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मोदी-शाह की लड़ाई मुसलमान या ईसाईयों से नहीं है बल्कि प्रगति, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा से है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 29, 2025
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मोदी-शाह की लड़ाई मुसलमान या ईसाईयों से नहीं है बल्कि प्रगति, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा से है
मोदी-शाह की लड़ाई मुसलमान या ईसाईयों से नहीं है बल्कि प्रगति, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा से है
जगदीश्वर चतुर्वेदी

आम्बेडकर के बनाए जम्मू कश्मीर राज्य को भाजपा-संघ खत्म कर चुके हैं. संविधान में यह राज्य था, आज गायब है. इससे समझ लें कि आम्बेडकर के बनाए संविधान को ये आरएसएस वाले कितना मानते हैं.

RSS के नंबर दो पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबले और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान देश के संविधान की प्रस्तावना में से समाजवादी और धर्म निरपेक्ष शब्द हटाने की वकालत कर रहे हैं.
लगता है इन महानुभावों ने अपनी ही पार्टी का संविधान नहीं पढ़ा है.
अनुरोध है कि संविधान से समाजवादी और धर्म निरपेक्ष शब्द बाद में हटवाइए, पहले अपनी पार्टी का संविधान तो पढ़ लीजिए.

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भाजपा के संविधान में सोशलिज्म, सेक्युरिज्म और डेमोक्रेसी का राग अलापा गया है. गांधीवादी सोच का भी उल्लेख है. पार्टी के संविधान में लिखा है –

Article II: OBJECTIVE

‘…to the principles of socialism, secularism, and democracy…’

Article IV: COMMITMENT

‘…Gandhian approach… Positive Secularism… Sarva Dharma Samabhav…’

भाजपा के संविधान का पन्ना

ये रहा भाजपा के संविधान को वो पन्ना. इसे आईटी सेल और व्हाट्सएप विष’विद्यालय के हर ज्ञानी ध्यानी (?) तक पहुंचा दीजिए.

आरएसएस की नई रणनीतियां और सामाजिक विघटन

आरएसएस को महज साम्प्रदायिक संगठन की तरह न देखें, साम्प्रदायिकता तो उसका ऊपरी गुण है, असल तत्व है अविवेकवाद. अविवेकवाद के आधार पर वह परंपरा या अतीत के अविवेकवादी विचारकों, विचारों, रूपों आदि का जमकर इस्तेमाल करता है. उसे साम्प्रदायिक कहना या फासिस्ट कहना रूढ़ हो चुका है, अर्थहीन हो चुका है.

आरएसएस ने भाजपा की आड़ में में ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत का नारा देकर यह दरशाने की कोशिश की कि उसे कांग्रेस नापसंद है, वह कांग्रेस का विकल्प है. उसका एकमात्र लक्ष्य है कांग्रेस से देश को मुक्त करना. लेकिन भाजपा के चुनाव जीतने और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कांग्रेस मुक्त भारत के नारे को दफ्न कर दिया गया और संविधान की आत्मा धर्मनिरपेक्षता-समाजवाद मुक्त भारत का नारा केन्द्र में आ गया है.

दूसरी ओर मुसलिम मुक्त भारत के तहत उन तमाम इलाकों में दवाब, आतंक और जोड़तोड़ शुरू की गयी जहां पर मुसलमान काबिज हैं. इस काम में उनको काफी हद तक सफलता मिली. मसलन्, कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक हैं तो इस तरह की नीति अपनायी गयी कि मुसलमान वहां पूरी तरह तबाह पड़े रहें और यह सब काम किया गया आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के बहाने और सेना को आवरण के रूप में इस्तेमाल करके. आज कश्मीर के मुसलमान, व्यापारी, मजदूर आदि सबके सब पामाल हैं, वहां की समूची अर्थव्यवस्था तबाह हो चुकी है.

कश्मीर में भाजपा-आरएसएस ने पहले पीडीपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा. वायदा था विकास का. वैसे ही जैसे देश के लिए विकास का वायदा किया गया. लेकिन कश्मीर को विकास की बजाय आतंकियों और विनाश के हवाले कर दिया गया है. वहां पर वोट पाने के लिए जितने भी वायदे किए गए, उनमें से एक भी वायदा लागू नहीं हुआ. जो चीज लागू हुई है वह है मुसलमानों का आर्थिक विध्वंस, उनके अधिकारों पर हमले.

मुसलमानों का विध्वंस चुनावों में सामने नहीं था, सामने था जम्मू-कश्मीर का विकास लेकिन हुआ एकदम उलटा. कश्मीर की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह तोड़ दिया गया. कहा गया विकास करेंगे, हुआ उलटा. सारा विकास ठप्प पड़ा है. कहा गया आतंकवाद को पछाड़ देंगे, हुआ उलटा. आतंकवादियों के कब्जे में कश्मीर चला गया है.

कहने का आशय यह है कि भाजपा-आरएसएस जब कांग्रेस और दूसरे लिबरल दलों को निशाना बनाते हैं तो जाने-अनजाने पृथकतावादी, जातिवादियों या आतंकियों को विकल्प के रूप में मदद करते हैं. साम्प्रदायिकता जहां पैदा होती है वह रूप बदलकर पृथकतावाद या जातिवाद या अस्मिता राजनीति या आतंकवाद की शक्ल ले सकती है.

याद करें शिवसेना के उदय को. उसने एक जमाने में दक्षिण भारतीयों के खिलाफ जंग का एलान किया. कालांतर में वह साम्प्रदायिक संगठन में रूपान्तरित हो गया. यानी साम्प्रदायिकता-पृथकतावाद और आतंकवाद जुड़वां भाई हैं. ये सतह पर अलग दिखते हैं, कभी एक-दूसरे से लड़ते भी नजर आते हैं, लेकिन व्यवहार में ये तीनों एक हैं. क्योंकि इन तीनों की धुरी है अविवेकवाद और घृणा. तीनों का उत्स एक ही गर्भ से हुआ है और तीनों का माई-बाप हैं कारपोरेट घराना.

आरएसएस के सौ साल और अविवेकवाद की आंधी

साम्प्रदायिकता या पृथकतावाद के नाम पर जब भी जहां पर भी प्रचार आरंभ होता है, जब आम जनता उसमें भाग लेने लगती है तो सबसे पहले राजसत्ता और उसके तंत्र ठंड़े पड़ जाते हैं. पुलिस-सेना के हाथ-पैर फूल जाते हैं, दिमाग सुन्न हो जाता है. अनेक मामलों में तो सत्ता के तंत्र स्वयं भी उस जहरीले प्रचार का अंग बन जाते हैं और आम जनता पर साम्प्रदायिक-पृथकतावादी ताकतों के साथ मिलकर हमला करने लगते हैं. आज ठीक देश की यही अवस्था है. सारा देश मुसलिम विरोधी प्रचार में डूबा हुआ है. मुसलिम विरोध को स्वाभाविक बनाकर हम सबके मन में उतार दिया गया है.

आज वास्तविकता यह है कि मोदी सरकार रहे या जाए मुसलिम विरोधी जहरीला प्रचार समाज से सहज ही जाने वाला नहीं है. इसका प्रधान कारण है साम्प्रदायिकता के खिलाफ केन्द्र और राज्य सरकारों का खुला समर्पण. देश के विभिन्न इलाकों में इस समर्पण को साफ तौर पर देखा जा सकता है.

मुसलिम विरोधी साम्प्रदायिक जहर महज सामान्य प्रचार या राजनैतिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह असामान्य राजनैतिक कार्यक्रम है. इसका लक्ष्य है समाज को, लोगों के दिलो-दिमाग को साम्प्रदायिक आधारों पर विभाजित करना, साम्प्रदायिक तर्कों को सहज, बोधगम्य बनाना और आम लोगों के दिलो-दिमाग में उतारना. इस काम में आरएसएस पूरी तरह सफल हो चुका है. आज उसकी साम्प्रदायिक विचारधारा की पकड़ में सारा देश है. हर आदमी है, चाहे वह किसी भी दल का हो.

जो लोग सोचते हैं साम्प्रदायिक विचार मुझे नहीं उसे प्रभावित कर सकते हैं वे गलतफहमी के शिकार हैं. साम्प्रदायिक विचार सबको प्रभावित कर रहे हैं. वे जिस गति, आक्रामकता और स्वाभाविक रूप में आ रहे हैं उससे हर कोई प्रभावित होगा. वे भी प्रभावित हो सकते हैं जो उसके शत्रु दिख रहे हैं.

साम्प्रदायिकता का मुसलिम विरोधी जहरीला प्रचार तमाम किस्म के कॉमनसेंस विश्वासों, कपोल-कल्पित कहानियों और धारणाओं के जरिए फैलाया जा रहा है. मसलन्, जुनैद की हत्या सतह पर उन 20 गुंडों ने की है जिनके पास चाकू थे, लेकिन असल में उन चाकुओं में धार और उनको चलाने का बहशियाना भावबोध तो मुसलिम विरोधी प्रचार ने निर्मित किया था.

जुनैद के कातिल पकड़े जाएं यह जरूरी है लेकिन इससे ज्यादा जरूरी है कि मुसलिम विरोधी जहरीले प्रचार अभियान के खिलाफ बिना किसी किन्तु-परन्तु और बहानेबाजी के हम सब एकजुट हों, उसके खिलाफ जमकर लिखें, बोलें, आंदोलन करें. असल में जुनैद के हत्यारे हमारे अंदर प्रवेश कर चुके हैं. वे जुनैद को नहीं हम सबको रोज चाकुओं से मार रहे हैं, हमें साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष करने से रोक रहे हैं.

जुनैद मुसलमान नहीं था, वह भारतीय नागरिक था. साम्प्रदायिक ताकतें सतह पर मुसलमान को मारती दिखती हैं लेकिन वे असल में नागरिक को मार रही होती हैं, नागरिक हकों पर हमले कर रही होती हैं, संविधान के परखच्चे उडा रही होती हैं. उनके सामने पीएम, सीएम, न्यायपालिका बौने हैं. जुनैद मारा जाए या अखलाक मारा जाए, एक वर्ग ऐसा है जो इन सब हत्याओं से बेखबर-निश्चिंत है. उनके तर्क सुनेंगे तो गुस्सा आने लगेगा.

वहीं दूसरी ओर आरएसएस वालों के तर्क सुनेंगे तो वे पलटकर कहेंगे आप इस समय बोल रहे हैं, कश्मीर में हिन्दू मारे जा रहे थे तब क्यों नहीं बोल रहे थे ! फलां-फलां समय फलां–फलां मारा गया, तब आप चुप क्यों थे ! आपने हल्ला क्यों नहीं किया ! आप उनको कहेंगे कि देखिए यह पैटर्न है हत्या का और अब तक 22 मुसलमान मौत के घाट उतारे जा चुके हैं, तो वे कहेंगे हम इसमें क्या करें, हत्या हुई है तो कानून अपना काम करेगा, कानून को काम करने दें. कानूनी तंत्र जो कहे और जो करे उसकी मानें. आप ज्यादा बोलेंगे तो वे एक लंबी फेहरिश्त बताने लगते हैं और कहते हैं सैंकड़ों सालों से मुसलमानों ने हिन्दुओं को मारा है, उस समय के बारे में कुछ क्यों नहीं बोलते !

कहने का आशय यह कि साम्प्रदायिक हिंसा की जब भी कोई घटना होती है और आप संवाद करना चाहें तो साम्प्रदायिक लोग बहस को अतीत में ले जाते हैं, गैर-जरूरी, अप्रासंगिक मसलों की ओर ले जाते हैं. इस क्रम में वे तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं. बार-बार वैज्ञानिक समझ और नजरिए को निशाना बनाते हैं, कम्युनिस्टों पर हमले करते हैं.

असल में साम्प्रदायिकता की बुनियादी लड़ाई मुसलमान या ईसाईयों से नहीं है बल्कि प्रगति, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा से है. वे इन विचारों को सहन नहीं कर पाते. विचारों से लेकर जीवन के सभी क्षेत्रों में वैचारिक प्रगति को सहन नहीं कर पाते. यह सच है विगत 75 साल में देश में प्रगति हुई है, अनेक कमियों के बावजूद प्रगति हुई है और यही प्रगति असल में आरएसएस जैसे साम्प्रदायिक संगठनों के निशाने पर है.

हममें से अधिकतर लोग हिन्दुत्व की विचारधारा को शाकाहारी विचारधारा के रुप में देखते हैं. लेकिन व्यवहार में साम्प्रदायिकता या हिंदुत्व एकदम नॉनवेज विचारधारा नहीं है. बिना हिंसा के इसे चैन नहीं मिलता. सतह पर हिन्दुत्ववादी विचार बड़ा भोला-सीधा लगता है लेकिन आचरण में पूरी तरह अविवेकवादी है.

समाज में अविवेकवादी होना पशुता की निशानी है लेकिन हमने कभी इस रुप में देखने की कोशिश ही नहीं की. दिलचस्प बात यह है कि कारपोरेट घरानों या बुर्जुआजी के प्रति आम जनता में जितना गुस्सा बढ़ता है, ठीक उसके समानांतर आरएसएस जैसे संगठन आक्रामक रुप में खड़े हो जाते हैं.

बुर्जुआजी जब बेचैन, निराश और पराजय के दौर से गुजरता है तब ही आरएसएस जैसे संगठन प्रगतिशील विचारों, मजदूरों-किसानों के हितों पर हमला बोलते हैं. इसी अर्थ में संघ को प्रगति से नफरत है. वे मुसलमान से नफरत नहीं करते, वे प्रगति और प्रगतिशील विचारधारा और प्रगतिशील वर्गों से नफरत करते हैं और कारपोरेट घरानों की वैचारिक-राजनीतिक सेवा करते हैं.

नव्य आर्थिक उदारीकरण के खिलाफ सारे देश में जिस समय सबसे ज्यादा गुस्सा था, मनमोहन सिंह के खिलाफ देश में आंधी चल रही थी, कारपोरेट घराने और उनके विचारक जनता में अलग-थलग पड़ चुके थे ठीक उसी समय सांड की तरह आरएसएस सामने आता है और सभी किस्म के प्रगतिशील विचारों को पहला और आखिरी निशाना बनाता है और यही वह चीज है जो गंभीरता से समझने की जरूरत है. सवाल यह है आरएसएस इतना ताकतवर क्यों बना ॽ उसके कामकाज और राजनैतिक एक्शन किसकी वैचारिक मदद करते हैं ॽ

हम सब लगातार समाज में विवेकवाद का प्रचार प्रसार कर रहे हैं और चाहते हैं कि विवेकवाद को आम जनता के आम-फहम विचार की तरह पेश किया जाए. यह चीज बुर्जुआजी को नापसंद है और यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां पर आरएसएस हमला करता है. आरएसएस के हमलों की धुरी है अविवेकवाद. इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए.

आरएसएस को यदि किसी चीज की जरूरत है तो वह है अविवेकवाद. वे अपनी सांगठनिक और वैचारिक क्षमता के विकास और विस्तार के लिए अविवेकवाद का बहुआयामी इस्तेमाल करते हैं. आज देश के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि देश को अविवेकवाद की आंधी से कैसे बचाएं ? यह आंधी आरएसएस के सौ साल की देन है.

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