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किसान आंदोलन को इतिहास का सलाम !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 7, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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किसान आंदोलन को इतिहास का सलाम !

Kanak Tiwariकनक तिवारी, वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, छत्तीसगढ़

मौजूदा किसान आंदोलन राष्ट्रीय पर्व है. वह अवाम के सबसे प्रतिनिधि अंश का आजादी के बाद सबसे बड़ा जनघोष है. सैकड़ों किसानों की मौतें हो चुकी. लाखों करोड़ों दिलों का वह स्पंदन गायन बन चुका. वह ईंट दर ईंट चढ़ते इरादों की मजबूत दीवार है. करोड़ों किसान सैद्धांतिक हरावलदस्ता बनकर निजाम से जायज अधिकारों की पहली बार पुरअसर मांग कर रहे हैं. हमवतन सरकार से संवैधानिक अधिकार लेने का यह जानदार मर्दाना उदाहरण है. वे मुकम्मिल सत्याग्रह के रास्ते चलकर अधिकार हासिल करना चाहते हैं, जो संसद के मुखौटे की आड़ में छीने जा रहे हैं.

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ऐसा नहीं कि सरकारें कानून वापस नहीं लेती रही हैं. ऐसा भी नहीं कि किसानों के पक्ष में देश के बुद्धिजीवी, अर्थशास्त्री, सियासती ताकतें और ईमानदार नागरिक नहीं खड़े हैं. किसान आंदोलन पूरी तौर पर अहिंसक है. यह दुनिया के किसी भी जनआंदोलन के मुकाबिले इतिहास की पोथियों में दर्ज किया जााएगा. रूस, वियताम, क्यूबा, मांटगोमरी और सैकड़ों जगहों पर कुछ हुए जनआंदोलनों से तुलना की जाएगी. नेताविहीन किसान आंदोलन विश्व इतिहास का श्रेय बनेगा. हो ची मिन्ह, लेनिन, मार्टिन लूथर किंग, फिदेल कास्त्रो और गांधी जैसा कोई नेता नहीं है.

किसानों ने इतिहास में नई फसल बोई है. वह अमिट स्याही से पानी पर पत्थर की लकीर की तरह लिखी है. पीढ़ियों की यादों की आंखों में फड़कती रहेगी. कायर रहने की हर कोशिश को एक मनुष्य इकाई बताकर मुफ्त में चावल मिल जाने लोगों के वोट को निजाम की ताबेदारी करने का चुनावी आचरण बनाया जाता है, जिनके पूर्वजों ने इतिहास की उजली इबारतों पर काली स्याही फेर दी जिनमें दिमागी वायरस होता है. वे पसीना बहाने वाले किसानों के अहिंसा आंदोलन को काॅरपोरेटियों की तिजोरियों, पुलिस की लाठियों, और मंत्रियों की लफ्फाजी में ढूंढ़ना चाहते हैं.

एक वाचाल भक्तमंडली राष्ट्रीय जीवन में टेस्टट्यूब बेबी की तरह है. उसे कोफ्त है कि किसान अमीर क्यों हैं ? उनके पास टैक्टर क्यों है ? छह महीने की लड़ाई की घोषणा करके पूरी तैयारी के साथ कैसे आ गए ? उनके घरों की महिलाएं, बच्चे, बूढ़े सभी साथ क्यों हैं ? सभी तरह की तकनीकी जानकारियों और तकनीकी व्यवस्था से लैस क्यों हैं ? इन बुद्धिशत्रुओं को समझ नहीं कि किसान वे भी हैं, जो लाखों की संख्या में लगातार आत्महत्या करने मजबूर हो रहे, जिन्हें स्वामीनाथन रपट मानने के आश्वासन के बावजूद सरकारों द्वारा फसल की कीमत देने को लेकर धोखा दिया जा रहा है.

उन्हें लफ्फाज राजनीतिक नेताओं द्वारा नियंत्रित सहकारी बैंकों में अपनी जमीन, महिलाओं के जेवर और पिता की बुढ़ापे की पेंशन तक गिरवी रखनी पड़ रही है और छुड़ाने में असमर्थ हैं. बेटी का ब्याह नहीं कर पा रहे हैं. मां, बाप की दवा नहीं ला पा रहे. पत्नी की अस्मत को बुरी नजरों से बचाने मुनासिब वस्त्र तक नहीं खरीद पा रहे. बच्चे हालत की मजबूरी के कारण पढ़ाई छोड़कर या तो मां बाप के खेतों पर काम कर रहे या उन्हें बहला फुसलाकर शोहदे बनाकर लफंगों द्वारा ऐसे अपराध करवाए जा रहे जिनमें पीड़ितों में निर्भया जैसी बेटियां भी शामिल हैं.

किसान धरती पुत्र हैं. किसानों के बेटे पुलिस की नौकरी में हैं. भाई की लाठी सगे किसान भाई की पीठ पर मारी जा रही है. किसान नहीं गए थे सुप्रीम कोर्ट में कि न्याय करो. किसानों के बेटे आलिम फाज़िल भी हैं. अर्थशास्त्र, इंजीनियरिंग, डाॅक्टरी और मानव विज्ञानों की डिग्रियां हैं. वे नोटबंदी, जीएसटी, नागरिकता अधिनियम, कश्मीर, कोरोना पीड़ितों वगैरह के कई मुकदमों में सुप्रीम कोर्ट का न्याय देख चुके. सुप्रीम कोर्ट के कुछ जज मनोरंजक सुभाषित और सूक्तियों का प्रवचन करते रहते हैं. उन्हें आने वाला इतिहास पढ़कर सिर धुनते हुए पुलकित होना चाहेगा.

पस्त भारतीय जनता ने सल्तनतों के साथ ही कुषाण, हूण, पठान, तुर्क, मुसलमान, मुगल, अंगरेज, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, डच और बाद में चीनी हमले झेले हैं. तब गांधी की अहिंसा और सत्य, अभय, भगतसिंह और चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत और सुभाष बोस के पराक्रम तथा भारत के तमाम संतों और बुद्धिजीवियों द्वारा ‘उठो जागो और मकसद हासिल करो‘, ‘स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है‘, ‘जय जवान जय किसान‘, ‘दिल्ली चलो‘, ‘इंकलाब जिंदाबाद‘, ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा‘, ‘आजादी की घास गुलामी के घी से बेहतर,‘ ‘किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों एक हो‘, ‘आराम हराम है‘ जैसे नारों ने भारत की मर्दानगी का इतिहास लिखा. ये नारे जिन आत्माओं से फूटे, उनके लिए अनाज किसानों ने खून पसीने से धरती सींचकर पैदा किया था.

किसान आंदोलन भारतीय आत्मा की निरंतरता और प्रवाहमयता का पड़ाव है. यह अनथक काल यात्रा चलती रहेगी, जब तक किसान जीवित हैं. उनमें जिजीविषा, जिद और जिरह है. मौजूदा किसान आन्दोलन न तो पहली धड़कन है और न ही अंतिम. इसमें हार जीत नहीं है. सरकारों, प्रतिहिंसकों, पुलिस सेना, अंधभक्तों, दलालों, काॅरपोरेटियों और हर अहंकारी शक्ति के जमावडे़े को जनता की आवाज का यह एक प्रतिनिधि ऐलान है. इस आवाज को कुचल दिये जाने के बाद भी इसका आगाज इतिहास में आगे चलकर दर्ज होता रहेगा. नौजवानों, छात्रों, महिलाओं, दलितों, वंचितों और किसानों द्वारा आज़ादी का नारा लगाते आंदोलन करना देश की धड़कन को जिलाए रखने का प्रोत्साहन है.

यही शोला है जो भगतसिंह और चंद्रशेखर आज़ाद में दहका था. भगतसिंह ने कहा था मैं हिंसक नहीं हूं. जनता में साहसी अहिंसक इंकलाब का बीज बोना चाहता हूं. इतिहास को दु:ख है कि भगतसिंह की बौद्धिक तीक्ष्णता गांधी संयोगवश पढ़ नहीं पाए. वही अग्नि लाखों नाामालूम किसानों और करोड़ों देशवासियों में कहीं न कहीं सुलग रही है. भले ही उस पर सफेद राख उसके बुझ जाने का छद्म रच रही हो. भारत अभी मरा नहीं है, कभी नहीं मरेगा. अमर है. किसान मेहनत के दम पर कपड़े पहनता है. बीवियों के लिए गहने बनवाता है. बच्चों की तालीम, मां बाप को इलाज के लिए विदेश भी भेज सकता है. धरती की छाती फोड़कर एक साथ मुल्क में इंसानियत, भाईचारा, अमन चैन और आर्थिक रिश्तों को भी उगाता है. वह दलाली नहीं खाता. कुछ लोग हिंदुस्तान के किसान आंदोलन में सेंधमारी कर रहे. वह काम तो चूहे और दीमक ज़्यादा अच्छी तरह करते हैं और किसान का सबसे ज़्यादा.

किसान आंदोलन का जो भी हश्र हो, वह हौसला कभी नहीं मरेगा. हुक्काम रहेंगे लेकिन वे पांच पांच साल तक अपनी अगली जिंदगी मांगने के लिए जिन दहलीजो पर आएंगे। उनमें सबसे ज्यादा संख्या तो किसानों की है. यदि पूरे देश के किसान किसी तरह से एकजुट होते तो आंदोलन इतने दिन चलने की ज़रूरत नहीं होती. किसान को सभी सरकारों द्वारा जानबूझकर बदहाल रखा गया है. किसान को काॅरपोरेट की गुलामी कराने पूंजीवादी षड़यंत्र रचा गया है. वह साजिश, अट्टहास, बदगुमानी और अहंकार के कानून की इबारत में भी गूंज रहा है. किसान ने अपनी ज्ञानेन्द्रियों के जरिए उसे देख, सुन और सूंघ लिया है. काॅरपोरेट और निजाम के नापाक गठजोड़ को तार तार कर दिया है.

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केन्द्रीय निजाम बहुत कड़े और सरकारी प्रतिहिंसा के नए मानक बन रहे सोपानों पर चढ़कर किसान आंदोलन को कुचलने की हरचंद कोशिश करेगा, उसने शुरू कर दिया है. इस निजाम ने तो कोरोना महामारी को भी भुनाकर देश की तमाम प्राकृतिक दौलत, जंगल, खनिज अपने मुंहलगे दो तीन खरबपति काॅरपोरेटियों को दहेज की तरह दे दिया है. पुलवामा को भी तो अवसर में बदला जा चुका है. अर्णव गोस्वामी के चैट्स को भी आपदा में अवसर समझकर सरकार विरोधियों को कुछ नहीं करने देगा. इस देश की न्याय व्यवस्था पर पूरी तौर पर भले कब्जा नहीं हो, जुगाड़ कर निजाम ने संजीव भट्ट, लालू यादव, भीमा कोरेगांव के मानव कार्यकर्ताओं और केरल से लेकर के दिल्ली तक के ईमानदार पत्रकारों और छात्रों को जेल से नहीं छूटने देने या उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट पर टेसुए बहाकर भी उन छात्रों को ढूंढ़ा तो नहीं है. वह दिल्ली दंगों के विदूशकों से खलनायक बनाए गए व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का हुक्म देने वाले हाईकोर्ट के जज का आधी रात को तबादला करा ही चुका है. वह सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पर अपने साथी दल के आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री के जरिए अवमाननायुक्त खुलकर आरोप लगवा कर चुप्पी साधे बैठा है.

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गांवों पर आधारित गांधी का हिंदुस्तान जाने कब से भरभरा कर गिर पड़ा है. गांवों पर दैत्याकार महानगर उगाए जा रहे हैं. उन्हें अंगरेजी की चाशनी में ‘स्मार्ट सिटी‘ का खिताब देकर किसानों से उनकी तीन फसली जमीनों को भी लूटकर विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के नाम पर अंबानी, अडानी, वेदांता, जिंदल, मित्तल और न जाने कितने काॅरपोरेटियों को दहेज या नज़राने की तरह तश्तरी पर रखकर हिंदुस्तान को ही दिया जा रहा है. मौजूदा निजाम चतुर कुटिलता का विश्वविद्यालय है.

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हिंसा के खुले खेल में ‘जयश्रीराम‘ को बदहवास नारा बनाते विपरीत विचारधाराओं को रावण के वंश का नस्ली बताया जाए. दल बदल का विश्व कीर्तिमान बनाकर सभी दलों से नर पशुओं को खरीदा जाए. ईवीएम की भी मदद से संदिग्ध चुनावों को लोकतंत्र की महाभारत कहा जाए. सदियों से पीड़ित, जुल्म सहती, अशिक्षित, गरीब, पस्तहिम्मत जनता को कई कूढ़मगज बुद्धिजीवियों, मुस्टंडे लेकिन साधु लगते व्यक्तियों से अनैतिक कर्मों में लिप्त कथित धार्मिकों के प्रभामंडल के जरिए वैचारिक इतिहास की मुख्य सड़क से धकेलकर अफवाहों के जंगलों या समझ के हाशिए पर खड़ा कर दिया जाए.

भारत के अतीत से चले आ रहे राम, कृष्ण, बुद्ध, नानक, महावीर, चैतन्य, दादू, कबीर, विवेकानन्द, गांधी, दयानन्द सरस्वती, पेरियार, फुले दंपत्ति, रैदास जैसे असंख्यविचारकों के जनपथ को खोदकर लुटियन की नगरी बताकर अपनी हुकूमत के राजपथ में तब्दील कर दिया जाए. मुगलसराय को दीनदयाल उपाध्याय नगर और औरंगजेब रोड नाम हटाकर या इलाहाबाद को प्रयागराज कहकर सांप्रदायिक नफरत को भारत का नया और पांचवां वेद बना दिया जाए.

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कृषि कानूनों में आश्वस्त प्रामाणिकता होती तो अवाम की उम्मीदों को निराश करता लगने वाला सुप्रीम कोर्ट भी कह देता कि शाहीन बाग की घटनाओं की तरह हटाओ अपने आंदोलन का टंटा. कोर्ट ने भी तो आननफानन में सरकारी समर्थकों की ऐसी कमेटी बनाई जो एक सदस्य के इस्तीफा दे देने से चतुर्भुज से त्रिभुज, नहीं नहीं त्रिशंकु की तरह हो गई.

राजसी मुद्रा में खुश होकर चापलूसों को अंगूठी देने वाली हुकूमतों की पारम्परिक मुद्रा में निजाम ने कहा वह इन कानूनों को डेढ़ साल तक स्थगित रखने को तैयार है. निजाम ने यह नहीं बताया कि अडानी जैसे काॅरपोरेट ने न जाने क्यों सैकड़ों बड़े बड़े पक्के गोदाम बनवा रखे हैं. वहां किसानों को कृषि कानूनों के चक्रव्यूह में फंसाकर पूरी उपज को लील लेने का षड़यंत्र किसी बांबी के सांपों की फुफकार की तरह गर्वोन्मत्त होता होगा. कोई जवाब नहीं है सरकार के पास ऐसी नायाब सच्चाइयों के खिलाफ.

कैसा देश है जहां सबसे बड़ी अदालत में किसी भी सरकार विरोधी को अहंकार की भाषा में सरकारी वकीलों द्वारा जुमला खखारती भाषा में आतंकी, अर्बन नक्सल, पाकिस्तानी एजेंट, खालिस्तानी, हिंसक देशद्रोही, राष्ट्रद्रोही, टुकड़े टुकड़े गैंग का खिताब दिया जाए और शब्दों की बाल की खाल निकालने वाली बल्कि उसके भी रेशे रेशे छील लेने की कूबत वाले सुप्रीम कोर्ट को ऐसे विशषणों का कर्णसुख दिया जाए.

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लोकतंत्र में क्या प्रधानमंत्री अंतरिक्ष से आता है, जो संविधान की एक एक इबारत को सरकार की स्तुति के सियासी पाठ में तब्दील करने को भी आपदा में अवसर बनाना समझता होगा ! सरकारों ने संविधान में किए गए भविष्य वायदों के परखचे तो लगातार उखाड़े हैं. जनता की कायर अहिंसा अंदर ही अंदर निश्चेष्ट होकर सोचती भर रही कि इसके बावजूद देश के सबसे अमीर आदमी को दुनिया का सबसे अमर आदमी वक्त का फायदा उठाते कैसे बना दिया जा रहा है.

एक अपने निहायत अजीज उद्योगपति को इतनी तेज गति से विकसित किया जा रहा है जो गिनीज बुक आफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में अव्वल नंबर पर दर्ज हो गया है. इंग्लैंड में मोम के पुतलों की नुमाइश में संविधान पुरुष का आदम कद दुनिया को दिखे. साथ-साथ सड़क पर रेंगते मरे हुए कुत्ते का मांस खाकर अपनी जिंदगी बचाने की कोशिश करते, नालियों, मोरियों की दुर्गंध अैर सड़ांध में जीते, लाखों गरीब बच्चे, औरतें, यतीम और जिंदगी से परेशान बूढे बुजुर्ग मौत मांगते भी निजाम के लिए ‘जय हो, जय हो‘ का नारा लगाना नहीं भूलें.

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राष्ट्रऋषि तो महान किसान आंदोलन चलते रहने पर भी किसानों से खुट्टी किए बैठे हैं. उसके विपरीत उद्योगपतियों, क्रिकेट खिलाड़ियों, फिल्मी तारिकाओं और न जाने किनसे किनसे दुख सुख में मिलने या हलो हाॅय करने की मानवीय स्थितियों की मुद्रा के प्रचारक हुए. दुनिया के पके हुए आंदोलनों से साहस, सीख और प्रेरणा लेकर भारत के किसानों ने इतिहास में एक नई फसल बोई है. वह अमिट स्याही से लिखी है. वह पानी पर पत्थर की लकीर की तरह लिखी है. वह पीढ़ियों की यादों की आंखों में फड़कती रहेगी. लोग इतिहास पढ़ने से डरते हैं, जिनके पूर्वजों ने इतिहास की उजली इबारतों पर काली स्याही फेर दी है. जो गोडसे के मंदिर में पूजास्तवन करते हैं, उनमें दिमागी वायरस होता है. वह पसीना बहाने वाले किसानों के अहिंसा आंदोलन को काॅरपोरेटियों की तिजोरियों, पुलिस की लाठियों और मंत्रियों की लफ्फाजी में ढूंढ़ना चाहता है.

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मीडिया का बहुलांश भी क्या ऐसा ही नहीं है ? वह काॅरपोरेटी और सरकारी जूठन को छप्पन भोग समझता है. उसके पैरों के नीचे से उसके ही अस्तित्व की धरती खिसक गई है. उसका जमीर बिक गया है. उसकी कलम झूठी तस्वीरें खींचने के हुक्मनामे ढोते कैमरे और जी-हुजूरी में तब्दील हो गई है. उसे पांच और सात सितारा होटलों में अय्याशी की आदत हो गई है. वह भारत के इतिहास का नया गुलाम वंश है. उसकी संततियां आगे चलकर कभी अपने पूर्वजों के कलंकित इतिहास के कारण आईने के सामने खड़े होने में शर्माएंगी.

आर्थिक और नैतिक अधोपतन के कारण वे एक बोतल शराब या कुछ रुपयों में अपना जमीर पांच साल के लिए इन्हीं नेताओं की बेईमानी में बंधक बना देते हैं. ये वही नेता हैं जो रेत की नीलामी में प्रति टन की दर से दलाली खा रहे हैं. देश का कोयला, लोहा, खनिज और धरती बेचकर एक ही मुंह से अडानी, अंबानी, जयश्रीराम, जयहिन्द, मेरा भारत महान और इंकलाब जिंदाबाद कर लेते हैं. शराबखोरी के कैंसर फैलाकर अपनी रातें रंगीन करते दलालों को नगरपिता बना रहे हैं. उनके दोमुंहे सांपों के आचरण को किसान समझता है क्योंकि सांप धरती पर ही तो रेंगते होते हैं. किसान धरती पुत्र ही तो हैं.

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धरती के इतिहास में कभी नहीं हुआ कि लोकख्याति के आधार पर हुए चुनाव का सबसे बड़ा जनप्रतिनिधि अवाम से बात नहीं करने की काॅरपोरेटी गलबहियों की जुगाली करता रहे. पिछड़े वर्ग के व्यक्ति ने अपने घर में अपनी बीवी के आचरण को कोसते हुए राजरानी सीता पर कटाक्ष कर दिया गया था. इस बात पर राम ने अपनी गर्भवती पत्नी तक का त्याग कर दिया था. उसी राम का मंदिर बनाने की चंदाखोरी में मशगूल लोग राम के चित्र को महानायक बना दिए गए प्रधानमंत्री की विराट देह की उंगली पकड़कर बच्चा बनकर जाते हुए देखने पर भी ‘जयश्रीराम‘ का नारा महान विपर्यय के रूप में लगाते रहते हैं.

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नहीं गए थे किसान भारत की सुप्रीम कोर्ट में कि न्याय करो. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा लाखों रुपए की हार्ले डेविडसन मोटरबाइक पर बैठ कर फोटो खिंचाने पर कटाक्ष करने वाले जनहित याचिकाकारों के पैरोकार वकील प्रशांत भूषण पर अवमानना का मुकदमा देख चुके हैैं. कई जज जरूर हैं जिनकी कलम और वाणी से सूझबूझ, निष्कपटता, साहस और न्यायप्रियता से मुनासिब आदेश झरते हैं. कई हाई कोर्ट में भी ऐसे जज हैं, नहीं होते तो न्याय महल भरभरा कर गिर भी जाता.

किसान ही वह लोहारखाना है जहां मनुष्य की नैतिकता के उत्थान के लिए कालजयी हथियार बनते हैं. ये हथियार शोषक नहीं, रक्षक होते हैं.

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कहां है देश की संसद ? कहां हैं विधानसभाएं ? केवल भाजपा नहीं कांग्रेस में भी वही सियासी आचरण है. कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को भाजपाई प्रधानमंत्री की शैली की नकल करने में अच्छा लगता है. एक एक राज्य का भाग्य एक एक खूंटे से बांध दिया गया है. उस खूंटे को मुख्यमंत्री कहते हैं. जनता तो गाय, बैल, भेड़, बकरी वगैरह का रेवड़ है. उनके संगठित पशु समाज को नहीं है उन्हें राजनीतिक दलाली के विश्वविद्यालय में दाखिला मिलता है. परिपक्व अक्ल और पूरी ईमानदारी के साथ गैर-भाजपाई राज्यों में किसान आंदोलन को उसकी भवितव्यता के रास्ते पर चलाया जा सकता था. गैर भाजपाइयों ने भी बेईमानी की है.

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भारतीय किसानों के असाधारण आंदोलन को गांधी का नाम जपने वाले सभी लोगों ने भी धोखा दिया है. अब छाती कूटने का क्या मतलब है कि किसानों को गांधी के अहिंसक रास्ते पर चलना चाहिए ? कोई समझे, महीनों तक शतप्रतिशत अहिंसक आंदोलन कोई इसलिए करेगा कि वह गणतंत्र दिवस की परेड में शरीक होकर देश के राजपथ पर मार्च करने पर नैतिक दृष्टि से मजबूर या उदात्त आचरण करे ?

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हर देश में अंधकार का युग आता है. भारत में मिथकों के काल से बार बार आता रहा है, तभी तो दशावतार की परिकल्पना की गई. हर सत्ता सम्राट को हमारे महान विचारकों ने ही राक्षस कहा है. जिनकी छाती से जनसेवा के लिए देवत्व फूटा, वही समाज उद्धारक बना. यह भारतीय किसानों की छाती है जिससे भविष्य का जनसमर्थक इतिहास कभी न कभी फूटने वाला है. मिथकों के युग के बाद भी पस्त भारतीय जनता ने विदेशी हमले झेले हैं, सल्तनतों की गुलामी की है.

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जो लोग पंचमांगी, सांप्रदायिक, पूंजीपरस्त, देश के दुश्मन और गरीब के रक्तशोषक हैं, वे नहीं जानते पंजाब की पांचों नदियों में केवल हिमालय का ठंडा पानी नहीं गुरुनानक से लेकर भगतसिंह, ऊधमसिंह, करतार सिंह सराभा और बाद की पीढ़ी का भी गरमागरम लहू बहता रहा है. यह देश गुलामों, पस्तहिम्मतों, बुद्धि-शत्रुओं, नादानों, बहके हुए लोगों और आवारा बनाई जा रही पीढि़यों का मोहताज नहीं है. बहादुर तो कम ही होते हैं. बुद्धिजीवी भी कम होते हैं. विचारक तो और कम होते हैं. सच्चे साधु संत और भी कम लेकिन वे ही तो मनुष्यता के विकास के अणु और परमाणु होते हैं.

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यह अलग बात है कि सत्तामूलक मानसिक बीमारों द्वारा प्रिंट, इलेक्ट्राॅनिक और सोशल मीडिया पर चीन के युवान शहर की तरह की उपजी कोई दूसरी वैचारिक महामारी कोविड 19 की जगह कोविड 21 बनकर काॅरपोरेट और निजाम की ताकत के बल पर फैलाई जा रही है. माहौल और इतिहास को प्रदूषित किया जा रहा है. अतीत को पढ़ने की नज़र पर भी रंगीन चश्मा चढ़ाया जा रहा है. लोग बहक रहे हैं. डरपोक हो गए लोग सरकारों से डरते हैं.

ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरह भारत में यूरो अमेरिकी गुलामी का वेस्ट इंडिया बनाने की सरकारी कोशिश है. इसलिए भारतीय नामों के बदले हमें ‘मेक इन इंडिया‘, ‘स्टार्ट इंडिया‘, ‘स्मार्ट सिटी‘, ‘बुलेट ट्रेन‘, ‘स्टार्ट अप‘, अर्बन नक्सल‘, ‘टुकड़े टुकड़ै गैंग‘ जैसे विस्फोटक ककहरे पढ़ाए जा रहे हैं.

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कोरोना से लड़ने की अपनी दुर्बुद्धि और नाकामी छिपाने के लिए लोगों से तालियां, थालियां बजवाई जाती रही हैं. दिए, मोमबत्ती और टाॅर्च जलाए जाते रहे हैं. आसमान से हवाई जहाजों पर बैठकर उन पर भी फूल बरसाए जाते रहे हैं, जिनके परिवार हुक्मरानों के अत्याचार के कारण तरह तरह से पीडि़त हैं.

विज्ञान के दम पर संवैधानिक यात्रा करने वाले देश को बताया जा रहा है कि बादलों में राडार छिप जाते हैं और तब उस पर सर्जिकल स्ट्राइक करने से पड़ोसी देश को पता तक नहीं चलता. जनता को सच नहीं बताया जाता. नक्शे जारी नहीं होते. गुलाम मीडिया का कैमरा नहीं पहुंचता कि चीन हमारे देश में घुसकर धरती नाप रहा है, गांव बसा चुका है.

जनता को बताया जाता है कि चीनी वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं करें, लेकिन खुद सरकार इसके बावजूद चीन से करार करती जा रही हैै. सरकार के काॅरपोरेटी नयनतारे काॅरपोरेटी चीन के साथ समझौते में हैं. पाकिस्तान के साथ भी हैं जबकि हर देशभक्त भारतीय पर पाकिस्तानी होने का ठप्पा लगा दिया जाता है. दोहरे आचरण में जिलाया जा रहा भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे अभिशप्त उदाहरण बनाया जा रहा है.

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प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के लिए खरीदा गया कोई साढ़े आठ हजार करोड़ रुपयों के हवाई जहाज क्या भारतीय किसानों के आंदोलन का जवाब हैं ? क्या नए संसद भवन को बनाए जाने की जरूरत भी है, उस गांधी के अनुसार जिसकी मुद्रा में बैठकर चरखा पकड़कर फोटो खिंचवाने वाले सदरे रियासत को यह मालूूम नहीं है कि गांधी ने कहा था कि अंगरेज वाॅयसराय या प्रधान सेनापति या तमाम अफसरों की कोठियों को अस्पतालों और जनोपयोगी संस्थाओं में बदल दिया जाए ? प्रधानमंत्री से लेकर सभी सरकारी सेवक छोटे मकानों में रहें.

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प्रधानमंत्री और गृह मंत्री अपने कपड़ों के लिए चरखे पर बैठकर खादी का सूत बुनते थे. वे दस लाख का सूट नहीं पहनते थे. काजू के आटे की रोटी नहीं खाते थे. महंगे मशरूम की सब्जी नहीं खाते थे. जनता के खर्च पर विश्व यात्राएं कर सकते थे लेकिन उन्होंने यह सब कुछ मौजूदा प्रधानमंत्री के लिए छोड़ दिया.

सरदार पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति बनाने का दम्भ करने वाले नहीं बताते अपने समर्थकों को कि गांधी तक की हिम्मत असमंजस में थी, तब बारदोली के किसान सत्याग्रह के नायक बनकर सरदार पटेल ने भारत को रोमांचित किया था. क्यों नहीं जानते कि राजकुमार शुक्ला जैसा चम्पारन मोतिहारी का नामालूम किसान नहीं होता, तो गांधी तो चम्पारन के नायक के रूप में इतिहास की गुमनामी में जाने कब तक पड़े रहते.

उसी बिहार में उत्तर भारत से चलकर आने वाले हजारों लाखों गरीबों, मजलूमों को मरते देखकर भी छाती में करुणा नहीं पिघलती. अपनी जीत का अंदाज होने पर शिव गुफा में बैठकर फोटो खिंचाते दुनिया के सामने नाटक प्रपंच करने पड़ते हैं.

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कहा था चर्चिल ने पीछे हटने पर कि हम लड़ाई हारे हैं, लेकिन युद्ध नहीं हारे हैं. कहा था गौतम बुद्ध ने बोधिवृक्ष के नीचे बैठकर यह मेरी सात्विक जिद है कि जब तक परम ज्ञान को प्राप्त नहीं कर लूंगा, यहां से नहीं हटूंगा. कहा था गांधी ने अफ्रीका में पीटर मेरिट्सबर्ग के स्टेशन पर अंग्रेज़ सार्जेेट द्वारा सामान की तरह फेंक दिया जाने पर अपनी आंखों के मौन में कि याद रखना मैं एक दिन दक्षिण अफ्रीका को आज़ाद करने के वास्ते अहिंसक अणुबम बनाकर दिखाऊंगा और हिंदुस्तान को उसके भविष्य के कैलेण्डर में 15 अगस्त 1947 का दिन टांक कर तोहफा दूंगा.

इसलिए इतिहास और भविष्य गाल बजाने वालों के नहीं होते. वीर मर जाएंगे तो गीत गाने वाले कवि भी मर जाएंगे. ये समाजचेता कवि भी हैं, जो इतिहास में चरित्र और इंसान बनाते हैं. सुप्रीम कोर्ट को बाबा साहेब अंबेडकर की अगुवाई वाले संविधान द्वारा दी गई असाधारण संविधान शक्तियों की समझ में विस्तारित, व्याख्यायित और व्यक्त करना चाहिए था. कर्तव्यबोध के प्रति उदासीनता न्यायपालिका को भी सालती रहेगी.

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