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मनरेगा क्यों जरूरी है और मोदी सरकार लाख कोशिशों के बावजूद इसे क्यों खत्म नहीं कर पायी ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 12, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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इसमें कोई संदेह नहीं है कि केन्द्र की मोदी सरकार अंधों और अनपढ़ों की सरकार है. यह जिस चीज का विरोधी करती है, बाद में फिर उसी को जी-जान से पर भद्दे तरीके से अपनाने लगती है. आधार कार्ड, एफडीआई, जीएसटी पर मोदी सरकार का दोगला चरित्र उजागर हो गया है.

इसी तरह मनरेगा को जिसे मोदी ने स्वयं कहा था ‘कांग्रेस की विफलताओं का जीता जागता स्मारक है’, को अब दोगुनी ताकत से लागू कर रहा है. इसका प्रमाण भाजपा के भोंपू केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद का ‘मनरेगा’ पर अपनी उपलब्धि का राग अलापते हुए कहना है कि ‘कांग्रेस सरकार के समय में मनरेगा में 21.4 फीसदी लोगों को फायदा हो रहा था, लेकिन हमारी सरकार में ये आंकड़ा 67.7 फीसदी पहुंच गया है.’

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मनरेगा के सवाल पर मोदी सरकार के दोमुंहापन पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक लेख लिखा है, जिसे एक अखबार ने छापा है. अपने पाठकों के लिए सोनिया गांधी के लेख को हू-ब-हू हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं.

मनरेगा क्यों जरूरी है और मोदी सरकार लाख कोशिशों के बावजूद इसे क्यों खत्म नहीं कर पायी ?

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून, 2005 (मनरेगा) एक क्रांतिकारी और तर्कसंगत परिवर्तन का जीता जागता उदाहरण है. यह क्रांतिकारी बदलाव का सूचक इसलिए है क्योंकि इस कानून ने गरीब से गरीब व्यक्ति के हाथों को काम व आर्थिक ताकत दे भूख व गरीबी पर प्रहार किया. यह तर्कसंगत है क्योंकि यह पैसा सीधे उन लोगों के हाथों में पहुंचाता है, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है.

विरोधी विचारधारा वाली केंद्र सरकार के छः साल में व उससे पहले भी, लगातार मनरेगा की उपयोगिता साबित हुई है. मोदी सरकार ने इसकी आलोचना की, इसे कमजोर करने की कोशिश की, लेकिन अंत में मनरेगा के लाभ व सार्थकता को स्वीकारना पड़ा. कांग्रेस सरकार द्वारा स्थापित की गई सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ-साथ मनरेगा सबसे गरीब व कमजोर नागरिकों को भूख तथा गरीबी से बचाने के लिए अत्यंत कारगर है. खासतौर से कोरोना महामारी के संकट के दौर में यह और ज्यादा प्रासंगिक है.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की संसद द्वारा सितंबर, 2005 में पारित मनरेगा कानून एक लंबे जन आंदोलन तथा सिविल सोसायटी द्वारा उठाई जा रही मांगों का परिणाम है. कांग्रेस पार्टी ने जनता की इस आवाज को सुना व अमली जामा पहनाया. यह हमारे 2004 के चुनावी घोषणापत्र का संकल्प बना और हममें से इस योजना के क्रियान्वयन के लिए अधिक से अधिक दबाव डालने वाले हर व्यक्ति को गर्व है कि यूपीए सरकार ने इसे लागू कर दिखाया.

मनरेगा का विचार क्या था ?

इसका एक सरल सिद्धांत है : भारत के गांवों में रहने वाले किसी भी नागरिक को अब काम मांगने का कानूनी अधिकार है और सरकार द्वारा उसे न्यूनतम मजदूरी के साथ कम से कम 100 दिनों तक काम दिए जाने की गारंटी होगी. इसकी उपयोगिता बहुत जल्द साबित भी हुई.

यह जमीनी स्तर पर, मांग द्वारा संचालित, काम का अधिकार देने वाला कार्यक्रम है, जो अपने स्केल एवं आर्किटेक्चर में अभूतपूर्व है तथा इसका उद्देश्य गरीबी मिटाना है. मनरेगा की शुरुआत के बाद 15 सालों में इस योजना ने लाखों लोगों को भूख व गरीबी के कुचक्र से बाहर निकाला है.

महात्मा गांधी ने कहा था, ‘जब आलोचना किसी आंदोलन को दबाने में विफल हो जाती है, तो उस आंदोलन को स्वीकृति व सम्मान मिलना शुरू हो जाता है.’ स्वतंत्र भारत में महात्मा गांधी की इस बात को साबित करने का मनरेगा से ज्यादा अच्छा उदाहरण और कोई नहीं.

पद संभालने के बाद, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को भी समझ आया कि मनरेगा को बंद किया जाना व्यवहारिक नहीं इसीलिए उन्होंने आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग कर कांग्रेस पार्टी पर हमला बोला और इस योजना को ‘कांग्रेस पार्टी की विफलता का एक जीवित स्मारक’ तक कह डाला.

पिछले सालों में मोदी सरकार ने मनरेगा को खत्म करने, खोखला करने व कमजोर करने की पूरी कोशिश की लेकिन मनरेगा के सजग प्रहरियों, अदालत एवं संसद में विपक्षी दलों के भारी दबाव के चलते सरकार को पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा.

इसके बाद केंद्र सरकार ने मनरेगा को स्वच्छ भारत तथा प्रधानमंत्री आवास योजना जैसे कार्यक्रमों से जोड़कर इसका स्वरूप बदलने की कोशिश की, जिसे उन्होंने सुधार कहा. लेकिन, वास्तव में यह कांग्रेस पार्टी की योजनाओं का नाम बदलने का एक प्रयास मात्र था. यह और बात है कि मनरेगा श्रमिकों को भुगतान किए जाने में अत्यंत देरी की गई तथा उन्हें काम तक दिए जाने से इंकार कर दिया गया.

कोविड-19 महामारी और इससे उत्पन्न आर्थिक संकट ने मोदी सरकार को वास्तविकता का अहसास करवाया है. पहले से ही चल रहे अभूतपूर्व आर्थिक संकट व मंदी की मार झेल रही अर्थव्यवस्था ने सरकार को आभास दिलाया कि पिछली यूपीए सरकार के फ्लैगशिप ग्रामीण राहत कार्यक्रमों को दोबारा शुरू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है. काम स्वयं बोलता है. चाहे देर से ही सही, वित्तमंत्री द्वारा हाल में ही मनरेगा का बजट बढ़ा एक लाख करोड़ रु. से ज्यादा का कुल आवंटन किए जाने की घोषणा ने इस बात को साबित कर दिया है.

अकेले मई 2020 में ही 2.19 करोड़ परिवारों ने इस कानून के तहत काम की मांग की, जो आठ सालों में सबसे ज्यादा है. कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रमों को यथावत स्वीकार करने के लिए मजबूर मोदी सरकार अभी भी कमियां खोजने के लिए कुतर्कों का जाल बुनने में लगी है लेकिन पूरा देश जानता है कि दुनिया के इस सबसे बड़े जन आंदोलन ने किस प्रकार न केवल लाखों भारतीयों को गरीबी के कुचक्र से बाहर निकाला, अपितु पंचायती राज संस्थाओं का स्वरूप बदल दिया, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कम करने में मदद की तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित किया.

इसने सभी के लिए समान वेतन सुनिश्चित कर, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों तथा कमजोर वर्गों को सशक्त बनाकर एक नए सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत की. इसने उन्हें संगठित होने की ताकत दी और उन्हें सम्मान व स्वाभिमानपूर्ण जीवन प्रदान किया.

आज के संकट में भारत को सशक्त बनाने के लिए इन तथ्यों को जानना बहुत आवश्यक है. आज निराश मजदूर व कामगार विभिन्न शहरों से समूहों में अपने गांंवों की ओर लौट रहे हैं. उनके पास न तो रोजगार है और न ही एक सुरक्षित भविष्य. जब अभूतपूर्व संकट के बादल मंडरा रहे हैं, तो मनरेगा की जरूरत व महत्व पहले से कहीं और ज्यादा है. इन मेहनतकशों का विश्वास पुनः स्थापित करने के लिए राहत कार्य उन पर केंद्रित होने चाहिए. सबसे पहला काम उन्हें मनरेगा का जॉब कार्ड जारी किया जाना है.

श्री राजीव गांधी ने अपने विशेष प्रयासों द्वारा जिस पंचायती राज तंत्र को सशक्त बनाने का संघर्ष किया, आज मनरेगा को लागू करने की मुख्य भूमिका उन्हीं पंचायतों को दी जानी चाहिए, क्योंकि यह कोई केंद्रीकृत कार्यक्रम नहीं है.

जन कल्याण की योजनाएं चलाने के लिए पंचायतों को और मजबूत किया जाए तथा प्राथमिकता से पैसा पंचायतों को दिया जाए. ग्राम सभा यह निर्धारित करे कि किस प्रकार का काम किया जाए क्योंकि स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधि ही जमीनी हकीकत, श्रमिकों की स्थिति व उनकी जरूरतों को समझते हैं. वो अच्छी तरह जानते हैं कि गांंव व स्थानीय अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुरूप, अपने बजट को कहांं खर्च करना है.

श्रमिकों के कौशल का उपयोग ऐसी टिकाऊ संरचनाओं के निर्माण के लिए किया जाना चाहिए, जिनसे कृषि उत्पादकता में सुधार हो, ग्रामीण आय में वृद्धि हो तथा पर्यावरण की रक्षा हो.

मनरेगा ने अपनी उपयोगिता साबित की है

संकट के इस वक्त केंद्र सरकार को पैसा सीधा लोगों के हाथों में पहुंचाना चाहिए तथा सब प्रकार की बकाया राशि, बेरोजगारी भत्ता व श्रमिकों का भुगतान लचीले तरीके से बगैर देरी के करना चाहिए. मोदी सरकार ने मनरेगा के तहत कार्य-दिवसों की संख्या बढ़ाकर 200 करने तथा कार्यस्थल पर ही पंजीकरण कराने की अनुमति देने की मांगों को नजरंदाज कर दिया है. मनरेगा के तहत ओपन-एंडेड फंडिंग सुनिश्चित होनी चाहिए, जैसा पहले होता था.

मनरेगा की उपयोगिता बार-बार साबित हुई है क्योंकि यूपीए सरकार के दौरान इसमें निरंतर सुधार व बढ़ोत्तरी हुई. विस्तृत सोशल ऑडिट, पारदर्शिता, पत्रकारों व बुद्धिजीवियों द्वारा जांंच-परख व लोकपाल की नियुक्ति के माध्यम से सरकार व नागरिकों ने मिलकर इसे मौजूदा आकार दिया. राज्य सरकारों ने सर्वश्रेष्ठ विधियों को अपनाकर इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यह पूरी दुनिया में गरीबी उन्मूलन के एक मॉडल के रूप में प्रसिद्ध हो गया.

अनिच्छा से ही सही, मोदी सरकार इस कार्यक्रम का महत्व समझ चुकी है. मेरा सरकार से निवेदन है कि यह वक्त देश पर छाए संकट का सामना करने का है, न कि राजनीति करने का. यह वक्त भाजपा बनाम कांग्रेस का नहीं. आपके पास एक शक्तिशाली तंत्र है, कृपया इसका उपयोग कर आपदा के इस वक्त भारत के नागरिकों की मदद कीजिए.

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योजनाओं के ऐलान तले फल-फुल रहा है भारत
सरकार की हर योजना गरीब की जेब काट सरकरी खजाने को भरने वाली साबित हो रही है
कोरोना महामारी के नाम पर लाखों करोड़ रुपये की वसूली कर रही है मोदी सरकार
आजाद भारत में कामगारों के विरुद्ध ऐसी कोई सरकार नहीं आई थी 

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Tags: मनरेगासोनिया गांधी का लेख
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