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माजुली द्वीप के अस्तित्व पर मंडराता संकट हमारे लिये एक चेतावनी है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 27, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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माजुली द्वीप के अस्तित्व पर मंडराता संकट हमारे लिये एक चेतावनी है

पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ

क्या आपने माजुली द्वीप का नाम सुना है ? शायद आप लोगों को ज्ञात न हो कि माजुली द्वीप असम की ब्रह्पुत्र नदी के मध्य बसा भारत का पहला ऐसा नदी द्वीप है, जिसे अभी हाल ही (2016) में जिला बनने का गौरव प्राप्त हुआ है. माजुली द्वीप जोरहाट शहर से मात्र 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और असम के विधानसभा समष्टि के 99 नंबर निर्वाचन क्षेत्र (यह अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट है) तथा माजुली लखीमपुर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जिस पर वर्तमान में सांसद बीजेपी के प्रदान बरुआह हैं और शायद आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि असम के वर्तमान मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल, यहां से अभी बीजेपी विधायक हैं और 2014 में सांसद थे. क्या आप माजुली द्वीप के बारे कुछ और जानते हैं ?

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शायद आपको ये भी ज्ञात न हो कि 2011 की जनगणना अनुसार माजुली में 167,304 लोगों की आबादी थी, जिसमें कुल 192 गांवों में 32,236 परिवार थे अर्थात एक परिवार में एवरेज 5 से ज्यादा सदस्य थे और 168 परिवारों का एवरेज हरेक गांव में था. उस समय पुरुषों की संख्या 85,566 और स्त्रियों की संख्या 81,738 थी, जो लैंगिक अनुपात में 4.5 प्रतिशत कम थी. उस समय 5 साल से कम उम्र वाले बच्चे 22,062 थे जिसमे 11,324 बालक और 10,738 बालिकाएं थी, जो लैंगिक अनुपात को बढ़ाने वाली अर्थात 5.2 þ था और उस समय माजुली द्वीप की साक्षरता दर 68.20þ थी, जिसमें महिला साक्षरता 61.33þ और पुरुष साक्षरता 74.76þ थी. उस समय वहां अनुसूचित जाति के 23,878 और अनुसूचित जनजाति के 77,603 लोग रहते थे (ये आंकड़े इसीलिये लिख रहा हूं ताकि आपको सनद रहे कि माजुली में 1971 के बाद रहने लायक जमीनी क्षेत्र लगातार घट रहा है, जबकि जनसंख्या एकदम से बढ़ रही है.




ये हालात तब है जब रोज़गार, शिक्षा आदि की तलाश में बड़ी संख्या में यहां के लोगों का द्वीप से बहिर्गमन भी हुआ. बावजूद इसके जनसंख्या का घनत्व बढ़ा. द्वीप में 47þ जनसंख्या अनुसूचित जाति/जनजाति की है, जिनमें मिसिंग, देउरी और सोनोवाल-कछारी इत्यादि शामिल हैं. मगर माजुली की 53þ आबादी में अन्य असमिया जातियों-उपजातियों (जैसे-कलिता, कोंच, नाथ, अहोम, चुतीया, मटक और ब्राह्मणों) के अलावा कमोवेश संख्या में नेपाली, मारवाड़ी और मुसलमानों के साथ-साथ दूसरे क्षेत्र के बंगाली और चाय जनजाति के लोग भी वर्षों से यहां बसोवास कर रहे हैं और ये सब उस भयमिश्रित क्षण का इन्तजार कर रहे हैं, जब उनका सब कुछ इस द्वीप के साथ ख़त्म हो जायेगा. जी हां, शायद आप नहीं जानते लेकिन माजुली द्वीप भारत का वो हिस्सा है, जो 2030 तक पानी में पूरी तरह डूब कर ख़त्म हो जायेगा. 2030 में (अगर हम जीवित होंगे तो) इसके खत्म होने का शोक भी हम लोग मना लेंगे लेकिन क्या हम इस सच से सामना करने को तैयार है कि माजुली द्वीप मानवजनित कारणों से दिन प्रतिदिन सिकुड़ रहा है और अपना अस्तित्व खोने की और बढ़ रहा है ?

अपनी आंखे बंद कीजिये और महसूस कीजिये वे जो माजुली द्वीप के लोग कर रहे हैं अर्थात जब आपको पता हो कि आपकी जमीन, आपका घर, आपकी दुकान, सब कुछ, कुछ ही समय में नष्ट हो जायेगा, मगर आप जिन्दा बचे रहेंगे. महसूस कीजिये उस डर को जब आप रोज इन्तजार करते हैं उस दिन का जिस दिन ये बर्बादी होगी (मैं तो सिर्फ सोचने मात्र से सिहर रहा हूं). वे कैसा महसूस करते होंगे, जो वहां रहते हैं और इस सच्चाई से वाक़िफ़ हैं. और वे हर पल एक डर के साथ इन्तजार कर रहे हैं उस समय का, जब उनके पास कुछ नहीं बचेगा. और ये सब इसलिये होगा क्योंकि हम इंसान प्राकृत्तिक संसाधनों का नाजायज दोहन और दुरूपयोग अपनी सुविधाओं के लिये कर रहे हैं.




माजुली द्वीप भारत का सबसे बड़ा और विश्व के उन चुनिंदा बड़े द्वीपों में से है जो नदी द्वीप के रूप में जाने जाते हैं. नदियों की दिशा और क्षेत्र के परिवर्तन के कारण ऐसे द्वीपो का अस्तित्व बनता है, लेकिन इंसानों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का दुरूपयोग इनके नष्ट होने का मुख्य कारण होता है. माजुली द्वीप असम की वो सांस्कृतिक राजधानी है, जहां से पूर्वी असम में नव-वैष्णव विचारधारा का उद्भव हुआ. 7वीं सदी के भौगोलिक इतिहास में भी इसका माजोली (मध्य का या दो नदियों के बीच की समान्तर भूमि) के रूप में जिक्र मिलता है. उस समय ब्रह्मपुत्र को लोहित, लुहित या लुईत के नाम से जाना जाता था. और दिखौ, धनशिरी, भोगदोई, झांजी, दिहिंग इत्यादि कई नदिया सहायक हुआ करती थी लेकिन इंसानी दखअंदाजी ने इन नदियों की धाराओं के साथ छेड़छाड़ की और नहरें निकाली, बांध बनाये और भी न जाने कैसे-कैसे अपनी सुविधाओं के लिये दुरूपयोग किया, जिससे इनका अवांछित दिशा क्षेत्र में परिवर्तन हुआ और इसी के कारण इस द्वीप का अस्तित्व खतरे में आ गया है.

अंग्रेजों के समय में (1853) ये नदी द्वीप 1246 वर्ग किमी था और आज 2019 में 352 वर्ग किमी ही बचा है (20वीं सदी की शुरुआत तक भी इसका क्षेत्रफल 880 वर्ग किलोमीटर था) अर्थात जितना नुकसान प्राकृतिक कारणों से एक सदी से भी ज्यादा के समय में नहीं हुआ, उससे ज्यादा नुकसान इंसानी दखलंदाजी से मात्र कुछ ही वर्षां में हो गय .और इसका अस्तित्व तक पर खतरा मंडराने लगा है. कहा जा रहा है कि 2030 तक इसका अस्तित्व सदा के लिये ख़त्म हो जायेगा. आज इस समस्या को मैं उठा रहा हूं, हो सकता है आने वाले समय में आपको इसके बारे में न्यूज चेनलों की बहस भी देखने को मिले या सदन में भी ये मुद्दा बने, मगर क्या इससे पहले हम इससे सबक लेंगे ? असल में माजुली द्वीप हमारे लिये एक चेतावनी है और अगर हम नहीं सुधरे तो एक दिन पूरा भारतीय उपमहाद्वीप इसी तरह पानी में समाकर ख़त्म हो जायेगा !




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