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सिंहावलोकन-3 : मोदी शासनकाल में मजदूरों की स्थिति

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 21, 2019
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सिंहावलोकन-3 : मोदी शासनकाल में मजदूरों की स्थिति

दूसरे सभी क्षेत्रों की तरह मोदी सरकार की ‘कॉरपोरेटों के हितों की हिफाजत करनेवाली’ और जनविरोधी श्रमनीति के चलते भारत का मेहनती वर्ग 2014 में भाजपा के सत्तासीन होने के बाद से लेकर अभी तक कम-से-कम 18 बार देशव्यापी हड़तालें करने को बाध्य हुआ है. सत्ता में आने के बाद से ही मोदी सरकार ने विश्व-बैंक की ‘व्यापार-वाणिज्य को आसान बनाने’ की परियोजना में अच्छी रेटिंग पाने के लिए खुद को उनके सामने बिछा-सा दिया है. सरकार ने श्रम-कानूनों को इतना ढीला-ढाला बना दिया है कि वे बड़े-बड़े कॉरपोरेटों द्वारा व्यापार करने के रास्ते में कोई भी रूकावट नहीं खड़ा कर सकें ताकि ये कॉरपोरेट्स देश से बिना किसी रोक-टोक के श्रम की लूट कर सके. इस तरह सरकार उन सभी न्यूनतम अधिकारों को, जो श्रमिक वर्ग ने इतने दिनों के अपने लगातार चलने वाले संघर्षों की बदौलत हासिल किये थे, खत्म कर देने की कोशिशें कर ही हैं.

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2014 के अगस्त में वसुन्धरा राजे के नेतृत्ववाली राजस्थानी सरकार के मंत्रिमंडल ने चार श्रम-कानूनों में संशोधन किये. वे कानून थे – इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स ऐक्ट (औद्योगिक विवाद कानून) 1947, फैक्ट्री कानून, 1948, कन्ट्रैक्ट लेबर (रेगुलेशन और एबोलिशन) एक्ट, 1970 और अप्रैन्टिस ऐक्ट, 1961. इंडस्ट्रियल डिस्प्युट्स एक्ट के पिछले संशोधन में ही बताया गया है कि सरकार से पहले किसी भी किस्म की पूर्व अनुमति लिये बिना मालिकगण 300 कर्मियों की छंटनी कर सकेंगे (पहले के कानून में यह सीमा 100 थी). आंकड़े बताते हैं कि ऐसे उद्योगों की संख्या 86 प्रतिशत है, जहां 300 से कम कर्मी काम कर रहे हैं. स्पष्ट है कि मालिकगण अब आसानी से इस संशोधन का इस्तेमाल कर श्रमिकों का बेरोकटोक शोषण कर सकेंगे. कानूनों में संशोधन के जरिए श्रमिक युनियनों के गठन के काम को भी पहले की तुलना में काफी कठिन बना दिया गया है. पहले 15 प्रतिशत कर्मीगण इकट्ठा एक युनियन का गठन कर सकते थे. अब वहीं एक युनियन बनाने के लिए किसी संस्थान, कारखाने आदि में 30 प्रतिशत कर्मियों को इकट्ठा होना होगा.




कन्ट्रैक्ट लेबर एक्ट में जो संशोधन किया गया है, उसका इस्तेमाल कर मालिकगण बिना किसी लाइसेंस के पद पर अस्थायी श्रमिकों की नियुक्ति कर सकते हैं. बिजनेस-स्टैण्डर्ड में छपी एक रिपोर्ट बताती है, ‘फैक्ट्री कानून में किये गये नये संशोधनों के अनुसार जिन कारखानों में बिजली नहीं है, उनमें मजदूरों की नियुक्ति करने की सीमा को 20 से बढ़ाकर 40 कर दिया गया है. फिर जिन कारखानों में बिजली है, उनमें मजदूर रखने की इस सीमा को 10 से बढ़ाकर 20 कर दिया गया है. राज्य सरकार से यदि पहले ही लिखित अनुमति नहीं ली गयी हो, तो अदालतों में मालिकों द्वारा इस कानून के उल्लंघन से सम्बन्धित अभियोग टिक ही नहीं पायेंगे. इस संशोधन में एक नया प्रावधान यह भी जोड़ा गया है कि कई अपराध होने पर भी उन सबको मिलाकर एक ही अपराध के रूप में उन्हें गिना जायेगा.’ इसी किस्म के संशोधन लाकर श्रमिकों के अधिकारों में कैसे कटौती की जाए और मालिकों के लिए कानून की घेराबन्दियों को कैसे खत्म किया जाए, इस सिलसिले में राजस्थान ने हरियाणा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे दूसरे राज्यों को राह दिखाई है.

2015 में गुजरात के श्रम-कानूनों में कुछ संशोधन किये गये. इसमें श्रमिकों के साथ मालिकों के झगड़ों व विवादों को अदालत के बाहर ही निपटाने की व्यवस्था की गयी है. वस्तुतः इस संशोधन का उद्देश्य अदालत का दरवाजा खटखटाने का जो बुनियादी अधिकार इतने दिनों तक मजदूरों को हासिल था, उससे उनको वंचित करना ही था. इसी साल मध्य प्रदेश सरकार ने भी श्रमिकों के शोषण के लिए ऐसे ही रास्ते का अनुसरण किया और अपने श्रम-कानूनों में उसने बदलाव किये. 2017 में कन्ट्रैक्ट लेबर महाराष्ट्र (संशोधन) एक्ट में कहा गया, ‘अनगिनत छोटे और मंझोले उद्योग इस कानून के दायरे से बाहर रहेंगे.’ बड़े उद्योग भी ऐसे कानूनों के दायरों से खुद को बाहर रख सकते हैं, बशर्ते कि वे 40 अस्थायी श्रमिकों के चार से पांच ग्रुपों के रूप में उन्हें अलग-अलग अपने उद्योगों में नियुक्ति दें. इस तरह मालिकगण श्रमिकों को प्रोविडेंट फंड, न्यूनतम मजदूरी आदि जैसी सुविधाओं से वंचित कर सकेंगे. 2016 में 18 करोड़ भारतीय श्रमिक सरकार के आर्थिक सुधारों के खिलाफ अखिल भारतीय हड़ताल पर गये. साथ ही कठोर श्रम कानूनों, केन्द्रों और राज्य सरकारों की अधीनस्थ विभिन्न संस्थाओं के विनिवेशीकरण और प्रत्यक्ष विदेशी निवेशों के लिए रेलवे से लेकर बीमा और यहां तक कि रक्षा उद्योगों को खोल देने आदि के खिलाफ केन्द्रीय ट्रेड-युनियनों ने एक 12 सूत्री मांग-पत्र पेश किया.




मोदी की भाजपा ने वादा किया था कि उनकी सरकार हर साल 2 करोड़ नौकरियां देंगी. इन लम्बे-चौड़े वादों के बिल्कुल उलट देश के कार्य-संस्थानों की स्थिति सचमुच ही सोचनीय है. 2017 के एक आंकड़े के मुताबिक देश में जहां 2 करोड़ लोग नौकरियों की तलाश में लगे हैं, वहीं नौकरियां पैदा हो रही हैं मात्र 20 लाख. पकौड़ा बेचने को नौकरियों के सृजन के रूप में पेश किया जा रहा है. हम देख पा रहे हैं कि एक-पर-एक कारखाने या तो धुक-धुक कर रहे हैं या फिर बंद हो जा रहे हैं. बेशुमार जनता अपनी जीविका से हाथ धो रही है. इस भयावह संकट के दौर में भी सरकार द्वारा हाल के वर्षों में पेश बजट प्रस्तावों में स्तरीय नौकरियों का सृजन करने के लिए कुछ ठोस कदम नहीं उठाये गये हैं. सरकार 7वें सेन्ट्रल पे-कमिशन की सिफारिशों के अनुसार न्यूनतम वेतन 18,000 करने को राजी हो गयी थी. पर वह उसे लागू करने में विफल रही है. एक के बाद एक सरकारी क्षेत्रों का निजीकरण करने की जो प्रक्रिया चल रही थी, वह 2018 के बजट में भी उसी तरह बेरोक-टोक जारी है. निःसन्देह इससे आर्थिक विषमता और भी बढ़ेगी.

2018-19 के बजट के बाद के अपने बयान में भाजपा सरकार ने यह दावा किया है कि सरकार ने न जाने कहां 70 लाख नौकरियां सृजित की है. यह दावा प्रोविडेंट फंड के आंकड़ों के आधार पर किया गया है जबकि इस तरह आंकड़ों से नौकरियों की निरंतरता के बारे में या मालिकों द्वारा अपने कर्मियों के प्रोविडेंट फंड के पैसे नियमित जमा किये जा रहे हैं या नहीं, इस सब के बारे कुछ पता नहीं चलता. इसके विपरीत इसी शोध में देखा जा रहा है कि इप्लॉयमेन्ट स्टेट इन्स्युरेन्स में रजिस्टर्ड होने वाले नये कर्मियों की संख्या में मात्र 5 लाख का इजाफा हुआ है. हाल में नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफिस (एनएसएसयू) से पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) की जो रिपोर्ट लीक हुई है, वह बता रही है कि मौजूदा समय में बेकारी पिछले 45 वर्षों में सबसे ज्यादा हो गयी है.

ऐसी सब स्थिति में मोदी सरकार ने ‘व्यापार-वाणिज्य को आसान बनाने के लिए’ फिक्स्ड टर्म इम्प्लॉयमेन्ट (एफटीई) की प्रक्रिया शुरू की है. इस एफटीई की नीति के जरिए मालिकों को यह अधिकार दिया गया है कि जो उनके खास प्रोजेक्ट मौसमी हैं, उनमें वे खास मौसम के लिए किराए पर श्रमिक नियुक्त कर ले सकते हैं. यह पॉलिसी निश्चित रूप से और भी भारी मात्रा में अस्थायी श्रमिक तैयार करेगी और यह मौजूदा कन्ट्रैक्ट लेबर (रेगुलेशन और सबोलिशन) एक्ट की अन्तरवस्तु के खिलाफ भी जाती है. एक सामाजिक कार्यकर्त्ता की भाषा में कहें तो, ‘फिक्स्ड टर्म इम्पलॉयमेन्ट देश की अर्थव्यवस्था पर और भी दवाब पैदा करेगी, क्योंकि इसके चलते जीविका की कोई सुरक्षा नहीं रहेगी और आमदनी व क्रय-क्षमता दोनों घटते चले जायेंगे. नतीजतन अिर्थक मंदी सामने आयेगी और उत्पादन भी घटेगा.’




2017 के अगस्त में लोकसभा में ऑन वेजेज बिल पेश किया गया, जिसमें 4 श्रम-कानूनों को एक में मिला दिया गया था. इस बिल में काम-काज का स्तर गिर जाने से लेकर हड़तालों में शामिल होने तक के चलते और इस जैसे कई कारणों से श्रमिक के वेतन में कटौती कर लेने के प्रावधान किये गये हैं. इसके अलावा इसमें मालिकों को अपनी मर्जी के मुताबिक कामों का समय निर्धारित करने की अनुमति दी गयी है. साथ ही इसमें ओवरटाईम की जो परिभाषा दी गई है, वह भी बहसतलब है. इसके एक नियम में उल्लेख किया गया है, ‘कम्पनी के जिस अकाउन्ट का हिसाब-किताब हो चुका है, उस पर फिर से कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकेगा. ‘मालिक’ और ‘श्रमिक’ की जो अलग-अलग संज्ञाएं इसमें दी गई है, उनके तहत वस्तुतः मालिकों के ही हितों की हिफाजत की गई है. इस बिल में एक महत्वपूर्ण बहस का मुद्दा यह है कि सरकार को अपनी मर्जी के मुताबिक न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण करने की अनुमति दी गई है.

उधर, लम्बे दिनों से ही ट्रेड-युनियनें यह मांग पेश करती आ रही हैं कि 1957 में 15वें आईएलसी (इंटरनेशनल लेबर काम्फ्रेंस – अन्तर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन) द्वारा घोषित फॉमूले के साथ सामंजस्य बिठाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी निर्धारित की जानी चाहिए. इस फार्मूले में भोजन की न्यूनतम जरूरतें कपड़े, घर के किराये, यहां तक कि जलावन और बिजली के खर्चे आदि जैसे खर्चों को भी हिसाब में लिया गया है. फिर इम्प्लॉयमेन्ट प्रोविडेंट फंड (ईपीएफ), मातृत्व की सुविधाएं और पेंशन सहित सामाजिक हित एवं सुरक्षा से सम्बन्धित 15 कानूनों को एक साथ मिलाने की कई कोशिशें हुई हैं.

मालिकों को अपने कर्मचारियों के ईपीएफ में उक्त कर्मी के वार्षिक आय का 12 प्रतिशत जमा करना पड़ता है. सरकार ने हर नये कर्मी के लिए 3 वर्षों तक उसके ईपीएफ में वह रकम जमा करने का निर्णय लिया है. इसके चलते कम्पनियों द्वारा कर्मचारियों को वेतन के रूप में दी जाने वाली राशि काफी कम हो जा रही है. इसी से वे अपने कर्मचारियों की संख्या बढ़ा रहे हैं. नये कर्मचारियों के मामले में इस तरह ईपीएफ में मालिकों को जो हिस्सा जमा देना पड़ता है, उसे सरकार द्वारा जमाकर दिये जाने का निर्णय दरअसल करदाताओं के रूपयों से कॉरपोरेटों की जेबें भरने का गौरतलब उदाहरण है. कॉरपोरेटों को दी जाने वाली यह सरकारी सहायता चूंकि सिर्फ 3 वर्षों तक के लिए ही है, अतः यहां एक दुश्चिन्ता लगी रह जाती है कि एक नये कर्मचारी को दी जानेवाली यह सुविधा तीन साल बाद जब सरकार बंद कर देगी तब उस कर्मचारी की नौकरी बनी रहेगी या नहीं ?




महिला कर्मचारियों के लिए ईपीएफ में जमा की जाने वाली राशि को सरकार ने 12 प्रतिशत से घटाकर 8 प्रतिशत कर दिया है, जिससे कि महिलाओं की हाथ में मिलनेवाली वेतन-राशि को बढ़ाया जा सके. यहां उल्लेख करना अत्यन्त जरूरी है कि इस जमा कररने वाली राशि में 4 प्रतिशत की यह कटौती सरकार नहीं पूरी करेगी. यानी महिलाओं के मामले में दीर्घमियादी संचय की मात्रा को घटाकर उनके हाथ में मिलनेवाली वेतनराशि को बढ़ाया गया है. नतीजे के तौर पर रिटायर होने के बाद महिलाओं को मिलनेवाली सुविधाएं काफी हद तक कम हो जायेगी और बुढ़ापे में पुरूषों पर उनकी निर्भरता बढ़ जायेगी. दूसरे, हाथ में मिलनेवाली वेतनराशि के बढ़ने के चलते मालिकों द्वारा महिलाओं के वेतन में कटौती की सम्भावनाओं की भी अनदेखी नहीं की जा सकती.

इसके अलावा सरकार द्वारा प्रचारित इस मसौदा-कोड में महिलाओं को मातृत्वकाल में मिलनेवाली सुविधाओं के लिए एक विस्तृत शर्तों की सूची पेश की गयी है. इसमें कहा गया है, ‘गर्भवती महिलाओं को श्रम-साध्य कार्यों में नहीं लगाने, उन्हें स्वास्थ्य लाभ के लिए छुट्टियां देने और बंदी दशा की वजह से उपजी बीमारियों के इलाज के लिए लम्बी सवेतन छुट्टियां देने को मालिकगण बाध्य नहीं हैं.’ तो ऐसे प्रावधान तब किये जा रहे हैं जब इकोनॉमिक सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक कुल कर्मचारियों में महिलाओं का अनुपात भारत में सबसे कम है और पुरूषों व महिलाओं के वेतनमानों में विषमता भी भारत में अत्यन्त ज्यादा है.

2019 के अन्तरिम बजट की एक बड़ी घोषणा प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन योजना है, जो असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक स्वैच्छिक पेंशन योजना है. इस योजना के तहत सरकार की ओर से इस योजना में 29 साल में शामिल होनेवालों के लिए प्रति माह 100 रूपया और 18 वर्ष में शामिल होनेवालों के लिए प्रति माह 55 रूपया आबंटित किये जाएंगे. यह कुल रकम उनके पेंशन अकाउंट में जमा की जाएगी. वस्तुतः यह योजना 2015 में एनडीए ने अटल पेंशन योजना के नाम से जो पेंशन योजना शुरू की थी, उसी का थोड़ा बदला हुआ रूप है. यह पेंशन पाने के लिए न्यूनतम कितने वर्षों तक काम करना होगा, इसके बारे में साफ-साफ कुछ नहीं कहा गया है. इसके अलावा नौकरी के नियमित नहीं होने के चलते असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का कार्यकाल अधिकांश मामलों में ही एक निरंतरता में नहीं होता. तो ऐसे मामलों में उनके पेंशन फंड का क्या होगा, इस बारे में भी स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा गया है.




इधर एक शोध में देखा गया है कि सारी उम्र निर्माण क्षेत्र, खदानों, कारखानों आदि में हाड़तोड़ शारीरिक श्रम करने की वजह से उनकी औसत राष्ट्रीय आयु 68.8 वर्ष से भी कम है. तो ऐसे में इस पेंशन योजना के तहत पेंशन फंड में भारी राशि वैसे ही जमा होगी जेसा कि इम्प्लॉयज प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन में हो रही है और उसकी तरह यह विशाल राशि भी इक्विटी मार्केट में कॉरपोरेटों को आसानी से मिलने वाले मूलधन के रूप में इस्तेमाल की जाएगी. काफी खून-पसीने बहाकर और कष्ट काटकर अर्जित इन रूपयों का अधिकांश मामलों में ही अंत में चलकर कोई दावेदार नहीं रह जाता और ये कॉरपोरेशन बिना कोई खर्च उठाये भारी मुनाफा अर्जित करते हैं.

इस किस्म के श्रम-कानून सुधारों और सरकारी नीतियों के प्रणयन के जरिए गरीबों का और भी शोषण कर अमीरों को और भी अमीर बनाने के संस्थानिक आधार तैयार किये जाते हैं. इसके साथ फिर श्रमिक वर्ग के जनवादी संघर्षों के विरूद्ध सरकार की साजिश मूलक साम्प्रदायिक एवं जातिगत भेदभाव की नीति जुड़ जाती है. पर दूसरा पक्ष यह भी है कि साम्राज्यवाद के हितों की हिफाजत के लिए मोदी सरकार द्वारा कई श्रमिक-विरोधी नीतियां ग्रहण करने और श्रमिक वर्ग के अधिकारों पर उसके द्वारा किये जा रहे हमलों के खिलाफ 2019 की जनवरी में दो दिनों की जो हड़ताल आयोजित की गई थी, उसमें सभी क्षेत्रों की मेहनती जनता ने भारी संख्या में भागीदारी की थी. ऐसे में इस हड़ताल को निःसन्देह मोदी सरकार के खिलाफ श्रमिक वर्ग के एक शक्तिशाली प्रत्युत्तर के रूप में देखा जा सकता है.




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