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Home लघुकथा

कुर्सी का नॉन-बॉयोलॉजिकल पुजारी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 18, 2024
in लघुकथा
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कुर्सी का नॉन-बॉयोलॉजिकल पुजारी
कुर्सी का नॉन-बॉयोलॉजिकल पुजारी

आजकल उसे अक्सर ही यह सपना आता है कि किसी ने उसे उसकी कुर्सी से धक्का देकर नीचे गिरा दिया है और वह कुछ नहीं कर पा रहा है. डर के मारे उसकी घिग्घी बंध गई है. उसके गले से आवाज नहीं निकल रही है. उसमें इतनी ताकत नहीं बची है कि उठकर खड़ा हो जाए. कुर्सी का सहारा लेकर उठने की कोशिश करता है तो कुर्सी उस पर गिर जाती है.

वह कुर्सी के नीचे दब जाता है. वह कुर्सी को अपने ऊपर से उठा नहीं पाता. आसपास कोई है नहीं, जो कुर्सी को हटाकर उसे सहारा देकर फिर से बिस्तर पर लिटा दे. वह अपनी इस दयनीय दशा पर रोने लगता है तो लोग उस पर हंसने लगते हैं. इस अपमान को वह बर्दाश्त नहीं कर पाता. अचानक उसकी चीख निकल जाती है.

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उसकी चीख सुनकर उसके दसियों सेवक उसके शयनकक्ष की ओर दौड़े आते हैं. दरवाजा खटखटाते हैं. पूछते हैं सर, क्या हुआ, क्या हुआ ? सब ठीक तो है न ? तबीयत तो ख़राब नहीं हो गई ? डाक्टर बुलाएं ? उधर से आवाज़ नहीं आती है तो वे दरवाजा तोड़ने की कोशिश करते हैं. इतने में अंदर से वह बोल पड़ता है. नहीं, मैं ठीक हूं. मुझे कुछ नहीं हुआ है. जाओ अपना काम करो. मुझे तंग मत करो. मुझे सोने दो. अरे मेरा कोई क्या बिगाड़ सकता है ? देश के140 करोड़ लोग मेरे साथ हैं.

उसके सेवक यह सुनकर मुस्कुराते हुए, यह सोचते हुए चले जाते हैं कि कुछ तो भारी गड़बड़ है मगर हमें क्या ? वह जाने, उसका काम जाने ! उसके बाद उसे रातभर नींद नहीं आती‌. उसे डर लगता है कि उसने फिर से सोने की कोशिश की तो फिर से वही दु:स्वप्न आएगा, फिर से चीख निकल जाएगी. क्या पता इस बार उसकी चड्डी गीली हो जाए !

वह सुबह होने तक कुर्सी को अच्छी तरह पकड़ कर बैठा रहता है. इस बीच मन ही मन वह अभ्यास करता है कि कोई कितनी ही ताकत लगाए तो भी कुर्सी उससे छिन‌ न पाए, इसके लिए वह क्या -क्या दांव खेल सकता है ? फिर भी अपनी कुर्सी को लेकर वह इतना अधिक चिंतित है कि बंद कमरे में भी बाथरूम जाते समय कुर्सी को अपने सिर पर ढोकर ले जाता है और वापस लाता है.

वह कुर्सी को अकेला नहीं छोड़ता. पता नहीं कब कौन उसका सतीत्व भंग कर दे ! नींद में भी वह अदबदाकर उठ बैठता है और देखता है कि उसकी कुर्सी कहां है ? कुर्सी ही उसका एकमात्र जीवन सत्य है, कुर्सी ही उसकी रक्षक है, उसकी चौकीदार है, उसकी माई- बाप, उसकी प्रभु है. कुर्सी ही उसके लिए सत्यम, शिवम, सुंदरम है !

अब रोज ही उसे अब कुर्सी छिन जाने के सपने आते हैं. अकसर पचास बरस की उम्र का एक पैंट-शर्ट धारी मुस्कुराता हुआ उस कुर्सी पर काबिज दिखाई देता है, जो उसका और उसकी कुर्सी का जानी दुश्मन है. वह उससे कहता है कि हट बे, इस जन्म में यह कुर्सी मेरी है और मेरी ही रहेगी. इस पर कोई और बैठ नहीं सकता. उस पर बैठा आदमी कोई जवाब नहीं देता, बस थोड़ा सा मुस्कुरा देता है. उसे यह मुस्कुराहट छाती में लगी उस गोली की तरह लगती है, जो पीठ को पार कर बाहर निकल गई है.

इस तरह के दु: स्वप्नों के कारण वह कभी दो, कभी तीन और कभी चार घंटे से अधिक सो नहीं पाता, जबकि वह पूरे आठ घंटे सोना चाहता है. वह मूर्ख और चालाक दोनों है. वह इस जागने को देश के भविष्य के लिए की जा रही अपनी तपस्या बताता है.

एक दिन हद हो गई. सपने में कुर्सी छत से ठीक उसके ऊपर आकर गिर गई. उसने उसे बुरी तरह घायल दिया. उस दिन तो गले से कराह भी नहीं निकली. ऐसा लगा, वह मर चुका है. वह घबराहट में उठा तो ठंड में भी पसीने-पसीने था. जाकर वह कुर्सी पर बैठ गया और उसे गले से लगाकर रोने लगा. उससे वादा लेने लगा कि तू मुझसे बेवफाई तो कभी नहीं करेगी ? मेरी होकर रहेगी न !

वह चूंकि नान बायोलॉजिकल था तो उसे संकट की इस घड़ी में मां याद नहीं आई. उसकी पहले भगवान राम में आस्था थी मगर उन्होंने उसे धोखा दे दिया था. भगवान जगन्नाथ उसे भाषण के दौरान ही याद आते थे. बजरंगबली भी आखिर राम के भक्त ही ठहरे ! उनसे भी कोई आशा नहीं थी. आशा का एकमात्र केंद्र कुर्सी थी.

इन दु: स्वप्नों से तंग आकर एक रात उसका मन किया कि झोला लेकर वह वाकई चल दे. आज तक के इस झूठ को सच करके दिखा दे मगर झोला एक स्वप्न था, कुर्सी सत्य थी और वह सत्य का पुजारी था !

  • विष्णु नागर

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