Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

NRC : तो हम पाकिस्तान की आत्मघाती राह पर चल पड़े हैं ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 21, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

NRC : तो हम पाकिस्तान की आत्मघाती राह पर चल पड़े हैं ?

गुरूचरण सिंह

लगता है संसद में मौजूद सभी पार्टियों ने एक दूसरे को ठीक से पहचान लिया है, तभी तो किसी भी मुद्दे पर गम्भीर चर्चा करने की बजाए सभी पार्टियां एक दूसरे को चोर साबित करने में अपना ज्यादा समय खर्च करती हैं. बेशक चोर तो सभी है ! यह अलग बात है कि कोई छोटा चोर है तो कोई बड़ा चोर !!

अब अपनी जड़ों की ओर जाने का भले ही कितना दावा करे सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा, हैं तो हम नकलची बन्दर ही. आजाद हुए तो गौरांग महाप्रभुओं की तरह बनना चाहा. सारी शासन प्रणाली ‘जस की तस’ रखी; पुलिस भी पहले जैसी खुरार्ट, डर का आलम साथ लिए चलने वाली, तमाम नौकरशाही भी पहले जैसी और कानून भी वैसे ही, कानून बनाने वाली संसद भी वैसी ही.

1962 में सपनों की इस उड़ान को पहला झटका लगा जब चीन ने अक्साई चिन और नेफा में हमला कर दिया और हज़ारों किलोमीटर जमीन पर कब्ज़ा करके बैठ गया. आज भी वह जब जी चाहे हमें घुड़की देता ही रहता है. कुछ दिन पहले ही अरुणाचल प्रदेश के एक सांसद ने सदन में यह कहकर सनसनी फैला दी थी कि चीन उसके राज्य में 50 किलोमीटर अंदर तक घुस आया है. बहानेबाजी करने के अलावा अपनी देशभक्ति पर अपनी पीठ खुद ही ठोकने वाली पार्टी ने फिर भी कुछ नहीं किया.

खैर, 1962 में हुई हार के चलते हमने सोवियत रूस जैसा बनने की सोची, कई चीजों के राष्ट्रीयकरण के जरिए कोशिश भी की लेकिन नकल के लिए भी अक्ल की जरूरत पड़ती है. अक्ल नहीं थी तभी तो आज तक जात पात की दकियानूसी जंजीरों में बंधे हुए हैं. आज भी ऊंच नीच करते रहते हैं इसलिए वहां भी असफल ही रहे ! रोज़े बख्शाने गए थे, नमाज़ गले पड़ गई !

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

1993 में वक्त ने फिर पलटी खाई और अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में अमरीका की तूती बोलने लगी. रूसी शासक गरबाचोव भी उसी के ही कसीदे पड़ने लगा, लिहाज़ा हम भी जिसकी ही झोली में जा बैठे. उसके हर अच्छे बुरे काम की नकल की ! एक बार उसकी मुद्रा संस्थाओं के कर्ज के मकड़जाल में उलझ गए तो फिर देश के हित अनहित की तमीज ही न रही.

चलता रहा है सब 2014 तक यों ही ढूचर ढूचर जब तक कि एक गुजराती गिरशेर ने हुंकार नहीं भरी और कहा हम तो विश्वगुरू हैं, बिल्कुल मौलिक हैं. हम विदेशियों का अनुकरण क्यों करें ? अनुकरण ही करना है तो अपने भाइयों का करेंगे, पाकिस्तान का करेंगे. बस वो दिन सो आज का दिन, हम तो पाकिस्तान की आत्मघाती राह पर ही चल रहे हैं !

दिलों में तो लगी ही हुई थी कब से, माकूल माहौल मिल गया तो सड़कों पर भी दिखने लगी यह आग. और यहां भी इसको भी भड़काने का काम हमेशा की तरह संघ के प्रशिक्षित लोगों ने किया, जिनमें से कई तो बेनकाब भी हो गए कैमरे के सामने ! पता नहीं किसने लिखा है, बहुत याद आ रहा है आज यह शे’र :

लगा के आग शहर को बादशाह ने कहा
उठा दिल में तमाशे का शौक बहुत है,
झुका के सर सभी शाहपरस्त बोल उठे
हजूर का शौक सलामत रहे, शहर और बहुत हैं !

जाहिर है दो हिस्सों में बंट चुके हैं मेरे देश के लोग; एक ‘अपने बादशाह’ की हर गलत सही बात की हिमायत किसी भी कीमत पर करने वाले और दूसरे न्याय, तर्क, विवेक की बात करने वाले ! ऐसे में जीत तो बिना सोचे काम कर देने वालों की ही हुआ करती है, गिनती जो ज्यादा होती है उनकी ! दरअसल ऐसे ही लोग कालिदास की तरह पेड़ की उस डाल को काटते हैं, जिस पर वे बैठे होते हैं. इसलिए कुछ लोग इस आगजनी के हादसों से बड़े खुश हैं; पिंजरे में अभी-अभी बंद किए गए खुंखार जंगली जानवर को ऊधम मचाते देख कर जैसे रिंगमास्टर खुश होता है, जैसे वक़्त के हुक्मरान खुश होते हैं कि उनके आदेश न मानने वाले लोगों पर पुलिस को लाठी-गोली चलाने का नैतिक आधार मिल गया. नागरिकता कानून का विरोध वाले लोगों को दो-दो विरोधियों का एक साथ सामना करना पड़ रहा है; एक तो बेरहम मौसम की मार का और दूसरे संवेदना से शून्य प्रशासन और पुलिस का !

सबसे दुखद पहलू इस पूरे मामले का यह है कि एक ऐसा आदमी आज यह फैसला करता है कि कौन इस देश में रह सकता है, कौन नहीं जो खुद 95 दिन जेल में रहा था. जेल में भी वह किसी राजनीतिक आंदोलन में भाग लेने के चलते नहीं गया था बल्कि उसके काले कारनामों की वजह से भेजा गया था. यहां तक कि हिस्ट्रीशीटर की तरह वह तड़ीपार भी हुआ था. वही आदमी आज सदन में 1971 के पहले वाले पाकिस्तान के आंकड़े आज के बना कर परोस देता है कि पाकिस्तान में 23% हिंदू थे जो घट कर चार फ़ीसदी तक आ गए हैं जबकि असलियत यह है कि पकिस्तान मे हिन्दु आबादी 3.2% से बढ़कर 3.7% हो गयी है और तो और इस्लामिक राज्य होने के बावजूद दो सांसद भी हिन्दू हैं, यानि उन्हें राजनीतिक अधिकार भी मिले हुए हैं.

सच्चाई तो यही है कि सारे माहौल को बिगाड़ने की पूरी ज़िम्मेदारी सरकार की है, जो आंदोलनकारियों को उपद्रवी बता कर बदनाम करना चाहती थी और पुलसिया कार्रवाई के लिए नैतिक आधार जुटाना चाहती थी ! वरना किस प्रदेश का मुख्यमंत्री कहता है कि हम बदला लेंगे उससे जिसने जलाई है सम्पत्ति! कैसे- कैसे नेता पैदा के दिए है इस देश ने जो गुंडों की भाषा बोलते हैं !! मुझे ब्रेख्ट का एक कथन याद आ रहा है :

‘सबसे निकृष्ट अशिक्षित आदमी वह होता है, जो सियासी नज़रिए से अशिक्षित होता है. वह सुनता नहीं, बोलता नहीं, सियासी सरगर्मियों में हिस्सा नहीं लेता. इतना घामड़ होता है कि गर्व से कहता है वह राजनीति से नफरत करता है. वह कूड़मगज नहीं जानता कि उसकी राजनीतिक अज्ञानता ही एक गिरे हुए राजनेता को जन्म देती है, जो भ्रष्ट राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों का नौकर होता है !’

यही तो हालात हो गए हैं इस देश के !!

किससे लेंगे आप बदला ? पहचान बताएंगे क्या उसकी ऐसे दिखते हैं ये लोग, इनका पहरावा आपसे अलग है, पूजा-आराधना का तौर तरीका अलग है !! सांप्रदायिक रंगत देने में केंद्र और राज्यों की सरकारें दोनों ही तो लगी हुई हैं कबसे. लेकिन असम और पूर्वोत्तर के राज्यों में कैसे दे पाएंगे यह सांप्रदायिक रंगत ? वहां पर भाषाई-सांस्कृतिक पहचान का संकट मुसलमानों के कारण तो आया नहीं है, हिंदुओं के चलते आया है. असम में असमी-बंगाली लडाई का इतिहास पुराना है. ‘बिहारियों’ के नाम पर हिंदीभाषियों पर हमले भी होते रहे हैं वहां. तमाम कोशिशों के बावजूद इन्हें मुसलमान-विरोधी रंगत तो आप दे नहीं पाए लेकिन बदला लेने का अहंकार अभी भी जस का तस बना हुआ है !

लाख समझा लें मगर सांप्रदायिक शेर की सवारी करता अपनी ही रौ में बहता सत्तारूढ़ दल विवेक बुद्धि की बात सुनने को तैयार ही नहीं है कि बंग्लादेश से भारत आए लोग हिन्दू या मुसलमान नहीं, बेहतर जीवन और रोजगार की तलाश मे आए लोग हैं, न कि वे किसी धार्मिक उत्पीड़न के कारण आए हैं !

उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम – सभी जगह विरोध हो रहा है इस कानून का. इसलिए केवल मुस्लिम बहुल इलाकों तक सीमित करके दिखना महज एक शरारत है हुक्मरानों की ! प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक रामचन्द्र गुहा को एक प्ले-कार्ड लिए चलने पर हिरासत में लिए जाने के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने जो कहा, वह सत्तापक्ष की सोच को बताने के लिए काफी है, ‘क़ानून व्यवस्था में खलल डाल रहे शरारती तत्वों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जानी चाहिए और आम लोगों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। अगर ऐसा कहीं होता है तो ज़िम्मेदार अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी यानि विरोध प्रदर्शन भी अब क़ानून व्यवस्था में खलल डालना है और इस बयान में ढकी धमकी भी प्रशासन के लिए कि उसे वहीं करना होगा, जो सत्ता पक्ष चाहेगा !

इस कानून के तहत नागरिकता का सबूत देना नागरिक का काम है. ममता बनर्जी ने भाजपा नेताओं को चुनौती देते हुए कहा, ‘अगर आप मुझसे मेरे पिता का जन्म प्रमाण पत्र मांगते हो, तो पहले तुम भी उसे दो. क्या इन भाजपा नेताओं के पास अपने पिता का जन्म प्रमाण पत्र है ? भाजपा हमसे हमारे पूर्वजों का प्रमाण मांग उनका अपमान कर रही है.’

एक तरह से ठीक ही कह रही हैं ममता दी. कम से कम मेरी पीढ़ी के लोग तो जानते ही हैं जन्म प्रमाणपत्र की असलियत. गांव का चौकीदार ही महीने में एक बार थाने में इसकी सूचना दिया करता था. मुझे खुद अपनी जन्म की तारीख तक नहीं मालूम. मां ने अध्यापक को विभाजन के दौर का कुछ हवाला दिया और अध्यापक ने एक तारीख निश्चित कर दी मेरे लिए, जो आज तक मेरा मुंह चिढ़ाती है. ऐसे लोग कैसे बता पाएंगे पिताजी की जन्म की तारीख ?

Read Also –

‘एनआरसी हमारी बहुत बड़ी गलती है’
अमर शहीद अशफाक और बिस्मिल का देशवासियों के नाम अंतिम संदेश
NRC में कैसे करेंगे अपनी नागरिकता साबित ?
सनक से देश नहीं चलते !

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Previous Post

प्रधानमंत्री मोदी के नाम एक आम नागरिक का पत्र

Next Post

मोदी-शाह की ‘न्यू इंडिया’ के खिलाफ खड़ी ‘भारतीयता’, उनकी वैचारिकी में अंतिम कील

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

मोदी-शाह की 'न्यू इंडिया' के खिलाफ खड़ी 'भारतीयता', उनकी वैचारिकी में अंतिम कील

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

4. चुनाव की पूर्व संध्या पर हुई मुठभेड़ें

January 5, 2026

भारत में जाति के सवाल पर भगत सिंह और माओवादियों का दृष्टिकोण

March 28, 2019

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.