लोकतंत्र के नाम पर साम्राज्यवाद और चिली का समाजवादी प्रयोग: सल्वाडोर अलेंदे की क्रांतिकारी विरासत

साथियों ने बहुत सारी बातें रखीं. आपने देखा कि अमेरिका किस तरह लोकतंत्र के नाम पर साम्राज्यवाद को बढ़ावा दे रहा है. रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध समाप्त हो जाना चाहिए. यह युद्ध समाप्त हो सकता था, लेकिन लगातार हथियारों की आपूर्ति करके इसे जारी रखा जा रहा है.
हमने सत्य और अहिंसा की भी बात की. महात्मा गांधी जीवन भर सत्य और अहिंसा की बात करते रहे, लेकिन अंततः उनकी हत्या कर दी गई. उनसे संवाद करने के बजाय उन्हें गोली मार दी गई. यह हमारे अपने देश का इतिहास है. इसलिए लोकतंत्र के नाम पर जो कुछ हो रहा है, उसे समझना जरूरी है.
चिली में भी ट्रेड यूनियन बनाने वाले, किसानों को संगठित करने वाले और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहने वाले लोगों की बड़े पैमाने पर हत्याएं हुईं. लोकतंत्र और स्वतंत्रता की बातें करने वाली ताकतों के वास्तविक चरित्र को समझने के लिए इन घटनाओं का अध्ययन करना आवश्यक है.
इसके बावजूद आज हमारे सामने उम्मीद की एक बड़ी वजह है. पूरे लैटिन अमेरिका में वामपंथी राजनीति का प्रभाव फिर से बढ़ा है. कई देशों में वामपंथी विचारों से जुड़ी सरकारें बनी हैं. इससे यह उम्मीद पैदा होती है कि जनता अपने अधिकारों, संसाधनों और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के लिए नए सिरे से संघर्ष कर सकती है.
अर्जेंटीना और लैटिन अमेरिका के दूसरे देशों के अनुभव भी बताते हैं कि संकट के समय उदारवाद और लोकतंत्र की बातें करने वाली ताकतों का वास्तविक चरित्र सामने आता है. जब व्यवस्था पर संकट आता है, तब अनेक लोग अपने घोषित सिद्धांतों से पीछे हट जाते हैं.
भारत में भी हम यह विरोधाभास देखते हैं. यहां लोकतंत्र की बातें होती हैं, लेकिन सूचना के अधिकार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं की हत्या होती है. सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जाता है. बालू माफिया और दूसरे प्रभावशाली गिरोहों के खिलाफ आवाज उठाने वालों की हत्याएं होती हैं. ये केवल सामान्य आपराधिक घटनाएं नहीं हैं. कई मामलों में इनके पीछे संगठित आर्थिक और राजनीतिक हित काम करते हैं.
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है. यदि कोई व्यक्ति अपने से अधिक ताकतवर व्यक्ति के खिलाफ शिकायत लेकर थाने जाता है और वहां उसे न्याय नहीं मिलता, तो उसके लिए लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है?
मेरा अपना अनुभव है कि जब किसी ताकतवर व्यक्ति से विवाद हो जाए और आप थाने पहुंच जाएं, तो कई बार सारी लोकतांत्रिक बातें पीछे छूट जाती हैं. रात भर थाने में रहने के बाद व्यक्ति समझता है कि लोकतंत्र का वास्तविक अनुभव केवल संविधान में लिखी बातों से नहीं, बल्कि संस्थाओं के व्यवहार से भी तय होता है.
इसलिए हमें यह समझना होगा कि लोकतंत्र के नाम पर दुनिया में क्या हो रहा है, सैन्य शक्ति का इस्तेमाल किस प्रकार किया जा रहा है और दूसरे देशों की संप्रभुता में हस्तक्षेप कैसे होता है. अमेरिका के दुनिया भर में फैले सैन्य अड्डों और विभिन्न देशों में उसके राजनीतिक हस्तक्षेप की चर्चा इसी संदर्भ में जरूरी है.
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के उस बयान का भी उल्लेख किया गया, जिसमें उन्होंने एक द्वीप को लेकर अमेरिकी मांग और अपने देश की संप्रभुता के प्रश्न पर बात की थी. ऐसी घटनाएं हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में छोटे और विकासशील देशों पर किस तरह का दबाव बनाया जाता है.
दुनिया की घटनाओं को समझने की जरूरत
हमारे संगठन की ओर से लगातार यह कोशिश होती है कि दुनिया में जो कुछ घट रहा है, उसे समझा जाए. हम केवल कार्यक्रम आयोजित करने के लिए कार्यक्रम नहीं करते. हमारा उद्देश्य भी सीखना, सुनना और अपने ज्ञान को विकसित करना है.
हम कोई ऐसी जादुई छड़ी नहीं रखते कि एक मिनट में पूरी दुनिया की राजनीति समझ जाएं. हम दूसरों को सुनते हैं, उनके अनुभवों से सीखते हैं और इतिहास के माध्यम से वर्तमान को समझने की कोशिश करते हैं.
हमें जानना चाहिए कि सरकारें कैसे गिराई जाती हैं, चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने के लिए क्या तरीके अपनाए जाते हैं और मीडिया की भूमिका इसमें क्या होती है.
अंतरराष्ट्रीय मीडिया के स्वामित्व और उस पर बड़ी कंपनियों के प्रभाव का सवाल भी महत्वपूर्ण है. जब समाचारों के प्रसार पर कुछ बड़ी कंपनियों का नियंत्रण बढ़ जाता है, तब यह देखना जरूरी हो जाता है कि किन घटनाओं को प्रमुखता दी जा रही है और किन घटनाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है.
उदाहरण के लिए, लैटिन अमेरिका में किसी वामपंथी सरकार के खिलाफ घटनाएं हों, उत्तर कोरिया का प्रश्न हो या किसी दूसरे देश की राजनीति, इन सबके बारे में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एक जैसी छवि निर्मित की जा सकती है. इसलिए किसी भी समाचार को अंतिम सत्य मान लेने के बजाय उसके राजनीतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक संदर्भों को समझना चाहिए.
इसी उद्देश्य से आज हम चिली के राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे के जीवन, उनके राजनीतिक प्रयोग और उनकी हत्या से जुड़े इतिहास पर चर्चा करना चाहते हैं.
सल्वाडोर अलेंदे: लोकतांत्रिक रास्ते से समाजवाद का सपना
सल्वाडोर अलेंदे की एक प्रसिद्ध तस्वीर हमारे सामने है. राष्ट्रपति भवन पर हमला हो चुका है. भवन आग और धुएं से घिरा है. अलेंदे के हाथ में राइफल है. कहा जाता है कि उन्होंने अपने जीवन में हथियारों को बहुत कम महत्व दिया था, लेकिन अपने जीवन के अंतिम क्षणों में वे हथियार के साथ दिखाई देते हैं.
11 सितंबर 1973 को चिली में सैन्य तख्तापलट हुआ. राष्ट्रपति भवन पर हमला किया गया और उसी दिन अलेंदे की मृत्यु हुई. उनकी मृत्यु को लेकर लंबे समय तक अलग-अलग तरह के दावे और विवाद सामने आते रहे, लेकिन प्रचलित ऐतिहासिक निष्कर्ष यह है कि उन्होंने सैन्य हमले के दौरान हत्या की गई थी.
अलेंदे के जीवन और उनकी मृत्यु को समझना केवल चिली के इतिहास को जानना नहीं है. यह लोकतंत्र, समाजवाद, साम्राज्यवाद और राजनीतिक परिवर्तन के रास्तों पर विचार करने का अवसर भी है.
भारत में 1991 के बाद जिस आर्थिक व्यवस्था को नवउदारवाद के नाम से जाना गया, उसकी वैचारिक जड़ों और उससे जुड़े राजनीतिक प्रयोगों को समझने के लिए भी चिली का इतिहास महत्वपूर्ण है.
चिली में सैन्य तख्तापलट के बाद जो आर्थिक मॉडल लागू किया गया, उसमें बाजार को व्यापक स्वतंत्रता देने, सार्वजनिक क्षेत्र को सीमित करने और निजी पूंजी की भूमिका बढ़ाने पर जोर था. इस मॉडल से जुड़े अर्थशास्त्रियों में मिल्टन फ्रीडमैन का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है. उन्हें अमेरिकी आर्थिक उदारवाद का एक प्रमुख विचारक माना जाता था.
यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है. यदि किसी देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार समाजवादी नीतियां लागू करना चाहती है, तो क्या बाहरी शक्तियां उसे अपने रास्ते पर चलने देंगी?
चिली का अनुभव इस प्रश्न को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार देता है.
अलेंदे का राजनीतिक जीवन और शुरुआती संघर्ष
सल्वाडोर अलेंदे का जन्म 1908 में चिली में हुआ था. वे पेशे से डॉक्टर थे और एक ऐसे परिवार से आते थे, जिसकी समाज में अच्छी प्रतिष्ठा थी. डॉक्टर बनने के बाद उन्होंने लोगों के बीच काम किया और सामाजिक असमानता, गरीबी तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को करीब से देखा.
धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ी और वे राजनीति में सक्रिय हुए. वे चिली की सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े थे. वे मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित थे, लेकिन उनकी राजनीतिक रणनीति सशस्त्र क्रांति के बजाय लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से समाजवाद की स्थापना पर केंद्रित थी.
यह अंतर समझना जरूरी है. अलेंदे समाजवाद चाहते थे, लेकिन उनका मानना था कि चिली की ऐतिहासिक परिस्थितियों और संस्थाओं को ध्यान में रखते हुए समाजवाद तक पहुंचने का रास्ता अलग हो सकता है.
उनकी राजनीति में ट्रेड यूनियनों, श्रमिकों, किसानों और अन्य सामाजिक समूहों को साथ लाने का प्रयास महत्वपूर्ण था. वे जानते थे कि समाज में परिवर्तन केवल किसी एक वर्ग या संगठन के प्रयास से संभव नहीं होगा.
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद फासीवाद के खिलाफ बने व्यापक राजनीतिक गठबंधनों का अनुभव भी लैटिन अमेरिका की राजनीति पर प्रभाव डाल रहा था. चिली में भी वामपंथी और प्रगतिशील शक्तियों के बीच सहयोग की कोशिशें हुईं. अलेंदे इस प्रक्रिया में सक्रिय रहे.
लेकिन वामपंथी राजनीति के भीतर भी मतभेद मौजूद थे. सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच रणनीति को लेकर मतभेद थे. कुछ लोग संसदीय रास्ते पर जोर देते थे, तो कुछ का मानना था कि व्यवस्था को बदलने के लिए अधिक निर्णायक क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे.
अलेंदे के सामने चुनौती यह थी कि वे इन मतभेदों के बावजूद एक व्यापक राजनीतिक गठबंधन बनाए रखें.
लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता
अलेंदे के राजनीतिक जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना 1958 के राष्ट्रपति चुनाव से जुड़ी है. वे इससे पहले भी चुनाव लड़ चुके थे और आगे भी कई बार राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बने.
उनके राजनीतिक जीवन से जुड़ी एक चर्चित घटना यह है कि जब एक चुनाव में उनकी जीत की संभावना मजबूत होने लगी, तब सैन्य नेतृत्व की ओर से उन्हें समर्थन देने का प्रस्ताव आया. इस प्रसंग का विवरण अलग-अलग स्रोतों में भिन्न हो सकता है, लेकिन अलेंदे की राजनीतिक छवि का केंद्रीय तत्व स्पष्ट है: वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपने व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ से ऊपर रखने के पक्षधर थे.
उनका मानना था कि यदि समाजवाद की स्थापना के लिए लोकतंत्र का रास्ता चुना गया है, तो उस रास्ते की रक्षा भी करनी होगी. सत्ता हासिल करने के लिए सेना के हस्तक्षेप को स्वीकार करना उनके सिद्धांतों के विरुद्ध था.
इस दृष्टिकोण को समझने के लिए 1959 की क्यूबा क्रांति का संदर्भ भी महत्वपूर्ण है. क्यूबा में फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ और बाद में वहां समाजवादी व्यवस्था स्थापित हुई. इससे पूरे लैटिन अमेरिका की राजनीति प्रभावित हुई.
अमेरिका के लिए यह एक बड़ा राजनीतिक झटका था. उसे आशंका थी कि क्यूबा के बाद दूसरे देशों में भी समाजवादी आंदोलन मजबूत हो सकते हैं. इस परिस्थिति में लैटिन अमेरिका में वामपंथी आंदोलनों और सरकारों के प्रति अमेरिकी नीति अधिक आक्रामक होती गई.
अलेंदे का रास्ता क्यूबा के रास्ते से अलग था. वे लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर रहते हुए समाजवाद की स्थापना करना चाहते थे. उनका विश्वास था कि चिली की परिस्थितियों में एक अलग तरह का समाजवादी मॉडल विकसित किया जा सकता है.
शीतयुद्ध, अमेरिकी हस्तक्षेप और चिली
चिली की राजनीति को समझने के लिए शीतयुद्ध की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना आवश्यक है.
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ ने नाजी जर्मनी के खिलाफ सहयोग किया था. लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद दोनों के बीच वैचारिक और सामरिक संघर्ष तेज हो गया. अमेरिका को आशंका थी कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कम्युनिस्ट आंदोलनों का प्रभाव बढ़ेगा.
लैटिन अमेरिका अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र था. इस क्षेत्र में तांबा, नाइट्रेट और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता थी. अमेरिकी कंपनियों के आर्थिक हित भी यहां गहराई से जुड़े हुए थे.
चिली तांबे के उत्पादन के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण था. वहां की अर्थव्यवस्था में विदेशी कंपनियों की बड़ी भूमिका थी. अलेंदे का मानना था कि देश के प्राकृतिक संसाधनों पर राष्ट्रीय नियंत्रण स्थापित किए बिना आर्थिक असमानता को दूर नहीं किया जा सकता.
इसलिए चिली में समाजवादी आंदोलन का मजबूत होना केवल घरेलू राजनीति का विषय नहीं था. इसका असर अमेरिकी कंपनियों के हितों, क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन और शीतयुद्ध की रणनीति पर भी पड़ता था.
अलेंदे के राष्ट्रपति बनने से पहले ही अमेरिका में उनकी संभावित जीत को लेकर चिंता थी. अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के प्रशासन और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर की भूमिका इस संदर्भ में महत्वपूर्ण रही.
अमेरिकी प्रशासन ने अलेंदे की सरकार को अस्थिर करने के लिए विभिन्न राजनीतिक और आर्थिक उपायों का समर्थन किया. इस दौर के दस्तावेजों और ऐतिहासिक अध्ययनों से पता चलता है कि अमेरिका चिली में अलेंदे के सत्ता में आने और उनकी सरकार के बने रहने को लेकर गंभीर रूप से चिंतित था.
यह लोकतंत्र और साम्राज्यवाद के बीच के विरोधाभास को सामने लाता है. एक तरफ लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्वतंत्र चुनावों की बात की जाती है, दूसरी तरफ जब जनता किसी ऐसी सरकार को चुनती है जिसकी नीतियां शक्तिशाली देशों के हितों के विरुद्ध जाती हैं, तो उस सरकार पर दबाव बनाने के प्रयास किए जा सकते हैं.
1970 का चुनाव और अलेंदे की जीत
सल्वाडोर अलेंदे ने 4 सितंबर 1970 को हुए राष्ट्रपति चुनाव में जीत हासिल की. वे व्यापक वामपंथी गठबंधन यूनिदाद पॉपुलर के उम्मीदवार थे. इस गठबंधन में सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य वामपंथी समूह शामिल थे.
अलेंदे की जीत बहुत बड़े अंतर से नहीं हुई थी. वे सबसे अधिक वोट प्राप्त करने वाले उम्मीदवार बने, लेकिन उन्हें पूर्ण बहुमत नहीं मिला. चिली की संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार कांग्रेस ने उनकी जीत की पुष्टि की और वे राष्ट्रपति बने.
यह एक ऐतिहासिक घटना थी. पहली बार किसी देश में मार्क्सवादी विचारों से जुड़ा नेता चुनावी और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से राष्ट्रपति बना और उसने समाजवादी परिवर्तन का कार्यक्रम आगे बढ़ाने का प्रयास किया.
अलेंदे की सफलता के पीछे उनकी राजनीतिक क्षमता भी थी. वे अलग-अलग विचारधाराओं और सामाजिक समूहों के बीच संवाद स्थापित कर सकते थे. उन्हें चिली के समाज, संस्थाओं और राजनीतिक इतिहास की गहरी समझ थी.
उनका मानना था कि चिली का समाजवाद क्यूबा की क्रांति की हूबहू नकल नहीं करेगा. चिली की अपनी ऐतिहासिक परिस्थितियां थीं और उन्हीं के अनुरूप परिवर्तन का रास्ता तैयार करना आवश्यक था.
राष्ट्रीयकरण और जनकल्याण की नीतियां
राष्ट्रपति बनने के बाद अलेंदे ने आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए.
उनकी सरकार ने तांबा उद्योग के राष्ट्रीयकरण को आगे बढ़ाया. इसका उद्देश्य देश के प्राकृतिक संसाधनों पर राष्ट्रीय नियंत्रण स्थापित करना और उनसे प्राप्त आय को जनता के कल्याण के लिए इस्तेमाल करना था.
सरकार ने गरीबों और श्रमिकों के जीवन में सुधार लाने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए. बच्चों के पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर जोर दिया गया. मजदूरी बढ़ाने और आर्थिक असमानता कम करने की कोशिशें भी की गईं.
इन नीतियों से समाज के कई कमजोर वर्गों को लाभ पहुंचा. लेकिन आर्थिक परिवर्तन का यह कार्यक्रम शक्तिशाली हितों से टकरा रहा था.
बड़े उद्योगपतियों, जमींदारों और विदेशी कंपनियों के हित प्रभावित हो रहे थे. आर्थिक नीतियों को लेकर देश के भीतर राजनीतिक संघर्ष तेज होने लगा. उत्पादन, आपूर्ति, मुद्रास्फीति और राजनीतिक ध्रुवीकरण जैसी समस्याओं ने भी सरकार के सामने कठिनाइयां खड़ी कीं.
यहां यह समझना जरूरी है कि समाजवादी परिवर्तन केवल नीतियों की घोषणा से पूरा नहीं होता. उसके लिए राजनीतिक समर्थन, संस्थागत क्षमता, आर्थिक स्थिरता और व्यापक सामाजिक सहमति की भी जरूरत होती है.
शिकागो बॉयज और नवउदारवादी मॉडल
चिली के इतिहास में शिकागो बॉयज का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है. यह उन अर्थशास्त्रियों और तकनीकी विशेषज्ञों के समूह के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला नाम था, जिनमें कई लोगों ने अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की थी.
इनमें से अनेक लोग मुक्त बाजार, निजीकरण और आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के समर्थक थे. वे राज्य के आर्थिक हस्तक्षेप को कम करने और बाजार की भूमिका बढ़ाने के पक्ष में थे.
अलेंदे की सरकार के साथ उनका वैचारिक टकराव था. अलेंदे सार्वजनिक नियंत्रण और सामाजिक कल्याण पर जोर देते थे, जबकि शिकागो बॉयज से जुड़े विचारक बाजार-आधारित आर्थिक व्यवस्था को प्राथमिकता देते थे.
1973 के सैन्य तख्तापलट के बाद चिली में जनरल ऑगस्टो पिनोशे की सैन्य सरकार स्थापित हुई. इस शासन ने कठोर दमन के साथ-साथ व्यापक आर्थिक पुनर्गठन किया. इसी दौर में शिकागो बॉयज से जुड़े अर्थशास्त्रियों को आर्थिक नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका मिली.
इस प्रकार चिली नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के शुरुआती और प्रभावशाली प्रयोगों में से एक बन गया.
यहां एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है. जिस आर्थिक मॉडल को लागू करने के लिए लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को हटा दिया गया, वह मॉडल सैन्य तानाशाही के संरक्षण में आगे बढ़ा.
इस अनुभव ने लोकतंत्र, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के बीच संबंधों पर गंभीर प्रश्न खड़े किए.
अलेंदे और फिदेल कास्त्रो: दो अलग रास्ते
अलेंदे और फिदेल कास्त्रो के संबंधों को समझना भी महत्वपूर्ण है.
क्यूबा की क्रांति के बाद फिदेल कास्त्रो लैटिन अमेरिका के वामपंथी आंदोलनों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुके थे. अलेंदे भी क्यूबा के क्रांतिकारी अनुभव से परिचित थे, लेकिन उनका विश्वास था कि चिली को अपने समाज और संस्थाओं के अनुरूप रास्ता अपनाना चाहिए.
फिदेल कास्त्रो ने 1971 में चिली की यात्रा की. यह यात्रा निर्धारित अवधि से लंबी चली और इसके दौरान चिली की राजनीति में इस बात पर बहस हुई कि क्यूबा के साथ संबंधों का घरेलू राजनीतिक प्रभाव क्या होगा.
अलेंदे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर रहकर समाजवादी परिवर्तन करना चाहते थे. उन्हें लगता था कि यदि सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं को दरकिनार करेगी, तो विरोधी ताकतों को हस्तक्षेप का और अधिक अवसर मिल सकता है.
दूसरी ओर, कुछ क्रांतिकारी समूहों का मानना था कि केवल चुनाव और संसदीय प्रक्रिया के सहारे सत्ता-संरचना को बदला नहीं जा सकता. वे अधिक उग्र कदमों और सशस्त्र तैयारी पर जोर देते थे.
यही वह कठिन प्रश्न था जिसका सामना अलेंदे को करना पड़ा: क्या लोकतांत्रिक रास्ते से समाजवाद की स्थापना की जा सकती है, जबकि विरोधी शक्तियां उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने में लगी हों?
यह बहस केवल चिली तक सीमित नहीं थी. दुनिया भर के कम्युनिस्ट और समाजवादी आंदोलनों में इस विषय पर मतभेद रहे हैं.
वामपंथी आंदोलन के भीतर रणनीति का संकट
अलेंदे की सरकार के सामने केवल बाहरी हस्तक्षेप की चुनौती नहीं थी. वामपंथी आंदोलन के भीतर भी रणनीति को लेकर गंभीर मतभेद थे.
कुछ समूहों का मानना था कि सरकार को अधिक तेजी से और अधिक व्यापक तरीके से समाजवादी परिवर्तन करना चाहिए. वे चाहते थे कि श्रमिकों और किसानों की शक्ति को संस्थागत रूप दिया जाए और सत्ता-संरचना को तेजी से बदला जाए.
अलेंदे इस बात से परिचित थे कि चिली की सेना, न्यायपालिका, प्रशासन और अन्य संस्थाओं में सरकार के विरोधी प्रभावशाली समूह मौजूद थे. वे यह भी जानते थे कि देश के भीतर मौजूद आर्थिक अभिजात वर्ग को अमेरिकी समर्थन मिल सकता है.
इसलिए उनके लिए हर कदम के राजनीतिक परिणामों का आकलन करना आवश्यक था.
उनका एक महत्वपूर्ण राजनीतिक विचार यह था कि परिवर्तन के लिए अधिकतम संभव व्यापक गठबंधन बनाया जाए. यदि समाजवादी शक्तियां उन समूहों को भी साथ ला सकें जो हर मुद्दे पर उनसे सहमत नहीं हैं, तो विरोधी ताकतों का आधार कमजोर हो सकता है.
इसी संदर्भ में ईसाई लोकतांत्रिक पार्टी के साथ समझौते की संभावनाओं पर चर्चा होती है. इस पार्टी के भीतर भी अलग-अलग विचारधाराओं के लोग थे. अलेंदे के लिए यह संभावना महत्वपूर्ण थी कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद कुछ मुद्दों पर सहमति बनाकर सैन्य तख्तापलट की आशंका को कम किया जा सके.
हालांकि, चिली की राजनीति में बढ़ते ध्रुवीकरण और विभिन्न पक्षों के बीच अविश्वास के कारण व्यापक समझौता संभव नहीं हो पाया.
यहां से एक बड़ा राजनीतिक सबक निकलता है. किसी भी आंदोलन के लिए केवल अपने समर्थकों की प्रतिबद्धता पर्याप्त नहीं होती. उसे विरोधी शक्तियों की ताकत, संस्थागत संतुलन और व्यापक समाज की वास्तविक परिस्थितियों का भी आकलन करना पड़ता है.
सैन्य तख्तापलट की ओर बढ़ता चिली
1970 से 1973 के बीच चिली की राजनीतिक स्थिति लगातार तनावपूर्ण होती गई.
आर्थिक कठिनाइयां बढ़ीं. सरकार और विपक्ष के बीच संघर्ष तेज हुआ. हड़तालों, विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक टकरावों ने व्यवस्था को अस्थिर किया. सेना के भीतर भी सरकार के प्रति विरोध बढ़ रहा था.
अमेरिकी हस्तक्षेप, आर्थिक दबाव और घरेलू राजनीतिक संघर्ष ने स्थिति को और जटिल बना दिया. इन सभी कारकों की भूमिका और उनके आपसी संबंधों पर इतिहासकारों के बीच विस्तार से चर्चा हुई है.
11 सितंबर 1973 को सेना ने तख्तापलट कर दिया. सैन्य बलों ने राष्ट्रपति भवन ला मोनेदा पर हमला किया. अलेंदे ने आत्मसमर्पण करने के बजाय प्रतिरोध किया और उसी दिन उनकी मृत्यु हो गई.
इसके बाद जनरल ऑगस्टो पिनोशे के नेतृत्व में सैन्य शासन स्थापित हुआ.
सैन्य शासन के दौरान राजनीतिक विरोधियों पर व्यापक दमन किया गया. हजारों लोग मारे गए या लापता हुए. अनेक लोगों को गिरफ्तार किया गया, यातनाएं दी गईं और निर्वासन के लिए मजबूर किया गया. ट्रेड यूनियनों, वामपंथी संगठनों और सामाजिक आंदोलनों पर कठोर कार्रवाई हुई.
यह केवल एक सरकार का पतन नहीं था. यह चिली की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर एक बड़ा हमला था.
क्या लोकतंत्र के रास्ते समाजवाद संभव था?
चिली के अनुभव का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या लोकतांत्रिक माध्यमों से समाजवाद की स्थापना संभव थी.
अलेंदे का विश्वास था कि जनता के समर्थन, चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से समाज में व्यापक परिवर्तन किया जा सकता है. वे समाजवाद को केवल सत्ता पर कब्जा करने की प्रक्रिया नहीं मानते थे. उनके लिए इसका संबंध आर्थिक संसाधनों के सामाजिक उपयोग, जनकल्याण और सामाजिक असमानता को कम करने से था.
लेकिन उनके सामने एक कठिन परिस्थिति थी. लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के विरुद्ध आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य स्तर पर विरोध संगठित हो रहा था.
इस अनुभव से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि लोकतंत्र का रास्ता अपने आप असफल हो जाता है. बल्कि यह समझना चाहिए कि लोकतांत्रिक परिवर्तन की सफलता के लिए व्यापक जनसमर्थन के साथ संस्थाओं की भूमिका, आर्थिक शक्ति का संतुलन और संगठित राजनीतिक गठबंधनों की आवश्यकता होती है.
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से सुरक्षित नहीं होता. उसे मजबूत करने के लिए नागरिक स्वतंत्रताओं, संस्थागत जवाबदेही, सामाजिक भागीदारी और राजनीतिक संवाद की भी आवश्यकता होती है.
अलेंदे की विरासत इसीलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने लोकतंत्र और समाजवाद को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े उद्देश्यों के रूप में देखा.
सामाजिक आंदोलनों और गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका
चिली के अनुभव का एक अन्य पहलू सामाजिक आंदोलनों और गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका से संबंधित है.
सामाजिक आंदोलनों का काम जनता को संगठित करना, उसके अधिकारों के लिए आवाज उठाना और लोकतांत्रिक भागीदारी बढ़ाना है. लेकिन यह भी आवश्यक है कि किसी भी संगठन की राजनीतिक भूमिका, आर्थिक स्रोतों और निर्णय लेने की प्रक्रिया का विश्लेषण किया जाए.
किसी भी देश में सक्रिय सामाजिक संगठनों को केवल उनके नाम या घोषित उद्देश्यों के आधार पर नहीं समझा जा सकता. यह देखना चाहिए कि वे किन मुद्दों पर काम करते हैं, उनके संसाधन कहां से आते हैं और वे व्यापक सामाजिक परिवर्तन में क्या भूमिका निभाते हैं.
चिली का इतिहास बताता है कि सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों और श्रमिक आंदोलनों के बीच संबंधों को लेकर गंभीर बहसें रही हैं.
कुछ लोगों का मानना था कि सामाजिक आंदोलनों को स्थापित राजनीतिक संरचनाओं से अलग रहकर काम करना चाहिए. दूसरे लोगों का तर्क था कि यदि सामाजिक आंदोलनों का राजनीतिक और संस्थागत परिवर्तन से संबंध कमजोर हो जाता है, तो वे व्यापक सत्ता-संरचना को बदलने में सीमित प्रभाव डाल पाएंगे.
यह बहस आज भी प्रासंगिक है. सामाजिक न्याय, श्रमिक अधिकारों और लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए काम करने वाले संगठनों के सामने यह प्रश्न रहता है कि जनआंदोलन और राजनीतिक सत्ता के बीच किस तरह का संबंध होना चाहिए.
इसका उत्तर किसी एक सूत्र में नहीं दिया जा सकता. अलग-अलग देशों की परिस्थितियों और आंदोलनों के अनुभवों से सीखना जरूरी है.
सत्ता में हिस्सेदारी या सामाजिक संरचना में बदलाव?
इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू सत्ता में हिस्सेदारी का प्रश्न है.
कई सामाजिक और राजनीतिक संगठन मानते हैं कि वंचित समूहों को सत्ता में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. यह लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण पक्ष है. यदि समाज के कमजोर और वंचित समूह निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर रह जाते हैं, तो लोकतंत्र अधूरा रह जाता है.
लेकिन एक दूसरा प्रश्न भी है: क्या सत्ता में हिस्सेदारी मिलने से सामाजिक शोषण और असमानता अपने आप समाप्त हो जाते हैं?
यदि सत्ता की संरचना ही असमानता को बनाए रखती है, तो केवल उसमें प्रतिनिधित्व हासिल करना पर्याप्त नहीं हो सकता. सामाजिक परिवर्तन के लिए उन संस्थाओं, आर्थिक संबंधों और नीतियों में बदलाव की आवश्यकता होती है जो असमानता को पैदा करते हैं.
अलेंदे की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे आर्थिक संसाधनों पर सामाजिक नियंत्रण और समाज के पुनर्गठन को परिवर्तन का केंद्रीय उद्देश्य मानते थे.
उनकी दृष्टि में समाजवाद का अर्थ केवल कुछ लोगों को सत्ता में जगह देना नहीं था. इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना था जिसमें उत्पादन, संसाधनों और सामाजिक विकास की दिशा पर व्यापक जनहित का प्रभाव हो.
यह प्रश्न आज भी भारत सहित अनेक देशों में महत्वपूर्ण है. सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और आर्थिक समानता को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता.
चिली से भारत के लिए सबक
चिली का अनुभव भारत जैसे लोकतांत्रिक और सामाजिक रूप से विविध देश के लिए कई महत्वपूर्ण सबक प्रस्तुत करता है.
पहला सबक यह है कि लोकतंत्र को केवल चुनाव तक सीमित नहीं किया जा सकता. लोकतंत्र का अर्थ है कि जनता अपने प्रतिनिधियों को चुने, सरकार की आलोचना कर सके, संगठित हो सके और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा सके.
दूसरा सबक यह है कि लोकतांत्रिक सरकारों के सामने केवल विपक्षी दलों की चुनौती नहीं होती. आर्थिक रूप से शक्तिशाली समूह, संस्थागत हित और बाहरी शक्तियां भी राजनीतिक परिवर्तन को प्रभावित कर सकती हैं.
तीसरा सबक व्यापक राजनीतिक एकता का है. यदि सामाजिक परिवर्तन चाहने वाली ताकतें आपसी मतभेदों के कारण बिखर जाती हैं, तो विरोधी शक्तियों को इसका लाभ मिल सकता है. इसका अर्थ यह नहीं कि सभी मतभेद समाप्त कर दिए जाएं, बल्कि यह है कि साझा उद्देश्यों पर संवाद और समझौते की संभावनाएं तलाशनी चाहिए.
चौथा सबक राजनीतिक रणनीति और वास्तविक शक्ति-संतुलन को समझने का है. किसी आंदोलन को यह देखना चाहिए कि उसकी सामाजिक ताकत कितनी है, संस्थाओं के भीतर उसका कितना प्रभाव है और विरोधी पक्ष की क्षमता क्या है.
पांचवां सबक यह है कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों और सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्यों के बीच संबंध बनाए रखना आवश्यक है. यदि लोकतंत्र को केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन माना जाए, तो उसकी बुनियादी संस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा कमजोर पड़ सकती है.
चिली का अनुभव यह भी बताता है कि समाजवाद, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता पर बहस करते समय अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की अनदेखी नहीं की जा सकती. किसी देश की घरेलू राजनीति पर वैश्विक आर्थिक और सामरिक शक्तियों का प्रभाव पड़ सकता है.
सल्वाडोर अलेंदे की विरासत और लैटिन अमेरिका की नई राजनीति
सल्वाडोर अलेंदे की मृत्यु के बाद भी उनकी राजनीतिक विरासत समाप्त नहीं हुई. लैटिन अमेरिका में अनेक आंदोलनों और सरकारों ने सामाजिक कल्याण, प्राकृतिक संसाधनों पर राष्ट्रीय नियंत्रण और आर्थिक असमानता कम करने के सवालों को फिर से उठाया.
बोलीविया में इवो मोरालेस, वेनेजुएला में ह्यूगो चावेज और दूसरे देशों के वामपंथी आंदोलनों ने अलग-अलग परिस्थितियों में सामाजिक परिवर्तन के कार्यक्रम आगे बढ़ाए. इन सभी के रास्ते एक जैसे नहीं थे और उनकी उपलब्धियों तथा सीमाओं का अलग-अलग विश्लेषण आवश्यक है.
चिली में भी अलेंदे की स्मृति राजनीतिक चेतना का हिस्सा बनी रही. 2019 के व्यापक छात्र और सामाजिक आंदोलनों के दौरान सामाजिक असमानता, सार्वजनिक सेवाओं और आर्थिक व्यवस्था के सवाल फिर से प्रमुखता से सामने आए.
इसी व्यापक राजनीतिक बदलाव के दौर में छात्र आंदोलन से उभरे गेब्रियल बोरिक ने 2022 में चिली के राष्ट्रपति का पद संभाला. अलेंदे की विरासत और उनके विचारों का उल्लेख समकालीन चिली की राजनीति में भी होता रहा है.
यह दिखाता है कि किसी राजनीतिक नेता की मृत्यु के बाद भी उसके विचार और उसके समय के प्रश्न जीवित रह सकते हैं. इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं है. वह वर्तमान को समझने और भविष्य की संभावनाओं पर विचार करने का माध्यम भी है.
निष्कर्ष: लोकतंत्र और सामाजिक परिवर्तन का साझा संघर्ष
सल्वाडोर अलेंदे के जीवन और चिली के अनुभव का सबसे बड़ा सबक यह है कि लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता के प्रश्नों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता.
अलेंदे समाजवाद चाहते थे, लेकिन उनका विश्वास था कि चिली की परिस्थितियों में लोकतांत्रिक रास्ते से समाजवाद की स्थापना की जा सकती है. उन्होंने चुनावी राजनीति, जनसमर्थन और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से परिवर्तन लाने का प्रयास किया.
उनके प्रयोग के सामने घरेलू राजनीतिक संघर्ष, आर्थिक संकट, संस्थागत विरोध और अमेरिकी हस्तक्षेप जैसी गंभीर चुनौतियां थीं. अंततः 1973 के सैन्य तख्तापलट ने उनकी सरकार का अंत कर दिया.
इस इतिहास को समझते हुए हमें न तो लोकतंत्र को अपने आप सभी समस्याओं का समाधान मान लेना चाहिए और न ही उसके महत्व को नकारना चाहिए. लोकतंत्र को प्रभावी बनाने के लिए जनता की संगठित भागीदारी, स्वतंत्र संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और सामाजिक जवाबदेही की जरूरत होती है.
हमें यह भी समझना होगा कि आर्थिक व्यवस्था का स्वरूप लोकतंत्र की वास्तविक गुणवत्ता को प्रभावित करता है. यदि समाज में आर्थिक शक्ति कुछ हाथों में केंद्रित हो जाए और जनता के संसाधनों पर उसका नियंत्रण स्थापित हो जाए, तो राजनीतिक समानता भी कमजोर पड़ सकती है.
सल्वाडोर अलेंदे की विरासत हमें इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित करती है. उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि समाजवादी परिवर्तन की लोकतांत्रिक संभावनाओं को समझना कितना आवश्यक है. उनकी मृत्यु यह भी याद दिलाती है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और जनता की संप्रभुता की रक्षा के लिए सतर्कता और व्यापक सामाजिक एकजुटता जरूरी है.
चिली का इतिहास केवल चिली का इतिहास नहीं है. यह दुनिया के उन सभी समाजों के लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन है जो लोकतंत्र के माध्यम से सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और मानवीय गरिमा पर आधारित व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं.
इसीलिए सल्वाडोर अलेंदे का जीवन, उनका राजनीतिक प्रयोग और उनकी क्रांतिकारी विरासत गंभीर अध्ययन और बहस के विषय बने रहने चाहिए.
धन्यवाद.
- अनीश अंकुर (यह आलेख सांस्कृतिक कर्मी और लेखक अनीश अंकुर द्वारा एक सेमिनार में दिये गये भाषण का टेक्स्ट रुपांतरण है, जिसे उन्होंने AIPSO द्वारा 11 सितम्बर 2024 को मैत्री शांति भवन में आयोजित कार्यक्रम 'चिली में साम्राज्यवादी घुसपैठ और सल्वाडोर अलेंदे की क्रांतिकारी विरासत' पर दिया था. यह कार्यक्रम 11 सितम्बर 1973 को चिली में हुए खूनी सैन्य तख्तापलट के 50 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था, जिसमें वहां के राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे की हत्या कर दी गई थी.)
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