऐसा था मानो जैसे उन सब के दिमाग में ये हो कि जेल में बन्द सारे मुसलमान गुनहगार हैं और इनकी फैमिली की कोई इज्जत नहीं है.

जेल मिलने जाना भी अपने आप में एक टॉर्चर है. 3 बार खालिद के 1 जोड़ी कपड़े की चेकिंग हुई. खालीद की जेल तक पहुंचते-पहुंचते थक गई थी, क्यूंकि मुझे 2 घंटे बस इन सब को पार करने में लगे.

खालीद की जेल के बाहर एक ऑफिसर को एक स्लिप दी, जिस से वो खालिद को बुलाते मिलने के लिए. वहां मैं 1/2 घंटा बैठी रही. गर्मी अपने पूरे शबाब पर थी और गरम हवाओं के थपेड़ों से हलक सुख चुका था. इंतज़ार करते हुए एक अजीब-सी घबराहट थी कि काफी दिन बाद मैं खालिद से मिलने जेल आई थी. अक्सर खालिद मुझे मना करते हैं जेल आने के लिए. पर इस बार मेरा दिल नहीं माना और मैं चली गई.

तकरीबन 1/2 घंटे बाद खालिद की आवाज लगी और जल्दी से उठ कर उनसे मिलने गई. वो मुझे देखकर बहुत खुश हुए. उनकी आंखों में चमक थी. हमने फोन उठाया और बातें करनी शुरू की.

बातों से ज्यादा हम बस एक दूसरे को देख रहे थे. हमारे बीच में शीशा और सलाखें थी फिर भी मैं खालिद के हाथों को छूने की कोशिश कर रही थी. उनकी आंखों में मेरे लिए आंसू थे. वो मेरे लिए परेशान थे कि मैं गर्मी में रोज़े की हालत में बच्चों को सोता हुआ छोड़ कर आई हूं. वो मुझे से सॉरी बोल रहे थे कि मेरी वजह से तुझे इतना परेशान होना पड़ रहा है.

में वहां बस उनको सुनने गई थी. वो अपने दिल की बातें सुना रहे थे. जिस तकलीफ से खालिद और हमारे सभी साथी गुजर रहे हैं वो शायद आप और मैं महसूस भी नहीं कर सकते. छत गरम, दिवारें गरम, फर्श गरम, खिड़की से आती हुई हवा गर्म, कूलर नहीं, पंखें मानो बोल रहे हो कि अब हम साथ नहीं दे सकते. चादर गीली करके लेटना पड़ता है.

इस हालत में जब खालिद की तबियत बिल्कुल भी ठीक नहीं, उनको सही खाना नहीं मिल रहा, सही इलाज नहीं मिल रहा, उस हालत में भी एक रोजा नहीं छोड़ रहे, अपनी इबादत में और तरावीह और तहाजुद में कोई कमी नहीं आने दे रहे.

जिस मौसम में आप सारी सहूलियत होने के बावजूद मस्जिद तक नहीं जा रहे उस हालत में भी खालिद का ईमान मजबूती के साथ खड़ा है. खालिद को और मुझे ये पता है कि हमें इस हालत में कुछ नहीं मिल रहा पर हमें अल्लाह मिल रहा है और जब वो मिल जाए तो किसी की जरूरत नहीं होती.

शायद अल्लाह को भी मंजूर था कि हम और बातें करे. पता ही नहीं चला के कब 1/2 घंटा गुजर गया और मेरे पीछे से आवाज आई कि आपका टाइम खतम हो गया है. मैंने उस ऑफिसर से कहा 2मिनट रुकिए तो उस ने कहा – ‘मैडम 15 मिनट का टाइम होता है और आप को तो फिर काफी देर हो गई है.’ मैं समझ गई और मुस्कुरा कर उसको थैंक्यू बोली.

उसकी दूसरी आवाज सुनते ही दिल को धक्का लगा क्यूंकी मुझे खालिद को फिर से उस जहन्नुम में छोड़ कर आना था, जहां इंसान को इंसान नहीं समझा जाता.

फोन रखते हुए उनकी और मेरी आंखों में आंसू थे, मानो वो कह रहे हो कि मुझे साथ ले चल और मैं भी बोल रही हूं कि मैं थक गई हूं अकेली भागते-भागते. अब बहोत हो चुका मेरे साथ चलो.

ये सब अभी मुमकिन नहीं था. हमने अल्लाह हाफिज करके फोन काटा और एक-दूसरे को देख कर चले गए. बाहर आते हुए और उनसे बिछड़ते हुए आंसू रूक ही नहीं रहे थे.

बाहर आते-आते एक जगह ऐसा लगा कि अंधेरा छा गया है. पैर कांपने लगे. वहां एक पुलिस वाला बोला – क्या हुआ ? चक्कर आ गया था शायद आपको. फिर उसने मुझे बैठने को बोला. पानी ऑफर किया पर रोजा था तो मना कर दिया. कुछ मिनट आराम मिलने के बाद उस भाई को शुक्रिया बोला और में बाहर आ गई.

7.30 सुबह से शुरू हुआ सफर बाहर आने तक दोपहर11.30 तक चला. फिर ऑटो करके अपने घर 12 बजे तक पहुंची. घर आते ही बच्चो ने गले लगाया और अब्बू के बारे में पूछने लगे. अपने बच्चों के लिए खालिद गिफ्ट के तौर पर लेटर्स लिखे थे तो मैंने वो बच्चो को दे दिए. तीनों लेटर्स ले कर बहुत खुश हुए.

आप सभी को खालिद ने सलाम भेजा है. अपनी दुआओं में खालिद और सभी को याद रखे. अल्लाह हमें और आपको हिम्मत के साथ एक जूट हो कर तानाशाही, फासीवाद से लड़ने की ताकत दे.

मोमिनो के लिए तो दुनिया वैसे भी कैद खाना है, तुम हमें कैद करो हम यूसुफ बन कर जेल को नूर की रोशनी से मुन्नवर करेगें. न डरे थे, न डरेंगे इंशाअल्लाह. नाइंसाफी की इस लड़ाई को हिम्मत के साथ जारी रखेंगे.

मैं तुम्हें पाने की हर आखिरी कोशिश करूंगी. मैं तुम्हें किस्मत के हवाले नहीं छोड़ सकती. मैं आप की कमजोरी नहीं हूं, मैं आप की हिम्मत बनकर आपके साथ हर हाल में खड़ी हूं.

  • नरगिस खालिद सैफी

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