Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

न्यायिक संस्था नहीं, सरकार का हथियार बन गया है सुप्रीम कोर्ट

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 19, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

न्यायिक संस्था नहीं, सरकार का हथियार बन गया है सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट की ‘अवमानना’ हो गई है, न्यायाधीश ने यही माना है. ‘अवमानना’ मुख्य न्यायाधीश एस. ए. बोबडे पर की गयी टिप्पणी से हुई है. प्रशांत भूषण को इसके लिए दोषी ठहराया गया. सर्वोच्च न्यायपालिका ने माननीय न्यायाधीश अरुण मिश्रा के नेतृत्व वाले बेंच के तहत न्यायालय को ‘न्याय’ दिला दिया है. न्याय के बदले सजा क्या होगी, यह 15 अगस्त के बाद 20 अगस्त को सुनाया जायेगा. ऐसा क्यों ? अपने प्रति न्याय में इतनी देरी क्यों ? क्या उनका एक ट्वीट न्यायपालिका की व्यवस्था को लोगों की नजर में इतना गिरा दिया ? सर्वोच्च न्यायालय से हम भी सुनने के लिए बेताब हैं. हिंदी फिल्मों के संवाद लेखकों ने तो ‘कानून अंधा है, कानून बिकता है’ आदि संवाद लिखकर खूब तालियां बटोरी और दर्शक कटघरे में ‘न्याय’ को होते हुए देखा.

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

इस बार यह ‘न्याय’ सर्वोच्च न्यायालय के प्रांगण में हुआ और ‘भुक्तभोगी’ ने ‘न्याय’ कर दिया है लेकिन इसमें कुछ बात है जो मुझे खटक रही है. इसमें एक उभरता हुआ वह समीकरण दिख रहा है जो हमारी राजनीति में दिख रहा है. इस तरह के समीकरणों के परिणाम अक्सर दूरगामी होते हैं. यह बात मुझे ठीक वैसे ही लग रही है मानो न्यायाधीश, न्यायपालिका और न्याय एक मूर्ति में समाहित हो चुके हों. यह एक कल्ट बनने की प्रक्रिया है जिसमें ‘मैं’ और ‘तुम’ के विभाजन में मैं इतना बड़ा होता जाता है, जहां से तुम एक तुच्छ अस्तित्व के सिवा कुछ रह ही नहीं जाता. यह तुच्छता इस कदर बढ़ती जाती है कि इसकी दवा करने के लिए ‘शत्रुओं’ की पूरी फौज खड़ी होती जाती है, और जो तुच्छ होने से ही इंकार कर देते हैं उनके लिए ‘न्याय’ की व्यवस्था की जाती है. तो, यह जो कल्ट है वह राजनीति में मुझे ठीक वैसे ही लग रही है मानो प्रधानमंत्री, कैबिनेट और सांसद एक मूर्ति में समाहित हो चुके हों.

एक सांसद का या उस व्यवस्था से जुड़ा कोई भी व्यक्ति प्रधानमंत्री या कैबिनेट के खिलाफ जाता है, तब उसे संसद से बहिष्कृत उस व्यक्ति की तरह देखा जा रहा है, मानो संसद का अस्तित्व ही महज सरकार की एक मूर्ति के लिए है, जबकि हम जानते हैं कि भारत का संसदीय लोकतंत्र सिर्फ जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों से ही नहीं उसमें हिस्सेदार राजनीतिक पार्टियों से भी चलता है. संसदीय लोकतंत्र की आवाजों में मीडिया से लेकर संस्कृति की गतिविधियां चलाने वाले लोग शामिल होते हैं और बाकायदा उन्हें बतौर सांसद मनोनीत किया जाता है. लोकतंत्र एक राजनीतिक प्रक्रिया है जिसमें भागीदारी बहुस्तरीय है.

लेकिन जब संसद में विपक्ष, उसकी पार्टी ‘जयचंद’ घोषित हो रही हो, असहमति के स्वर ‘देशद्रोही’ बनाकर यूएपीए के तहत कैद किये जा रहे हों, समाज की विविध धार्मिक पहचानों पर पहरे लगा देना कानून बन गया हो, गरीब मजदूर और आम जन की चीख को ‘दंगा’ घोषित किया जा रहा हो, …तब आप क्या करेंगे ? जब न्यायपालिका खुद का ही ‘न्याय’ करने लगे, …तब क्या करेंगे ? संसद भी खुद की अवमानना के अन्याय का ‘न्याय’ कर चुकी है और दोषियों को संसद में खड़े होकर माफी मांगना पड़ा है. यह सर्वोच्चता चाहे जितनी वैधानिक हो, लेकिन न्यायपूर्ण हो यह जरूरी नहीं है.

सौभाग्य से कोर्ट की अवमानना ‘देशद्रोह’ नहीं है. मैं कानून का जानकार नहीं हूं लेकिन इतनी बात तो पता है कि कानून की व्याख्याएं चलती रहती हैं. संभव है यह ‘देशद्रोह’ के बराबर मान लिया जाए क्योंकि, कानूनन यह ‘न्याय प्रक्रिया’ में बाधा पहुंचाता है और न्याय ‘देशहित’ में है. प्रशांत भूषण का तर्क भी तो यही था. उन्होंने न्यायाधीश के व्यवहार पर सवाल उठाया था. उन्होंने न्याय के पूर्वाग्रहों की ओर लोगों का ध्यान खींचने का प्रयास किया था. और, बाद में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने प्रेस वार्ता कर ‘न्याय’ पर चल रहे हस्तक्षेप के बारे में बताने की पहलकदमी ली थी. उस समय उन्होंने खुद को न्याय की प्रतिमूर्ति घोषित नहीं किया था.

  • अंजनी कुमार

Read Also –

न्यायपालिका : संस्था महत्वपूर्ण होती है न कि कोई व्यक्ति विशेष
जस्टिस मुरलीधर का तबादला : न्यायपालिका का शव
भारत के नाम पत्र – आयरिश कवि गैब्रिएल रोसेनस्तोक
कश्मीर : सत्ता की चाटूकारिता करता न्यायपालिका
पहलू खान की मौत और भारतीय न्यायपालिका के ‘न्याय’ से सबक
जज लोया की मौत पर चुप्पी साधने वाला सुप्रीम कोर्ट आखिर इतना मुखर क्यों ?
न्यायपालिका की अंतरात्मा ???

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

निवाला

Next Post

पूर्णिया विश्वविद्यालय में प्रोन्नति और वेतन निर्धारण जैसे मुद्दों को लेकर आंदोलित शिक्षक

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

पूर्णिया विश्वविद्यालय में प्रोन्नति और वेतन निर्धारण जैसे मुद्दों को लेकर आंदोलित शिक्षक

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

मोदी सरकार के साढ़े तीन साल बाद देश

November 17, 2017

चुनाव आयोग पर उठते सवाल क्या माओवादियों को सही साबित कर रहा है ?

August 22, 2025

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.