
भारतीय राजनीति के बड़े हिस्से में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) को अक्सर क्रांतिकारी और प्रगतिशील ताकतों के रूप में पेश किया जाता है. लेकिन इतिहास को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि यह छवि एक रणनीतिक तरीके से बनाई गई मृगतृष्णा से ज्यादा कुछ नहीं है.
असल में, यह राजनीतिक सफर रणनीतिक समझौतों और सोची-समझी राजनीतिक विश्वासघातों की कहानी है. इन फैसलों ने सिर्फ कांग्रेस और वामपंथ को कमजोर नहीं किया, बल्कि लोकतांत्रिक विपक्ष की पूरी जगह को व्यवस्थित तरीके से खत्म कर दिया, जिससे बंगाल में हिंदू राष्ट्रवादी उभार के लिए रास्ता साफ हो गया.
जब 1997 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर TMC बनाई, तो मुख्य उद्देश्य पश्चिम बंगाल में स्थापित विपक्ष का पूरी तरह सफाया करना था. इसे हासिल करने के लिए पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राज्य की राजनीति में औपचारिक प्रवेश को आसान बनाया. 1999 तक संगठन BJP के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल हो गया, जिससे पहले पांच साल की हिंदू राष्ट्रवादी सरकार को वह स्थिरता मिली जिसकी उसे जरूरत थी.
हालांकि 2001 में थोड़ी दूरी बनाई गई, लेकिन ममता बनर्जी ने 1999 में BBC को दिए एक महत्वपूर्ण इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि BJP उनकी ‘स्वाभाविक सहयोगी’ है. यह रिश्ता इतना गहरा था कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद भी पार्टी NDA में बनी रही. 2003 में, RSS के मुखपत्र पंचजन्य के संपादक तरुण विजय की किताब के लॉन्च कार्यक्रम में शामिल होने के दौरान, उन्हें ‘बंगाल की दुर्गा’ कहा गया. वामपंथ के खिलाफ लड़ाई में RSS से मजबूत समर्थन पाने के बाद उन्होंने मोहन भागवत, शेषाद्रि चारी और मदन दास देवी जैसे लोगों को ‘सच्चा देशभक्त’ बताया, जो देश से गहरा प्रेम करते हैं.
2000 के दशक में यह राजनीति BJP के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती रही. 2006 तक, सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के जरिए पार्टी ने आर्थिक सुधारों के खिलाफ जनता को सफलतापूर्वक संगठित किया, जिससे बंगाल का औद्योगिक भविष्य लगभग ठप हो गया. यह सिर्फ स्थानीय विरोध नहीं था; यह जनवादी सत्ता हासिल करने के लिए राज्य की आर्थिक आकांक्षाओं को रणनीतिक रूप से तोड़ने की प्रक्रिया थी.
बाद में, सितंबर 2011 में यह राजनीति विनाशकारी चरम पर पहुंच गई, जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ढाका के ऐतिहासिक दौरे पर थे. जब देश तीस्ता जल संधि के जरिए एक कूटनीतिक सफलता की उम्मीद कर रहा था, तब ममता बनर्जी ने आखिरी समय में आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल से खुद को अलग कर लिया. इस रणनीतिक बाधा के कारण भारतीय प्रधानमंत्री को वैश्विक मंच पर शर्मिंदगी उठानी पड़ी और वह उस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं कर सके जिसका वादा उन्होंने खुद शेख हसीना से किया था. भारत की रणनीतिक विदेश नीति से ऊपर क्षेत्रीय जनवादी राजनीति को रखने के कारण उन्होंने न सिर्फ भारत-बांग्लादेश संबंधों को एक दशक तक कमजोर किया, बल्कि केंद्र की UPA सरकार को ‘कमजोर और पंगु’ बताने वाली छवि को भी मजबूत किया.
इसी दौरान TMC ने बंगाल में कांग्रेस को खत्म करना शुरू किया—उसके जमीनी कार्यकर्ताओं को अपने साथ लेकर उस पार्टी को राजनीतिक नक्शे से मिटाना शुरू कर दिया जिसने उसे सत्ता तक पहुंचने में मदद की थी. यहां तक कि 2012 में भी पंचजन्य ने उनके सादगीपूर्ण जीवन की तारीफ करते हुए लेख प्रकाशित किया. सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सितंबर 2022 में, जब राष्ट्रीय विपक्ष एकजुट होने की कोशिश कर रहा था, तब ममता बनर्जी ने खुले तौर पर RSS की तारीफ करते हुए उसे ‘अच्छा संगठन’ बताया, जिसमें ‘बहुत अच्छे लोग’ हैं.
यह दोहरापन 2019 के CAA-NRC विरोध प्रदर्शनों के दौरान फिर सामने आया. जहां सड़कों पर प्रदर्शन किए गए, वहीं संसद में अहम वोटिंग के दौरान TMC के आठ सांसद रहस्यमय तरीके से अनुपस्थित रहे, जिससे बिल पास होने में सीधी मदद मिली. यह रणनीतिक सहयोग जनवरी 2020 में चरम पर पहुंचा; जब BJP के अनुराग ठाकुर ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को’ जैसे भड़काऊ नारे से माहौल गरमा रहे थे, उसी समय मुर्शिदाबाद के जालंगी ब्लॉक में TMC के अध्यक्ष ताहिरुद्दीन मंडल पर कथित तौर पर CAA विरोधी प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आरोप लगा.
जालंगी की इस हिंसक झड़प में दो निर्दोष लोगों—अनारुल विश्वास और सलाहुद्दीन—की मौत हो गई. ऐसे घटनाक्रम, और शेख आलम जैसे नेताओं की भड़काऊ बयानबाजी—जिन्होंने मार्च 2021 में ‘चार पाकिस्तान’ बनाने की बात कही थी—ने सांप्रदायिक नैरेटिव को और मजबूत किया, जिससे हिंदू राष्ट्रवादी ध्रुवीकरण की राजनीति को जड़ जमाने के लिए सही माहौल मिला.
इस राजनीति की ‘घूमते दरवाजे’ जैसी प्रकृति का उदाहरण मुकुल रॉय बने, जो 2017 में BJP में गए और फिर 2021 में वापस लौट आए. लौटते समय उन्होंने कहा, ‘BJP और TMC एक बराबर हैं.’ यहां तक कि जुलाई 2022 के उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा का समर्थन न करने का फैसला भी सीधे तौर पर जगदीप धनखड़ के पक्ष में गया—जो राज्यपाल रहते हुए राज्य सरकार के लगातार आलोचक रहे थे.
आज जबकि अंध समर्थक दावा करते हैं कि वह BJP के खिलाफ आखिरी दीवार हैं, सच्चाई इससे कहीं ज्यादा कठोर है. 34 साल के वाम शासन को खत्म करते हुए नेतृत्व ने सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को नहीं हराया; उसने उस संगठित राजनीतिक ढांचे को व्यवस्थित तरीके से नष्ट कर दिया जो कभी सांप्रदायिक लामबंदी के खिलाफ एक दीवार का काम करता था. उस 40 प्रतिशत वोट बैंक को अस्थिर स्थिति में धकेलकर इस प्रशासन ने एक विशाल राजनीतिक खालीपन पैदा किया—जिसे हिंदू राष्ट्रवाद के लिए खुला छोड़ दिया गया.
शायद सबसे बड़ी विडंबना ‘ट्रांसफरेबल राजनीतिक कैडर’ की रचना में है. वामपंथ को खत्म करने के लिए जिन नेताओं को तैयार किया गया—जैसे मुकुल रॉय और शुभेंदु अधिकारी—वही बंगाल में BJP की सबसे बड़ी ताकत बन गए. विचारधारा की जगह सत्ता की राजनीति को प्राथमिकता देकर इस प्रशासन ने भविष्य के हिंदू राष्ट्रवादी नेताओं की एक तरह से ‘नर्सरी’ चला दी.
इसके अलावा, 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान, INDIA गठबंधन की संस्थापक सदस्य होने के बावजूद, उन्होंने अचानक गठबंधन में चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया और ‘एकला चलो’ की नीति अपनाई. गठबंधन के विस्तार का विरोध और नीतीश कुमार जैसे नेताओं से सार्वजनिक टकराव ने उसी गठबंधन को कमजोर कर दिया, जिसका नेतृत्व करने का दावा वह करती थीं.
इस आत्मघाती रणनीति का अंतिम परिणाम मई 2026 के ऐतिहासिक विधानसभा चुनावों में देखने को मिला. पहली बार BJP ने TMC के किले को तोड़ते हुए 207 सीटें हासिल कीं और TMC को सिर्फ 80 सीटों तक सीमित कर दिया. एक बेहद प्रतीकात्मक हार में ममता बनर्जी खुद अपनी भवानीपुर सीट अपने पूर्व सहयोगी से प्रतिद्वंद्वी बने शुभेंदु अधिकारी से 15,000 से ज्यादा वोटों से हार गईं. जिस ‘अल्पसंख्यक एकजुटता’ पर वह भरोसा करती थीं, वह भी टूट गई, क्योंकि आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) और फिर से मजबूत हुए कांग्रेस-वाम गठबंधन ने वोट बांट दिए. इससे साबित हुआ कि किसी भी समुदाय को वैचारिक खालीपन में स्थायी वोट बैंक नहीं माना जा सकता.
अब पार्टी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था. जिस तरह हिंदू राष्ट्रवाद के उभार ने ओडिशा की बीजू जनता दल (BJD), महाराष्ट्र की बंटी हुई शिवसेना, पंजाब की शिरोमणि अकाली दल (SAD), उत्तर प्रदेश की सिमटती बहुजन समाज पार्टी (BSP) और असम गण परिषद (AGP) जैसी क्षेत्रीय ताकतों को कमजोर किया, उसी तरह 2026 के जनादेश ने TMC के लिए भी अप्रासंगिकता का वही रास्ता तय कर दिया. यहां तक कि जनता दल (यूनाइटेड) और आम आदमी पार्टी (AAP) का क्षेत्रीय प्रभाव भी लगातार चुनौती में दिखाई दे रहा है.
बंगाल पर कमजोर होती पकड़ उस आक्रामक राजनीति का सीधा परिणाम है जिसने हिंदू राष्ट्रवादी उभार के लिए रास्ता बनाया. सामूहिक गठबंधनों को ठुकराकर और अकेले लड़ने का रास्ता चुनकर नेतृत्व ने सिर्फ अपने राजनीतिक अंत की पटकथा नहीं लिखी; उसने BJP के ऐतिहासिक विस्तार का मार्ग भी तैयार किया.
इतिहास ममता बनर्जी को ऐसे नेता के रूप में याद करेगा जिन्होंने प्रगतिशीलता का मुखौटा पहनकर लोकतांत्रिक मूल्यों का सौदा अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक विरासत के लिए किया. इस छिपे हुए योगदान ने आखिरकार उसी अजगर को ताकत दी जिसने अब उनके अपने गढ़ को निगल लिया है. बंगाल का वर्तमान बदलाव अवसरवाद और वैचारिक खालीपन पर बनी एक राजनीतिक व्यवस्था के अनिवार्य अंत को दिखाता है.
- नाथानियल राहुल
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