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Home लघुकथा

लंच टाइम

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 17, 2021
in लघुकथा
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1969 में इंदिरा गांधी ने किया था बैंकों का राष्ट्रीयकरण. जो बैंक राष्ट्रीयकृत हुए थे उनमें से एक था सेन्ट्रल बैंक ऑफ इंडिया. अब जिन बैंकों के दरवाज़े से आम लोगों (तब बस अमीर और गरीब हुआ करते थे, मिडिल क्लास जैसा कुछ नहीं था) को ‘हट गरीब’ कह कर भगा दिया जाता था, उन्हें भी बैंक के अंदर आने का अवसर मिला.

इस अवसर का लाभ उठाया 1950 को जन्मे एक युवा ने. युवा की आयु 1970 में 20 वर्ष की थी और आज यह युवा पहली बार बैंक जाने वाला था. नहीं, ये युवा बैंक में पैसा जमा कराने नहीं जा रहा था. यह युवा तो अति गरीब था और घर से भागा हुआ था, ये केवल बैंक कैसा होता है, ये देखने के लिए बैंक में जाना चाहता था.

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एन्काउंटर

उस जमाने में बैंक छोटे-छोटे होते थे झोपडी जैसे, और सिंगल काउंटर होता था. आज के जैसे लोगों के बैठने की कोई सुविधा नहीं थी.

दोपहर के दो बजे लड़का झोपड़ीनुमा बैंक के सामने खड़ा था, आज वो बहुत खुश था. वह बैंक के अंदर जाएगा, फिर बैंक वाले भैया से थोड़े पैसे मांग लेगा. बैंक के पास तो बहुत पैसा होता है. थोड़ा उसको दे देने पर भी कम नहीं होगा, वह मन ही मन सोचने लगा.

‘ए लड़के !!! ए ! ए ! ए ! कहां घुसे चला आ रहा है ?’ एक कर्कश आवाज़ युवा के कानों में गूंजी.

युवा ने आवाज़ की ओर ध्यान दिया तो पाया कि बैंक के सामने एक चौकीदार खड़ा है. अपने ख़याली पुलाव पकाने में युवा इतना खोया हुआ था कि उसको बैंक के सामने चौकीदार दिखाई ही नहीं दिया था.

युवा ने कहा कि ‘बैंक के अंदर जाना है मुझे.’ चौकीदार ने कहा कि ‘ये लंच टाइम है, अभी नहीं जा सकते.’

‘लंच टाइम मतलब ?’ युवा ने हिम्मत जुटा कर पूछा.

‘लंच मतलब खाना, अभी सब खाना खा रहा है.’ चौकीदार ने जवाब दिया.

‘खाना खाने का भी भला कोई टाइम होता है !! मुझे तो जब खाना मिलता है तब खाना खा लेता हूं.’ युवा ने कहा.

‘ए हॉफ पैंट तू जाता है कि नहीं !!! अभी लंच टाइम है. तुम अंदर नहीं आ सकता.’ चौकीदार ने गुस्से से युवा को चिढ़ाते हुए कहा.

यह सुन कर युवक को गुस्सा आ गया और युवा ने चौकीदार को धक्का दिया और जबरदस्ती बैंक के अंदर घुसने लगा. चौकीदार पहले पहलवान रह चुका था और हट्टा-कट्टा था. उसने पतले दुबले युवा को एक ही हाथ से उठा लिया, दो चक्कर हवा में गोल-गोल घुमाया और रोड की तरफ उछाल दिया.

अब युवा की आंखों में आंसू थे. उसका घुटना छिल चुका था, कोहनी पर निशान आ गया था लेकिन ये सब तो वो चोट थी जो उसके शरीर पर लगी थी, असली घाव तो उसके मन में हुआ था. उसको लग रहा था कि उसे जानबूझ कर बैंक के अंदर जाने से रोका गया है.

यह सोच-सोच कर उसकी आंखों से आ रहे थे आंसू और आ रहा था याद की कैसे चाणक्य को धनानंद ने अपने महल से बाहर फेंक दिया था और फिर कैसे चाणक्य ने धनानंद का सर्वनाश कर दिया था !

घर से भागने से पहले युवा नाटक मंडली का हिस्सा था और एक अच्छा अभिनेता था, तो नाटक खेलते-खेलते ही उसे ये कहानी मालूम हुई थी क्यूंकि किताबों से उसे कुछ मालूम होना संभव नहीं था. किताब उसको अपनी दुश्मन लगती थी.

युवा को अब गांधी भी याद आ रहे थे कि कैसे गांधी को एक अंग्रेज़ ने ट्रेन से फेंक दिया क्यूंकि वो गोरे नहीं थे, बदले में गांधी ने गुस्से को मां बहन कि गाली दे कर नहीं निकाला, उन्होंने उस गुस्से को पाला और अंग्रेज़ हुकूमत को देश से बाहर फेंक दिया.

युवा अब अपने को गांधी के ज्यादा करीब पा रहा था. और ऐसा हो भी क्यों ना, युवा भी गुजराती था, गांधी भी गुजरात के ही थे.

युवा ने आग्नेय नेत्रों से बैंक के उस बोर्ड को देखा जिसमें लिखा था ‘Central bank of India.’ युवा ने जोर से बैंक की ओर देखते हुए कहा, ‘जैसे आज सेन्ट्रल बैंक वालो तुमने मुझे चौकीदार के हाथो बैंक से बाहर फेंक दिया है, एक दिन मैं भी चौकीदार बन कर तुम्हारा ये बैंक ही बेच डालूंगा.’

इस घटना को 50 साल बीत जाते हैं.

50 साल बाद ‘The Economic Times’ नाम के अखबार में पहले पन्ने की खबर थी – ‘India shortlists four banks for potential privatisation: The four banks on the shortlist are Bank of Maharashtra, Bank of India, Indian Overseas Bank and the Central Bank of India.’ अर्थात ‘भारत निजीकरण के लिए चार बैंकों को शॉर्टलिस्ट करता है: शॉर्टलिस्ट पर चार बैंक हैं – बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया.’

  • जेम्स बॉन्ड नवम

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