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प्रगतिशील, वामपंथी एवं क्रांतिकारी शक्तियों को हमेशा गैर संसदीय जनसंघर्षों पर जोर देना चाहिए

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 29, 2025
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ठोस परिस्थिति का ठोस विश्लेषण मार्क्सवाद की जीती-जागती आत्मा है. हमारे देश में 1947 में हुए सत्ता हस्तांतरण और 26 जनवरी 1950 को एक पूंजीवादी संविधान लागू होने के बाद से ही संसदीय चुनाव की परम्परा रही है. पहला आम चुनाव वर्ष 1951-’52 में हुआ था. तबसे 1957, 1962, 1967, 1971, 1977, 1980, 1984, 1989, 1991, 1996, 1998, 1999, 2004, 2009, 2014, 2019 तथा 2024 में कुल मिलाकर 18 बार लोक सभा के लिए चुनाव हो चुके हैं.

इसी प्रकार प्रांतीय स्तर पर विभिन्न राज्यों में विधानसभा के लिए चुनाव होते रहे हैं. इसके साथ ही तीन स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के अनुसार जिला परिषद, प्रखंड समिति और ग्राम पंचायत स्तर के चुनाव भी होते हैं. इससे आम जनता में यह भ्रम भी जन्म लेता है कि आम जनता के वोटों से जीत कर जो प्रतिनिधि जाते हैं, वे आम जनता के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन व्यवहार में ठीक इसके उलट होता है.

पिछले 75 वर्षों की संसदीय चुनावी प्रणाली का लब्बोलुआब यह है कि 90 फीसदी से ज्यादा सीटें शासक वर्गों की पार्टियों द्वारा खड़े किये गये प्रत्याशी या उम्मीदवार जीतते हैं. कुछ सीटों पर आम जनता के हितों के लिए लड़ने वाले जनपक्षधर, प्रगतिशील एवं वामपंथी-क्रांतिकारी प्रत्याशियों को भी यदा-कदा जीतने का मौका मिल जाता है.

जनवादी एवं वामपंथी आन्दोलन का यह कटु अनुभव है कि उनके द्वारा खड़े किये गये उम्मीदवारों का एक अच्छा-खासा हिस्सा चुनाव जीतने के बाद पार्टी व संगठन के सिद्धांतों से विचलित होने लगता है और संसदीय भटकाव का शिकार हो जाता है. पार्टी या संगठन के लाख प्रयास के बावजूद मुखिया, जिला पार्षद, विधायक, सांसद व अन्य जनप्रतिनिधियों का एक हिस्सा वैचारिक रूप से पतित और आर्थिक रूप से भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाता है.

यह स्थिति वामपंथी एवं क्रांतिकारी आन्दोलन के समक्ष एक चुनौती के रूप में खड़ी है. इसका मुकाबला कैसे किया जाए और इस विचलन एवं भटकाव को कैसे रोका जाए, यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने मुंह बाए खड़ा है.

मुझे ऐसा लगता है कि चुनाव में हमें सिर्फ ऐसे उम्मीदवारों को ही खड़ा करना चाहिए जो राजनीतिक, वैचारिक एवं सैद्धांतिक रूप से परिपक्व हों, विचारधारा, कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार और जनता के चेतना के स्तर को उन्नत करना हमारा फौरी कार्यभार होना चाहिए.

किसी भी स्थिति में चुनाव जीतने के लिए गलत हथकंडे का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए और वामपंथी दलों को अपनी स्वतंत्र दावेदारी पेश करनी चाहिए. इसलिए शासक वर्गों की पार्टियों से गठजोड़ से परहेज करना चाहिए. जनता में किये गये संघर्षों और जन आंदोलनों की ताकत पर चुनाव के संघर्ष में विजय प्राप्त करने का ख्वाब देखना चाहिए और प्रगतिशील, वामपंथी एवं क्रांतिकारी शक्तियों को हमेशा गैर संसदीय जनसंघर्षों पर जोर देना चाहिए.

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