Thursday, July 23, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home लघुकथा

लोटा और कलश

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 8, 2024
in लघुकथा
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

उनको देखा तो हैरत में पड़ गया. ऐसा तो पहले कभी न हुआ था.

‘आपके हाथ में यह लोटा कैसा !’ मैं तपाक से बोल उठा.

You might also like

कथाकार व उपन्यासकार कैलाश वनवासी का समकालीन कथा साहित्य में एक जरूरी हस्तक्षेप

UPSC में 301वां रैंक को लेकर जब आकांक्षा सिंह के सपने में आया ब्रह्मेश्वर सिंह

एन्काउंटर

‘यह लोटा नहीं कलश है…’ उन्होंने मुझे झिड़कते हुए कहा.

‘मुझे तो लोटा लगा…’

‘कलेश न करो, कलश ही है…’

‘दोनों में अंतर क्या है !’

‘वही जो हड्डी और अस्थि में…’ उन्होंने अंतर स्पष्ट किया. हालांकि मैं समझ न सका.

‘काफी चमक रहा है !’

‘अपने आंसुओं से धोया है !’ यह कहते हुए उनकी आंखें नम नहीं हुईं, अलबत्ता छाती कुछ जरूर फूल गई.

‘अगर आप नाराज न हों तो एक बात पूछूं !’ मैंने आग्रह किया.

‘पूछो !’

‘मैं अभी भी नहीं समझ पाया कि लोटे और कलश में क्या अंतर होता है !’

‘अरे भई जरा सी बात आपको समझ में नहीं आती !’ उन्होंने आप कह कर मुझे इज्जत नहीं बख्शी थी, व्यंग्य किया था.

‘तभी तो मैं यहां हूं आप वहां !’ मैंने वस्तुस्थिति का वर्णन किया जो पूर्णतः सत्य था.

‘देखो ! लोटे को एक हाथ से उठाया जाता है, मगर कलश को दोनों हाथों से थामा जाता है !’

‘ओहो, तो यह है आप की उन्नति का रहस्य !’

‘कैसा रहस्य !’ वे चौंके.

‘पहले किसी न किसी का लोटा उठाना चाहिए, फिर उसके बाद आप उस व्यक्ति के कलश को थामने के दावेदार हो जाते हैं !’

‘अब तो लोटा उठाने वाले कहां रहे !’ यह कहकर कहीं खो-से गए.

‘लोटा तो हमारे जमाने में उठाया जाता था, उसकी एक संस्कृति होती थी…एक सभ्यता होती थी…परंपरा होती थी’ कहते-कहते वे चुप हो गए.

‘अच्छा !’ मैं उनके लोटा ज्ञान पर मुग्ध हो चला.

‘हम लोगों में होड़ लगी होती थी कि श्रद्धेय का लोटा कौन उठाएगा ! कुछ लोग तो लोटा उठाने के लिए लोट जाया करते थे !’ वे आंखें बंद करके बोले।

‘अभी भी तो यही चल रहा है !’

‘भक्क ! अब तो नये वाले अरथी तक सही से नहीं उठाते लोटा क्या खाक उठाएंगे !’ वे थोड़ा सख्त हुए. ‘

‘ उठाते-उठाते तभी आप इतने ऊपर उठे हैं !’

‘बात सिर्फ इतनी सी नहीं है !’ वह कलश को देखते हुए बोले.

‘फिर !’

‘जब आप किसी गुणी का लोटा उठाते हैं तो आपको उससे भरपूर संगत करने का अवसर मिलता है, तब आपमें स्वतः ही उसके गुण ट्रांसफर हो जाते हैं !’

‘वाह ! आभार आपका !’

‘किस बात के लिए !’

‘मेरी संकीर्ण सोच को व्यापक बनाने के लिए !’

‘यही नहीं… लो और सुनों ! लोटा उठाने से कितनों की लुटिया डूबने से बच जाती है !’ वे जोश में बोल गए.

‘वाह क्या बात है !’ उनकी यह बात मुझे जमी.

‘ ये सुनो ! एक साहब तो अपने श्रद्धेय का दिन-रात लोटा उठाए रहते थे,..एक दिन तंग आकर उनके श्रद्धेय ने कहा कि भई तुम्हारी श्रद्धा के आगे नतमस्तक हूं, मगर शौचालय में तो लोटा उठाए मत घुस आया करो !’ यह कहकर वे हंसे.

‘गजब का कंम्टीशन था तब तो !’

‘यही नहीं…. लोटा ही नहीं उठाना होता था, उसको चमकाना भी होता था !

‘कैसे चमकाते थे फिर !’

‘राख से मलमल कर साफ करते थे, अगर लोटा पीतल का हो तो सोने का लगने लगता था !’

‘काफी मेहनत करते थे उस जमाने में !’

‘तुम्हें यह मेहनत लगती है, मगर यह हमारे संस्कार थे, जानते हो वह राख कौन-सी होती थी !’ वे आगे बोले.

‘जी आप ही बताएं ! मैं अकिंचन इतना कुछ कहां जान सकता हूं !’ मैंने असमर्थता व्यक्त की.

‘श्रद्धा की राख से !’ उन्होंने अपनी आंखों को मूंदते हुए कहा.

‘तो इस कलश में भी राख है !’ मैंने कलश को देखते हुए कहा !

‘नहीं खाली है !’ वह कलश पर हाथ फेरते हुए बोले.

‘राख कहां गई !’

‘उसको तो नदी में प्रवाहित कर दिया !’

‘अब कलश का क्या करेंगे आप !’

‘इसको अपने ड्रांइगरूम में रखूंगा !’ वह कलश पर हाथ फेरते हुए बोले.

‘और पुराना वाला लोटा !’

‘अब वह कहां रहा !’

‘क्यों क्या हुआ !’

‘उसको स्टोररूम में रख दिया !’

‘ऐसा क्यों !’

‘उसमें छेद हो गया था !’

‘अरे आप को कौन सा पानी पीना या भरना था !’

‘अच्छा नहीं लगता !’ अब वे सच बोले.

‘अरे उसी लोटे की बदौलत तो आप आज यहां तक पहुंचे !’

‘इस बात से मैं कब इंकार कर रहा हूं !’

‘फिर !’

‘लेकिन अब यहां से मुझे आगे जाना है !’

‘जो कलश आपको पहुंचाएगा !’

वे मुस्कुराए मगर कुछ न बोले.

जब वे जा रहे थे तब मुझे लगा जैसे उनके पीछे उनका लोटा उठाने वालों की एक लंबी कतार चल रही हो !

उनके जाने के बाद मैं सोचता हूं, गणतंत्र की झांकी में लोटे और कलश की एक झांकी हर बार जरुर निकलनी चाहिए. लोटा पीतल का और कलश सोने का होना चाहिए. आम आदमी लोटा उठाए है, जो भरा है मगर पानी से नहीं उसके आंसुओं से और नेता कलश थामे है जिसके अंदर राख है, हां मगर दंगों में जली हुई बस्तियों की राख…

  • अनूप मणि त्रिपाठी

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
G-pay
Previous Post

उपवर्गीकरण का फैसला : भारत को जाति की समस्या को हल करने वाले आरक्षण मॉडल की आवश्यकता है, न कि इसे कायम रखने की

Next Post

सीरियाई राष्ट्रपति फरार, अमरीकी प्रॉक्सी गुट HTS ने की फतह की घोषणा

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

लघुकथा

कथाकार व उपन्यासकार कैलाश वनवासी का समकालीन कथा साहित्य में एक जरूरी हस्तक्षेप

by ROHIT SHARMA
March 17, 2026
लघुकथा

UPSC में 301वां रैंक को लेकर जब आकांक्षा सिंह के सपने में आया ब्रह्मेश्वर सिंह

by ROHIT SHARMA
March 11, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
लघुकथा

मैं रहूं न रहूं, पर लड़ाई ज़िंदा रहेगी : एक अपरिचय से परिचय तक की दहला देने वाली मुलाक़ात

by ROHIT SHARMA
February 7, 2026
Next Post

सीरियाई राष्ट्रपति फरार, अमरीकी प्रॉक्सी गुट HTS ने की फतह की घोषणा

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

13 दिसम्बर, 2023 को भगत सिंह लौट आये ?

December 13, 2023

कविता की भाषा में किसान आंदोलन !

November 9, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
Uncategorized

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

July 20, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.