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मानसिक गुलामी के खेल का नियम तो बदलना ही होगा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 27, 2020
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मानसिक गुलामी के खेल का नियम तो बदलना ही होगा

गुरुचरण सिंह

जिस महाभारत को दूरदर्शन और मनोरंजन का मसाला परोसने वाले दूसरे चैनल बदले रंग रूप में दिखा रहे हैं, वह खुद भागवत पुराण का हिस्सा है. इस पुराण को कहने वाले हैं वेद व्यास, जो महाभारत के प्रमुख किरदारों (धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर) के औरस पिता भी है. इतने बढ़िया कहते थे वह कहानी कि आज भी कथावाचक जिस आसन पर बैठ कर कथा कहते हैं, उसे व्यास गद्दी ही कहा जाता है.

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इसी भागवत पुराण में स्वर्ग के राजा इंद्र के बारे में एक कथा आती है. लंपट और अहंकारी तो वह हमेशा से था ही, समय के साथ-साथ उसका और भी अवमूल्यन होता रहा है. यह इस तथ्य को रेखांकित करता है कि आर्य मूलतः स्वार्थी प्रकृति के होते हैं जो जरूरत पड़ने पर गदहे को बाप भी बना सकते हैं और फिर उसे दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर फेक भी सकते हैं. दरअसल यही चरित्र होता है कुलीन वर्ग का दुनिया भर में.

खैर, इसी के चलते इंद्र सर्वशक्तिमान ईश्वर के पद से गिर कर महज़ एक देवता भर गया है, लिहाजा हीनभावना से भी ग्रस्त हो चुका है. अपने किसी दुर्व्यवहार के चलते देवगुरू बृहस्पति से शापित होकर उसे पृथ्वी लोक पर सूअर बनना पड़ता है लेकिन सूअर योनि में बहुत दिन रहने पर वह उसी में इतने आनंद का अनुभव करने लगता है कि ब्रह्मा के बुलाए जाने के बावजूद वह स्वर्ग जाना मंजूर नहीं जाना चाहता. सूअरों के जिस परिवेश में ही वह एक अरसे से रह रहा था, वही परिवेश उसे इतना अच्छा लगने लगा था कि स्वर्ग के बदले में भी वह उसे नहीं छोड़ना चाहता है.

भागवतकार इसे माया कहता है और मैं इसे आदत कहता हूं. व्यास इस उदाहरण से यह दिखाना चाहते थे कि माया (भ्रम) बहुत बलवान होती है, लेकिन इस रहस्य पर चर्चा करना न तो उन्हें जरूरी लगा और न उनसे किसी शिष्य ने ही पूछा. बस आंख मूंद कर और ‘सत्य वचन’ बोल कर स्वीकार कर लिया. हालांकि यह रहस्य केवल इतना-सा है कि एक लंबे समय से एक खास माहौल में रहने की वजह से अनजाने ही कुछ आदतें हमारे व्यवहार में शामिल हो जाती हैं जैसे अलग-अलग मजहबों में पैदा हुए बच्चे अनजाने में ही उसकी तमाम रिवायतों को अपना लेते हैं. कहते हैं दासप्रथा को खत्म करने के लिए लड़े गए एक लंबे अमेरिकी गृह युद्ध के खत्म होने पर अश्वेत दासों की बेड़िया जब काटी गईं तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी ने उनके वस्त्र उतार दिए हों, जंजीरें जैसे उनके शरीर का ही एक अंग बन चुकी थी.

अपने यहां के दलित समुदाय की हालत भी कुछ ऐसी ही है बल्कि उससे भी कुछ अधिक खराब क्योंकि अमरीकी दासत्व केवल दैहिक था, यहां तो वह मानसिक भी है. धार्मिक छौंक जो लगी हुई है उसमें. लाख समझाते रहिए कि आप ही असल में इस देश के मूलनिवासी हैं, आप ही के पूर्वज कभी यहां राज करते थे. अपना गुलाम बना कर आपसे सारे घटिया काम करने पर मजबूर करने वाले लोग तो आज भी आपके दिमाग को हिंदू धर्म की आड़ में गुलामी के अदृश्य बंधनों से जकडे़ हुए हैं लेकिन मजाल है उनके कान पर एक जूं भी रेंग जाए.

धार्मिक प्रवचन सुनने के बाद जैसे लोग सब कुछ भूल-भुला कर रोज़ाना के काम धंधों में लग जाते हैं, झूठ बोलते हैं, बेइमानी करते हैं, अपने लाभ के लिए दूसरों का ह़क भी छीनते है; ठीक वैसे ही दलित भी यह सब सुन कर बस मुंडी भर हिला देते हैं लेकिन मानसिक गुलाम तो वे फिर भी बने ही रहते हैं. ऐसा कौन-सा भगवान है जो आपकी सदियों की पूजा अर्चना से भी नहीं पसीजता और कुछ खास लोगों पर हमेशा से मेहरबान रहता है ? जो सदियों से नहीं पसीजा वह अब क्या पसीजेगा ??

बाबा साहेब ने भले ही अपने अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया हो, जो ईश्वर की सत्ता के बारे में मौन है लेकिन दलितों ने तो बुद्ध और बाबा साहेब को ही ईश्वर का दर्जा दे डाला. जो सिखाया था उन्होंने, उसे कुंंएं में फेक दिया. आदतों का गुलाम दलित तो आज भी सनातनी ही है हालांकि व्यवहार में उसे वैसा कोई मानता कोई नहीं है. मान लिया होता तो क्या मंदिरों में उनका प्रवेश बंद किया होता ? पढ़ाई और कमाई का अधिकार छीन लिया होता ? माना होता तो क्या कोई भी पंडा दलित राष्ट्रपति का वैसा अपमान करने की सोच भी सकता था ? माना होता तो सारे विश्व को एक परिवार बताने हिंदू धर्म के अनुयायी अपने ही देशवासियों के साथ इतना नीच बर्ताव करते ? उनसे सभी निकृष्ट काम करवाते ? उन्हें धीरे ध-रे ऐसा जानवर बना देते जो पुचकारने पर तत्काल मालिक के तलुए चाटने लगता है वरना चुपचाप अपने बुलाए जाने का इंतजार करता रहता है ? जीने का चलन भूल चुके इन ‘मानव पशुओं’ को फिर से आदमी की गरिमा प्रदान करने का काम शुरू किया था एक विदेशी कौम ने जो ऐसे अमानवीय परिवेश में रहते लोगों को देखने का आदी ही नहीं थी. मंशा कुछ भी रही हो, आरक्षण भी पहली बार अंग्रेजों ने ही दिया.

अगला सामाजिक सोपान चढ़ने की ललक में अन्य पिछड़ा वर्ग की तरह दलित समुदाय का भी एक शातिर हिस्सा जो आरक्षण का लगभग 80-85% हड़प जाता है, बहुत मुखर है आरक्षण की पैरोकारी में जबकि बाकी के लोग तो बस ‘अपने लोगों’ के इस जोरदार विरोध प्रदर्शन में शामिल हो जाते हैं. वैसे शामिल तो वे हिंदू धर्म के भी सभी अनुष्ठानों में भी होते हैं.

सच कहा जाए तो वे अनुष्ठान इन्हीं लोगों के कारण ही सफल हो पाते हैं चाहे कांवड़ उठानी हो, अमरनाथ, बद्रीनाथ या वैष्णों दैवी की यात्रा में शामिल होना हो, त्योहारों और जलूसों की शोभा बढ़ानी हो, मेलों, तीर्थों में सामूहिक स्नान करना हो, हर जगह दलित और पिछड़े वर्ग के लोग ही दिखाई देंगे.

बहुत मुमकिन है कि उनके इस उत्साह के पीछे यह अहसास हो कि वे भी एक बड़े परिवार का हिस्सा हैं, ऐसा परिवार जहां सब बराबर है, कोई छोटा नहीं कोई बड़ा नहीं. कुछ ही देर के लिए क्यों न हो, उन्हें अपने रोजमर्रा के जीवन के एहसास से मुक्ति अवश्य मिल जाती है. यही लोग तमाम प्रायोजित हिंदू उत्पातों में शामिल होते हैं. अफराज़ुल का बेरहम कत्ल करने वाले शिवलाल रैंगर की तो याद होगी ही न आपको, जिसके बचाव में सारा ही ‘हिंदू समाज’ खड़ा हो गया था !

कितना अजीब है कोरोना महामारी का दंश भी सबसे अधिक इसी समुदाय को झेलना पड़ रहा है. कोई खेत खलिहान, कोई बंधा-बंधाया वेतन या बुजुर्गों की छोड़ी विरासत तो है नहीं उसके पास कि उसी से काम चलाते रहें, और तालिया-थालियां बजाते रहें, मोमबत्तियां जलाते रहें, ‘गो कोरोना गो’ चिल्लाते रहें. रोज ही कुंआ खोजना है और पानी पीना है. बस दो हाथ ही तो उसके अपने हैं, वे सलामत रहें परिवार की रोजी रोटी का जुगाड़ तो होता ही रहेगा लेकिन इन हाथों को करने के लिए कोई काम तो हो !! मेहनतकश हैं, भीख पर जिंदा नहीं रह सकते ! ऐसे तो एक और तरह की गुलामी का आदी बना रहे हैं हम, पहले से ही मानसिक गुलाम संप्रदाय को !

भीख नहीं, आत्मग्लानी से मुक्त होने के लिए दया भी नहीं, दे सकते हो तो काम दो वरना इन हाथों ने अगर काम करने की आदत छोड़ दी तो इस देश को खत्म ही समझो. दुनिया के हजार पांच सात सौ अरबपति अगर कम हो भी गए तो कोई आफत नहीं आने वाली, लेकिन अगर किसान, मजदूर, माली, नाई, बावर्ची, भिश्ती, कुली , रेहड़ी, ठेले, झल्ली वाले ही न रहे तो आपकी दुनिया जरूर खत्म हो जाएगी, जिंदगी ठहर जाएगी. खेल के नियम तो बदलने ही होंगे !

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